Sunday, May 24, 2026

तीसरे विकल्प का आगाज है ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ है ? धर्मेंद्र कुमार



भारतीय लोकतंत्र के तथाकथित अमृतकाल में देश का युवा अपने भविष्य व अधिकार को लेकर सड़क पर आंदोलनरत है। सरकार की लगातार बेरुखी एवं सड़े हुए सिस्टम का दंश झेल रहे युवाओं के सब्र का बांध तब टूट गया, जब देश की न्याय व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे माननीय ने अपने अधिकार के लिए आबाज बुलंद कर रहे युवाओं को कॉकरोच जैसे शब्दों से नवाजा। देश की युवा पीढ़ी ने इस गाली को चुनौती के तौर पर स्वीकार करते हुए कहा कि हां, हम उसी सड़े गले सिस्टम और सरकार की गलत नीतियों की उपज हैं। देश के युवाओं का मनोबल आज जिस गहराई तक टूट चुका है, वह केवल सरकार की नीतियों की विफलता नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जड़ता और संवेदनहीनता का परिणाम है। लगातार अत्याचार, बेरोजगारी, शिक्षा में गिरावट और अवसरों की कमी ने युवाओं को हताश व निराश कर दिया है। इतिहास हवाह है कि जब भी देश की युवा पीढ़ी नें अंगड़ाई ली, सत्ता परिवर्तन हो गया। चाहे स्वतंत्रता का आंदोलन हो या जेपी का आंदोलन। 

राजनीतिक दलों से मोहभंग

राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता में आने से पहले युवाओं से रोजगार, शिक्षा और अवसरों के वादे किए जाते हैं, लेकिन सत्ता हासिल करने के बाद वही वादे हवा हवाई हो जाते हैं। भर्ती परीक्षाओं में धांधली, परिणामों में देरी, और भ्रष्टाचार ने युवाओं के भविष्य को अंधकारमय बना दिया है। आंदोलन करने वाले युवाओं पर दमन, उनकी आवाज़ दबाने की कोशिश, और समस्याओं की लिपापोती यह सब मिलकर युवाओं को और अधिक निराश कर रहा है। युवा पीढ़ी ने जहां एक तरफ कांग्रेस का राज देखा, वहीं दूसरी तरफ 12 साल भाजपा का शासन देख रहा है। चेहरा बदला, नारे बदले, झंडे बदले—पर सिस्टम? सिस्टम वही सड़ा-गला ढांचा है जिसमें फाइल दबती है, और भविष्य लीक होता है। युवाओं ने देखा है कि पारंपरिक राजनीतिक दल उनके दर्द को केवल चुनावी मुद्दा बनाते हैं। वोट मांगते समय रोजगार और शिक्षा की बात होती है, लेकिन सत्ता में आने के बाद वही मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं। यही कारण है कि अब युवाओं का भरोसा इन दलों से उठ चुका है। ऐसे युवाओ को एक नए राजनीतिक विकल्प की तलाश है।

तीसरे विकल्प की जरूरत क्यों?

कांग्रेस ने ‘गरीबी हटाओ’ कहा, गरीबी नहीं हटी। भाजपा ने ‘भ्रष्टाचार मिटाओ’ कहा, पेपर लीक नेशनल स्पोर्ट बन गया। समस्या विचारधारा की नहीं, सिस्टम की है। जब तक भर्ती आयोग, परीक्षा एजेंसी, संवैधानिक संस्थाओं एवं पुलिस-प्रशासन की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक कोई भी दल आए, नतीजा वही रहेगा। आज युवाओं को एक ऐसे विकल्प की तलाश है जो उनकी आवाज को बुलंद करें, उनके भविष्य के लिए एक बेहतर वातावरण तैयार करें।

तीसरे विकल्प की तलाश

इस पृष्ठभूमि में "कॉकरोच जनता पार्टी" का आगाज़ युवाओं के लिए एक प्रतीक बनकर उभर रहा है। यह नाम भले ही असामान्य लगे, लेकिन इसका सार यही है कि यह पार्टी उन युवाओं की आवाज़ बने जो बार-बार कुचले गए हैं, फिर भी जीवटता से खड़े हैं। यह विकल्प सरकार विरोधी आंदोलन से कहीं अधिक सड़े-गले सिस्टम के विरोध में है। इसका उद्देश्य युवाओं के लिए एक ऐसा मंच तैयार करना है जो उनके दर्द को समझे और उनके भविष्य के लिए बेहतर वातावरण बनाए। यह पार्टी युवाओं को केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि देश की रीढ़ मानकर उनके लिए शिक्षा, रोजगार और अवसरों की नई राह खोले।
आज का युवा परिवर्तन की तलाश में है। "कॉकरोच जनता पार्टी" उस तलाश का प्रतीक है। एक ऐसा तीसरा विकल्प जो युवाओं की आवाज़ को बुलंद करे और उनके सपनों को साकार करने की दिशा में ठोस कदम उठाए। यह आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का भी संकेत है। सत्ता को समझना होगा कि ‘कॉकरोच’ गाली नहीं बल्कि वह आइना जिसमें भ्रष्ट सिस्टम औऱ सरकार की गैर जिम्मेदारी के अक्स दिखाई पड़ते है। जब तक सिस्टम में गंदगी रहेगी, कॉकरोच पैदा होते रहेंगे। उन्हें मारने से नहीं बल्कि सिस्टम में आमूल चूल परिवर्तन ही इस समस्या का असली समाधान है।
यदि सिस्टम ने युवाओं की पुकार को अनसुना किया, तो यह तीसरा विकल्प आने वाले समय में देश की राजनीति की नई धुरी बन सकता है।

