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Showing posts from August, 2026

जंतर-मंतर पर लाठीचार्ज: क्या सुप्रीम कोर्ट की जांच की आंच गृह मंत्रालय तक पहुंचेगी? धर्मेंद्र कुमार

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जंतर-मंतर पर लाठीचार्ज: क्या सुप्रीम कोर्ट की जांच की आंच गृह मंत्रालय तक पहुंचेगी?  धर्मेंद्र कुमार दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन के दौरान हुए लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल का मामला अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर है, जहां अदालत द्वारा एक उच्च-स्तरीय स्वतंत्र जांच समिति के गठन के फैसले ने देश के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। चूंकि दिल्ली पुलिस सीधे तौर पर केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करती है, इसलिए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या देश की शीर्ष अदालत में चल रही इस कानूनी लड़ाई की आंच अंततः गृह मंत्रालय तक पहुंचेगी?  इस पूरे विवाद की जड़ें 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर आयोजित 'संसद चलो' मार्च से जुड़ी हैं। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर दावा किया है कि भीड़ के हिंसक होने और बैरिकेड्स तोड़ने के बाद "न्यूनतम आवश्यक बल" और "चरणबद्ध तरीके" से कार्रवाई की गई। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। हालांकि, याचिकाकर्ताओं द्वारा पेश किए गए साक्ष्य और सादे कपड...

हेमंत ने दिखाई हिम्मत, विपक्ष की बोलती बंद: छात्रों में खुशी की लहर-- धर्मेंद्र कुमार

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हेमंत ने दिखाई हिम्मत, विपक्ष की बोलती बंद: छात्रों में खुशी की लहर -- धर्मेंद्र कुमार  झारखंड की राजनीति और छात्र आंदोलन के इतिहास में 17 अगस्त 2026 का दिन एक बड़े नीतिगत बदलाव और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के रूप में दर्ज हो गया है। JPSC और JSSC CGL परीक्षाओं तथा नियुक्तियों में कथित गड़बड़ियों और शुचिता की मांग को लेकर पिछले 24-25 दिनों से राजधानी रांची की सड़कों और जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में डटे युवाओं के संघर्ष की आखिरकार जीत हुई। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपनी कैबिनेट की एक आपातकालीन बैठक बुलाई और आंदोलनकारी छात्रों की सबसे बड़ी और प्रमुख मांग को सहर्ष स्वीकार करते हुए JSSC- CGL परीक्षा और विवादित आउटसोर्सिंग एजेंसी टीडीपीएल द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं व चयन प्रक्रियाओं को तत्काल प्रभाव से रद्द करने की ऐतिहासिक घोषणा कर दी। मुख्यमंत्री के इस साहसिक और संवेदनशील फैसले ने जहां राज्य के लाखों अभ्यर्थियों में उम्मीद और खुशी की एक अभूतपूर्व लहर दौड़ गई, वहीं छात्रों के कंधे पर बंदूक रखकर चुनावी रोटियां सेंकने की फिराक में बैठे विपक्ष की बोलती पूरी तरह बंद कर दी है। ...

पेपर लीक धंधा चालू आहे ! धर्मेंद्र कुमार

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संदर्भः UGC-NET पेपर लीक पेपर लीक धंधा चालू आहे !  धर्मेंद्र कुमार 'सिर मुड़ाते ही ओले पड़ना'—यह मुहावरा इन दिनों नवनिर्वाचित शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी के लिए बिल्कुल सटीक बैठ रहा है। अभी जोशी ने शिक्षा विभाग की कमान संभाली ही थी और वे इस महकमे की जटिलताओं को समझ भी नहीं पाए थे कि देश के सबसे प्रतिष्ठित और बड़े परीक्षाओं में से एक, यूजीसी-नेट (UGC-NET) का पेपर लीक होने की खबर ने शिक्षा व्यवस्था की चूलें हिलाकर रख दीं। यह महज एक परीक्षा का रद्द होना नहीं है, बल्कि लाखों छात्रों के सपनों, भविष्य और अभिभावकों की गाढ़ी कमाई के साथ क्रूर मजाक है। यह घटना दर्शाती है कि शिक्षा व्यवस्था के भीतर सड़ांध कितनी गहरी है। विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है, लेकिन असली सवाल प्रह्लाद जोशी के सामने है कि क्या वे इस 'दीमक' को खत्म कर पाएंगे? नेट पेपर लीक ने शिक्षा मंत्रालय के सामने एक बार फिर परीक्षा में पारदर्शिता और सुरक्षा जैसी चुनौती खड़ी कर दी है। सिस्टम के भीतर 'दिमागी नक्सलियों की गहरी पैठ  जब हम कहते हैं कि सिस्टम के अंदर 'दिमागी नक्सलियो...

