Sunday, May 3, 2026

ममता की सोशल इंजीनियरिंग में क्या भाजपा कर पाएगी सेंधमारी ?--धर्मेंद्र कुमार


24 घंटों के बाद पश्चिम बंगाल में किसकी सरकार बनेगी यह स्थिती स्पष्ट हो जाएगी। पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से सामाजिक समीकरणों और सांस्कृतिक अस्मिता पर टिकी रही है। पहले वामपंथियों ने मुस्लिम एवं ग्रामीण जनता को अपने वोट बैंक के तौर पर संगठित एवं संरक्षित किया और उसी वोट बैंक के आसरे तीन दशकों तक बंगाल पर शासन किया। ममता ने उसी  परंपराओं को आगे बढ़ाया। ममता बनर्जी ने अपने तीन कार्यकालों में जिस तरह से सोशल इंजीनियरिंग  का ताना-बाना बुना है, वह तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी ताक़त बन चुका है। मुस्लिम वोट बैंक, ग्रामीण महिलाओं के बीच लोकप्रिय योजनाएं, और स्थानीय पहचान को मज़बूती से जोड़कर उन्होंने एक ऐसा सामाजिक गठजोड़ तैयार किया है जो भाजपा के लिए चुनौती बना हुआ है।

ममता की सोशल इंजीनियरिंग

ममता ने जहां ‘कन्याश्री’ और ‘रूपश्री’ जैसी योजनाओं ने महिलाओं के बीच गहरी पैठ बनाई है। वहीं मुस्लिम समुदाय का बड़ा हिस्सा अब भी तृणमूल के साथ मज़बूती से खड़ा है। ममता ने  बंगाल की संस्कृति, भाषा और स्थानीय गौरव को चुनावी विमर्श में लगातार प्रमुखता दी है।

भाजपा की रणनीति

भाजपा ने बंगाल में अपनी पकड़ मज़बूत करने के लिए अप्रत्यक्ष रुप से चुनाव आयोग सहित कई संवैधानिक एजेंसियों का खुलकर प्रयोग किया। इस रणनीति ने विपक्ष को संस्थागत दबाव के मुद्दे उठाने का मौका भी दिया। भाजपा ने बंगाल की राजनीति को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने के साथ ही हिंदूत्व वोट बैंक की ध्रवीकरण करने कि कोशिश की है। वहीं बीजेपी ने  बेरोज़गारी भत्ता और रोज़गार सृजन के वादों के ज़रिए युवा वर्ग को आकर्षित करने का प्रयास किया। जंगलमहल और उत्तर बंगाल में भाजपा ने सामाजिक असंतोष को भुनाने की रणनीति अपनाई है।

टकराव की स्थिति

ममता की सोशल इंजीनियरिंग का सबसे मज़बूत पहलू यह है कि उन्होंने वोटों का समेकन  किया है, जबकि भाजपा अब भी वोटों का विखंडन  रोकने की चुनौती से जूझ रही है। भाजपा ने 2021 में 77 सीटें जीतकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी, लेकिन 2026 में बहुमत की ओर बढ़ने के लिए उसे ममता के सामाजिक गठजोड़ में सेंध लगानी होगी जो आसान नहीं है।
बंगाल की राजनीति में भाजपा की चुनौती केवल चुनावी नहीं, बल्कि सामाजिक है। जब तक भाजपा ममता की सोशल इंजीनियरिंग को तोड़ने में सफल नहीं होगी, तब तक बंगाल में सत्ता परिवर्तन का सपना अधूरा ही रहेगा। यह चुनाव केवल सीटों का नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों की जंग  है—जहां हर वोट एक पहचान और हर पहचान एक राजनीतिक शक्ति बन चुकी है। एक बात जो महत्वपूर्ण है भाजपाइयों को समझनी होगी कि बंगाल की राजनीति देश के अन्य राज्यों की राजनीति से बिलकुल अलग है। बस इतना समझ लीजिए कि तमाम हथकंडे अपनाने के बाद भी भाजपा बंगाल के लोगों की भावनाओं को पूरी तरह समझने में असफल रही। पूरे देश की जनता की नजरें बंगाल चुनाव के नतीजों पर टिकी है। वैसे राजनीति संभावनाओं का खेल है कुछ भी हो सकता है। बंगाल का जनादेश यह तह करेगा कि भावनाओं की राजनीति भारी पड़ती है या विकास का वादा अपना रंग दिखाता है।

Saturday, May 2, 2026

नारी शक्ति वंदन – संकल्प या सिर्फ़ चुनावी लॉलीपॉप ? धर्मेंद्र कुमार

भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाला नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 ऐतिहासिक कदम कहा गया। लेकिन यह कदम ज़्यादा ‘पोस्ट-डेटेड चेक’ साबित हुआ। आधी आबादी को उम्मीद की चाबी थमा दी गई, मगर ताला 2034 से पहले खुलने का नाम नहीं लेता।

तालियों से लेकर ठंडे बस्ते तक

20 सितंबर 2023 को संसद ने सर्वसम्मति से इस बिल को पास किया और 27 सितंबर को राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दिया। भाजपा को लगा कि इस अधिनियम के सहारे वह 2024 की चुनावी वैतरणी पार कर लेगी। लेकिन सजग महिलाओं ने उन्हें ‘ठेंगा’ दिखा दिया। नतीजा—2024 में अपेक्षित सफलता नहीं मिली और कानून ठंडे बस्ते में चला गया।
2026 में जब पाँच राज्यों के चुनावी रण में सभी दल व्यस्त थे, तभी सरकार को अचानक याद आया कि महिलाओं को आरक्षण देना ज़रूरी है। आनन-फानन में 16,17 और 18 अप्रेल को तीन दिवसीय विशेष सत्र बुलाकर तीन विधेयक पेश किए गए:
• 131वां संविधान संशोधन विधेयक – लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 850।
• परिसीमन विधेयक – राज्यों में नई सीटों का निर्धारण।
• केंद्र शासित प्रदेश संशोधन विधेयक – दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी में महिलाओं को आरक्षण।
विपक्ष ने साफ कहा—“यदि सरकार की नियत साफ है तो मौजूदा 543 सीटों में ही 33% आरक्षण लागू कर दीजिए, हम समर्थन देंगे।” लेकिन सरकार की मंशा लागू करने की नहीं, बल्कि लटकाने और विपक्ष पर ठीकरा फोड़ने की थी।

कानून की असलियत

कानून कहता है कि पहले जनगणना होगी, फिर परिसीमन होगा, तब जाकर 2029 में महिलाएँ 181 सीटों पर लड़ पाएँगी। जनगणना 2027 तक, परिसीमन 2028 में और उसके बाद चुनाव। यानी 2023 में तालियाँ बटोरने वाला कानून 2029 तक कागज़ पर ही रहेगा। इसे ‘लॉलीपॉप’ न कहें तो क्या कहें?