Sunday, May 17, 2026

भारतीय राजनीति के कलयुगी चाणक्य बनाम सत्ता का खेल धर्मेंद्र कुमार


आचार्य चाणक्य का नाम सुनते ही मस्तिष्क में एक ऐसी नीति की छवि उभरती है जो राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखती थी। उनकी कूटनीति का केंद्रबिंदु था—राष्ट्र का निर्माण, शत्रुओं से रक्षा और प्रजा का कल्याण। उनके अर्थशास्त्र में राजा का पहला धर्म ‘प्रजा सुखे सुखं राज्ञः’ बताया गया था। यानी राजा का सुख प्रजा के सुख में है। आज के दौर में यह नीति अप्रासंगिक हो गया। राजा के सुख में प्रजा को सुख की अनुभूति करनी होगी यही जनता कि नियति बन चुकी है। जो जनता जनप्रतिनिधियों को पलकों पर बिठा कर सत्ता के सिंहासन पर बैठाती है वहीं सेवक सत्ता के सिंहासन पर पहुंचने के साथ ही स्वंय को प्रजा से असुरक्षित महसुस करने लगता है। और अपनी सुरक्षा के लिए अपनी चारों तरफ अंगरक्षकों की एक घेराबंदी बना लेता है ताकि जनता आसानी से उन तक नहीं पहुंच सके। आज की राजनीति व राजनताओं की कड़वी हकिकत है। दुर्भाग्य से आज की भारतीय राजनीति में जिन ‘चाणक्यों’ का उदय हुआ है, उनकी नीति चाणक्य के सिद्धांतों के ठीक उलट है। इन कलयुगी चाणक्यों के लिए राष्ट्रनिर्माण गौण है, सत्ता ही साध्य है।

विपक्ष-मुक्त लोकतंत्र का खतरनाक खेल  
चाणक्य ने कहा था कि मजबूत शत्रु भी राज्य को सतर्क रखता है। लोकतंत्र में विपक्ष वही भूमिका निभाता है। लेकिन आज के चाणक्य की पहली नीति विपक्ष को हर कीमत पर कमजोर करना है। इसके लिए प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई, आयकर जैसी संवैधानिक संस्थाओं का राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल आम हो गया है। विपक्षी नेताओं पर छापे, मुकदमे और दल-बदल कराना अब ‘चुनावी रणनीति’ का हिस्सा बन चुका है। मकसद साफ है चुनावी मैदान में उतरने से पहले ही विरोधी को पंगु बना दो। ताकि चुनाव आसानी से जीता जा सके।

 संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग

चाणक्य ने राजा को धर्म और न्याय के अधीन रखा था। आज के चाणक्य संविधान और संस्थाओं को अपने अधीन करना चाहते हैं। संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग  कर लोकतंत्र को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल, राज्यपालों का राजनीतिक इस्तेमाल, और न्यायपालिका पर दबाव के आरोप अब सामान्य हो गए हैं। जब हार का डर सताए, तो संवैधानिक प्रावधानों की मनमानी व्याख्या करके, अध्यादेश लाकर, या राज्य सरकारों को अस्थिर करके चुनाव जीतना इनकी प्राथमिकता बन गई है। लोकतंत्र की प्रक्रिया बची रहे, भावना मर भी जाए तो परवाह नहीं।

नागरिक नहीं, सिर्फ ‘वोटर टूल’ 

असली चाणक्य के लिए प्रजा ‘पाल्य’ थी। कलयुगी चाणक्य के लिए जनता महज चुनाव जीतने का ‘टूल’ है। जनता को वास्तविक मुद्दों—महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य—से दूर रखने के लिए उसे धर्म और जाति के आख्यान में उलझा दिया जाता है। सुबह-शाम मंदिर-मस्जिद, श्मशान-कब्रिस्तान की बहस चलाई जाती है ताकि कोई यह न पूछे कि अस्पताल क्यों नहीं बने, नौकरियां कहां गईं, रुपया क्यों गिरा।

 विकास का विकल्प ‘रेवड़ी कल्चर’ 

