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Showing posts from July, 2026

बांकीपुर उपचुनाव: खिलेगा कमल या पीके की होगी इंट्री ? धर्मेंद्र कुमार

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बांकीपुर उपचुनाव: खिलेगा कमल या पीके की होगी इंट्री ?  धर्मेंद्र कुमार पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव का मतदान संपन्न हो चुका है। पारंपरिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का अभेद्य गढ़ माने जाने वाले इस शहरी क्षेत्र का चुनावी समर इस बार महज एक सीट जीतने की होड़ नहीं है। यह बिहार की आगामी राजनीतिक दिशा, नए विकल्पों की स्वीकार्यता और पारंपरिक वोटबैंक की एकजुटता का एक बड़ा लिटमस टेस्ट बन गया है। यहां यह देखना लाजमी होगा कि देशभर में आंदोलनरत युवाओं का रुख इस उपचुनाव किस ओर है। क्या युवाओं ने भाजपा के विरुद्ध अपना विरोध प्रकट किया है या लोगों ने एक बार फिर भाजपा के प्रति अपना विश्वास व्यक्त किया है।  कम मतदान से बनी असमंजस की स्थिति  बांकीपुर उपचुनाव में सबसे पहला और चिंताजनक पहलू मतदान का बेहद कम प्रतिशत रहा। आंकड़ों के मुताबिक, इस बार करीब 34.39 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया है, जो 2025 के आम चुनाव (41.35%) से भी लगभग 7.23 फीसदी कम है। देश और राज्य की राजनीति पर तीखी बहस करने वाला पटना का प्रबुद्ध और शहरी मतदाता पोलिंग बूथ तक पहुंचने में एक ब...

संसद में घमासान: कैसे निकलेगा समाधान ? धर्मेंद्र कुमार

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संसद में घमासान: कैसे निकलेगा समाधान ?  धर्मेंद्र कुमार संसद लोकतंत्र का वो सर्वोच्च मंच है जहां देश की दशा और दिशा तय होती है। जहां जनता की समस्याओं का समाधान खोजा जाता है। लेकिन हाल के दिनों में संसद का दृश्य देखकर यह बुनियादी परिभाषा धुंधली होती नजर आ रही है। विशेषकर युवाओं, पेपर लीक और चरमराती शिक्षा व्यवस्था जैसे अत्यंत संवेदनशील और गंभीर विषय पर जो सार्थक चर्चा होनी चाहिए थी, वह पूरी तरह डिरेल (पटरी से उतर) हो चुकी है। देश का भविष्य तय करने वाली यह बहस अब सत्ता पक्ष और विपक्ष के व्यक्तिगत 'अहम' और 'सम्मान' की लड़ाई में तब्दील हो गई है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या इस राजनीतिक घमासान से देश के करोड़ों युवाओं की समस्या का कोई वास्तविक समाधान निकल पाएगा? अहं के टकराव में पिसता युवाओं का भविष्य इस पूरे विवाद के केंद्र में शिक्षा व्यवस्था की खामियां और पेपर लीक की निरंतर घटनाएं हैं, लेकिन संसद के भीतर का विमर्श कहीं और ही भटक गया है। प्रियंका गांधी द्वारा नए शिक्षा मंत्री प्रहलाद जोशी पर की गई टिप्पणी के बाद संसद की कार्यवाही मुद्दों से ज्यादा मर्यादा ...

युवाओं का भविष्य: झारखंड में भर्ती घोटालों का अंतहीन सिलसिला -- धर्मेंद्र कुमार

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युवाओं का भविष्य: झारखंड में भर्ती घोटालों का अंतहीन सिलसिला  -- धर्मेंद्र कुमार  झारखंड के लाखों युवाओं के भविष्य को संवारने वाला झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) जैसी संस्थाएं आज खुद भ्रष्टाचार, पेपर लीक और साठगांठ के दलदल में धंसी नजर आ रही हैं। हाल ही में सामने आए 14वीं जेपीएससी प्रारंभिक परीक्षा विवाद और जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा में हुई अनियमितताओं ने पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता को जमींदोज कर दिया है। भ्रष्टाचार की इस व्यवस्था में घोटालों का जो तंत्र सामने आया है, वह चौंकाने वाला है। हालिया 14वीं जेपीएससी पीटी परीक्षा में एक ऐसा ओएमआर (OMR) शीट वायरल हुआ, जिसमें बिना नेगेटिव मार्किंग के 100 में से मात्र 48 सवाल टिक करने वाले छात्र को भी पास घोषित कर दिया गया। इस पूरे खेल के पीछे मेसर्स टीएसआर डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड (TDPL) नामक आउटसोर्सिंग एजेंसी का नाम सामने आया है। इस एजेंसी को जेएसएससी ने मई 2025 में ही ब्लैकलिस्टेड घोषित किया था, लेकिन इसके बावजूद जेपीएससी की मुख्य परीक्षाओं का ठेका इसी कंपनी को सौंप दिया गया। घो...