अधूरा न्याय

33% में SC/ST महिलाओं को हिस्सा मिला, पर OBC बहनें कहाँ गईं? देश की 60% आबादी की महिलाओं को कानून ने छुआ तक नहीं। राज्यसभा और विधान परिषद को भी बाहर रखा गया—जहाँ असली नीति बनती है, वहाँ महिलाओं की हिस्सेदारी 13% ही रहेगी। यह कैसा सशक्तिकरण, जो आधे रास्ते में ही दम तोड़ दे? नारी शक्ति वंदन अधिनियम का नाम जितना भव्य है, उसका असर उतना ही खोखला। यह अधिनियम महिलाओं के सशक्तिकरण का संकल्प है या सिर्फ़ चुनावी लॉलीपॉप—यह सवाल जनता के सामने है। सरकार ने आधी आबादी को उम्मीद का सपना दिखाया, लेकिन उसकी ‘एक्सपायरी डेट’ 2029 लिख दी।

सरकार की मंशा

सिंतबर 2023 में संसद में नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के पास होने के साथ ही इसको लागू करने लिए जनगणना का कार्य की शुरुआत करनी चाहिए थी लेकिन मजे की बात यह है कि इस अधिनियम के कानून बनने के बाद इसको नोटिफाई 2026 में किया गया। इससे इश कानून को लागू करने की सरकार की मंशा साफ है। संसद में मुहंकी खाने के बाद सरकार इसको लेकर विपक्ष को घेरने का प्रयास किया लेकिन देश की आधी आबादी बहुत ही समझदार है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विधानसभा एक निंदा प्रस्ताव लाया गया जिस पर चर्चा हुई। विपक्ष का स्पष्ट तोर पर कहना है कि सरकार की नियत साफ है तो 543 में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू कर दो हम समर्थन देने को तैयार है।
1996 से लटका बिल पास होना अपने-आप में क्रांति है। 454-2 का बहुमत बताता है कि देश की सियासत मन से तैयार है। पंचायतों में 14.5 लाख महिलाएं आज नेतृत्व कर रही हैं - वही मॉडल संसद में दोहराया जाए तो तस्वीर बदल सकती है। यदि पार्टियां नैतिक जिम्मेदारी लेकर कानून का इंतजार किए बिना ही चुनाव में 33% टिकट महिलाओं को दें। 
नारी शक्ति वंदन अधिनियम ‘ऐतिहासिक’ तभी बनेगा जब वह ‘तत्काल’ बने। वरना आने वाली पीढ़ी इसे किताबों में ‘चुनावी लॉलीपॉप’ के नाम से ही पढ़ेगी। संकल्प को सिद्धि में बदलने के लिए नीयत के साथ ‘तारीख’ भी चाहिए। वरना ताली दोनों हाथ से नहीं बजती - एक हाथ कानून का है, दूसरा सरकार की इच्छाशक्ति का। फिलहाल, आधी आबादी इंतजार कर रही है। सवाल बस इतना है: इंतजार कब तक?

Thursday, April 30, 2026

किसके माथे सजेगा बंगाल का ताज ?--धर्मेंद्र कुमार


लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा और सत्ता की जंग

पश्चिम बंगाल में बुधवार 29 अप्रेल को 2026 के विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण का मतदान शांतिपूर्ण संपन्न हो गया। दूसरे चरण में भी लगभग 93 प्रतिशत मतदान हुआ। यह जहां लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत हैं। वहीं लगभग 27 लाख मतदाता जो वोट देने से वंचित रह गए, यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काला अध्याय के तौर पर याद रखा जाएगा। यह कहीं ना कहीं भारतीय संविधान प्रदत्त भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकारों के हनन का मामला है। बड़ा सवाल यह है कि न्यायालय ने भी इस विषय को गंभीरता से नहीं लिया, सिवाय एक दो टिप्पणी करने के। यह लोकतंत्र के लिए खतरे का संकेत भी हैं। बंगाल का चुनाव सिर्फ 294 सीटों की जंग नहीं है। ये लड़ाई बंगाल की अस्मिता, सियासी दिशा, संघीय ढांचे और जनता के मूड की असली परीक्षा है। मुख्य रुप से बंगाल में टीएमसी और भाजपा के बीच सीधी टक्कर है। लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन और ISF जैसे दल भी समीकरण बदल सकते हैं।

कौन से मुद्दे रहे हावी ?

बंगाल के पूरे चुनाव में कोई एक मुद्दा ऐसा नहीं रहा जिससे किसी एक पक्ष में लहर चली हो। भाजपा ने प्रारंभ से घुसपैठिए, हिंदुत्व और ममता की सिंडिकेट एवं भ्रष्टाचार के मुद्दे पर फोकस किया। वहीं ममता ने केंद्र सरकार की ईडी, सीबीआई, चुनाव आयोग और संघीय ढ़ाचे पर हमले के साथ ही इसको बंगाल की अस्मिता से जुड़ा मुद्दा बनाने का प्रयास किया। इस चुनाव में एक बात सबसे महत्वपूर्ण रही कि लोग मुखर होकर किसी के भी पक्ष में बोलते नहीं दिखे। यह बात सही है कि शुरुआत से भाजपा ने एक नैरेटीव गढ़ने का प्रयास किया कि बंगाल के लोग ममता सरकार की सिंडिकेट से परेशान है, लोग बदलाव चाहते है और बंगाल में लोगों की पहली पसंद भाजपा है। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। वहीं ममता ने लगातार केंद्रीय एजेंसियों व चुनाव आयोग के खिलाफ जिस प्रकार के प्रदर्शन किया वह अपने समर्थकों व वोटरों को यह विश्वास दिलाने में कामयाब रही कि केंद्र की मोदी सरकार बंगाल की अस्मिता के साथ खिलवाड़ कर रही है। ममता ने चुनाव आयोग द्वारा एसआईआर के तहत काटे गए 90 लाख मतदाताओं के नाम को मुद्दा बनाने की पुरजोर कोशिश की इसका कितना लाभ ममता बनर्जी को मिलेगा यह देखना लाजमी होगा। 


भाजपा की चुनावी रणनीति

भाजपा ने बंगाल चुनाव को जीतने के लिए सभी प्रकार के दांव चले। तमाम केंद्रीय एजेंसियों के माध्यम से चारो तरफ से ममता को घेरने का प्रयास किया गया। जिसमें सबसे महत्वपूर्ण एसआईआर के माध्यम से टीएमसी के गढ़ माने जाने वाले क्षेत्र में भारी संख्या में मतदाताओं का नाम कटना। शांतिपूर्ण व निष्पक्ष चुनाव के नाम पर टीएमसी के सिंडिकेट के प्रमुख कार्यकर्ताओं के खिलाफ कानुनी कार्रवाई। इस संबंध में कोलकात्ता हाई कोर्ट ने टिप्पणी भी की। भारी संख्या में पदाधिकारियों का तबादला भी चर्चा का विषय बना था। इस बार भाजपा बंगाल को जीतने के लिए कोई कसर छोड़ना नहीं चाहती थी, उसने ममता को हर तरफ से घेरने का हरसंभव प्रयास किया। इसका कितना लाभ भाजपा को मिलेगा यह तो 4 मई को ही पता चलेगा।

टीएमसी की रणनीति  

यह चुनाव टीएमसी एवं ममता बनर्जी के लिए 15 साल की सत्ता की अग्निपरीक्षा थी। ममता ने प्रारंभ से ही इस चुनाव को भीतरी बनाम बाहरी बनाने का प्रयास किया। वहीं बंगाल में केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग के साथ संघीय ढ़ाचे पर हमला को आगे रख कर स्वंय को एक विकटीम के तौर पर प्रस्तुत करने का प्रयास किया। इसका कितना लाभ ममता को मिलेगा यह तो फिलहाल ईवीएम में कैद है जो 4 मई को ही पता चलेगा।