सरकार की ‘गले की हड्डी’ बना JPSC-JSSC आंदोलन! --धर्मेंद्र कुमार

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सरकार की ‘गले की हड्डी’ बना JPSC-JSSC आंदोलन!              धर्मेंद्र कुमार  झारखंड की राजनीति में युवाओं और रोजगार का मुद्दा हमेशा से बेहद संवेदनशील रहा है। लेकिन वर्तमान समय में झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की कार्यप्रणाली को लेकर उपजा जनाक्रोश, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। राज्य के युवाओं का यह असंतोष अब महज सोशल मीडिया की बहसों तक सीमित नहीं है, बल्कि सड़कों पर उतरकर 20 अगस्त को मुख्यमंत्री आवास के घेराव की दी गई खुली चेतावनी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पानी अब सिर से ऊपर गुजर चुका है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह स्थिति सरकार के लिए 'गले की हड्डी' जैसी बन गई है।    सरकार की साख का संकट  इस पूरे विवाद के केंद्र में परीक्षाओं की शुचिता, पेपर लीक के आरोप और चयन प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताएं हैं। JSSC-CGL परीक्षा को रद्द करने की मांग, JPSC परीक्षाओं के विवाद, और परीक्षा आयोजित करने वाली बाहरी एजेंसियों की भूमिका पर उठते सवाल इस...

बिहार की सुशासन बनाम डस्टबिन घोटाला!  धर्मेंद्र कुमार

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बिहार की सुशासन बनाम डस्टबिन घोटाला!   धर्मेंद्र कुमार बिहार की राजनीतिक गलियारे इन दिनों एक नए विवाद से गरमाए हुए हैं। सूचना के अधिकार से प्राप्त आकड़ों ने राज्य के स्वास्थ्य विभाग और नगर निकायों की खरीद प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसे अब आम बोलचाल में 'डस्टबिन घोटाला' कहा जा सकता है। एक ऐसे राज्य में जहां बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं खुद वेंटिलेटर पर हैं, वहां कचरा फेंकने वाले एक साधारण डिब्बे की खरीद में करोड़ों के हेरफेर के आरोप व्यवस्था की नीयत और नीति दोनों को कटघरे में खड़ा करते हैं। इस पूरे विवाद के केंद्र में वो आंकड़े हैं जो आम जनता की गाढ़ी कमाई के दुरुपयोग की गवाही देते हैं। आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, बाजार में मिलने वाले जिस 75 लीटर क्षमता के साधारण डस्टबिन की वास्तविक कीमत लगभग ₹1,200 से ₹1,500 के बीच होती है, उसे सरकारी फाइलों में ₹15,490 प्रति यूनिट की अत्यधिक दर पर खरीदा दिखाया गया है। इतना ही नहीं, इस डिब्बे के अंदर इस्तेमाल होने वाली मामूली प्लास्टिक थैली (कचरा पॉलीथिन), जो बाजार में मात्र ₹5 से ₹10 में मिल जाती है, उसके लि...

लोकतंत्र की चुनौती बनाम दिमागी नक्सल ! धर्मेंद्र कुमार

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लोकतंत्र की चुनौती बनाम दिमागी नक्सल !  धर्मेंद्र कुमार 80वें स्वाधीनता दिवस के पावन अवसर पर लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देश के नाम संबोधन कई मायनों में अभूतपूर्व रहा। उन्होंने एक तरफ जहां 'विकसित भारत 2047' के संकल्प को दोहराया, वहीं दूसरी तरफ देश के आंतरिक परिदृश्य पर बात करते हुए एक नई शब्दावली 'दिमागी नक्सल' (इंटेलेक्चुअल नक्सल) का प्रयोग कर एक नई वैचारिक बहस को जन्म दे दिया है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि देश ने जंगलों में हथियारों के बल पर लड़ने वाले नक्सलियों का तो लगभग खात्मा कर दिया है, लेकिन अब सत्ता के गलियारों और वैचारिक मंचों पर सक्रिय 'दिमागी नक्सलियों' को पहचान कर अलग-थलग करने की जरूरत है। यह शब्दावली सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेदों को एक बार फिर सतह पर ले आई है। सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर 'दिमागी नक्सल' की सटीक परिभाषा क्या है? क्या वे लोग दिमागी नक्सल हैं जो सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं और जनहित में आवाज बुलंद करते हैं? या फिर वे जो सोशल मीडिया के दौर में प्रोपेगैंडा का जवाब उसी ...