लोकतंत्र की छाती पर लाठियां और जवाबदेही के सुलगते सवाल -- धर्मेंद्र कुमार

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लोकतंत्र की छाती पर लाठियां और जवाबदेही के सुलगते सवाल -- धर्मेंद्र कुमार  दिल्ली की सड़कों पर परीक्षा सुधारों और धांधलियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर रहे छात्रों का आंदोलन अब भले ही शांत हो गया हो, लेकिन 20 जुलाई की उस काली तारीख ने देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर गहरे घाव छोड़े हैं। आंदोलन स्थगित होना इस बात की गारंटी नहीं है कि उस दिन जो बर्बरता हुई, उस पर मिट्टी डाल दी जाए। आज भी दिल्ली की फिजाओं में कई गंभीर और तीखे सवाल तैर रहे हैं, जिनका जवाब दिए बिना सरकार सदन में अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकती। मॉनलून सत्र के दौरान विपक्ष सदन में पेपर लीक एवं शिक्षा व्यवस्था में सुधार जैसे युवाओं से जुड़े गंभीर विषय पर चर्चा करें। साथ ही छात्रों पर दिल्ली पुलिस द्वारा की गई बर्बरतापूर्ण कार्रवाई पर भी सरकार को सदन में जवाब देने के लिए मजबूर करें। सबसे बड़ा और बुनियादी सवाल यह है कि 20 जुलाई को निहत्थे छात्रों पर बर्बरता से लाठीचार्ज करने का आदेश आखिरकार किसने दिया था? संसद मार्च कर रहे देश के भविष्य पर उस बलप्रयोग की क्या सीमा तय की गई थी, जिसमें कथित तौर पर पेलेट गन और कीलें लगी लाठिय...

ज्योतिर्मयी नायक बनी इंडियन आइडल सीजन 16' की विजेता

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ज्योतिर्मयी नायक बनी इंडियन आइडल सीजन 16' की विजेता सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन के रियलिटी शो 'इंडियन आइडल सीजन 16' को अपनी विजेता मिल गई है। ओडिशा के भुवनेश्वर की रहने वाली ज्योतिर्मयी नायक ने इस सीजन की प्रतिष्ठित ट्रॉफी अपने नाम कर इतिहास रच दिया है। वह इस शो को जीतने वाली ओडिशा की पहली प्रतियोगी बन गई हैं। ग्रांड फिनाले में जजों और दर्शकों का दिल जीतने के बाद ज्योतिर्मयी को चमचमाती ट्रॉफी के साथ 20 लाख रुपये का नकद पुरस्कार और एक शानदार कार भी इनाम में मिली। इस कड़े मुकाबले में जबलपुर के तनिष्क शुक्ला फर्स्ट रनर-अप रहे, जबकि अन्य फाइनलिस्ट्स अंशिका चोंकर, मनराज वीर सिंह, मायस्मी बसु और सुहैल सूफी ने टॉप 6 में अपनी जगह बनाई थी। 'यादों की प्लेलिस्ट' थीम पर आधारित इस 10 महीने लंबे सीजन को श्रेया घोषाल, विशाल ददलानी और बादशाह ने जज किया, जबकि मेजबानी आदित्य नारायण ने की। ग्रैंड फिनाले की शाम बेहद शानदार रही, जिसमें उषा उत्थुप, उदित नारायण, कुमार सानू और पापोन जैसे दिग्गज गायकों ने अपनी प्रस्तुतियों से समां बांध दिया। कंप्यूटर साइंस में बी.टेक करने वाली ज्य...

सीजेपी छात्र आंदोलनः मीडिया के विश्वनियता पर उठते सवाल धर्मेंद्र कुमार

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सीजेपी छात्र आंदोलनः मीडिया के विश्वनियता पर उठते सवाल  धर्मेंद्र कुमार मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी के विरोध में शुरू हुआ 'सीजेपी' (कॉकरोच जनता पार्टी) आंदोलन भारतीय इतिहास में डिजिटल क्रांति का एक अभूतपूर्व उदाहरण बन चुका है। महज दो महीनों के भीतर इस आंदोलन ने देश के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा करा दिया और सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। इस आंदोलन की सफलता और इसके सफर को समझने के लिए सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया-सरकार के गठजोड़ की भूमिका को समझना बेहद जरूरी है। सोशल मीडिया की भूमिका सीजेपी आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत इसका पूरी तरह से डिजिटल और विकेंद्रीकृत होना रहा। जब पारंपरिक रास्तों ने युवाओं को निराश किया, तब सोशल मीडिया उनका सबसे बड़ा हथियार बना। सीजेपी के संयोजक एवं राजनीतिक रणनीतिकार अभिजीत दीपके द्वारा शुरू किए गए इस आंदोलन ने इंस्टाग्राम पर कुछ ही दिनों में 3 करोड़ से अधिक फॉलोअर्स का आंकड़ा पार कर लिया। रील्स और मीम्स के माध्यम से गंभीर राजनीतिक संदेशों को बेहद सरल और व्यंग्यात्मक तरीके से युवाओं तक पहुंचाया गया। मुख्यधारा के टीवी चैन...