किसका पक्ष कितना मजबूत

जहां तक ममता की बात करें तो लक्ष्मीर भंडार, कन्याश्री, रूपश्री जैसी योजनाओं के कारण ग्रामीण महिलाओं में ममता की मजबूत पकड़ है। वहीं बंगाल में 30 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय का वोट टीएमसी का एक मजबूत आधार है। हालांकि एसआईआर के तहत भारी संख्या में उनके वोट कटे हैं। शहरी क्षेत्र के मिडिल क्लास के वोटरों में टीएमसी की गहरी पैठ है। वहीं भाजपा की बात करें तो हिंदू ध्रुवीकरण का लाभ मिलेगा, मतुआ, राजबंशी SC वोटों में सेंधमारी सफल रही तो भाजपा को अच्छी बढ़त मिल सकती है। मतदाताओं के नाम कटने का सीधा फायदा भाजपा को ही मिलेगा। वहीं लेफ्ट-कांग्रेस और आईएसएफ का जितना वोट शेयरिंग बढ़ेगा उसका लाभ भी भाजपा को ही मिलेगा। भाजपा की कुछ सीटों का लाभ होता तो दिख रहा है लेकिन कितना यह कहना थोड़ा कठिन है।

क्या बोल रहे हैं एक्सपर्ट ?

 राजनीतिक जानकारों के अनुसार भ्रष्टाचार और एंटी-इंकम्बेंसी ममता पर भारी पड़ता दिख रहा है जिसके कारण इस बार जनता का रुझान भाजपा की ओर है। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि भाजपा की सीटें बढ़ने की उम्मीद तो है, लेकिन सरकार टीएमसी की ही बनेगी। एक्जिट पोल में ज्यादातर सर्वे भाजपा के पक्ष में हैं, वहीं कुछ टीएमसी के पक्ष में भी हैं। जहां भाजपा के लिए बंगाल का चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न है वहीं टीएमसी के लिए यह चुनाव उसके अस्तित्व से जुड़ा हुआ हैं। बंगाल के चुनाव में मतदान के बढ़ते प्रतिशत का सही सही आकलन कर पाना आसान नहीं कि यह किस ट्रेंड बढ़े हैं। 4 मई को पता चलेगा कि बंगाल की अस्मिता पर जनता ने किसे ताज पहनाया ?

Tuesday, April 28, 2026

पलटीमार गद्दार बनाम राजनीतिक अवसरवाद या लोकतांत्रिक मूल्यों का अवसान। धर्मेंद्र कुमार



भारतीय लोकतंत्र में दल बदल कोई नई घटना नहीं है। पिछले दिनों आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल हुए। इससे पहले कांग्रेस और अन्य दलों के कई सांसद व विधायक भी अपनी पार्टी छोड़कर दूसरे दलों में जा चुके हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या होता है कि राजनेता वर्षों तक जिस पार्टी में रहे, जहां उन्हे मान-सम्मान मिला, उसी पार्टी को अचानक "गलत" बताकर नेता रातों-रात दूसरी पार्टी में चले जाते हैं। तब उनके लिए नैतिकता, नीति और सिद्धांत कोई मायने नहीं रखता, ना ही उन्हें जनता की कोई फिक्र होती है, जिसने उनपर भरोसा किया और उन्हें सदन तक पहुंचाया। यह केवल राजनीतिक अवसरवाद नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ खिलवाड़ है। वर्तमान परिपेक्ष्य में नेताओं के लिए उनका निजी हित और स्वार्थ ज्यादा महत्वपूर्ण है।

किसने कब मारी पल्टी
1985 में दल बदल रोकने के लिए दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) लागू हुई। लेकिन नेताओं का दल बदलने का सिलसिला कभी रुका नहीं। हाल की कुछ घटनाओं की अगर बात करें तो 2019 में कर्नाटक  17 विधायकों ने सामूहिक इस्तीफा देकर कांग्रेस-जेडीएस की सरकार गिरा दिया और भाजपा में शामिल हो गए। 2020 में मध्यप्रदेश में  ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस के 22 विधायक भाजपा में शामिल हुए। दिल्ली (2026) – आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल हुए।

 क्या कहता है दल बदल कानून
 
दल बदल कानून कहता है कि यदि कोई सांसद/विधायक अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त हो सकती है। लेकिन यदि दल का एक बड़ा समूह (कम से कम दो-तिहाई) टूटकर दूसरी पार्टी में जाता है, तो यह "विलय" कहलाता है और सदस्यता बच जाती है। इस कानून में कई त्रुटियां हैं जिसके आसरे नेता अपनी सदस्यता बचाने में सफल रहते है। नेता अक्सर पद से इस्तीफा नहीं देते, बल्कि संवैधानिक पद पर बने रहते हुए ही दल बदल करते हैं। विधायक औऱ सांसद की सदस्यता का समाप्त करने का अधिकार सदन के अध्यक्ष पास होता है। यही कारण है कि दल बदल के मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं।
नेताओं का अपने हित साधने के लिए दूसरे दलों में शामिल होना केवल राजनीतिक अवसरवाद नहीं, बल्कि यह जनता के साथ विश्वासघात है। जनता जिस विचारधारा और पार्टी के नाम पर वोट देती है, वही नेता अपनी हीत व सुख सुविधा के लिए उस जनादेश को बदल देता है। भारतीय राजनीति में दल बदल की प्रवृत्ति लोकतंत्र की विश्वसनीयता को कमजोर करती है। यदि किसी नेता को सचमुच लगता है कि वह गलत पार्टी में था, तो उसे सबसे पहले अपने पद से इस्तीफा देकर जनता के सामने जाना चाहिए। लेकिन ऐसा शायद ही कभी होता है। लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए ज़रूरी है कि दल बदल कानून को और कठोर बनाया जाए, ताकि जनादेश का सम्मान हो और राजनीति में "गद्दारी" की जगह "निष्ठा" को महत्व मिले।

 

Wednesday, April 22, 2026

झालमुड़ी पर चुनावी बवाल – लोकतंत्र का नया स्वाद! धर्मेंद्र कुमार



झाड़ग्राम की झालमुड़ी ने ऐसा तूफ़ान खड़ा कर दिया कि बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और महँगाई जैसे मुद्दे अब कहीं पीछे छुट गए हैं। अब चुनावी बहस का नया एजेंडा बन गया है—झालमुड़ी का स्वाद और उसकी प्लेटिंग! महंगाई के इस दौर में भी कम कीमत में झालमुड़ी आपके मुंह का स्वाद बदल सकता है। झालमुड़ी में मुख्य रुप से मुड़ी और मसालों का इसतेमाल किया जाता है। मुड़ी जिसे बिहार में भुंजा या चबेनी वहीं दिल्ली, गुजरात में मुरमुरा भी कहा जाता है। आज के दौर में झालमुड़ी राज्यों के दायरे से उपर उठ कर सर्वव्यापी हो गया है। जहां मुड़ी बंगाल के कल्चर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वहीं ओड़िशा में मुड़ी के साथ घुघनी या छोले और पकोड़े नाश्ते के तौर पर लोग खाना पसंद करते है।

