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जंतर-मंतर पर लाठीचार्ज: क्या सुप्रीम कोर्ट की जांच की आंच गृह मंत्रालय तक पहुंचेगी? धर्मेंद्र कुमार

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जंतर-मंतर पर लाठीचार्ज: क्या सुप्रीम कोर्ट की जांच की आंच गृह मंत्रालय तक पहुंचेगी?  धर्मेंद्र कुमार दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन के दौरान हुए लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल का मामला अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर है, जहां अदालत द्वारा एक उच्च-स्तरीय स्वतंत्र जांच समिति के गठन के फैसले ने देश के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। चूंकि दिल्ली पुलिस सीधे तौर पर केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करती है, इसलिए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या देश की शीर्ष अदालत में चल रही इस कानूनी लड़ाई की आंच अंततः गृह मंत्रालय तक पहुंचेगी?  इस पूरे विवाद की जड़ें 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर आयोजित 'संसद चलो' मार्च से जुड़ी हैं। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर दावा किया है कि भीड़ के हिंसक होने और बैरिकेड्स तोड़ने के बाद "न्यूनतम आवश्यक बल" और "चरणबद्ध तरीके" से कार्रवाई की गई। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। हालांकि, याचिकाकर्ताओं द्वारा पेश किए गए साक्ष्य और सादे कपड...

हेमंत ने दिखाई हिम्मत, विपक्ष की बोलती बंद: छात्रों में खुशी की लहर-- धर्मेंद्र कुमार

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हेमंत ने दिखाई हिम्मत, विपक्ष की बोलती बंद: छात्रों में खुशी की लहर -- धर्मेंद्र कुमार  झारखंड की राजनीति और छात्र आंदोलन के इतिहास में 17 अगस्त 2026 का दिन एक बड़े नीतिगत बदलाव और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के रूप में दर्ज हो गया है। JPSC और JSSC CGL परीक्षाओं तथा नियुक्तियों में कथित गड़बड़ियों और शुचिता की मांग को लेकर पिछले 24-25 दिनों से राजधानी रांची की सड़कों और जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में डटे युवाओं के संघर्ष की आखिरकार जीत हुई। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपनी कैबिनेट की एक आपातकालीन बैठक बुलाई और आंदोलनकारी छात्रों की सबसे बड़ी और प्रमुख मांग को सहर्ष स्वीकार करते हुए JSSC- CGL परीक्षा और विवादित आउटसोर्सिंग एजेंसी टीडीपीएल द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं व चयन प्रक्रियाओं को तत्काल प्रभाव से रद्द करने की ऐतिहासिक घोषणा कर दी। मुख्यमंत्री के इस साहसिक और संवेदनशील फैसले ने जहां राज्य के लाखों अभ्यर्थियों में उम्मीद और खुशी की एक अभूतपूर्व लहर दौड़ गई, वहीं छात्रों के कंधे पर बंदूक रखकर चुनावी रोटियां सेंकने की फिराक में बैठे विपक्ष की बोलती पूरी तरह बंद कर दी है। ...

पेपर लीक धंधा चालू आहे ! धर्मेंद्र कुमार

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संदर्भः UGC-NET पेपर लीक पेपर लीक धंधा चालू आहे !  धर्मेंद्र कुमार 'सिर मुड़ाते ही ओले पड़ना'—यह मुहावरा इन दिनों नवनिर्वाचित शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी के लिए बिल्कुल सटीक बैठ रहा है। अभी जोशी ने शिक्षा विभाग की कमान संभाली ही थी और वे इस महकमे की जटिलताओं को समझ भी नहीं पाए थे कि देश के सबसे प्रतिष्ठित और बड़े परीक्षाओं में से एक, यूजीसी-नेट (UGC-NET) का पेपर लीक होने की खबर ने शिक्षा व्यवस्था की चूलें हिलाकर रख दीं। यह महज एक परीक्षा का रद्द होना नहीं है, बल्कि लाखों छात्रों के सपनों, भविष्य और अभिभावकों की गाढ़ी कमाई के साथ क्रूर मजाक है। यह घटना दर्शाती है कि शिक्षा व्यवस्था के भीतर सड़ांध कितनी गहरी है। विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है, लेकिन असली सवाल प्रह्लाद जोशी के सामने है कि क्या वे इस 'दीमक' को खत्म कर पाएंगे? नेट पेपर लीक ने शिक्षा मंत्रालय के सामने एक बार फिर परीक्षा में पारदर्शिता और सुरक्षा जैसी चुनौती खड़ी कर दी है। सिस्टम के भीतर 'दिमागी नक्सलियों की गहरी पैठ  जब हम कहते हैं कि सिस्टम के अंदर 'दिमागी नक्सलियो...

सरकार की ‘गले की हड्डी’ बना JPSC-JSSC आंदोलन! --धर्मेंद्र कुमार

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सरकार की ‘गले की हड्डी’ बना JPSC-JSSC आंदोलन!              धर्मेंद्र कुमार  झारखंड की राजनीति में युवाओं और रोजगार का मुद्दा हमेशा से बेहद संवेदनशील रहा है। लेकिन वर्तमान समय में झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की कार्यप्रणाली को लेकर उपजा जनाक्रोश, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। राज्य के युवाओं का यह असंतोष अब महज सोशल मीडिया की बहसों तक सीमित नहीं है, बल्कि सड़कों पर उतरकर 20 अगस्त को मुख्यमंत्री आवास के घेराव की दी गई खुली चेतावनी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पानी अब सिर से ऊपर गुजर चुका है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह स्थिति सरकार के लिए 'गले की हड्डी' जैसी बन गई है।    सरकार की साख का संकट  इस पूरे विवाद के केंद्र में परीक्षाओं की शुचिता, पेपर लीक के आरोप और चयन प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताएं हैं। JSSC-CGL परीक्षा को रद्द करने की मांग, JPSC परीक्षाओं के विवाद, और परीक्षा आयोजित करने वाली बाहरी एजेंसियों की भूमिका पर उठते सवाल इस...