कॉकरोचों ने कर दी कुर्सी लीक ! धर्मेंद्र कुमार

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कॉकरोचों ने कर दी कुर्सी लीक !  धर्मेंद्र कुमार "आज खुश तो बहुत होगे तुम... जिसकी पुलिसिया रौब और लाठियों के कारण लाखों छात्र अपनी गुहार लेकर अपने ही भविष्य से नहीं मिल पा रहे थे, आज उसी तंत्र की नाक के नीचे जंतर-मंतर की 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने उसे इस्तीफे का पर्चा थमा दिया! जिस भगवान के दरवाजे पर कल तक छात्र न्याय की भीख मांग रहे थे, आज वहां अहंकार खुद घुटने टेक कर खड़ा है।" कल तक जो मंत्री जी कैमरे के सामने 'इस्तीफा' शब्द सुनकर ऐसे चौंकते थे मानो किसी ने उनके कान के पास पटाखा फोड़ दिया हो, आज उनके चेहरे पर बारह बज चुके हैं। सीजेपी के छात्रों ने मंत्री जी से ऐसा 'आउट ऑफ सिलेबस' सवाल पूछा कि मंत्री जी बिना री-चेकिंग के ही फेल हो गए। कॉकरोचों ने इस बार नाली से निकलकर सीधे मंत्रालय की फाइलों में ऐसा हमला किया की मंत्री की कुर्सी ही स्वाहा हो गई! ये 21वीं सदी के कॉकरोच हैं भाई इन पर लाल काला या भगवा हीट भी अप्रभावी है। सीजेपी आंदोलन के दौरान जंतर-मंतर पर एक नारा गूंज रहा था—"पर्चा तुम लीक कराओगे, कुर्सी हम लीक कर देंगे!" और देखिए, ब...

देर आए दुरुस्त आए' या सत्ता के अहंकार की पराजय? --धर्मेंद्र कुमार

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देर आए दुरुस्त आए' या सत्ता के अहंकार की पराजय?                   धर्मेंद्र कुमार  आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। जो भारतीय लोकतंत्र में जनता और विशेषकर युवाओं व छात्रों की शांतिपूर्ण आंदोलन की जीत है। जिसको सत्ता लंबे समय से नजरअंदाज करने की भूल कर रही थी। 25 जुलाई 2026 को दिया गया यह इस्तीफा केवल एक मंत्री का जाना नहीं है, बल्कि देश की जर्जर हो चुकी परीक्षा प्रणाली और जवाबदेही से भागती सरकार के मुंह पर एक करारा तमाचा भी है। यह फैसला बहुत पहले हो जाना चाहिए था, लेकिन 'हुजूर' को जंतर-मंतर की सड़कों पर गूंजते युवाओं के बुलंद आवाज को सुनने में बहुत वक्त लग गया। जब व्यवस्था खुद बन जाए माफिया 3 मई 2026 को आयोजित हुई NEET-UG परीक्षा की शुचिता जब तार-तार हुई, तभी नैतिक आधार पर इस इस्तीफे की पटकथा लिखी जा चुकी थी। करोड़ों छात्रों के भविष्य को दांव पर लगाकर जब परीक्षा माफिया समानांतर सरकार चला रहे थे, तब शिक्षा मंत्रालय शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर छिपाए बैठा था। शुरुआती दौर में किसी भ...

छात्रों के आंदोलन को डिरेल करना चाहती है सरकार? धर्मेंद्र कुमार

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छात्रों  के आंदोलन को डिरेल करना चाहती है सरकार?  धर्मेंद्र कुमार लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब देश का भविष्य सड़कों पर उतरकर अपने हक और न्याय की भीख मांगने को मजबूर हो जाए, तो वह स्थिति किसी भी चुनी हुई सत्ता की नैतिक और प्रशासनिक विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण बन जाती है। वर्तमान में दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट (NEET) 2026 पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की मांग को लेकर चल रहा ऐतिहासिक छात्र आंदोलन इसी कड़वी हकीकत को बयां कर रहा है। इस युवा आंदोलन को कुचलने, बदनाम करने और इसके मुख्य मुद्दों से भटकाकर इसे 'डिरेल' करने के सत्ता प्रायोजित प्रयास अब पूरी तरह सतह पर आ चुके हैं। सत्ता का यह चरित्र होता है कि उसके खिलाफ उठने वाली सभी आवाजों को किसी भी तरह खामोश कर दिया जाए। वर्तमान सरकार भी इसी प्रयास में है। सवाल यह है कि क्या छात्रों द्वारा पेपर लीक पर रोक लगाने और शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की करना गलत है ? और यदि बच्चों की मांग सही है तो इनसे संवाद करने में सरकार को क्या परेशानी है ? ये बच्चे अपने ही तो हैं। लाठी और आंसू गैस से आवाज दबाने की कोशिश  जब सत्ता का...