ममता दीदी की मिर्ची

प्रधानमंत्री मोदी के चटकारे लेते ही ममता दीदी का पारा चढ़ गया। उन्होंने इसे “स्क्रिप्टेड ड्रामा” करार दिया और आरोप लगाया कि कैमरा पहले से फिट था, झालमुड़ी भी SPG के जवान से बनवाई गई। यानी अब बंगाल की राजनीति में झालमुड़ी भी सुरक्षा कवच में लिपटी हुई है।

भाजपा का नमकीन जवाब

भाजपा समर्थक इसे जनता से जुड़ाव बताते हैं। लेकिन विपक्ष का तंज़ है—“जनता से जुड़ना है तो झालमुड़ी खाकर नहीं, महँगाई घटाकर और बेरोज़गारी मिटाकर जुड़िए।” जनता सोच रही है कि अगर रोज़गार मिल जाए तो झालमुड़ी भी रोज़ खाई जा सकती है।
हेलिकॉप्टर बनाम झालमुड़ी
तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि पीएम के झालमुड़ी ब्रेक की वजह से हेमंत सोरेन का हेलिकॉप्टर हवा में ही मंडराता रह गया। अब लोकतंत्र का सवाल यह है—हेलिकॉप्टर की लैंडिंग ज़्यादा अहम है या झालमुड़ी की प्लेटिंग?

मुफ़्त झालमुड़ी योजना?

झालमुड़ी अब राष्ट्रीय मुद्दा बन चुकी है। जनता उम्मीद लगाए बैठी है कि अगली बार चुनावी घोषणापत्र में “मुफ़्त झालमुड़ी योजना” भी शामिल होगी। अगर यही रफ़्तार रही तो संसद के अगले सत्र में “मुफ़्त झालमुड़ी योजना” लागू करने को लेकर सत्ता एवं विपक्ष बहस करते हुए दिखेंगे। जहां सत्ता पक्ष कहेगा “झालमुड़ी सबको मिलेगी”, वहीं विपक्ष अपने अंदाज में तंज़ कसेगा “ झालमुड़ी में नमक कम है, मिर्च ज़्यादा है”।

क्या भाजपा बंगाल में करेगी किला फतह या करना होगा थोड़ा और इंतजार — धर्मेंद्र कुमार



आईविजन। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के कारण प्रदेश का राजनीतिक तापमान काफी बढ़ गया है। पिछले 15 वर्षों से बंगाल की राजनीति तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के इर्द-गिर्द घूमती रही है। 2021 विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने 215 सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया था, जबकि भाजपा ने 77 सीटों पर कब्ज़ा जमाया और स्वयं को बंगाल में एक मज़बूत विपक्ष के रूप में स्थापित किया।
2021 के विधानसभा चुनाव में वोट प्रतिशत की बात करें तो टीएमसी को 48.02 प्रतिशत, भाजपा को 38.15 प्रतिशत और कांग्रेस को 2.94 प्रतिशत वोट मिले थे। लेकिन कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई। वोट प्रतिशत के दृष्टिकोण से देखें तो टीएमसी और भाजपा में लगभग 10 प्रतिशत का अंतर था। यही अंतर भाजपा को सत्ता से दूर रखने में सबसे बड़ी बाधा बना।

वर्तमान परिदृश्य (2026)

बंगाल की सत्ता पर टीएमसी की मजबूत पकड़ है और विशेषकर मुस्लिम वोट बैंक उसका स्थायी आधार बना हुआ है। ममता सरकार ने स्वास्थ्य और शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया, जिससे आम लोगों को राहत मिली। सरकारी योजनाओं का लाभ हर वर्ग तक पहुँचाने की कोशिश भी की गई। हालांकि रोजगार सृजन के मामले में सरकार कहीं न कहीं असफल रही, बावजूद इसके बंगाल की जनता की पहली पसंद अब भी ममता ही हैं।
दूसरी ओर भाजपा बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और घुसपैठ जैसे मुद्दों को लेकर चुनावी मैदान में उतरी है।

चुनाव आयोग की तैयारी

केंद्रीय चुनाव आयोग 2026 का विधानसभा चुनाव निष्पक्ष कराने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों का बड़े पैमाने पर फेरबदल और अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती से स्पष्ट है कि आयोग इस बार किसी भी प्रकार का जोखिम उठाने के मूड में नहीं है। वहीं समय पर एसआईआर को पूरा कराने के लिए आयोग ने जजों की नियुक्ति भी की है, ताकि उसकी निष्पक्षता पर कोई सवाल न उठ सके।

भाजपा की रणनीति
भाजपा का शीर्ष नेतृत्व जानता है कि बंगाल में सत्ता तक पहुँचने के लिए 2021 के लगभग 10 प्रतिशत वोट अंतर को समाप्त करना होगा। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम मतदाता लगभग 27% हैं और उनका प्रभाव 70–85 विधानसभा सीटों पर निर्णायक माना जाता है।
2021 चुनाव में इन मुस्लिम-बहुल सीटों में से लगभग 85 पर मुकाबला हुआ था, जिनमें से टीएमसी ने 75 सीटें जीती थीं। ऐसे में वोट अंतर को समाप्त किए बिना भाजपा के लिए सत्ता तक पहुँचना कठिन है।
एसआईआर के दौरान 10 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं के नाम काटे गए। चुनाव आयोग के आँकड़ों से स्पष्ट है कि सीमावर्ती जिलों—कूचबिहार, उत्तर दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया और उत्तर व दक्षिण 24 परगना—में सबसे अधिक नाम हटाए गए हैं। कहा जा रहा है कि इनमें से अधिकांश वोटर टीएमसी समर्थक थे। इसका सीधा असर चुनाव पर पड़ेगा और संभावना है कि भाजपा को इसका लाभ मिल सकता है। यदि ऐसा हुआ तो भाजपा बंगाल में सरकार बनाने में सफल हो सकती है।
राजनीति में कुछ भी संभव है। 2026 का विधानसभा चुनाव टीएमसी के लिए अग्नि परीक्षा है, वहीं भाजपा के लिए यह अवसर है कि वह वोट अंतर को कम करके सत्ता तक पहुँचने की कोशिश करे।

Friday, November 7, 2025

बढ़ता मतदान, बदलता बिहार: 2025 के पहले चरण की लोकतांत्रिक तस्वीर धर्मेंद्र कुमार



बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण में 18 जिलों की 121 सीटों पर 64.66% मतदान हुआ जो पिछले 20 वर्षों के सभी रिकार्ड को धवस्त कर एक नया प्रतिमान स्थापित किया. यह आंकड़ा न केवल पिछले चुनावों की तुलना में अधिक है, बल्कि यह राज्य की राजनीतिक चेतना, जन-सक्रियता और संभावित सत्ता परिवर्तन की आहट भी देता है. मतदान में हुए इस वृद्धि का आकलन सभी दलों द्वारा अपने अपने पक्ष में बताया जा रहा है. वहीं राजनीतिक जानकार भी मतदान में हुए इस वृद्धि को लेकर स्पष्ट रुप से कुछ भी कहने से बचते दिख रहे है. 