इन चाणक्यों का विकास से कोई वैचारिक सरोकार नहीं। पांच साल तक बुनियादी ढांचा, रोजगार सृजन, शिक्षा सुधार पर कोई ठोस काम नहीं होता। मगर चुनाव से छह महीने पहले ‘रेवड़ी वितरण’ शुरू हो जाता है। मुफ्त अनाज, नकद हस्तांतरण, बिजली बिल माफी—यह सब ‘लाभार्थी वर्ग’ बनाने की कला है। इसका उद्देश्य जनता को स्वावलंबी बनाना नहीं, बल्कि उसे सरकारी खैरात पर निर्भर रखकर चुनावी वैतरणी पार करना है। यह चाणक्य की ‘कोष वृद्धि’ नीति नहीं, बल्कि ‘कोष लुटाकर सत्ता बचाओ’ नीति है। उनके लिए विकास का सरल विकल्प रेवड़ी कल्चर है जिसका स्वाद जनता को भी भाने लगा है लेकिन जो देश को बर्बादी की और ले जाएगा।

 शासन का नया शस्त्र झूठे आश्वासन  

चाणक्य कहते थे कि ‘न विश्वसेत् अविश्वस्ते’ यानी अविश्वसनीय पर विश्वास न करो। लेकिन आज के चाणक्य का पूरा खेल ही अविश्वसनीय वादों पर टिका है। हर चुनाव में 2 करोड़ नौकरियां, किसानों की आय दोगुनी, 15 लाख हर खाते में—ऐसे जुमले फेंके जाते हैं। चुनाव बाद इन वादों को ‘चुनावी जुमला’ बताकर भुला दिया जाता है। जनता की स्मृति कमजोर है, यह इनका सबसे बड़ा भरोसा है।

 चाणक्य नीति से विश्वासघात  

आचार्य चाणक्य ने सत्ता को राष्ट्र का साधन माना था। आज के कलयुगी चाणक्य ने राष्ट्र को सत्ता का साधन बना दिया है। उनके लिए संविधान एक किताब है जिसे जरूरत पर मोड़ा जा सकता है, लोकतंत्र एक प्रक्रिया है जिसे प्रबंधित किया जा सकता है, और जनता एक भीड़ है जिसे भावनाओं में बहाकर वोट में बदला जा सकता है।
यह स्थिति लोकतंत्र के लिए घातक है। जब नीति का लक्ष्य केवल ऐन केन प्रकारेण  चुनाव जीतना’ रह जाए, तो राष्ट्रनिर्माण पीछे छूट जाता है। चाणक्य ने मगध को अखंड बनाया था। कलयुगी चाणक्य भारत को विचारों, धर्मों और जातियों में खंड-खंड कर रहे हैं।
जनता को अब तय करना होगा कि उसे नीति एवं सिद्धांत के प्रति समर्पित चाणक्य या जुमलों का जादूगर। क्योंकि जब राजा का सुख प्रजा के दुख में हो, तो लोकतंत्र का महल रेत की दीवारें साबित होता है।

जिला प्रशासन ने दिखाई संवेदनशीलता,बुजुर्ग को मिली राहत


85 वर्षीय बुजुर्ग को 24 घंटे के भीतर मिला पेंशन और आयुष्मान योजना का लाभ


रांची। बड़े अधिकारी व प्रशासन थोड़े संवेदनशील हो जाएं तो जनता के लिए यह किसी बड़े सौगात से कम नहीं। महीनों का मिनटों में संभव है। क्योंकि सुशासन की पहली शर्त प्रशासन का संवेदनशील होना है। रांची जिला प्रशासन की संवेदनशील कार्यशैली का एक प्रेरणादायक उदाहरण सामने आया है। जब उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री के निर्देश पर 85 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक राधेश्याम नाथ को 24 घंटे के भीतर सरकारी योजनाओं का लाभ उपलब्ध कराया गया।

16 मई को अपनी फरियाद लेकर उपायुक्त कार्यालय पहुंचे 85 वर्षीय किशोरगंज निवासी राधेश्याम नाथ की समस्या को उपायुक्त ने सुना और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि जल्द से जल्द बुजूर्ग को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलवाएं। उपायुक्त के निर्द्श पर पदाधिकारियों ने त्वरित कार्रवाई करते हुए सर्वजन पेंशन योजना के अंतर्गत पेंशन स्वीकृति प्रमाण पत्र उनके घर पहुंचकर उपलब्ध कराया गया। इसके साथ ही उनका आयुष्मान कार्ड भी बनवाकर सौंपा गया, ताकि उन्हें स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं का लाभ आसानी से मिल सके।

वहीं लाभ प्राप्त करने के बाद वरिष्ठ नागरिक राधेश्याम नाथ ने राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद दिया। मौके पर उपायुक्त भजंत्री ने कहा कि जरूरतमंद एवं पात्र लोगों तक योजनाओं का लाभ समयबद्ध तरीके से पहुंचाना प्रशासन की प्राथमिकता है तथा आगे भी इसी तरह संवेदनशीलता के साथ कार्य जारी रहेगा। यदि प्रशासन व सरकार थोड़ी संवेदनशील हो जाए तो जनता की सभी समस्याओं का समाधान समय पर हैं। अब यह देखना लाजमी होगा कि यह घटना प्रदेश के पदाधिकारियों के लिए एक प्रेरणा का स्रोत बनेगा या अन्य घटनाओं की तरह ही यह भी काल के गाल में विलीन हो जाएगा।

NEET-UG के पेपर लीक का कौन है जिम्मेवार ?  धर्मेंद्र कुमार


युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ आखिर कब तक ?  

