आजादी के सात दशक और 'जल, जंगल, जमीन' से महरूम मूल निवासी! - धर्मेंद्र कुमार
विश्व आदिवासी दिवस
आजादी के सात दशक और 'जल, जंगल, जमीन' से महरूम मूल निवासी। - धर्मेंद्र कुमार
प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस पर सजने वाले राजनीतिक मंच, पारंपरिक नृत्यों की चकाचौंध और भारी-भरकम बजट के सरकारी विज्ञापन एक ऐसी कृत्रिम दुनिया रचते हैं, जिसका जमीनी हकीकत से दूर दूर तक कोई नाता नहीं है। हकीकत देखनी हो तो उन सुदूर आदिवासी गांवों में जाइए, जहां आजादी के सात दशकों बाद भी देश के मूल निवासी पीने के साफ पानी के लिए नालों और चुआर पर निर्भर हैं। 'विकास' के जिस खूनी मॉडल को हमने देश में लागू किया है, उसने प्रकृति के इन सच्चे सिपाहियों को उनके ही पैतृक 'जल, जंगल, जमीन' से बेदखल कर विस्थापन की अंतहीन त्रासदी में झोंक दिया है।
आबादी का गणित बनाम प्रतिनिधित्व की शून्यता
2011 की जनगणना के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में आदिवासियों की आबादी लगभग 10.45 करोड़ है, जो देश की कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत है। यदि राज्यवार वितरण पर नजर डालें तो इस आबादी की सघनता और उनके साथ हो रहा छलावा साफ नजर आता है। पूर्वोत्तर के राज्यों में आदिवासी बहुसंख्यक हैं। जहां मिजोरम में उनकी आबादी 94.4% हैं वहीं मेघालय में 86.1% है। वहीं मध्य भारत की बात करें तो छत्तीसगढ़ में 30.6%, झारखंड में 26.2%, ओडिशा में 22.8% और मध्य प्रदेश में 21.1% आदिवासी आबादी निवास करती है।
लेकिन व्यवस्था का क्रूर मजाक देखिए कुल आबादी में लगभग 9% की हिस्सेदारी रखने वाले इस समाज की शिक्षा और सरकारी नौकरियों में स्थिति आज भी बदतर बनी हुई है। राष्ट्रीय साक्षरता दर (73%) की तुलना में आदिवासियों की साक्षरता दर मात्र 63.1% पर अटकी है, जिसमें आदिवासी महिलाओं की स्थिति लगभग 46% है, जो और भी भयावह है। उच्च शिक्षा तक तो इस समाज की पहुंच न के बराबर है। सरकारी नौकरियों की बात करें तो देश के शीर्ष प्रशासनिक पदों और केंद्रीय विश्वविद्यालयों के संकाय पदों में आदिवासियों का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात से आधा भी नहीं है। अधिकांश आदिवासी वर्ग आज भी चतुर्थ श्रेणी या असंगठित क्षेत्र में बंधुआ मजदूरी करने को मजबूर है। इस समुदाय की यह स्थिति उनकी वास्तविकता को बयां करते हैं।
पेसा और वनाधिकार अधिनियम की जमीनी हकीकत
आदिवासियों को अपनी जमीन पर संप्रभुता देने के लिए बने ऐतिहासिक पेसा कानून आज प्रशासनिक उदासीनता और कॉरपोरेट सांठगांठ के कारण सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। केंद्र सरकार ने आदिवासियों को ग्राम सभा के माध्यम से स्वशासन का अधिकार देने के लिए 1996 में पेसा कानून बनाया था। विडंबना देखिए कि देश के खनिज समृद्ध राज्य झारखंड में इस कानून के नियम बनाने में सरकारों को पूरे 25 साल लग गए। हाल ही में नोटिफाई किए गए नियम भी ब्यूरोक्रेसी के चंगुल में फंसे हैं, जहां ग्राम सभा की सर्वोच्चता को कुचलकर फैसलों को प्रशासनिक अधिकारियों