विकसित भारतः नारा या हकीकत? धर्मेंद्र कुमार

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विकसित भारतः नारा या हकीकत?  धर्मेंद्र कुमार भारत को वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र और वैश्विक पटल पर विश्व गुरु बनाने का संकल्प एक महत्वाकांक्षी विजन है। लेकिन कोई भी राष्ट्र केवल भव्य बुनियादी ढांचे, विशाल स्मारकों या राजनीतिक विज्ञापनों से विकसित नहीं बनता। किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक प्रगति इस बात से मापी जाती है कि उसकी व्यवस्था अपनी सबसे कमजोर और मूक आबादी के साथ कैसा व्यवहार करती है। जब देश की चौखट पर 80 करोड़ लाचार नागरिक, मजबूर किसान और करोड़ों बेरोजगार युवा खड़े हों, तब विकास के दावों की गहन समीक्षा अनिवार्य हो जाती है। भारतीय लोकतंत्र में सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेतृत्व ने कभी 'प्रधान सेवक' तो कभी 'चौकीदार' की भूमिका को आत्मसात किया। यह शब्दावली जनता में एक गहरा विश्वास जगाती है कि देश की संपत्ति, सुरक्षा और आस्था सुरक्षित हाथों में है। लेकिन जब अयोध्या राम मंदिर जैसे देश की अगाध श्रद्धा के केंद्र से जुड़ी व्यवस्थाओं में पारदर्शिता की कमी या विसंगतियों के आरोप सामने आते हैं, तो करोड़ों श्रद्धालुओं की 'आस्था की चोरी' का अहसास गहराने लगता ह...

हेमंत सोरेन के लिए 'जोर का झटका' है नया माइनिंग बिल धर्मेंद्र कुमार

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हेमंत सोरेन के लिए 'जोर का झटका' है नया माइनिंग बिल  धर्मेंद्र कुमार संसद के दोनों सदनों से खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 का पारित होना भारतीय राजनीति और विशेषकर खनिज बहुल राज्यों के वित्तीय व्यवस्था पर सीधा प्रहार है। राजनीति के गलियारों में इसे "मोदी सरकार द्वारा हेमंत सोरेन को दिया गया अब तक का सबसे बड़ा वित्तीय और राजनीतिक झटका" माना जा रहा है। जहां केंद्र सरकार इसे देश के खनन क्षेत्र में निवेश बढ़ाने, पारदर्शिता लाने और 'एक देश, एक टैक्स' की व्यवस्था को मजबूत करने का बड़ा कदम बता रही है, वहीं झारखंड की झामुमो-कांग्रेस सरकार इसे अपनी वित्तीय नुकसान के रूप में देख रही है। इस विधेयक का झारखंड के विकास व सामाजिक सुरक्षा पर दूरगामी प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता है। क्या है खान एवं खनिज संशोधन विधेयक 2026 इस पूरे विवाद की जड़ें जुलाई 2024 में आए सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले में हैं, जिसमें 9 जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि राज्यों को खनिज युक्त भूमि और खनिज अधिकारों पर टैक्स या सेस लगाने का पूरा संवैधानिक अध...