NEET-UG जैसी परीक्षा किसी छात्र के लिए सिर्फ एक टेस्ट नहीं, बल्कि जीवन भर का सपना होता है। एक डॉक्टर बनने की तपस्या। इस परीक्षा की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि परीक्षार्थियों को बिना जेब वाले कपड़े पहनने, चप्पल में आने और कान की बाली तक उतारने के निर्देश दिए जाते हैं। मेटल डिटेक्टर, जैमर, बायोमेट्रिक अटेंडेंस—हर कदम पर ‘कदाचार मुक्त’ परीक्षा का दावा किया जाता है। लेकिन विडंबना देखिए, जहां छात्र की शर्ट की जेब पर शक किया जाता है, वहीं सिस्टम की पूरी तिजोरी में सेंध लगी हुई है। 2024 से NEET-UG के पेपर लीक का जो सिलसिला खुले तौर पर शुरू हुआ, वह अब एक पैटर्न बन चुका है। प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले टेलीग्राम चैनलों पर बिक रहे हैं, 30-30 लाख में सौदे हो रहे हैं, और मेहनत करने वाला छात्र ठगा हुआ महसूस कर रहा है। बड़ा सवाल है कि इस पेपर लीक खेल का असली जिम्मेवार कौन है ? 
चूक कहां हो रही है ?  

NTA जैसी केंद्रीय एजेंसी की जिम्मेदारी है कि वह देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा को पारदर्शी बनाए। लेकिन असल चूक वहीं हो रही है जहां सबसे ज्यादा चौकसी होनी चाहिए। पेपर सेटिंग से लेकर प्रिंटिंग प्रेस, ट्रांसपोर्टेशन और स्ट्रॉन्ग रूम तक। परीक्षा केंद्र पर छात्र की तलाशी लेने वाली एजेंसी, पूरे सिस्टम की तलाशी लेने में फेल हो रही है। इस मामले सरकार कितनी गंभीर है इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि इतने बड़े खुलासों के बाद भी एजेंसी के शीर्ष अधिकारियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। न कोई इस्तीफा, न कोई बर्खास्तगी। यह ‘जीरो टॉलरेंस’ नहीं, बल्कि ‘जीरो एक्शन’ है। जब गलती पर सजा नहीं मिलती, तो पदाधिकारियों का मनोबल बढ़ना स्वाभाविक है। उन्हें लगता है कि सिस्टम उनके साथ है।

पूरा सिस्टम ही बीमार है  

पेपर लीक अब अपवाद नहीं, नियम बन गया है। पिछले 12 वर्षों का रिकॉर्ड देखें तो तस्वीर और डरावनी हो जाती है-
2015 | AIPMT/NEET | 700+ केंद्रों पर पेपर लीक, सुप्रीम कोर्ट ने परीक्षा रद्द की
2016 | SSC CGL | पेपर लीक, SSC मुख्यालय पर प्रदर्शन
2017 | CBSE Class 12 Economics | पेपर लीक, दोबारा परीक्षा
2018 | SSC CHSL, UP Police | लगातार लीक के मामले
2021 | NEET-UG | राजस्थान, यूपी में सॉल्वर गैंग पकड़े गए
2022 | UPTET, REET | परीक्षा से पहले पेपर वायरल, रद्द करनी पड़ी
2023 | JSSC CGL, बिहार सिपाही भर्ती | लीक के कारण परीक्षा रद्द
2024 | NEET-UG, UGC-NET | पेपर लीक, NTA पर सवाल, UGC-NET रद्द
2024 | झारखंड एक्साइज सिपाही भर्ती | परीक्षा से एक दिन पहले पेपर लीक
2024 | UP पुलिस कांस्टेबल भर्ती | 48 लाख अभ्यर्थी प्रभावित, परीक्षा रद्द
यह सूची बताती है कि शिक्षा माफियाओं का सिंडिकेट कितना तगड़ा और बेखौफ हो चुका है। बिहार से लेकर राजस्थान, यूपी से लेकर झारखंड—हर राज्य में इनके तार जुड़े हैं। सवाल है कि जब कोचिंग माफिया, प्रिंटिंग प्रेस, ट्रांसपोर्टर और अधिकारियों की मिलीभगत से पूरा नेटवर्क चल रहा है, और सरकार उसे तोड़ने असहाय दिख रही।