शिक्षा के लिए संघर्ष बना राष्ट्रीय संकट --धर्मेंद्र कुमार

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शिक्षा के लिए संघर्ष बना राष्ट्रीय संकट  --धर्मेंद्र कुमार देश में वर्ष 2009 में 'शिक्षा का अधिकार' (RTE) कानून पारित किया गया, जिसका उद्देश्य हर बच्चे को सम्मानजनक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी देना था। इस ऐतिहासिक कदम के डेढ़ दशक बाद भी देश की वास्तविक स्थिति इस कानून के दावों के ठीक विपरीत नजर आती है। आज देश की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस युवा पीढ़ी को क्लासरूम में बैठकर राष्ट्र निर्माण का खाका तैयार करना चाहिए था, उसे बुनियादी शिक्षा और कदाचार मुक्त परीक्षाओं के लिए सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। परीक्षाओं की शुचिता का खत्म होना और छात्रों का यह आक्रोश केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह हमारी पूरी व्यवस्था के खोखलेपन को उजागर करता है।  व्यवस्था पर सवाल हाल के वर्षों में देश की प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर बोर्ड परीक्षाओं तक में पेपर लीक, धांधली और भ्रष्टाचार के मामलों की बाढ़ आ गई हैं। जब देश की सबसे बड़ी केंद्रीय जांच एजेंसियां मेडिकल और प्रशासनिक सेवाओं जैसी शीर्ष परीक्षाओं में हुए घोटालों की जांच करने में व...

देश के युवाओं ने भरी हुंकारः बरसीं लाठियां और पानी की बौछार --धर्मेंद्र कुमार

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देश के युवाओं ने भरी हुंकारः बरसीं लाठियां और पानी की बौछार       --धर्मेंद्र कुमार देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर 20 जलाई को जो दृश्य दिखाई दिया, उसने भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है। मॉनसून सत्र के पहले ही दिन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के 'संसद चलो' आह्वान पर देश भर से आए हजारों युवाओं का सैलाब जब जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ा, तो उनके स्वागत में संवाद के रास्ते नहीं, बल्कि लाठियां, आंसू गैस के गोले और पानी की बौछारें तैयार खड़ी थीं। पेपर लीक और चरमराती शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ अपनी जायज आवाज बुलंद कर रहे इन निहत्थे छात्रों पर पुलिसिया बल प्रयोग ने व्यवस्था के उस चेहरे को बेनकाब कर दिया है, जो युवाओं के सपनों को सुरक्षा देने के बजाय उनकी आवाज को कुचलने में अधिक तत्पर नजर आता है। युवा आक्रोश और व्यवस्था का बहरापन देश का युवा आज केवल रोजगार नहीं, बल्कि परीक्षाओं की शुचिता मांग रहा है। नीट (NEET) जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं के बार-बार लीक होते पर्चे, युवाओं के बरसों की तपस्या को मटियामेट कर रहे हैं। अपने भविष्य को बचाने के लिए शांतिपूर्ण ढंग...

वैज्ञानिकों का सामूहिक इस्तीफा और सरकार की नियत पर सवाल-- धर्मेंद्र कुमार

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वैज्ञानिकों का सामूहिक इस्तीफा और सरकार की नियत पर सवाल -- धर्मेंद्र कुमार  भारत की वैज्ञानिक संस्थाओं, विशेषकर इसरो जैसी प्रतिष्ठित संस्था से एक साथ सौ से अधिक वैज्ञानिकों का इस्तीफा देना केवल एक प्रशासनिक घटना नहीं है, बल्कि यह देश की वैज्ञानिक संस्कृति और सरकार की नीतिगत दृष्टि पर सवाल खड़ा करता है। वैज्ञानिकों का सामूहिक असंतोष किसी छोटे कारण से नहीं उपजता है। कहीं ना कहीं यह लंबे समय से चले आ रहे असंतोष, दबाव और नीतिगत असहमति का परिणाम है। इस्तीफों का महत्व वैज्ञानिक किसी भी राष्ट्र की प्रगति के स्तंभ होते हैं। उनकी भूमिका केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं होती, बल्कि वे देश की तकनीकी दिशा और भविष्य की योजनाओं को आकार देते हैं। जब इतने बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक इस्तीफा देते हैं, तो यह इस बात का संकेत है कि संस्थागत वातावरण में गंभीर समस्या है। और यह समस्या वेतन या सुविधाओं से कहीं अधिक गहरी है। यह विश्वास और स्वतंत्रता की कमी से जुड़ी है। देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि इतने बड़े पैमाने पर वैज्ञानिकों ने सामूहिक तौर इस्तीफा दिया है। यह सरकार के साथ ही देश के...