मतदान प्रतिशत में वृद्धि के मायने

राजनीति जानकारों ने बिहार के प्रथम चरण में मतदान प्रतिशत में हुई वृद्धि के कई कारण की चर्चा की. उनका मानना है कि  जनता की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी के कारण वोट प्रतिशत में वृद्धि हुई है. इसमें जहां युवाओं और पहली बार वोट डालने वालों की भागीदारी ने इस प्रतिशत को ऊपर उठाया है. वहीं दूसरी ओर सत्ता विरोधी लहर की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है. यह बदलाव की चाहत या विकल्प की तलाश के कारण भी सकता है. बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि जैसे स्थानीय मुद्दों ने मतदाताओं को प्रेरित किया. जानकारों के अनुसार वोट प्रतिशत में वृद्धि का एक प्रमुख कारण मतदान में  महिलाओं की बढ़ती भागीदारी है. कई जिलों में तो महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा. यह सामाजिक जागरूकता और महिला सशक्तिकरण का संकेत है,  2020 में कुल 57.05% मतदान हुआ था जिसमें महिलाओं का मतदान प्रतिशत 59.6% था जबकि पुरुषों का 54.7% था. वहीं  2025 के प्रथम चरण में कुल मतदान 64.66% रहा, जिसमें महिलाओं का मतदान प्रतिशत लगभग 69% और पुरुषों का 61% रहा. 2020 के मुकाबले 2025 में महिलाओं के वोट प्रतिशत में लगभग 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इस बार के चुनाव में महिलाओं ने अपने पुराने रिकार्ड को पीछे छोड़ दिया. इसका मुख्य कारण नीतीश सरकार द्वारा ठीक चुनाव से पहले 1.21 करोड़ महिलाओं के खाते में 10 हजार रुपये दिया जाना बताया जा रहा है. इस कारण भी एनडीए इसको अपने पक्ष होने का दावा कर रही है और इसमें कुछ तो सत्यता भी है. वहीं दूसरी ओर महागठबंधन वहीं पुराने ढर्रे पर चलते हुए इस बढ़ते हुए वोट प्रतिशत को सरकार के खिलाफ लोगों के गुस्सा को बताया जा रहा है. लेकिन एक बात तो तय है कि यदि यही ट्रेंड दूसरे चरण के मतदान में भी कायम रहा तो एक बात तो स्पष्ट है कि जिस गठबंधन की जीत होगी उसको प्रचंड बहुमत मिलेगा. 
कहां कितना हुआ मतदान
बिहार के बेगूसराय जिला में सबसे अधिक मतदान 67.32% दर्ज की गई वहीं मधेपूरा में 65.74% मुजफ्फरपुर में 65.23% गोपालगंज में 64.96% पटना में 62% बक्सर में 63% भोजपुर में 64% कैमूर में 65% रोहतास में 66% औरंगाबाद में 67% अरवल में 64% सहित अन्य जिलों में भी कमोवेश 60% से अधिक मतदान हुए. कई जिलों में रिकॉर्ड मतदान ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान खींचा है, जहां सामाजिक आंदोलनों और युवा नेतृत्व की भूमिका अहम रही.
 बिहार में बढ़ा हुआ मतदान प्रतिशत लोकतंत्र की मजबूती और जन-जागरण का प्रतीक है. यह संकेत देता है कि मतदाता अब केवल दर्शक नहीं, बल्कि निर्णायक भूमिका में हैं. 2025 का यह चुनाव न केवल सीटों का गणित बदलेगा, बल्कि राजनीतिक विमर्श और जन अपेक्षाओं की दिशा भी तय करेगा.

Thursday, November 6, 2025

सरकार के नहीं दोष गोसाई धर्मेंद्र कुमार



गोस्वामी तुलसीदास जी ने सदियों पहले लिख दिया था — "समरथ के नहीं दोष गोसाई." त्रेता युग में राम थे, द्वापर में कृष्ण. और कलियुग में सरकार है. अब सरकार कोई साधारण संस्था नहीं, यह एक चमत्कारी सत्ता है. जो चाह ले तो जनता से थाली ताली बजवा सकती है, दीया जलवा सकती है, मोबाइल की टॉर्च से कोरोना को डरवा सकती है. यह वही सरकार है जो भ्रष्टाचारियों को सत्य हरिशचंद्र बना सकती है और सच बोलने वालों को कालकोठरी में तपस्या का अवसर प्रदान करती है. और यदि सरकार डबल इंजन वाली हो तो फिर वहां कथित रुप से राम राज्य होने की बात कही जाती है. डबल इंजन वाली सरकार में ना खाता ना बही जिधर बुलडोजर चल जाए वही सही. वहां पीड़ितों को न्याय मिले या मिले लेकिन सरकार के खिलाफ बोलने वालो को पुलिस प्रशासन द्वारा निश्चित रुप से पुरस्कृत किया जाता है और पुरस्कार इतना जबर्दस्त मिलता है कि पुरस्कार पाने .वालो के आने वाली सात पीढ़ीयां फिर कभी सपने में भी सरकार के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे. अपराधी, वर्तमान समय में बलात्कारी, भ्रष्टाचारी और कलंकी नेता ही कलयुग का कलिंक अवतार माना जाता है.
समर्थता का नया परिभाषा
सब साधन संपन्न सरकार समर्थवान है क्योंकि उसके पास जनता की याददाश्त से तेज़ वाइपिंग पावर है. सरकार समर्थ है क्योंकि वह सवालों को देशद्रोह में बदलने की योग्यता रखती है. वह सवाल को ही झूठा साबित कर उसको खारिज कर देती है. सरकार समर्थ है क्योंकि वह विकास की परिभाषा को रील्स और रैप में बदल चुकी है. अब दोष किसका है? दोष उनका है जो सरकार से सवाल पूछते हैं. दोषी वो हैं जो कहते हैं कि "बेरोजगारी बढ़ रही है", "महंगाई चरम पर है", "लोकतंत्र सिकुड़ रहा है". अरे भाई आप क्यों नहीं समझते है कि सरकार से सवाल पूछना मतलब राष्ट्र से सवाल पूछना क्योंकि सरकार ने यह सिद्ध कर दिया है कि वही राष्ट्र है, और राष्ट्र से सवाल पूछना मतलब राष्ट्रविरोध.
 आत्मनिर्भरता का नया स्वरुप
सरकार ने कहा — "आत्मनिर्भर बनो." तो जनता ने पकोड़े तले, रील्स बनाए, और कुछ ने तो जेल की रोटियों में भी आत्मनिर्भरता खोज ली. अब सरकार ने जनता पर भरोसा नहीं करते हुए स्वंय को आत्मनिर्भर बनाने की राह ढ़ूढ़ निकाली है. सरकार ने इस आत्मनिर्भर प्लान पर काम करना शुरु भी कर दिया है. सरकार ने जनता के वोट को अपने नाम करने का अनोखा तरीका है. इसमें जोखिम बिलकुल भी नहीं सही रहा तो सरकार के पक्ष में और अगर चोरी पकड़ी गई तो संवैधानिंक संस्था की जिम्मेवारी यह प्लान रंग भी ला रहा है. आप सरकार से उम्मीद क्यों करते हैं? क्या सरकार ने सबका ठेका ले रखा है? क्या आपको हर बार बताना पड़ेगा कि सरकार का काम सिर्फ चुनाव जीतना और सरकार चलाना है जनकल्याण करना नहीं?
 लोकतंत्र का नया रंगमंच
संसद अब बहस का नहीं, बहिष्कार का मंच बन चुकी है. मीडिया अब सवाल नहीं पूछता, सरकार की चालीसा गाता है. न्यायपालिका अब न्याय नहीं देती, टिप्पणी से काम चला लेती है. और जनता? जनता अब मेमोरी कार्ड की तरह है. जब तक फॉर्मेट नहीं होती, तब तक पुराने सवालों को याद करती रहती है. इसलिए हे गोसाई, हे भक्तगण, हे आत्मनिर्भर नागरिकों — दोष मत ढूंढो, सवाल मत पूछो, थाली बजाओ, दीया जलाओ, रील बनाओ, सरकार से मिलने वाली रेवड़ीयों का आनंद लीजिए और सरकार को समरथ मानकर उसकी हर लीला को रामलीला समझकर जयकारा लगाइए. क्योंकि — "समरथ सरकार के नहीं दोष गोसाई!" तो प्रेम से समरथ सरकार की जय बोलिए. जय हो.