भ्रष्टाचार मुक्त भारत’ के दावे और हकीकत  

केंद्र सरकार लगातार ‘भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस’ का दावा करती है। लेकिन NEET जैसा ‘छोटे स्तर’ का भ्रष्टाचार भी रोकने में वह नाकाम दिख रही है। अगर सरकार 24 लाख बच्चों के भविष्य से जुड़ी परीक्षा को सुरक्षित नहीं रख सकती, तो बड़े नीतिगत भ्रष्टाचार पर कार्रवाई के दावे कितने खोखले हैं, यह जनता खुद समझ सकती है। सरकार की चुप्पी भी एक संदेश है। जब हर लीक के बाद सरकार केवल ‘जांच कमेटी’ बनाकर मौन हो जाती है, तो इसे मौन स्वीकृति ही कहा जाएगा। न NTA का पुनर्गठन हुआ, न पेपर सेटिंग प्रक्रिया में आमूलचूल बदलाव। बस हर बार लाखों बच्चों को कहा जाता है—‘अगली बार मेहनत करना’।

युवाओं के साथ धोखा

यह केवल पेपर लीक नहीं, युवाओं के भरोसे और विश्वास के साथ खिलवाड़ है। एक छात्र 12-14 घंटे पढ़ता है, घर से दूर रहकर तैयारी करता है, मां-बाप खेत बेचकर फीस भरते हैं। और अंत में पता चलता है कि सीट पहले ही 30 लाख में बिक चुकी थी। लाखों छात्रों के साथ हुए इस अन्याय के लिए कहीं ना कहीं सरकार दोषी है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। सरकार यदि थोड़ी सख्त हो जाए, और परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों की जिम्मेवारी और जवाबदेही तय करे, की परीक्षा के पेपर लीक होने पर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी तो निश्चित रुप से पेपर लीक के खेल पर विराम लग सकता है।
सरकार को समझना होगा कि शिक्षा राष्ट्रनिर्माण की नींव है। अगर नींव में ही भ्रष्टाचार की दीमक लग गई, तो इमारत कितने दिन टिकेगी? 
जब तक सरकार शिक्षा माफियाओं के सामने बौनी नजर आएगी, तब तक ‘विकसित भारत’ का सपना कागजों में ही लीक होता रहेगा। युवाओं के भविष्य से यह खिलवाड़ अब बंद होना चाहिए। कम से कम इस मामले में सरकार को गंभीर एवं संवेदनशील होने की आवश्यक्ता है।

Friday, May 15, 2026

जनता पर अत्याचार कब तक सरकार ? --धर्मेंद्र कुमार


देश की जनता एक के बाद एक संकटों से जूझ रही है। कोविड-19 महामारी की मार से वह अभी पूरी तरह उबरी भी नहीं थी कि सरकार की नीतियों ने उसे फिर आर्थिक दलदल में धकेल दिया है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। यह वृद्धि केवल ईंधन तक सीमित नहीं, बल्कि ट्रांसपोर्ट महंगा होने से सब्जी, अनाज, दूध से लेकर हर जरूरी वस्तु की कीमत आसमान छू रही है। महंगाई की यह आग सीधे रसोई तक पहुंच चुकी है।

चुनाव बाद कीमत वृद्धि: जनता से छल

विपक्ष महीनों से आगाह कर रहा था कि चुनाव समाप्त होते ही सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाएगी। तब सत्ता पक्ष ने इसे ‘झूठा प्रचार’ बताकर खारिज कर दिया और दावा किया कि स्थिति सामान्य है। चुनाव निपटते ही दामों में उछाल ने साबित कर दिया कि विपक्ष की आशंका सही थी। सवाल यह है कि सरकार ने सच छिपाकर जनता का विश्वास क्यों तोड़ा? क्या लोकतंत्र में पारदर्शिता की कोई जगह नहीं बची?
भारत ने रूस से अंतरराष्ट्रीय बाजार से काफी कम दाम पर कच्चा तेल 2022-23 में बड़े पैमाने पर खरीदा और अपनी ऊर्जा लागत नियंत्रित रखी। लेकिन अमेरिकी दबाव के आगे झुकते हुए सरकार ने धीरे-धीरे रूस से आयात लगभग बंद कर दिया। नतीजा हमें महंगा तेल खाड़ी देशों और अमेरिका से खरीदना पड़ रहा है। 
यही नहीं कुछ वर्ष पहले तक भारत ईरान से रुपये में तेल खरीदता था। भुगतान व्यवस्था ऐसी थी कि भारत ईरान को सामान निर्यात करके तेल का पैसा चुकाता था। इससे डॉलर की जरूरत नहीं पड़ती थी और रुपया भी स्थिर रहता था। लेकिन अमेरिका के प्रतिबंधों के दबाव में सरकार ने ईरान से आयात पूरी तरह बंद कर दिया। आज जब खाड़ी संकट गहराया है, तो सस्ते विकल्प हमारे पास नहीं बचे। वहीं किसी भी समझदार देश के लिए रणनीतिक तेल भंडार यानी ‘स्ट्रैटेजिक रिजर्व’ संकट से निपटने का सबसे बड़ा हथियार होता है। लेकिन  पिछले 12 वर्षों में सरकार ने देश के तेल रिजर्व में कोई ठोस बढ़ोतरी नहीं की। आज जब आपूर्ति श्रृंखला टूटी है, हमारे पास सिर्फ 9-10 दिन का रिजर्व है जबकि चीन के पास 90 दिन और अमेरिका के पास 200 दिन से ज्यादा का भंडार है। यह तैयारी की भारी कमी दर्शाता है।

