युवाओं की हुंकार बनाम सत्ता का आश्वासन धर्मेद्र कुमार
युवाओं की हुंकार बनाम सत्ता का आश्वासन
धर्मेद्र कुमार
झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं (JPSC और JSSC) में कथित भर्ती घोटालों के खिलाफ रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब एक निर्णायक मोड़ पर है। हफ्तों की तपिश और संघर्ष के बाद, यह आंदोलन सिर्फ युवाओं की नाराजगी नहीं, बल्कि राज्य के नीतिगत सुधारों का एक सशक्त घोषणापत्र बन चुका है। 7-8 अगस्त को स्टेट गेस्ट हाउस में सरकार के मंत्रियों और छात्रों के 11-सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के बीच दो राउंड वार्ता हुई। सरकार ने इस गतिरोध को तोड़ने की दिशा में एक सकारात्मक कदम बढ़ाया है।
लिखित गारंटी का सवाल
बैठक के दौरान मंत्रियों ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि छात्रों की मांगें जायज और प्रशासनिक शुचिता के लिए आवश्यक हैं। सरकार की ओर से आश्वासन दिया गया है कि इन सभी बिंदुओं पर मुख्यमंत्री से विस्तार से चर्चा कर त्वरित समाधान निकाला जाएगा। यह स्वीकारोक्ति युवाओं के संघर्ष की पहली नैतिक जीत है।
हालांकि, सत्ता के पुराने अनुभवों को देखते हुए छात्रों का रुख बिल्कुल स्पष्ट है। आंदोलनकारियों ने दो-टूक कहा है कि जब तक सरकार अपनी प्रतिबद्धताओं को लिखित रूप में प्रस्तुत नहीं करती, तब तक आंदोलन थमेगा नहीं। यह रुख दर्शाता है कि आज का युवा केवल वादों के खोखले दिलासों पर भरोसा करने को तैयार नहीं है। उसे अपने भविष्य के लिए ठोस और वैधानिक सुरक्षा की गारंटी चाहिए। इसी रणनीति के तहत, संवाद की प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद, छात्रों ने आगामी 10 अगस्त को पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार विधानसभा घेराव करने का निर्णय लिया है ताकि सरकार पर नीतिगत दबाव बना रहे। वहीं राहुल गांधी ने भी छात्रों से बात कर उन्हें आश्वस्त किया कि वे मुख्यमंत्री से इस मामले में बात कर कार्रवाई करने को कहेंगे।
मांगों का दायरा और सरकार का रुख
छात्रों का यह आक्रोश अचानक फूटा कोई गुबार नहीं है, बल्कि सालों से व्यवस्था की कमियों को झेलने का नतीजा है। आंदोलनकारी छात्र इस बार किसी समझौते के मूड में नहीं हैं। उनकी प्रमुख मांग हालिया परीक्षाओं में हुए कथित पेपर लीक और धांधली के मामलों की सीबीआई से निष्पक्ष जांच कराना है। इसके साथ ही, उत्तर पुस्तिकाओं और कार्बन कॉपियों को सार्वजनिक करने, कट-ऑफ मार्क्स समय पर जारी करने और विसंगतियों को दूर कर परीक्षा प्रणाली में पूर्ण पारदर्शिता लाने की मांग की जा रही है। दूसरी ओर, सरकार के मंत्रियों का रुख इस बार सहानुभूतिपूर्ण नजर आ रहा है। आधिकारिक बयानों के अनुसार, मंत्रियों ने छात्रों के प्रस्तावों का मसौदा तैयार कर लिया है, जिसे अंतिम निर्णय के लिए मुख्यमंत्री के समक्ष रखा जाएगा।
स्याही कांड: लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रहार
इस आंदोलन के बीच 7 अगस्त को एक बेहद चिंताजनक घटना भी सामने आई। वामपंथी छात्र संगठन 'ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन' (AISA) द्वारा आयोजित विधानसभा मार्च के दौरान, संगठन की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा वोरा पर एक युवक ने अचानक स्याही फेंक दी। पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए मौके से ही हजारीबाग के निवासी आरोपी छात्र अमर पांडेय को गिरफ्तार कर लिया है। घटना के बाद छात्र संगठनों में भारी आक्रोश है। नेहा वोरा और आइसा नेताओं ने आरोप लगाया है कि अमर पांडेय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ा हुआ है और यह हमला युवाओं की एकजुट आवाज को वैचारिक ध्रुवीकरण के जरिए दबाने की एक राजनीतिक साजिश है। लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद और विरोध स्वाभाविक हैं, लेकिन असहमति का जवाब स्याही फेंकने या व्यक्तिगत हमलों से देना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। ऐसे हिंसक प्रयास मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने का काम करते हैं, जबकि वास्तविक लड़ाई लाखों छात्रों के रोजगार और पारदर्शी परीक्षा प्रणाली की है। सरकार को अब और देर न करते हुए 10 अगस्त के विधानसभा घेराव से पहले छात्रों को लिखित प्रस्ताव सौंपना चाहिए, क्योंकि राज्य का भविष्य इन युवा अभ्यर्थियों के भविष्य से ही जुड़ा है।
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