Wednesday, November 5, 2025

वादों की बारिश में भीगता लोकतंत्र: चुनावी मौसम का विज्ञान ✍️धर्मेंद्र कुमार



जब आसमान बिलकुल साफ नीला हो और बिन बादल  वादों की बारिश हो तो यकिन मानिए वह चुनावी मौसम आगाज़ है. चुनावी मौसम में अक्सर लगातार वादों की बारिश होती रहती है. यह वो बारिश है जिसमें जनता भींगती नहीं है बल्कि वादों कि बारिश की बूंदें कानों के रास्ते दिल तक पहुंच कर गुदगुदी करती हैं, और दिमाग में भ्रम पैदा करती हैं. यह चुनावी मौसम का असर है इसका कोई इलाज नहीं है.
 वादों का मानसून
हर पांच साल में लोकतंत्र के आंगन में एक विशेष प्रकार का मानसून आता है, जिसमें माननीय नेतागण बादलों की तरह गरजते हैं, बिजली की तरह चमकते हैं, और फिर वादों की बौछार करते हैं. इस खुशनुमा चुनावी मौसम की बारिश का अपना ही आनंद है. माननीय लोग वादों की झड़ी लगा देते है और बेचारी जनता इस वादों की बारिश को हमेशा की तरह झेलती है. उसे पता है कि यह चुनावी मौसम की बादों की बारिश से ना तो “हर हाथ को काम मिलता है,” ना ही “हर खेत को पानी,” ना ही “हर जेब में पैसा और हर घर में वाई फाई,” और इतने वर्षों में ना ही “भ्रष्टाचार खत्म हो पाया और ना ही समाज के अंतिम पायदान पर खड़े आम नागरिकों का ही विकास हुआ.” जनता भी इस मौसम की अनुभवी है. वो जानती है कि माननीयों द्वारा आयोजित ये वादों की नकली बारिश दरअसल जनकल्याण के लिए अपितु लोगों को दिगभ्रमित करने के लिए की जाती है.
 चुनावी कैटवॉक
चुनाव मौसम में माननीय नेताओं के फैशन परेड के क्या कहने हैं. माननीय लोग ऐसे सज-धज कर निकलते हैं जैसे हर ओर फैशन शो हो रहा हो. कोई टोपी बदलता है, कोई रंग तो कोई पार्टी ही बदल देता है. भाषणों में "गरीबों का मसीहा" बनने की होड़ लग जाती है. और जनता? वो हर बार उम्मीद करती है कि “इस बार शायद सचमुच कुछ बदले,” बदलाव तो होता है लेकिन सिर्फ नारों में. अफसोस जनता हर बार छली जाती है. यही लोकतंत्र कि विशेषता है कि जिसके दम पर लोकतंत्र जीवित है उसी लोकतंत्र में तंत्र हमेशा लोक पर हावी रहता है. 
वादों की प्रयोगशाला
नेताओं के पास एक गुप्त लैब होती है, जहां काफी जांच परख के बाद वादों को तैयार किया जाता है. वहां से निकलते हैं.  त्वरित विकास के कैप्सूल, मुफ़्तख़ोरी बम व मुफ्त की रेवड़ी योजनाएं, धर्मनिरपेक्ष सिरप और राष्ट्रवाद का नूडल्स . इनका सेवन करने से जनता को कुछ समय के लिए लोकतंत्र का स्वाद आता है, लेकिन बाद में पेट में मरोड़ और पछतावा होता है.
 जनता का जादू
फिर भी, सबसे बड़ा वोट का जादू जनता के पास होता है. वो चाहे तो राजा को रंक बना दे, और रंक को राजा.  लेकिन अक्सर वो जादू या तो जाति में उलझ जाता है, या जुमलों में फंस कर रह जाता हैं. चुनावी मौसम में वादों की बारिश का आनंद वही ले सकता है जो जानता है कि ये बारिश नहीं, बर्फबारी है. जो ऊपर से मुलायम लगती है, लेकिन नीचे सब कुछ जमा देती है. इस बार भी चुनावी मौसम आया है. वादों की बौछार शुरू है. छाता मत निकालिए, नज़रें तेज कीजिए.  क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत वादों को परखने में है, न कि  उनमें भीगने में. तो चुनावी मौसम का आंनद लीजिए और मस्त रहिए.

Tuesday, November 4, 2025

अत्यंत अद्भुत गुणकारी है चुनावी मौसम में श्री सत्ता नारायण भगवान की कथा ✍️धर्मेंद्र कुमार