सरकार ने दिए लॉकडाउन के संकेत 
  
 प्रधानमंत्री ने देशवासियों को संबोधित करते हुए देश पर आए संकट से निपटने के लिए देशहित में पेट्रोल औऱ डीजल के उपयोग कम करने की अपील की वहीं वर्क फॉर होम की बात कही। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट तौर पर यह संकेत दे दिया कि यदि हालात नहीं सुधरेंगे तो लॉकडाउन का सामना करना पड़ सकता है। जनता अभी पूरी तरह कोविड के दर्द से उबर भी नहीं पाई है।  कोविड काल में लाखों लोगों ने रोजगार खोया, छोटे कारोबार बंद हो गए, बचत खत्म हो गई। परिवार अब भी कर्ज चुकाने में लगे हैं। ऐसे में सरकार द्वारा बार-बार ‘लॉकडाउन जैसी स्थिति’ के संकेत देना जनता के मानसिक और आर्थिक स्वास्थ्य पर दोहरी मार है। 

रुपया कमजोर, नीतियां नाकाम  

डॉलर के मुकाबले रुपये का लगातार गिरना सरकार की आर्थिक और विदेश नीति की विफलता को उजागर करता है। कमजोर रुपया आयात को महंगा बनाता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 85% आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमत,  कमजोर रुपये के कारण पेट्रोल-डीजल  और महंगा हो गया है। यह सीधा-सीधा अदूरदर्शी आर्थिक प्रबंधन का परिणाम है। न निर्यात बढ़ाने की ठोस रणनीति दिखती है, न रुपये को संभालने की।

सरकार का जिम्मेदारी से पलायन 

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि सरकार अपनी गलतियों को स्वीकार करने के बजाय हर संकट के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहरा देती है। महंगाई बढ़े तो ‘अंतरराष्ट्रीय कारण’, रुपया गिरे तो ‘वैश्विक हालात’, बेरोजगारी पर सवाल उठे तो ‘पिछली सरकारें’जिम्मेवार। यह पलायनवाद लोकतांत्रिक जवाबदेही के खिलाफ है। जनता ने जिन्हें ‘सेवक’ बनाकर देश चलाने की जिम्मेदारी दी थी, वे आज ‘सेवा का मेवा और मलाई’ चाभ रहे हैं। मंत्रियों के भत्ते, सुविधाएं, विज्ञापनों पर खर्च बरकरार है, लेकिन जनता से कहा जा रहा है कि ‘राष्ट्रनिर्माण’ के लिए त्याग करे।

क्या बोझ सिर्फ जनता उठाएगी?

देश को आर्थिक संकट से उबारने की जिम्मेदारी क्या केवल जनता की है? जब जनता टैक्स दे, महंगा तेल खरीदे, महंगाई सहे और फिर भी चुप रहे, तो सरकार की भूमिका क्या है? नीति निर्धारण, कूटनीतिक संतुलन, कर ढांचे में सुधार — ये सब सरकार के दायित्व हैं। यदि हर वैश्विक संकट का ठीकरा जनता के सिर ही फोड़ा जाएगा, तो ‘कल्याणकारी राज्य’ की अवधारणा का क्या अर्थ रह जाएगा?
आज जरूरत है कि सरकार अदूरदर्शी फैसलों और दोषारोपण की राजनीति छोड़कर जमीन पर उतरे। तेल पर अत्यधिक केंद्रीय करों में कटौती करे, रुपये को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाए, और जनता को विश्वास दिलाए कि संकट की घड़ी में वह अकेली नहीं है। वरना इतिहास यही दर्ज करेगा कि जब जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी, उसके ‘सेवक’ सत्ता के सुख भोग रहे थे।