सत्ता और विपक्ष के गतिरोध की भेट चढ़ा मानसून सत्र धर्मेंद्र कुमार

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सत्ता और विपक्ष के गतिरोध की भेट चढ़ा मानसून सत्र  धर्मेंद्र कुमार संसद लोकतंत्र का सबसे पवित्र मंदिर होती है। जहां देश के भविष्य की दिशा और दशा तय करने वाले कानूनों पर गंभीर विमर्श, असहमति और फिर सहमति की बुनियाद रखी जाती है। लेकिन हाल ही में संपन्न हुआ संसद का मानसून सत्र जिस तरह की राजनीतिक उठापटक और गतिरोध की भेंट चढ़ा, उसने संसदीय लोकतांत्रिक मूल्यों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। इसे यदि सत्ता और विपक्ष की 'नूरा कुश्ती' का नाम दिया जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जनता के करोड़ों रुपये और देश का बहुमूल्य समय उस राजनीतिक खींचतान में स्वाहा हो गया, जिसका अंततः राष्ट्रहित से कोई सरोकार नहीं था। इस सत्र की विडंबना का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पूरे सत्र के दौरान कई बार संसद बमुश्किल 15 मिनट भी सुचारू रूप से नहीं चल सकी। हंगामे, नारेबाजी और तख्तियां लहराने के शोर में सदन की कार्यवाही दिन-प्रतिदिन स्थगित होती रही। सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि इस शोर-शराबे के बीच कई महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले विधेयक बिना किसी गंभीर चर्चा के ही पारित कर दिए गए...

43.61 लाख मतदाताओं का कटा नाम, दोषी कौन? -- धर्मेंद्र कुमार

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झारखंड मे SIR 43.61 लाख मतदाताओं का  कटा नाम, दोषी कौन?       -- धर्मेंद्र कुमार  झारखंड में हाल ही में हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान ने लोकतंत्र की बुनियाद को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य की ड्राफ्ट मतदाता सूची से 43.61 लाख नाम हटाए गए, जो कुल मतदाता संख्या का लगभग 16.5% है। इस कटौती के बाद मतदाताओं की संख्या 2.64 करोड़ से घटकर 2.21 करोड़ रह गई। यह आंकड़ा न केवल अभूतपूर्व है बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों के संकुचन की आशंका भी पैदा करता है। बड़ा सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर वोटरों का मतदाता सूची से कट गया इसके लिए दोषी कौन है ? क्या बीएलओ ने घर घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन किया? क्या मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम के लिए लोगों को जागरुक किया गया? क्या राजनीतिक दलों ने ईमानदारी से अपनी भूमिका का निर्वहन किया? ऐसे कई सवाल स्वतः खड़े हो रहें हैं। जिसका उत्तर कोई देने को तैयार नहीं। सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं के नाम अधिक काटे गए हैं। आंकड़ों की सच्चाई और विसंगतियां मुख्य निर्वाचन अधिकारी के रवि...

क्या यूपीआई पेमेंट बिल से थमेगी डिजिटल लेनदेन की रफ्तार? -- धर्मेंद्र कुमार

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क्या यूपीआई पेमेंट बिल से थमेगी डिजिटल लेनदेन की रफ्तार?                 -- धर्मेंद्र कुमार  भारतीय डिजिटल भुगतान की लाइफलाइन बन चुके यूपीआई को लेकर देश में एक नई बहस छिड़ गई है। संसद में पारित हुए टैक्सेशन एंड अदर लॉ एमेंडेंट बिल,2026 (कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026) ने देश के डिजिटल लेनदेन को एक नए चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। इस विधेयक के माध्यम से सरकार ने ‘पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007’ की धारा 10ए में संशोधन कर बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स को डिजिटल लेनदेन पर शुल्क  लगाने की कानूनी अनुमति देने का रास्ता साफ कर दिया है। वर्ष 2020 से लागू शून्य शुल्क नीति को हटाने वाले इस कदम को सरकार जहां व्यवस्था की स्थिरता के लिए जरूरी बता रही है, वहीं आम लोग और छोटे व्यापारी इसे लेकर संशय में हैं। क्या है यह नया यूपीआई पेमेंट बिल? यह विधेयक कोई तत्काल टैक्स या शुल्क लागू नहीं करता, बल्कि यह एक सक्षमकारी प्रावधान है। इसके तहत केंद्र सरकार को यह कानूनी अधिकार मिल गया है कि वह भविष्य में अधिसूचना जारी कर त...