सरकार वीक: पेपर लीक से डेटा लीक तक — व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल धर्मेंद्र कुमार

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सरकार वीक: पेपर लीक से डेटा लीक तक — व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल  धर्मेंद्र कुमार भारत में “लीक” अब केवल परीक्षा पत्रों तक सीमित नहीं रहा बल्कि यह शासन और सुरक्षा व्यवस्था की जड़ों तक पहुंच चुका है। एक ओर छात्र अपने भविष्य के साथ हो रहे पेपर लीक से त्रस्त हैं, तो दूसरी ओर देश की संवेदनशील संस्थाओं से डेटा चोरी की घटनाएं राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती दे रही हैं। यह स्थिति बताती है कि सरकार की डिजिटल और प्रशासनिक सुरक्षा दोनों ही कमजोर पड़ रही हैं। जब परीक्षा और सिस्टम दोनों लीक हों, तो सवाल उठता है कि सरकार की व्यवस्था कितनी मजबूत है? सिस्टम की विफलता और पेपर लीक यह स्पष्ट है कि लगातार पेपर लीक शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता है। बीते कुछ वर्षों में लगभग हर राज्य में किसी न किसी प्रतियोगी परीक्षा का पेपर लीक हुआ है। चाहे वह शिक्षक भर्ती परीक्षा हो, पुलिस भर्ती, या राष्ट्रीय स्तर की SSC परीक्षा हो। लाखों युवाओं की मेहनत एक क्लिक में मिट जाती है। पेपर लीक केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं, बल्कि यह युवाओं के विश्वास पर सीधा प्रहार है। जब परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र बाजार ...

युवा मांगे शिक्षा में सुधार और रोजगार, सरकार लाचार धर्मेंद्र कुमार

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युवा मांगे शिक्षा में सुधार और रोजगार, सरकार लाचार  धर्मेंद्र कुमार भारत की युवाओं की आबादी को दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त मानी जाती है। देश में 65% आबादी 35 साल से कम है। लेकिन जब यही ताक़त शिक्षा और रोजगार की कमी से जूझती है, तो यह युवाओं के लिए अवसर से अधिक चुनौती बन जाती है। आज देश का युवा वर्ग सरकार से लगातार यह सवाल पूछ रहा है कि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्थायी रोजगार क्यों नहीं मिल पा रहा है? भारत में शिक्षा और रोजगार की स्थिति को लेकर ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि सुधार के बावजूद चुनौतियाँ गंभीर हैं—14.67 लाख स्कूलों में से केवल 69.9% में कंप्यूटर और 67.4% में इंटरनेट है, जबकि सरकारी नौकरियों में लगभग 6 लाख पद रिक्त पड़े हैं। यह स्थिति युवाओं की मांगों को और अधिक वैध बनाती है।    शिक्षा व्यवस्था की खामियां शिक्षा को लेकर सबसे बड़ी समस्या गुणवत्ता और अवसर की असमान वितरण का है। महानगरों और निजी संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों को आधुनिक तकनीक, बेहतर शिक्षक और संसाधन मिलते हैं, जबकि ग्रामीण और छोटे कस्बों के छात्र बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित रहते हैं। पाठ्...

छात्रों के आंदोलन से राहुल गांधी की दूरी क्यों? धर्मेंद्र कुमार

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छात्रों के आंदोलन से राहुल गांधी की दूरी क्यों?  धर्मेंद्र कुमार भारतीय राजनीति में आंदोलनों और भूख हड़तालों का अपना अलग इतिहास रहा है। जब सरकार समान्य तौर पर लोगों की मांगों पर विचार नहीं करती है। तब सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ अपनी बातों को जोरदार तरीके से सांगठनिक तौर पर रखने को आंदोलन कहते हैं। अन्ना हज़ारे का 2011 का आंदोलन हो या जेपी आंदोलन, विपक्षी नेताओं की मौजूदगी अक्सर इन आंदोलनों को वैधता और ताक़त देती रही है। लेकिन दिल्ली के जंतर मंतर पर पिछले लगभग 25 दिनों से पेपर लीक मामले को लेकर आंदोलन कर रहे कॉककरोच जनता पार्टी(सीजेपी)से राहुल गांधी की दूरी को लेकर अब सवाल खड़े होने लगे हैं। वहीं इस आंदोलन को मजबूती प्रदान करने के लिए सोनम वांगचुक पिछले 19 दिनों से भूख हड़ताल पर हैं। विपक्षी के कई नेताओं ने वांगचुक से मिल कर उन्हें अपना समर्थन दिया है। ऐसे में देश में विपक्ष के सबसे बड़े दल के नेता के तौर राहुल गांधी का इस आंदोलन से दूर रहना समझ से परे है। जबकि कांग्रेस पार्टी द्वारा जून में ही कोटा में आयोजित गूंज कार्यक्रम में छात्रों से मिले थे और उनकी समस्याओं पर बात...

संसद का मॉनसून सत्र और विपक्ष की चुनौती --धर्मेंद्र कुमार

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संसद का मॉनसून सत्र और विपक्ष की चुनौती                --धर्मेंद्र कुमार भारतीय लोकतंत्र में संसद का हर सत्र केवल विधायी कार्यवाही का मंच नहीं होता, बल्कि अक्सर यह सत्ता और विपक्ष के बीच राजनीतिक संघर्ष का अखाड़ा भी बन जाता है। 20 जुलाई से शुरू होने जा रहे संसद के मॉनसून सत्र में विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपनी भूमिका को केवल शोरगुल तक सीमित न रखे, बल्कि ठोस मुद्दों पर सरकार को घेरने में सफल हो। बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार विपक्ष अपनी भूमिका को सार्थक ढंग से निभा पाएगा या फिर वही पुराने आरोप-प्रत्यारोप और शोरगुल में सत्र का अधिकांश समय व्यर्थ जाएगा। वोट चोरी और एसआईआर विवाद इस बार विपक्ष के एजेंडे में महंगाई, बेरोजगारी स्वास्थ्य के साथ सबसे प्रमुख मुद्दा वोट चोरी और एसआईआर विवाद है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल लगातार केंद्रीय चुनाव आयोग एवं सरकार पर वोट चोरी का आरोप लगाते रहे हैं। उनका कहना है कि हाल के दिनों में चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी आई है। एसआईआर के नाम पर जो कुछ हुआ है, वह लोकतांत्रिक मूल्यों ...