Thursday, May 14, 2026

पप्पू सरदार ने मनाया सीने तारिका माधुरी दीक्षित का जन्मदिन


सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने बांधा समां


जमशेदपुर। पप्पू सरदार ने बॉलीवुड की धक-धक गर्ल माधुरी दीक्षित का जन्मदिन दुश्म से मनाया।  हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी शहर के साकची बाजार में भव्य दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा हैं। कार्यक्रम के प्रथम दिन गुरुवार शाम को आयोजन स्थल पर उत्सव (त्योहर) जैसा माहौल देखने को मिला। स्पर्श क्रिएटिव एकेडमी के बच्चों ने माधुरी दीक्षित के लोकप्रिय गीतों पर शानदार रंगारंग प्रस्तुतियां देकर दर्शकों का मन मोह लिया। बच्चों के आकर्षक नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने उपस्थित लोगों को देर रात तक बांधे रखा। 

भजन कीर्तन से भक्तिमय हुआ वातावरण


इसके साथ ही इस्कॉन की टीम द्वारा हरे राम-हरे कृष्ण संकीर्तन एवं धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन किया गया, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। कार्यक्रम की शुरुआत भगवान श्री गणेश की पूजा-अर्चना से हुई। पंडित संतोष कुमार त्रिपाठी ने पूजा संपन्न कराई, जबकि आयोजनकर्ता पप्पू सरदार यजमान के रूप में शामिल हुए। पूजा के दौरान माधुरी की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना की गयी। 

मीडिया कर्मियों को किया गया सम्मानित

पूजा अर्चना के बाद आयोजित सम्मान समारोह में शहर के 50 से अधिक वरिष्ठ मीडियाकर्मियों को सम्मानित किया गया। रात करीब 11.30 बजे भव्य केक काटकर माधुरी दीक्षित का जन्मदिन त्योहर के रूप में मनाया गया। इस अवसर पर आयोजन स्थल को पूजा पंडाल की तरह आकर्षक ढंग से सजाया गया था। पहले दिन खासकर महिलाओं और युवतियों में सेल्फी लेने की होड़ देखने को मिली। 

29 वर्षों से लगातार हो रहा है जन्मदिन का आयोजन
 गौरतलब है कि शहर के पप्पू सरदार पिछले 29 वर्षों से लगातार माधुरी दीक्षित का जन्मदिन मनाते आ रहे हैं। उनकी इस अनोखी श्रद्धा और दीवानगी को अंतरराष्ट्रीय पहचान भी मिल चुकी है। इस आयोजन को सफल बनाने में हर वर्ष की तरह इस बार भी कई शुभचिंतकों का सहयोग प्राप्त हुआ।

Sunday, May 10, 2026

भारतीय लोकतंत्र में नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत?--धर्मेंद्र कुमार

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त उसकी विविधता और जनभागीदारी है, लेकिन हाल की कुछ घटनाएओं से स्वतः यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या विश्व के सबसे बड़े गणतंत्र में संविधान से इतर तानाशाही तंत्र की एक नई और चिंताजनक अध्याय की शुरुआत हो चुकी है ? भारतीय संविधान में जाति धर्म अमीर और गरीब का भेद नहीं करते हुए सभी को मतदान करने का समान अधिकार दिया गया है। यही भारतीय लोकतंत्र की खुबसूरती है और मजबूती भी। 2024 के लोकसभा चुनाव में केंद्रीय चुनाव आयोग ने शतप्रतिशत मतदान के लिए अभियान चलाया था। जिसके तहत जो वोटर मतदान केंद्रों तक जाने में असमर्थ थे, उनके घर जा कर वोट कास्ट कराया गया था। आयोग का यह प्रयास था कि एक भी मतदाता ना छुटे, लेकिन भाजपा के अमृतकाल में हालात बदल गए हैं। चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के शुद्धिकरण के नाम पर अपने हिसाब से मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए एवं जोड़े जा रहे हैं। अब लाखों लोग यदि वोट देने से वंचित रह जाएं, तब भी यह चुनाव आयोग के लिए कोई चिंता का विषय नहीं है क्योंकि यह सब उनका ही कुकृत है। जबकि लोकतंत्र का तकाजा है कि एक भी वोटर अपने मताधिकार से न चुके।
 आयोग पर लगे वोट चोरी के आरोप
पिछले कुछ वर्षों में विपक्ष द्वारा चुनाव आयोग पर वोट चोरी  और मतदाता सूची में हेरफेर  जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया के नाम पर लाखों मतदाताओं के नाम काटे। विपक्ष का आरोप है कि समर्थक वर्ग के नाम जोड़े गए, जबकि विरोधी मतदाताओं को वंचित किया गया। इसके प्रमाण भी प्रस्तुत किए गए। लेकिन आयोग ने इन आरोपों के जांच कराने के उलट, इसका जवाब देना भी उचित नहीं समझा, जो कहीं ना कहीं आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता हैं। इन घटनाओं पर न्यायपालिका की मौन स्वीकृति भी लोकतंत्र की निष्पक्षता पर गहरी चोट करती है।
संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका
संविधान का मूल आधार है कि संवैधानिक संस्थाएं स्वतंत्र और निष्पक्ष रहें। लेकिन जब उच्चतम न्यायालय गंभीर आरोपों पर ठोस कार्रवाई नहीं करता, जब संवैधानिक संस्थाएं  केंद्र सरकार के दबाव में कार्य करती हैं, तो यह लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करता है। चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं जिन पर निष्पक्ष चुनाव कराने की बड़ी जिम्मेवारी है। जब उसके द्वारा जनमानस की अपनेक्षाओं की अवहेलना कर एक पक्षीय कार्य किए जाते है। तब देश की जनता का भरोसा आयोग से उठ जाता है। जो लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है। 
हाल की घटनाएं
बिहार में हुए विवादित घटनाक्रम के बाद अब बंगाल में भी वही खेल दोहराया गया। इससे लोगों में यह धारणा मजबूत होती है कि केंद्र सरकार जब चाहे, जहां चाहे संवैधानिक संस्थाओं के आसरे चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र को संविधान विरोधी  दिशा में ले जाती है।
 एक देश, एक विधान, एक निशान ?
 यह इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि भारतीय जनता पार्टी की मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के संस्थापकों ने भारतीय संविधान औऱ भारतीय तिरंगा को मानने से इंकार कर दिया था। आजादी के बाद पांच दशकों तक आरएसएस के मुख्यालय पर तिरंगा नहीं फहरा गया। तब एक देश एक विधान एक निशान और एक संगठन के पैरवीकारो की मंशा भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की थी, जिसमें वो सफल नहीं हो पाए थे। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव में धांधली से संबंथित हाल की कुछ घटनाएं उसी अघोषित लक्ष्य  की प्राप्ति की ओऱ बढ़ाया गया यह कदम है। यह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि इससे संघीय ढांचा और राज्यों की स्वायत्तता कमजोर होगी और तानाशाही हावी होगी।
भारतीय लोकतंत्र में शुरू हुए तानाशाही तंत्र का यह नया अध्याय जहां जनतंत्र को कमजोर करेगा, वहीं यह इसके लिए घातक भी है। बड़ा सवाल यही है कि क्या लोकतंत्र अब जनता की शक्ति से नहीं, बल्कि सत्ता की रणनीति से संचालित होगा? यदि ऐसा है, तो यह नया अध्याय लोकतंत्र के अंत की प्रस्तावना होगा।