छात्र आंदोलन: विरोध से झारखंड बंद तक!  धर्मेंद्र कुमार

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छात्र आंदोलन: विरोध से झारखंड बंद तक!   धर्मेंद्र कुमार झारखंड में जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं एवं नियुक्तियों में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ पिछले 17 दिनों से चल रहा छात्रों का आंदोलन आखिरकार राजनीतिक बिसात का हिस्सा बन ही गया है। 10 अगस्त को पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत छात्रों द्वारा किए गए विधानसभा घेराव के दौरान हुई पत्थरबाजी, तोड़फोड़ और उसके बाद प्रशासन द्वारा किए गए लाठीचार्ज व वाटर कैनन के प्रयोग ने इस आंदोलन को एक नया मोड़ दे दिया है। इसी लाठीचार्ज के विरोध में 11 अगस्त मंगलवार को मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा द्वारा राज्यव्यापी 'झारखंड बंद' का आह्वान किया गया है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जो आंदोलन पिछले 15 दिनों से पूरी तरह शांतिपूर्ण ढंग से, लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर चल रहा था, वह अचानक हिंसक और विशुद्ध रूप से राजनीतिक रंग में कैसे रंग गया? क्या जानबूझकर बिगाड़ा गया माहौल ? विधानसभा घेराव के दौरान उत्पन्न हुई अराजक स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है। सरकार का यह आरोप बेहद विचारणीय है कि जब आंदोलनकारी छात्रों और सरकारी प्रतिनिधियों के बीच द...

आजादी के सात दशक और 'जल, जंगल, जमीन' से महरूम मूल निवासी! - धर्मेंद्र कुमार

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विश्व आदिवासी दिवस  आजादी के सात दशक और 'जल, जंगल, जमीन' से महरूम मूल निवासी।          - धर्मेंद्र कुमार  प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस पर सजने वाले राजनीतिक मंच, पारंपरिक नृत्यों की चकाचौंध और भारी-भरकम बजट के सरकारी विज्ञापन एक ऐसी कृत्रिम दुनिया रचते हैं, जिसका जमीनी हकीकत से दूर दूर तक कोई नाता नहीं है। हकीकत देखनी हो तो उन सुदूर आदिवासी गांवों में जाइए, जहां आजादी के सात दशकों बाद भी देश के मूल निवासी पीने के साफ पानी के लिए नालों और चुआर पर निर्भर हैं। 'विकास' के जिस खूनी मॉडल को हमने देश में लागू किया है, उसने प्रकृति के इन सच्चे सिपाहियों को उनके ही पैतृक 'जल, जंगल, जमीन' से बेदखल कर विस्थापन की अंतहीन त्रासदी में झोंक दिया है।  आबादी का गणित बनाम प्रतिनिधित्व की शून्यता 2011 की जनगणना के आधिकारिक आंकड़ों  के अनुसार, भारत में आदिवासियों की आबादी लगभग 10.45 करोड़ है, जो देश की कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत है। यदि राज्यवार वितरण पर नजर डालें तो इस आबादी की सघनता और उनके साथ हो रहा छलावा साफ नजर आता है। पूर्वोत्त...

संदर्भः छात्र आंदोलनअनशन-प्रदर्शन कहां हैं समाधान ? धर्मेंद्र कुमार

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संदर्भः छात्र आंदोलन अनशन-प्रदर्शन कहां हैं समाधान ?  धर्मेंद्र कुमार   आज देश का युवा एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहां उसकी वर्षों की मेहनत और सुनहरे भविष्य के सपने चंद रुपयों में बिक रहे हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार,पंजाब, कर्नाटक, झारखंड से लेकर दिल्ली तक चल रहे छात्र आंदोलन किसी राजनीतिक दल से प्रेरित नहीं हैं। यह पूरी तरह 'स्वयं स्फूर्त' हैं, जो व्यवस्था की नाकामी से उपजे आक्रोश को प्रकट करता है। सवाल बहुत गंभीर है कि क्या सरकारें छात्रों की वास्तविक समस्याओं को समझने में सक्षम हैं, या फिर हर बार की तरह केवल 'आईवॉश' और लीपापोती करके मामले को टालने का प्रयास किया जा रहा है? छात्रों का देशव्यापी आक्रोश छात्रों का यह आंदोलन किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने एक विकराल राष्ट्रीय संकट का रूप ले लिया है। झारखंड की राजधानी रांची में जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) परीक्षाओं में हुई धांधली और पेपर लीक को लेकर छात्र आमरण अनशन पर हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आयोग के अध्यक्ष को इस्तीफा तक देना पड़ा। वहीं उत्तर प्रदेश के प्रयागरा...