जब-जब लोकतंत्र संकट में आता है, तब-तब श्री सत्ता नारायण भगवान अवतरित होते हैं. उनका आगमन न तो पुष्पक विमान से और न ही किसी तपस्वी की तपस्या से बल्कि वे आते हैं चुनाव आयोग की घोषणा के साथ, और जाते हैं परिणाम की घोषणा के बाद. इस दौरान वे जनता के बीच चमत्कार करते हैं, वादों की वर्षा करते हैं, और हर गली-नुक्कड़ में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं.
 अवतार की लीला
श्री सत्ता नारायण भगवान के अवतार अनेक रूपों में होते हैं, कभी वे किसान के हमदर्द बनते हैं तो कभी बेरोजगारों के मसीहा. चुनावी मौसम में उनके चमत्कारों की गति इतनी तीव्र होती है कि पांच सालों की निष्क्रियता एकदम से सक्रियता में बदल जाती है. सड़कें बनती हैं, घोषणाएं होती हैं, और जनता को याद दिलाया जाता है कि "आप ही हमारे मालिक हैं" बशर्ते वोट सही बटन पर पड़े.
 प्रसाद वितरण
श्री सत्ता नारायण भगवान की कथा में प्रसाद का विशेष महत्व होता है. भक्तों को मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, और मुफ्त वादों का प्रसाद मिलता है. कुछ विशेष भक्तों को तो टिकट नामक अमृत भी मिलता है, जिससे वे स्वयं सत्ता के हिस्सेदार बन जाते हैं. इस प्रसाद की गुणवत्ता चुनाव के बाद स्वतः समाप्त हो जाती है, जैसे ही भगवान बैक टू रियलिटी मोड में लौटते हैं.
 कथा की पुनरावृत्ति
हर चुनावी मौसम में वही कथा दोहराई जाती है कि "हमने किया", "हम करेंगे", "वे निकम्मे थे", "हम महान हैं". जनता, जो इस कथा की श्रोता है, हर बार नए कथा वाचकों के माध्यम से वही पुरानी सत्ता नारायण की कथा सुनती है. फर्क बस इतना है कि इस बार कथा वाचकों की वाणी में और भी अधिक डिजिटल प्रभाव है, रिल्स, ट्वीट्स और वायरल वीडियो के रूप में.
 भक्तों की श्रद्धा
श्री सत्ता नारायण भगवान के भक्तों की श्रद्धा अडिग होती है. वे हर बार विश्वास करते हैं कि इस बार भगवान सचमुच कल्याण करेंगे. वे भूल जाते हैं कि पिछली बार भी यही कथा थी, बस कथा वाचक बदले थे. भक्तों की स्मृति इतनी क्षीण होती है कि वे पांच साल की पीड़ा को पांच मिनट के प्रवचन में भूल जाते हैं.
कथा का फलादेश
कथा का अंत हमेशा एक ही होता है, कुछ भक्त निराश होते हैं, कुछ सत्ता में शामिल हो जाते हैं, और कुछ अगले चुनाव तक फिर से तपस्या में लीन हो जाते हैं. श्री सत्ता नारायण भगवान अगली बार जब फिर अवतरित होंगे तो फिर वही कथा सुनाई जाएगी, और फिर वही प्रसाद वितरित होगा.  चुनावी मौसम में श्री सत्ता नारायण भगवान की कथा अत्यंत गुणकारी है. यह जनता को आशा देती है, नेताओं को मंच देती है, और लोकतंत्र को तमाशा बना देती है. यह कथा हर पांच साल में दोहराई जाती है, और हर बार हम इसे "नया युग" मानकर सुनते हैं. सच्चाई यही है कि श्री सत्ता नारायण भगवान की कथा का श्रवण और प्रसाद ग्रहण के बिना लोकतंत्र व जनता का कल्याण संभव ही नहीं है. इति श्री सत्ता नारायण कथा समाप्तः.

Monday, November 3, 2025

अंधभक्त बनाम चमचे: कौन है नंबर वन ? ✍️ धर्मेंद्र कुमार


 
राजनीति का मंच अब अखाड़ा बन चुका है.  जहां विचारधाराओं की कुश्ती नहीं बल्कि  वफादारी की डब्ल्यू डब्ल्यू इ (WWE) चल रही है. एक ओर अंधभक्त हैं, जो अपने नेताओं की हर बात को वेदवाक्य मानते हैं और उनके झूठे बयानों को भी सच बताने के लिए तमाम तरह के गलत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. थेथरई उनका अमोध अस्त्र है, यदि उससे भी बात नहीं बनी तो गाली गलौज व मारपीट पर उतर जाते हैं. दरअसल अंधभक्तों की शिक्षा मूलतः व्हाट्स्अप यूनिवर्सिटी से हुई है. व्हाट्स्अप यूनिवर्सिटी से तो आप वाकिफ होंगे ही. आजकल उसी का ट्रेंड है. वहीं दूसरी ओर चमचों की बिरादरी है, जो अपने नेताओं के जूते चमकाने में इतनी महारत रखते हैं कि कभी-कभी इनके नेता खुद भ्रमित हो जाता है कि वो नेता है या सेलिब्रिटी.
 तथ्यों की तिजोरी में ताले
इन दोनों वर्गों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनको तथ्यों से परहेज़ है. इतिहास की जानकारी तो इन्हें व्हाट्स्अप यूनिवर्सिटी से मिलती है, और भूगोल इनके लिए एक ट्रोल पोस्ट मात्र हैं. जब भी कोई सवाल उठता है, तो जवाब में आते हैं गूगल से प्राप्त अधकचरे आंकड़े, पुरानी क्लिपिंग्स, और भावनात्मक ब्लैकमेल पोस्ट. इन्हें अपने नेताओं के समक्ष अपनी वफादारी साबित करनी पड़ती है ताकि इनकी राजनीति की दुकान चलती रहे.
 राजनीति में 'चाटुकारिता' ही सफलता की एक मात्र कुंजी है
किसी जमाने में भारतीय राजनीति में विचारधारा, नीति और जनसेवा की बात होती थी. लेकिन अब वहां ट्रेंडिंग हैशटैग, फोटोशूट, और टीवी डिबेट की नौटंकी है. नेता अब भाषण नहीं देते, डायलॉग मारते हैं. और उनके अनुयायी भक्त और चमचे उन डायलॉग्स को आत्मसात करते हैं. यदि आप शिक्षित, ईमानदार व प्रतिभावान है लेकिन आपके पास चाटुकारिता व चमचागिरी की कोई सर्टिफिकेट नहीं है तो लाख चाहने के बावजूद आप वर्तमान राजनीति में सफल नहीं हो सकते हैं. क्योंकि वर्तमान राजनीति में चाटुकारिता व चमचागिरी ही सफलता की कुंजी है.
नंबर वन कौन ?
नंबर वन बनने के इस महामुकाबले में जीत किसी की नहीं होती. बल्कि हार होती है विवेक की, तर्क की, और लोकतंत्र की गरिमा की. लेकिन दोनों ही पक्ष अपने-अपने आकाओं की जय-जयकार में इतने व्यस्त और मस्त हैं कि उन्हें समझाना अब तर्क व तथ्यों का अपमान लगता है. जब हर बात को सही साबित करने के लिए  गलत उदाहरण दिए जाते हैं, तो कुछ देर के लिए ही सही जनता भी भ्रमित हो जाती है. लेकिन उस भ्रम में सच की हत्या हो जाती है. और जब सच मरता है, तो समाज में अंधविश्वास, घृणा, और टुकड़ों में बंटी सोच जन्म लेती है.
 जब राजनीति में भक्तों और चमचों की संख्या बढ़ती है, तो जनता सिर्फ तमाशबीन बन जाती है. लेकिन हकीकत यही है कि तमाशा देखने से बदलाव नहीं आता. बदलाव आता है सवाल पूछने से, तथ्य को जानने से, और नेताओं को जवाबदेह बनाने से. अब निर्णय आपको करना है कि सबकुछ भुलाकर कुंभकर्णी निंद्रा में पड़े रहना है या फिर समाज और देश की बेहतरी के लिए मजबूती के साथ कदम बढ़ाना है. जय हिंद

Sunday, November 2, 2025

नेता जी कहिन: नाच ना आवे, आंगन टेढ़ा ✍️ धर्मेंद्र कुमार



वर्तमान परिपेक्ष्य में भारतीय राजनीति का मंच अब सिर्फ भाषणों का नहीं बल्कि यह एक रंगमंच बन गया है, जहां नेता जी कभी भावुकता का भरतनाट्यम करते हैं, कभी वादों की कथकली, और कभी-कभी तो विरोधियों पर आरोपों की ब्रेक डांस भी कर डालते हैं. चुनावी मौसम आते ही देश के हर कोने में "नेता नृत्य महोत्सव" शुरू हो जाता है जहां टिकट फ्री और ड्रामा गारंटीड. डांस दिखाओ वोटर रिझाओ के इस महाकुंभ में फ्री में जनता का भरपूर मनोरंजन होता है.