जो मौन हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध – धर्मेंद्र कुमार

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जो मौन हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध  – धर्मेंद्र कुमार राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने आपातकाल के दौर में चेताया था – “समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध; जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।” यह चेतावनी आज के भारत में और भी प्रासंगिक हो उठी है। संविधानिक रूप से भले ही आपातकाल घोषित न हो, लेकिन हालात किसी अघोषित इमरजेंसी से कम नहीं लगते। अन्याय और शोषण के समय मौन रहना भी अपराध है। दिनकर ने तटस्थता को पाप के बराबर माना था—और आज यह पंक्ति लोकतंत्र की आत्मा को झकझोरती है। तटस्थता का भ्रम तटस्थता को अक्सर निष्पक्षता का नाम दिया जाता है। लेकिन जब समाज अन्याय और असमानता से जूझ रहा हो, तब तटस्थ रहना वस्तुतः अन्याय का समर्थन बन जाता है। जब सत्ता सवाल पूछने को गुनाह बना दे, असहमति को देशद्रोह ठहराया जाने लगे, तब मौन रहना लोकतंत्र की नींव को खोखला करता है। जनता की चुप्पी ही सत्ता को निरंकुश बनाती है। इतिहास केवल सक्रिय भागीदारी करने वालों को नहीं, बल्कि मौन रहने वालों को भी दर्ज करता है—और यह दर्ज़ होना अपराध की तरह ही होता है। युवाओं का संघर्ष, समाज की चुप्पी पिछले प...

यहां सब कुछ बिकता है, बस खरीददार होना चाहिए --धर्मेंद्र कुमार

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यहां सब कुछ बिकता है, बस खरीददार होना चाहिए          --धर्मेंद्र कुमार आज का समाज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां हर चीज़—विचार, नैतिक मूल्य, रिश्ते, यहां तक कि लोकतंत्र भी बाज़ार की भाषा समझता औऱ बोलता है। यहां हर चीज़ की कीमत तय है। चाहे वह वस्तु हो, विचार हो, या फिर इंसान की ईमानदारी, सब कुछ बाज़ार की भाषा में अनुवादित हो चुका है। “यहां सब कुछ बिकता है, बस खरीददार होना चाहिए” यह वाक्य केवल व्यापारिक यथार्थ नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन का आईना बन गया है। जहां नैतिकता से लेकर लोकतंत्र तक, जब मूल्य का पैमाना केवल ‘मांग और आपूर्ति’ रह जाए, जब वोट, नौकरी, न्याय और जान का रेट लगने लगे, तो समझिए कि बाजार में इंसानियत सबसे सस्ती हो गई है। राजनीति और लोकतंत्र चुनावी राजनीति में विचारधारा और जनहित का स्थान अब धनबल और प्रचार-तंत्र ने ले लिया है। टिकट से लेकर सत्ता तक, विधायक से लेकर सांसद तक सब कुछ एक सौदेबाज़ी की तरह दिखता है। लोकतंत्र का मूल भाव—जनसेवा—धीरे-धीरे ‘निवेश पर लाभ’ की मानसिकता में बदलता जा रहा है। जहां सदन में प्रश्न पूछने के लिए जन...
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भ्रष्टाचार है किसका यार ?    --धर्मेंद्र कुमार भारत में भ्रष्टाचार पर राजनीति करना शायद सबसे आसान काम है। विपक्ष में रहते हुए हर पार्टी भ्रष्टाचार को खत्म करने का दावा करती है, लेकिन सत्ता में आते ही वही पार्टी आकंठ तक भ्रष्टाचार में डूब जाती है। "जीरो टॉलरेंस" का नारा हर चुनाव में गूंजता है। पर ज़मीन पर टॉलरेंस जीरो है और मौतें लगातार बढ़ रही हैं। भ्रष्टाचार अब सिर्फ रिश्वत नहीं रहा। अब ये नल से, सड़क से, पुल से और शेड से गिरकर जान ले रहा है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2024 रिपोर्ट के अनुसार भ्रष्टाचार के मामले में 180 देशों में भारत 93वें स्थान पर है। स्कोर 100 में से 39। यानी "समस्या गंभीर" है। वहीं हर साल नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) संसद में 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की "अनियमितता, वित्तीय चूक और बर्बादी" की रिपोर्ट देता है। पर रिकवरी कितनी? इसकी कोई जानकारी नही। सीबीआई के आंकड़े कहते हैं कि भ्रष्टाचार के 100 केस में सिर्फ 22-23 में सजा होती है। बाकी 77 केस 10-15 साल कोर्ट में "लंबित" रहकर दम तोड़ देते हैं। मतलब भ्रष्टाचा...