युवाओं की हुंकार बनाम सत्ता का आश्वासन  धर्मेद्र कुमार

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युवाओं की हुंकार बनाम सत्ता का आश्वासन   धर्मेद्र कुमार झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं (JPSC और JSSC) में कथित भर्ती घोटालों के खिलाफ रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब एक निर्णायक मोड़ पर है। हफ्तों की तपिश और संघर्ष के बाद, यह आंदोलन सिर्फ युवाओं की नाराजगी नहीं, बल्कि राज्य के नीतिगत सुधारों का एक सशक्त घोषणापत्र बन चुका है। 7-8 अगस्त को स्टेट गेस्ट हाउस में सरकार के मंत्रियों और छात्रों के 11-सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के बीच दो राउंड वार्ता हुई। सरकार ने इस गतिरोध को तोड़ने की दिशा में एक सकारात्मक कदम बढ़ाया है। लिखित गारंटी का सवाल बैठक के दौरान मंत्रियों ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि छात्रों की मांगें जायज और प्रशासनिक शुचिता के लिए आवश्यक हैं। सरकार की ओर से आश्वासन दिया गया है कि इन सभी बिंदुओं पर मुख्यमंत्री से विस्तार से चर्चा कर त्वरित समाधान निकाला जाएगा। यह स्वीकारोक्ति युवाओं के संघर्ष की पहली नैतिक जीत है। हालांकि, सत्ता के पुराने अनुभवों को देखते हुए छात्रों का रुख बिल्कुल स्पष्ट है। आंदोलनकारियों ने दो-टूक कहा है कि जब तक सरकार...

कांग्रेस मुक्त भारत बनाम कांग्रेस युक्त भाजपा  धर्मेंद्र कुमार

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कांग्रेस मुक्त भारत बनाम कांग्रेस युक्त भाजपा   धर्मेंद्र कुमार राजनीति की दुनिया में नारों का अपना एक अलग विज्ञान होता है। कुछ नारे चुनाव जिताते हैं, कुछ नारे इतिहास बनाते हैं, और कुछ नारे इतने 'सदाबहार' होते हैं कि समय के साथ खुद ही अपना मज़ाक उड़ाने लगते हैं। साल 2014 के आसपास एक कालजयी नारा गढ़ा गया था—"कांग्रेस मुक्त भारत"। जनता ने इस पर खूब तालियां बजाईं। लेकिन दशक बीतते-बीतते क्रोनोलॉजी ऐसी बदली कि आज आम नागरिक खुद को ठगा महसूस कर रहा है। वह भाजपा की कार्यकारिणी की लिस्ट देख कर असमंजस में है कि क्या यह वही बीजेपी है या भाजपा का कांग्रेसीकरण हो गया है।  भारतीय राजनीति के सबसे बड़े वैज्ञानिक आविष्कार को दुनिया 'बीजेपी वाशिंग मशीन' के नाम से जानती है। इस मशीन को चलाने का ईधन हैं ईडी, सीबीआई और आईटी। प्रक्रिया बड़ी जादुई है। कल तक जो कांग्रेसी नेता भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा था, जिसके 70,000 करोड़ के घोटालों पर खुद प्रधानमंत्री चुनावी रैलियों में दहाड़ते हैं, उसके खिलाफ जांच एजेंसियां अचानक एक्टिव हो जाती हैं। आधी रात को छापेमारी का डर और जेल...

राजनीति की बिसात पर 'सनातन' का कैसा अपमान! धर्मेंद्र कुमार

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राजनीति की बिसात पर 'सनातन' का कैसा अपमान!  धर्मेंद्र कुमार जो अनादि है, अनंत है, अजन्मा है और नश्वरता की सीमाओं से परे है, क्या उसे किसी मान - अपमान की अपेक्षा है? जो स्वयं संपूर्ण ब्रह्मांड का नियंता हो, उसका अपमान करने की हैसियत भला इस नश्वर संसार में किसकी हो सकती है? लेकिन आधुनिक भारत की राजनीति ने श्रद्धा और दर्शन के इस मूल तत्व को पूरी तरह बिसरा दिया है। आज 'सनातन' शब्द आध्यात्मिक उत्कर्ष का मार्ग होने के बजाय राजनीतिक ध्रुवीकरण की प्रयोगशाला का एक सबसे सुविधाजनक उपकरण बनकर रह गया है। सच तो यह है कि सनातन धर्म का सबसे बड़ा अपमान तब होता है, जब वोट बैंक की फसल काटने के लिए इसके प्रतीकों को चुनावी रैलियों या संसद की सीढ़ियों पर तमाशा बना दिया जाता है। भारतीय राजनीति का यह चरित्र बेहद चिंताजनक है कि यहां धर्म और उसकी आस्था का उपयोग जनहित के मुद्दों को सुलझाने के लिए नहीं, बल्कि जनता को आपस में लड़ाने, बांटने और एक स्थायी राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा करने के लिए किया जाता है। जब तक कोई दल या नेता धर्म का उपयोग अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए करता रहता है, तब त...