के अधीन कर दिया गया है। जंगलों पर आदिवासियों के पारंपरिक दावों को मान्यता देने वाले ऐतिहासिक वनाधिकार अधिनियम 2006 की स्थिति झारखंड में बेहद शर्मनाक है। विभिन्न नागरिक संगठनों की रिपोर्टों के अनुसार, झारखंड अपनी न्यूनतम क्षमता का मात्र 4.91% व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकार (IFR & CFR) ही आदिवासियों को दे पाया है। इसका सीधा मतलब यह है कि लगभग 95% हकदारी आज भी फाइलों में दफन है। देश भर में करीब 48,000 सामुदायिक वन अधिकार दावों को बिना किसी ठोस आधार के मनमाने ढंग से खारिज कर दिया गया। जिसके कारण पीढ़ियों से जंगलों में रहने वाले मूल निवासी अपनी ही जमीन पर 'अतिक्रमणकारी' बना दिए गए हैं।
सीएनटी-एसपीटी की सच्चाई
झारखंड में आदिवासियों की जमीन की सुरक्षा के लिए छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT) और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT) जैसे बेहद कड़े सुरक्षा कवच लागू हैं। लेकिन ये कानून सिर्फ किताबों की शोभा बढ़ा रहे हैं। भू-माफियाओं, बिल्डरों और कॉरपोरेट घरानों ने प्रशासनिक सांठगांठ के जरिए इन कानूनों को धत्ता बताते हुए आदिवासी जमीनों की धड़ल्ले से लूट मचा रखी है।
इस व्यवस्थागत लूट का नतीजा यह है कि प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों वाले झारखंड का आदिवासी आज सबसे भीषण कंगाली झेल रहा है। 'प्रदान' (PRADAN) की 'स्टेटस ऑफ आदिवासी लाइवलीहुड्स' रिपोर्ट इस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है कि झारखंड में लगभग 53% आदिवासी परिवार गंभीर खाद्य असुरक्षा और कुपोषण का शिकार हैं। इनकी औसत वार्षिक आय देश के अन्य ग्रामीण परिवारों की तुलना में 60% से भी कम है।
पहचान मिटाने की राजनीतिक साजिश
एक तरफ सरकार स्वंय को आदिवासियों की हितैषी बताने से नहीं चूकती है, वहीं दूसरी ओर आदिवासी समाज की पहचान से जुड़ी सरना धर्म कोड पर सरकार की चुप्पी समझ से परे है। अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को बचाने के लिए आदिवासी समाज वर्षों से 'सरना धर्म कोड' की मांग को लेकर सड़कों पर आंदोलन कर रहा है। जनगणना में अलग धार्मिक कॉलम न होने के कारण प्रकृति पूजक आदिवासियों को जबरन अन्य स्थापित धर्मों का हिस्सा बनने पर मजबूर किया जाता है, जिससे उनकी जनसांख्यिकीय और सांस्कृतिक पहचान तेजी से विलुप्त हो रही है। झारखंड विधानसभा द्वारा 2020 में इसका प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित होने के बावजूद, केंद्र सरकार इस मुद्दे पर पूरी तरह मूकदर्शक बनी हुई है।
आदिवासियों की इस बदहाली पर केवल घड़ियाली आंसू बहाने या सालाना उत्सव मनाने से अब काम नहीं चलेगा। जब तक पेसा (PESA) और वनाधिकार कानून (FRA) को पूर्ण प्रशासनिक इच्छाशक्ति के साथ धरातल पर लागू नहीं किया जाता, ग्राम सभाओं को वास्तविक शक्ति नहीं मिलती, और सरना कोड जैसे अस्मिता के सवालों को हल नहीं किया जाता, तब तक आदिवासी विकास के तमाम दावे बेमानी की साबित होंगे ।
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