बांकीपुर उपचुनाव: क्या प्रशांत किशोर खोल पाएंगे "जनसुराज" का खाता? --धर्मेंद्र कुमार

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बांकीपुर उपचुनाव: क्या प्रशांत किशोर खोल पाएंगे "जनसुराज" का खाता?             --धर्मेंद्र कुमार बिहार की राजनीति में 30 जुलाई 2026 को होने वाले बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं है। यह उपचुनाव जहां प्रशांत किशोर के लिए राजनीतिक परीक्षा है वहीं बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई। पीके यदि यहां सेंधमारी कर पाते हैं तो यह न केवल जन सुराज की पुनर्जीवन यात्रा होगी बल्कि बिहार की राजनीति में बीजेपी की अजेयता पर भी सवाल खड़े होंगे। हालांकि, बीजेपी का दशकों पुराना संगठनात्मक ढांचा और जातीय समीकरण अभी भी उसके पक्ष में हैं। असली सवाल यही है कि क्या प्रशांत किशोर जनता को यह विश्वास दिला पाएंगे कि वे सिर्फ रणनीतिकार ही नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय जननेता भी हैं? अब देखना दिलचस्प होगा कि 2025 में शून्य पर आउट हुई जनसुराज, क्या बीजेपी के गढ़ में खाता खोल पाएगी?   बांकीपुर का गणित बांकीपुर 40 साल से बीजेपी की सीट रही है। पूर्व विधायक नितिन नवीन अब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। उनके इस्तीफे से ही ये सीट खाली हुई है। ये सीट कायस्थ बहुल मानी...

पंजाब 95/सतलुज: कला, सेंसरशिप और लोकतंत्र का आईना --धर्मेंद्र कुमार

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पंजाब 95/सतलुज: कला, सेंसरशिप और लोकतंत्र का आईना     --धर्मेंद्र कुमार भारतीय सिनेमा में राजनीतिक विषयों पर बनी फिल्मों का सफर हमेशा आसान नहीं रहा है। इसका ताज़ा उदाहरण है 90 के दशक में पंजाब में उग्रवाद आंदोलन विषय पर बनी फिल्म ‘सतलुज’, जो मूल रूप से ‘पंजाब ’95’ नाम से जानी जाती थी। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की जिंदगी और संघर्षों पर आधारित है। खालरा ने पंजाब में उग्रवाद के दौर में जबरन गायब किए गए लोगों और उनके गुप्त अंतिम संस्कारों का पर्दाफाश किया था। उनकी जांच ने न केवल पंजाब पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की जवाबदेही पर भी बहस छेड़ दी।  हनी त्रेहान निर्देशित फिल्म सतलुज में अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालरा का किरदार निभाया है। सही मायने में दिलजीत ने अपने अभिनय से किरदार को जीवंत कर दिया है। इस फिल्म की खासियत यह है कि पूरे फिल्म में कोई शोर शराबा कोई प्रेम प्रसंग नही कोई आइटम सॉन्ग नहीं उसके बावजूद यह फिल्म लोगों को बहुत प्रभावित करती है। जब जसवंत सिह अपने गुमशुदा पड़ोसी किरपाल सिहं के...

मिलावट का दर्शनशास्त्र बनाम लोकतंत्र --धर्मेंद्र कुमार

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मिलावट का दर्शनशास्त्र बनाम लोकतंत्र        --धर्मेंद्र कुमार पेट्रोल में एथनॉल की मिलावट को लेकर आजकल लंबी चौड़ी बहस हो रही है। दरअसल पेट्रोल में एथनॉल की ब्लेंडिंग तो बस बहाना है। असली कहानी यह है कि आज हमारी पूरी ज़िंदगी ही मिलावट की फैक्ट्री बन चुकी है। खाद्य पदार्थों में मिलावट तो अब आम बात हैं। बल्कि अब तो लोग कहते हैं कि "बिना मिलावट का सामान खाओगे तो शरीर को झटका लग जाएगा।" आज के दौर में शुद्धता तो दुर्लभ है लेकिन मिलावट की शुद्धता की 100 प्रतिशत की गारंटी है। मिलावट वह कला है जिसमें किसी चीज की शुद्धता को समाप्त करने के लिए हम उसमें कुछ ऐसा मिला देते हैं जिससे वह न तो असली रहती है, न नकली बस कामचलाऊ बन कर रह जाती है। सामान्य अर्थ में कहें तो मिलावट का मतलब है शुद्धता को समाप्त करना होता है।    व्यवहार में मिलावट मिलावट वह प्रक्रिया है जिसके ज़रिए इंसान अपनी सच्चाई, ईमानदारी और मूल्यों को थोड़ा-थोड़ा एडजस्ट करता है ताकि वह समाज में फिट हो सके। वास्तव में “मिलावट वह राष्ट्रीय चरित्र है, जिसमें शुद्धता को अपराध और मिलावट को उपलब्धि म...