हेमंत जी हिम्मत दिखाइए, छात्रों से करिए संवाद धर्मेंद्र कुमार

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हेमंत जी हिम्मत दिखाइए, छात्रों से करिए संवाद  धर्मेंद्र कुमार झारखंड का युवा आज एक बार फिर अपने भविष्य की रक्षा के लिए सड़कों पर है। रांची का जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम पिछले एक सप्ताह से केवल एक धरना स्थल नहीं, बल्कि राज्य के हजारों युवाओं की हताशा, आक्रोश और उम्मीदों का केंद्र बन चुका है। जेपीएससी (14वीं सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा) और जेएसएससी भर्ती परीक्षाओं में लगे कथित धांधली और पेपर लीक के आरोपों ने राज्य की पूरी चयन प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का यह आश्वासन कि 'सरकार गंभीर है। इसकी बानगी दिख भी रही है। इस मामले में अभी तक लगभग दो दर्जन अधिकारियों एवं कर्मचारियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। आयोग को अध्यक्ष एल खियांग्ते ने इस्तीफा दे दिया उनसे भी चार बार पूछताछ हो चुकी है। लेकिन परीक्षा को कैंसिल करना और अधिकारियों को सजा दिलाने से केवल बात नहीं बनेगी। मुख्यमंत्री को आगे बढ़कर खुद कमान संभालनी होगी। युवाओं को यह भरोसा दिलाना होगा कि भविष्य में कोई पेपर लीक नहीं होगा। क्योंकि लोकतंत्र में संवाद ही हर गतिरोध का एकमात्र हल है।   युव...

ये बांकीपुर की जनता भाई, आपकी गुलाम नहीं  धर्मेंद्र कुमार

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ये बांकीपुर की जनता भाई, आपकी गुलाम नहीं   धर्मेंद्र कुमार बिहार की राजनीति में बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र हमेशा से वैचारिक चेतना और राजनीतिक जागरूकता का केंद्र रहा है। यह वह क्षेत्र है जिसने बड़े-बड़े राजनीतिक दिग्गजों को बनते और बदलते देखा है। लेकिन 3 अगस्त को बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के अप्रत्याशित परिणाम ने पुराने सारे रिकार्ड को एक झटके में पलट कर रख दिया। इस चुनावी परिणाम की गूंज बिहार सहित पूरे देश में सुनाई दे रही है। यहां बड़ा सवाल यह है कि मात्र आठ महीनों ऐसा क्या घटित हो गया कि बांकीपुर की जनता का भाजपा से मोहभंग हो गया। बिहार में हाल के दिनों हुए राजनीतिक घटनाक्रम और बयानों ने बांकीपुर के मतदाताओं के आत्मसम्मान को झकझोर कर रख दिया है। आज बांकीपुर की गलियों से एक ही गूंज सुनाई दे रही है—"ये बांकीपुर की जनता है भाई, आपकी गुलाम नहीं।" यह नारा सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उस कथित अहंकार का करारा जवाब है, जो मतदाताओं को अपनी 'स्थायी जागीर' समझने की भूल कर बैठती है। मतदाताओं के साथ धोखा बांकीपुर सहित पुरे बिहार की जनता स्वयं को ठगा महसू...

