ये बांकीपुर की जनता भाई, आपकी गुलाम नहीं  धर्मेंद्र कुमार

ये बांकीपुर की जनता भाई, आपकी गुलाम नहीं 
 धर्मेंद्र कुमार


बिहार की राजनीति में बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र हमेशा से वैचारिक चेतना और राजनीतिक जागरूकता का केंद्र रहा है। यह वह क्षेत्र है जिसने बड़े-बड़े राजनीतिक दिग्गजों को बनते और बदलते देखा है। लेकिन 3 अगस्त को बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के अप्रत्याशित परिणाम ने पुराने सारे रिकार्ड को एक झटके में पलट कर रख दिया। इस चुनावी परिणाम की गूंज बिहार सहित पूरे देश में सुनाई दे रही है। यहां बड़ा सवाल यह है कि मात्र आठ महीनों ऐसा क्या घटित हो गया कि बांकीपुर की जनता का भाजपा से मोहभंग हो गया। बिहार में हाल के दिनों हुए राजनीतिक घटनाक्रम और बयानों ने बांकीपुर के मतदाताओं के आत्मसम्मान को झकझोर कर रख दिया है। आज बांकीपुर की गलियों से एक ही गूंज सुनाई दे रही है—"ये बांकीपुर की जनता है भाई, आपकी गुलाम नहीं।" यह नारा सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उस कथित अहंकार का करारा जवाब है, जो मतदाताओं को अपनी 'स्थायी जागीर' समझने की भूल कर बैठती है।

मतदाताओं के साथ धोखा

बांकीपुर सहित पुरे बिहार की जनता स्वयं को ठगा महसूस कर रही है। लोगों का कहना है कि उन्होंने नीतीश कुमार के नाम पर वोट दिया था। भाजपा ने सत्ता पाने के लिए नीतीश कुमार के चेहरे पर चुनाव लड़ा और जीतने के बाद अपने हिडन एजेंडा के तहत नीतीश को हटाकर सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बना दिया। जो बिहार की जनता के धोखा है। लोगों का कहना है कि बीजेपी को यह भली भांति ज्ञात था सम्राट चौधरी के नाम पर चुनाव लड़ने पर उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए चुनाव जीतने के लिए नीतीश को आगे कर दिया और मतलब निकलने के साथ ही अपने प्यादे को सीएम की कुर्सी पर बैठा दिया। यह बात कहीं ना कहीं बांकीपुर की जनता की नाराजगी का एक बड़ा कारण है इससे इंकार नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही पिछले दिनों मुख्यमंत्री द्वारा लिए कई निर्णयों से भी जनता में सरकार के प्रति आक्रोश बढ़ा। विशेषकर तथाकथित अमर तिवारी का इनकाउंटर से लोगों में नाराजगी थी। वहीं छात्रों पर एक47 से गोली चलवाना आग में घी का काम किया, जिसमें बांकीपुर स्वाहा हो गया।

'सुरक्षित गढ़' के मुगालते में बीजेपी
बीजेपी लंबे समय से बांकीपुर को अपना एक अजेय और सुरक्षित किला मानती आ रही है। पार्टी के रणनीतिकारों को शायद यह गलतफहमी हो गई थी कि वे किसी को भी उम्मीदवार बनाकर मैदान में उतार देंगे, तो जनता उनके नाम और निशान पर आंख मूंदकर मुहर लगा देगी। जब किसी राजनीतिक दल में यह भाव आ जाता है कि "जनता के पास कोई विकल्प नहीं है," तो वहीं से लोकतंत्र में तानाशाही और अहंकार का जन्म होता है। बांकीपुर की प्रबुद्ध जनता का यह गुस्सा इसी थोपे गए नेतृत्व और स्थानीय मुद्दों की अनदेखी के खिलाफ एक जनाक्रोश है।

 वादा-खिलाफी पड़ी महंगी 

बांकीपुर की जनता आज सत्ताधारी दल से तीखे सवाल पूछ रही है। हर मानसून में पटना का यह पॉश इलाका टापू में बदल जाता है, लेकिन वर्षों से इसका कोई स्थायी समाधान नहीं निकला। स्मार्ट सिटी के बड़े-बड़े दावों के बीच अंदरूनी सड़कें और ड्रेनेज सिस्टम आज भी बदहाल हैं। क्षेत्र के युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार और बेहतर शिक्षा के अवसर आज भी एक दूर का सपना हैं। विपक्ष और स्थानीय नागरिक लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि बीजेपी चुनाव जीतने के बाद जनता को भूल जाती है और केवल चुनाव के समय ही 'राष्ट्रवाद' और 'पार्टी कैडर' के भरोसे मैदान में उतरती है।

 लोकतंत्र में कोई 'गुलाम' नहीं होता
"ये बांकीपुर की जनता है भाई, आपकी गुलाम नहीं"—यह महज एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेताओं के लिए एक कड़ा सबक है। यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र में मतदाता 'मालिक' होता है, 'गुलाम' नहीं। किसी भी दल का सिंबल या किसी बड़े नेता का चेहरा, स्थानीय जनभावनाओं और बुनियादी विकास की जरूरतों का विकल्प नहीं हो सकता।
बांकीपुर के जागरूक मतदाताओं ने हमेशा जाति और पार्टी से ऊपर उठकर फैसले लिए हैं। इस बार का जनआक्रोश यह साफ संकेत दे रहा है कि अगर बीजेपी ने अपने इस 'सुरक्षित गढ़' में जनता की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया और अपने सांगठनिक अहंकार को कम नहीं किया, तो बांकीपुर की यही जनता सत्ता के समीकरणों को पलटने में देर नहीं लगाएगी।

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