लोकतंत्र में नाच के प्रकार 

वैसे तो भारतीय शास्त्रीय संगीत में नृत्य का महत्वपूर्ण स्थान है. नृत्य के कई प्रकार भी हैं. लेकिन भारतीय राजनीति में नाच व नृत्य की बात ही कुछ और है. राजनीति में नाच कई प्रकार के होते हैं, जिनका कोई शास्त्रीय वर्गीकरण तो नहीं हैं. लेकिन वह जनभावनाओं में गहराई से पैठ बना चुके हैं. बात अगर राजनीति नृत्य की करें तो पहले नंबर पर वोट-लुभावन तांडव नृत्य आता है.  इसमें नेता जी विकास की ऐसी झड़ी लगाते हैं कि जनता को लगता है, बस अब रामराज्य आने ही वाला है. सड़क, बिजली, पानी सब वादों की ताल पर थिरकते हैं. वहीं दूसरा नंबर आरोप-प्रत्यारोप गरबा का है. इसमें एक पार्टी आरोप लगाती है, दूसरी उसका जवाब देती है, फिर दोनों मिलकर मीडिया के कैमरे के सामने ऐसा गरबा करते हैं कि टीआरपी की घंटी बज उठती है. तीसरा नंबर दल-बदल भांगड़ा का है. चुनाव से पहले नेता जी जिस पार्टी में होते हैं, चुनावी हवा बदलते ही दूसरे दल में कूद पड़ते हैं. यह नाच बिना संगीत के होता है, लेकिन ताल हमेशा सत्ता की होती है. वहीं जब कोई नेता अपने पुराने बयानों से पलटी मारता है, तो वह संविधान की व्याख्या करते हुए संविधानिक कथक करता है तो कुछ देर के लिए ही सही जनता भी भ्रमित हो जाती है.

 टेढ़ा आंगन या नाच नकली?
नेता जी कहते हैं कि "हम तो सच्चे हैं, नाचना नहीं आता, आंगन ही टेढ़ा है." लेकिन जनता जानती है कि यह आंगन टेढ़ा नहीं, तेजाबी है, जहां हर कदम फिसलन भरा है. हकिकत यह है कि नाचने वाले को पता है कि कैमरा कहां है, तालियां कब बजेंगी, और कब मंच से उतरकर फिर से जनता के बीच "सेवा" का अभिनय करना है, कब आंसू बहाना है और कब गीत गुनगुनाना है.
 नाच का नया रंगमंच
सोशल मीडिया के इस दौर में अब तो नेता जी का हर स्टेप वायरल होता है. कोई मंच पर गाना गा रहा है, कोई डांस कर रहा है, कोई बच्चों को गोद में उठाकर वोट मांग रहा है. जनता भी कम नहीं मीम्स, रील्स और व्यंग्यात्मक ट्वीट्स व कमेंट्स की बौछार से नेता जी का "नाच" ट्रेंडिंग में बना रहता है. राजनीति का यह नाच कभी-कभी मनोरंजन देता है, तो  कभी चिंता भी. लेकिन जब जनता सजग होती है, तब यह नाच एक जन-जागरण बन जाता है. नेता जी चाहे जितना भी कहें  "नाच ना आवे, आंगन टेढ़ा." जनता सब जानती है कि  नेताओं को नाच भी आता है, और आंगन भी सीधा है, बस उनकी नीयत ही टेढ़ी है.

Friday, October 31, 2025

"कुशासन की नई परिभाषा या जंगलराज का रिवाइवल पार्ट 2?" ✍️ धर्मेंद्र कुमार




बिहार में 2025 के चुनावी मौसम ने लोकतंत्र की गरिमा को फिर से लहूलुहान कर दिया है. मोकामा में जन सुराज पार्टी के नेता दुलारचंद यादव की हत्या और सिवान में एक एएसआई की गला रेतकर हत्या ने यह साबित कर दिया कि ‘सुशासन बाबू’ के राज में कानून-व्यवस्था सिर्फ भाषणों तक सीमित हो कर रह गया है. यदि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्यमंत्री के नजर यह सुशासन व्यवस्था है तो आप सहज ही अंदाजा लगा सकते है कि जंगलराज में क्या स्थिती होगी. आज के दौर में तो यही जंगलराज पार्ट 2 है. बड़ा सवाल यही है कि क्या इसी सुशासन व्यवस्था से प्रदेश की जनमानस का कल्याण होगा, यह गंभीर चिंता का विषय है.

कुशासन का नया अवतार

आपको बता दे कि 30अक्टूबर 2025 को मोकामा के घोसवरी थाना क्षेत्र में जन सुराज समर्थक दुलारचंद यादव की गोली मारकर हत्या कर दी गई. वे चुनाव प्रचार में निकले थे, और यह हत्या चुनावी रंजिश का नतीजा बताई जा रही है. सिवान में एक एएसआई की गला रेतकर हत्या कर दी गई, और आरोप है कि इसमें शराब माफियाओं का हाथ है. इन दोनों घटनाओं ने बिहार की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या यह वही बिहार है जहाँ प्रधानमंत्री और गृहमंत्री द्वारा ‘सुशासन’ का दावा किया जाता है?
क्या कहते है आंकड़े
2024 में बिहार में हत्या के 3,800 से अधिक मामले दर्ज हुए, जो देश के टॉप 5 राज्यों में शामिल है. 2025 के पहले 10 महीनों में ही 3,200 से अधिक हत्या के मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से कई चुनावी रंजिश और आपराधिक गिरोहों से जुड़े हैं. शराबबंदी के बावजूद 2024 में 1.5 लाख से अधिक शराब जब्ती के मामले दर्ज हुए, और शराब माफियाओं की ताकत लगातार बढ़ती दिख रही है. यह तो महज दो वर्षों का आकड़ा है एनसीआरबी के आकड़ों के अनुसार पिछले 10 वर्षों अपराधिक घटनाओं में अप्रत्याशित बढ़ोतरी दर्ज की गई है. 

सुशासन या कुशासन
प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री लगातार 90 के दशक के ‘जंगलराज’ की बात करते हैं, लेकिन मौजूदा हालात तो प्रदेश में जंगलराज पार्ट 2 चल रहा है. बाहुबली नेताओं की वापसी हो चुकी है. पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता ने जनता का भरोसा डगमगा रहा है. ऐसा लगता है कि “बिहार में अब कुशासन का नया ब्रांड लॉन्च हुआ है—‘सुशासन 2.0’, जिसमें अपराधी VIP हैं और जनता RIP!”
बिहार की जनता को यह समझना होगा कि चुनाव सिर्फ वोट डालने का नहीं, जवाब मांगने का भी पर्व है. जब जनप्रतिनिधि सुरक्षा देने में नाकाम हों, और प्रशासन सिर्फ चुनावी रैलियों की भीड़ गिनने में व्यस्त हो, तो लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है. अब वक्त है कि जनता सवाल पूछे—कुशासन की इस नई परिभाषा में हमारा भविष्य कहाँ है?