ढहा भाजपा का किला, पीके की हुई प्रचंड जीत धर्मेंद्र कुमार।

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बांकीपुर में जन सुराज का उदय: ढहा भाजपा का किला, पीके की हुई प्रचंड जीत  धर्मेंद्र कुमार पटना। बिहार की राजनीति में 3 अगस्त 2026 का दिन एक ऐतिहासिक बदलाव के रूप में दर्ज हो गया है। लगभग तीन दशकों से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का अभेद्य गढ़ रही बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में प्रशांत किशोर (पीके) ने न केवल अपनी पहली प्रत्यक्ष चुनावी परीक्षा पास की, बल्कि बड़े अंतर से जीत दर्ज कर बिहार में 'तीसरे विकल्प' को हकीकत में बदल दिया है।   आंकड़ों के आईने में बांकीपुर का संग्राम बांकीपुर उपचुनाव के आंकड़े जन सुराज की एकतरफा लहर और पारंपरिक दलों की विफलता को साफ दर्शाते हैं। इस उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर कुल 63,203 वोट प्राप्त कर विजयी रहे वहीं भाजपा के नीरज कुमार सिन्हा को कुल 44,250 वोट मिला जबकि राजद की प्रत्याशी रेखा कुमारी को मात्र 14,085 वोट पर ही संतोष करना पड़ा। इस उपचुनाव में 34.30% मतदान हुआ था। कम मतदान के बावजूद 18,953 वोटों के बड़े अंतर से प्रशांत किशोर की जीत यह साबित करता है कि जो भी मतदाता पोलिंग बूथ तक पहुंचे, उन्होंने पारंपरिक राजन...

गाली का राष्ट्रवाद: देशद्रोही गाली बनाम राष्ट्रहित के अपशब्द धर्मेंद्र कुमार

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गाली का राष्ट्रवाद: देशद्रोही गाली बनाम राष्ट्रहित के अपशब्द  धर्मेंद्र कुमार आज के दौर में यदि आप शुद्ध भाषा का प्रयोग करते हैं, तो यकीन मानिए आप विकास की रेस में बहुत पीछे छूट चुके हैं। आधुनिक व्याकरण अब ‘संज्ञा, सर्वनाम और क्रिया’ से नहीं, बल्कि इस बात से तय होता है कि आपकी दी हुई गाली या झिड़की किस ‘कटेगरी’ में आती है। भाषा विज्ञान के नए शोधकर्ताओं ने गालियों का लोकशाहीकरण करते हुए उन्हें दो मुख्य विभागों में बांट दिया है—देशद्रोही गालियां और राष्ट्रहित के अपशब्द। दरअसल जब दूसरों को या दूसरों के लिए गाली दी जाती है तो वह हमारे लिए सहज होता है लेकिन वहीं अपशब्द या गाली हमारे लिए दी जाती है तो हम असहज हो जाते हैं। यही प्रकृति का नियम है।  आइए, इस नए भाषाई राष्ट्रवाद को समझें, ताकि अगली बार जब आपके मुंह से कुछ 'अमर्यादित' निकले, तो कम से कम उसका 'केवाईसी' तो दुरुस्त रहे! आजकल आंदोलनों का तरीका बदल गया है। अब तख्तियां लेकर नारे लगाने का जमाना पुराना हो गया है। अब आंदोलन रील्स, मीम्स और हैशटैग्स से चलते हैं। जब देश का 'जेन-ज़ी' (Gen Z) वर्ग रोजगार या...

Gen-Z देश की ताकत है, दुश्मन नहीं ! दमन से नहीं, अवसरों से संवरेगा युवा भविष्य  धर्मेंद्र कुमार

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Gen-Z देश की ताकत है, दुश्मन नहीं ! दमन से नहीं, अवसरों से संवरेगा युवा भविष्य  धर्मेंद्र कुमार डिजिटल क्रांति के इस युग में भारत दुनिया का सबसे युवा देश होने का गौरव रखता है। वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मी इस 'जेन-जी' (Gen-Z) पीढ़ी को आज देश की सबसे बड़ी ताकत और रीढ़ माना जाना चाहिए। यदि सरकार इस पीढ़ी की असीम तकनीकी दक्षता की क्षमता का सही दिशा में इस्तेमाल करे, तो निश्चित रूप से भारत वैश्विक स्तर पर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अग्रणी बनने की क्षमता रखता है। लेकिन विडंबना यह है कि सरकार इस ऊर्जावान पीढ़ी की भावनाओं, उनकी चिंताओं और उनके आक्रोश को समझने के बजाय, उन्हें अपना विरोधी या शत्रु मान बैठी है। दिल्ली के जंतर मंतर पर पिछले दिनों पेपर लीक को लेकर हुए आंदोलन के समाप्त होने के बाद जो परिदृश्य उभरकर सामने आया है, वह अत्यंत चिंताजनक और लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। युवाओं को डराने का प्रयास   हाल के दिनों में आंदोलन में शामिल रहे युवाओं को रणनीतिक रूप से टारगेट किया जा रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी खबरें आ रही हैं जहां आंदोलनकारी युवाओं और उनके परिवार...