43.61 लाख मतदाताओं का कटा नाम, दोषी कौन? -- धर्मेंद्र कुमार
झारखंड मे SIR
43.61 लाख मतदाताओं का कटा नाम, दोषी कौन?
-- धर्मेंद्र कुमार
झारखंड में हाल ही में हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान ने लोकतंत्र की बुनियाद को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य की ड्राफ्ट मतदाता सूची से 43.61 लाख नाम हटाए गए, जो कुल मतदाता संख्या का लगभग 16.5% है। इस कटौती के बाद मतदाताओं की संख्या 2.64 करोड़ से घटकर 2.21 करोड़ रह गई। यह आंकड़ा न केवल अभूतपूर्व है बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों के संकुचन की आशंका भी पैदा करता है। बड़ा सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर वोटरों का मतदाता सूची से कट गया इसके लिए दोषी कौन है ? क्या बीएलओ ने घर घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन किया? क्या मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम के लिए लोगों को जागरुक किया गया? क्या राजनीतिक दलों ने ईमानदारी से अपनी भूमिका का निर्वहन किया? ऐसे कई सवाल स्वतः खड़े हो रहें हैं। जिसका उत्तर कोई देने को तैयार नहीं। सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं के नाम अधिक काटे गए हैं।
आंकड़ों की सच्चाई और विसंगतियां
मुख्य निर्वाचन अधिकारी के रवि कुमार के अनुसार, 30 जून से 29 जुलाई तक बूथ स्तर अधिकारियों (बीएलओ) ने घर-घर सत्यापन अभियान चलाया। इसके बाद हटाए गए नामों को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया। जिसमें मृत मतदाताओं की कुल संख्या: 7.63 लाख, स्थायी रूप से स्थानांतरित: 15.92 लाख, अनुपस्थित: 14.50 लाख और फर्जी मतदाता: 4.38 लाख हैं। इसके अलावा 1.16 लाख लोगों ने फॉर्म पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया, जिससे उनका नाम भी सूची से बाहर कर दिया गया।
सबसे असामान्य पहलू यह है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं के नाम अधिक काटे गए हैं। लगभग 31 लाख महिलाएं बनाम 25 लाख पुरुष सूची से बाहर हुए। सामान्यतः पुरुष रोजगार के लिए पलायन करते हैं, लेकिन महिलाओं को ‘स्थायी रूप से स्थानांतरित’ दिखाकर हटाना प्रशासनिक चूक या जल्दबाजी का संकेत देता है।
जिलों में कटौती का परिदृश्य
सबसे ज्यादा नाम शहरी और औद्योगिक जिलों में कटे हैं। पूर्वी सिंहभूम में 3,95,439 नाम हटाए गए। वहीं रांची, धनबाद और बोकारो में भी बड़ी संख्या में कटौती हुई। इसके विपरीत, खूंटी, लोहरदगा और सिमडेगा जैसे छोटे, ग्रामीण और आदिवासी बहुल जिलों में कटौती अपेक्षाकृत कम रही। यह अंतर प्रवासन और प्रशासनिक कार्यप्रणाली दोनों को उजागर करता है।
चुनाव आयोग और सरकार की जिम्मेदारी
क्या इसके लिए केंद्रीय चुनाव आयोग को दोषी ठहराया जा सकता है? प्रशासनिक दृष्टिकोण से तो आयोग को पूरी तरह दोषी कहना उचित नहीं होगा। उच्चतम न्यायालय ने मतदाता सूची के शुद्धिकरण को लोकतांत्रिक शुचिता के लिए आवश्यक माना है। लेकिन जमीनी स्तर पर बीएलओ की कार्यप्रणाली और विसंगतियों ने आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। राज्य सरकार की भी जिम्मेदारी है कि एक भी योग्य मतदाता का नाम सूची से न कटे इसके लिए ईमानदारी से प्रयास हो। यदि सरकार समय रहते सक्रिय नहीं होती और अंतिम सूची में भी यही स्थिति बनी रहती है, तो वैला परिस्थिती में आयोग पर दोषारोपण करना सीधे तौर पर राजनीति से प्रेरित माना जाएगा।
दावा और आपत्ति का अवसर
निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह प्रक्रिया अंतिम नहीं है। वर्तमान में 63.24 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी कर उनकी प्रविष्टियों की जांच की जा रही है। आयोग ने आश्वासन दिया है कि किसी भी वैध मतदाता का नाम बिना सुनवाई के अंतिम सूची से नहीं हटाया जाएगा।
5 अगस्त से 4 सितंबर तक का दावा और आपत्ति का समय प्रभावित नागरिकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। राजनीतिक दलों और नागरिक समाज को इस अवधि में सक्रिय रहकर यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी वास्तविक मतदाता वंचित न रह जाए।
लोकतंत्र में एक भी योग्य नागरिक का मताधिकार छीनना व्यवस्था की विफलता है। झारखंड में हुए इस व्यापक शुद्धिकरण अभियान को प्रशासनिक दृष्टि से आवश्यक कहा जा सकता है, लेकिन महिलाओं के नामों की असामान्य कटौती और बीएलओ की लापरवाही गंभीर चिंता का विषय है। सरकार एवं आयोग के पदाधिकारीयों को इस विषय पर विशेष निगरानी करने की आवश्यकता है। निर्वाचन आयोग और राज्य सरकार दोनों को यह सुनिश्चित करना होगा कि शुद्धिकरण के उत्साह में कहीं लोकतांत्रिक अधिकारों का संकुचन न हो जाए। अंतिम मतदाता सूची 7 अक्टूबर को प्रकाशित होगी। उम्मीद यही है कि यह सूची त्रुटिहीन साबित हो, ताकि लोकतंत्र की नींव मजबूत बनी रहे।
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