पुलिस सख्त, अपराधी मस्त: जनता को मिली चेकिंग से राहत --धर्मेंद्र कुमार

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पुलिस सख्त, अपराधी मस्त: जनता को मिली चेकिंग से राहत            --धर्मेंद्र कुमार जमशेदपुर की कानून व्यवस्था लंबे समय से सवालों के घेरे में रही है। अपराधियों के बढ़ते दुस्साहस और पुलिस की कमजोर पकड़ के कारण शहरवासी स्वंय को असुरक्षित महसूस कर रहे थे। लेकिन हाल ही में नए पुलिस कप्तान डॉ. एहतेशाम वकारिब के आगमन के बाद हालात में बदलाव की झलक दिखाई देने लगी है। डॉ. वकारिब ने पदभार संभालते ही सबसे पहले ट्रैफिक चेकिंग में लगे दर्जनों पुलिस पदाधिकारियों को थानों में पदस्थापित कर दिया। यह कदम कानून व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में अहम साबित हुआ है। अब पुलिस बल केवल हेलमेट चेकिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि अपराध नियंत्रण और गश्ती व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इसके साथ ही एसएसपी द्वारा देर रात विभिन्न थानों का औचक निरीक्षण कर पुलिस पदाधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए जा रहे हैं। इससे गश्ती बढ़ी है और पुलिस की मौजूदगी सड़कों पर महसूस की जा रही है। अपराधियों का दुस्साहस हालांकि पुलिस की सख्ती दिख रही है, अपराधी पकड़े भी जा रहे हैं। लेकिन अपराधियों के...

पंडवानी लोकगायिका तीजनबाई की आवाज सदा के लिए मौन -धर्मेंद्र कुमार

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पंडवानी लोकगायिका तीजनबाई की आवाज सदा के लिए मौन              -धर्मेंद्र कुमार जब छत्तीसगढ़ की माटी से उठी एक आवाज ने देश-विदेश के मंचों पर ‘पांडवों की गाथा’ गाई, तो लगा जैसे महाभारत फिर से जीवित हो उठा। वो आवाज थी छतीसगढ़ की तीजनबाई की। पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित तीजनबाई सिर्फ एक लोकगायिका नहीं थी, बल्कि वो छत्तीसगढ़ की आत्मा और भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति ‘लोक संस्कृति’ का प्रतीक हैं। 5 जुलाई 2026 को रायपुर के एम्स अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांसे ली और पंडवानी लोक गायिका की वो खनकती बुलंद आवाज सदा के लिए खामोश हो गई। आपको बता दे कि तीजनबाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को छत्तीसगढ़ के दूर्ग जिले के भिलाई शहर के निकट गनियारी गांव के हनुकलाल परधा और सुखवंत्ती के घर में हुआ था। बचपन से ही अपने नाना पंडवानी लोकगायक ब्रजलाल से महाभारत सुनते सनते तीजन ने महाभारत को कंठस्थ कर लिया। उनकी अद्भुत प्रतिभा औऱ लगन को देखते हुए उमेद सिंह देशुमख ने उन्हें अनौपचारिक प्रशिक्षण दिया था। विलक्षण प्रतिभा क...

*झारखंड में गठबंधन की मजबूरी और कांग्रेस की चुनौती --धर्मेंद्र कुमार*

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झारखंड में गठबंधन की मजबूरी और कांग्रेस की चुनौती       --धर्मेंद्र कुमार झारखंड की राजनीति इस समय दिल मिले ना मिले, हाथ मिलाते रहिए कहावत जैसी हो गई है। प्रदेश में यूपीए गठबंधन की सरकार सतह पर एकता का प्रदर्शन कर रही है, लेकिन भीतरखाने दरारें और गहरी होती जा रही हैं। राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी की हार ने इस दरार को और उजागर कर दिया। हार के बाद सहयोगी दलों के बीच तल्खी बढ़ी है, पर सार्वजनिक मंचों पर “ऑल इज़ वेल” का मुखौटा पहनने की कोशिश जारी है। यही दोहरी राजनीति झारखंड की सत्ता का असली चेहरा बन गई है। कांग्रेस की स्थिति: सांप-छुछुंदर कांग्रेस की हालत झारखंड में सांप-छुछुंदर जैसी हो गई है। सत्ता में रहते हुए भी वह न तो गठबंधन पर पूरी तरह हावी हो पा रही है, न ही स्वतंत्र राजनीतिक ताक़त के रूप में ही उभर पा रही है। चुनावी हार ने उसकी विश्वसनीयता पर गहरा आघात किया है। सहयोगी दलों के बीच उसका स्थान अब “ज़रूरी लेकिन असुविधाजनक साथी” जैसा बन गया है। पिछले दिनों कांग्रेस कोटे के मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने अंगरक्षकों के लिए गाड़ी उपलब्ध नहीं कराए जाने पर नारा...