बिहार की सुशासन बनाम डस्टबिन घोटाला!  धर्मेंद्र कुमार

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बिहार की सुशासन बनाम डस्टबिन घोटाला!   धर्मेंद्र कुमार बिहार की राजनीतिक गलियारे इन दिनों एक नए विवाद से गरमाए हुए हैं। सूचना के अधिकार से प्राप्त आकड़ों ने राज्य के स्वास्थ्य विभाग और नगर निकायों की खरीद प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसे अब आम बोलचाल में 'डस्टबिन घोटाला' कहा जा सकता है। एक ऐसे राज्य में जहां बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं खुद वेंटिलेटर पर हैं, वहां कचरा फेंकने वाले एक साधारण डिब्बे की खरीद में करोड़ों के हेरफेर के आरोप व्यवस्था की नीयत और नीति दोनों को कटघरे में खड़ा करते हैं। इस पूरे विवाद के केंद्र में वो आंकड़े हैं जो आम जनता की गाढ़ी कमाई के दुरुपयोग की गवाही देते हैं। आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, बाजार में मिलने वाले जिस 75 लीटर क्षमता के साधारण डस्टबिन की वास्तविक कीमत लगभग ₹1,200 से ₹1,500 के बीच होती है, उसे सरकारी फाइलों में ₹15,490 प्रति यूनिट की अत्यधिक दर पर खरीदा दिखाया गया है। इतना ही नहीं, इस डिब्बे के अंदर इस्तेमाल होने वाली मामूली प्लास्टिक थैली (कचरा पॉलीथिन), जो बाजार में मात्र ₹5 से ₹10 में मिल जाती है, उसके लि...

लोकतंत्र की चुनौती बनाम दिमागी नक्सल ! धर्मेंद्र कुमार

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लोकतंत्र की चुनौती बनाम दिमागी नक्सल !  धर्मेंद्र कुमार 80वें स्वाधीनता दिवस के पावन अवसर पर लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देश के नाम संबोधन कई मायनों में अभूतपूर्व रहा। उन्होंने एक तरफ जहां 'विकसित भारत 2047' के संकल्प को दोहराया, वहीं दूसरी तरफ देश के आंतरिक परिदृश्य पर बात करते हुए एक नई शब्दावली 'दिमागी नक्सल' (इंटेलेक्चुअल नक्सल) का प्रयोग कर एक नई वैचारिक बहस को जन्म दे दिया है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि देश ने जंगलों में हथियारों के बल पर लड़ने वाले नक्सलियों का तो लगभग खात्मा कर दिया है, लेकिन अब सत्ता के गलियारों और वैचारिक मंचों पर सक्रिय 'दिमागी नक्सलियों' को पहचान कर अलग-थलग करने की जरूरत है। यह शब्दावली सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेदों को एक बार फिर सतह पर ले आई है। सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर 'दिमागी नक्सल' की सटीक परिभाषा क्या है? क्या वे लोग दिमागी नक्सल हैं जो सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं और जनहित में आवाज बुलंद करते हैं? या फिर वे जो सोशल मीडिया के दौर में प्रोपेगैंडा का जवाब उसी ...

विकसित भारतः नारा या हकीकत? धर्मेंद्र कुमार

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विकसित भारतः नारा या हकीकत?  धर्मेंद्र कुमार भारत को वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र और वैश्विक पटल पर विश्व गुरु बनाने का संकल्प एक महत्वाकांक्षी विजन है। लेकिन कोई भी राष्ट्र केवल भव्य बुनियादी ढांचे, विशाल स्मारकों या राजनीतिक विज्ञापनों से विकसित नहीं बनता। किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक प्रगति इस बात से मापी जाती है कि उसकी व्यवस्था अपनी सबसे कमजोर और मूक आबादी के साथ कैसा व्यवहार करती है। जब देश की चौखट पर 80 करोड़ लाचार नागरिक, मजबूर किसान और करोड़ों बेरोजगार युवा खड़े हों, तब विकास के दावों की गहन समीक्षा अनिवार्य हो जाती है। भारतीय लोकतंत्र में सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेतृत्व ने कभी 'प्रधान सेवक' तो कभी 'चौकीदार' की भूमिका को आत्मसात किया। यह शब्दावली जनता में एक गहरा विश्वास जगाती है कि देश की संपत्ति, सुरक्षा और आस्था सुरक्षित हाथों में है। लेकिन जब अयोध्या राम मंदिर जैसे देश की अगाध श्रद्धा के केंद्र से जुड़ी व्यवस्थाओं में पारदर्शिता की कमी या विसंगतियों के आरोप सामने आते हैं, तो करोड़ों श्रद्धालुओं की 'आस्था की चोरी' का अहसास गहराने लगता ह...