Wednesday, May 6, 2026

बंगाल में झंडा बदला, लेकिन डंडा और गुंडा वही – बदलाव की असली परीक्षा– धर्मेंद्र कुमार


सत्ता का अंत, हिंसा का सिलसिला जारी
बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की प्रचंड जीत ने 15 वर्षों के टीएमसी शासन का पटाक्षेप कर दिया। लेकिन चुनावी नतीजों के बाद जो दृश्य सामने आ रहे हैं, वे बंगाल की राजनीति की पुरानी बीमारी को उजागर करते हैं। बदले की भावना से टीएमसी कार्यालयों पर हमले एवं कार्यकर्ताओं की पिटाई तो कहीं बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्याएं। यह राजनीतिक प्रतिशोध की घटनाएं यह दिखाती हैं कि बंगाल में सत्ता बदलने से हिंसा का चरित्र नहीं बदला।

झंडा बदला, संस्कृति नहीं

टीएमसी के कार्यकर्ता जो कल तक सत्ता के संरक्षण में थे, ऐसा प्रतित हो रहा है कि आज वही लोग नए झंडे के नीचे खड़े हैं। बंगाल की राजनीति में “डंडा और गुंडा” संस्कृति इतनी गहरी जड़ें जमा चुकी है कि केवल चुनावी परिणाम इसे मिटा नहीं सकते। सवाल यह है कि क्या बीजेपी इस हिंसक राजनीतिक संस्कृति को बदल पाएगी, या वही सिलसिला नए रंग में भी जारी रहेगा।
केंद्रीय बलों की मौजूदगी और सवाल

चुनाव के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों की मौजूदगी ने मतदान को अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण बनाया। लेकिन चुनाव बाद की हिंसा यह बताती है कि सुरक्षा बल केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित रहे। लोकतंत्र की असली परीक्षा तो चुनाव के बाद होती है, जब सत्ता परिवर्तन के बावजूद नागरिकों को सुरक्षा और न्याय का भरोसा मिलना चाहिए।
बंगाल की राजनीति का असली संकट 
बंगाल का संकट केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति का है। यहां राजनीति लंबे समय से हिंसा, डर और प्रतिशोध पर टिकी रही है। चाहे कांग्रेस हो, वामपंथी हों, टीएमसी या अब बीजेपी हर दौर में कार्यकर्ताओं और आम जनता ने हिंसा का सामना किया है। बंगाल की जनता ने टीएमसी की गुंडागर्दी से छुटकारा पाने के लिए भाजपा को समर्थन किया। लेकिन हिंसा थम नहीं रहा है। यही कारण है कि जनता पूछ रही है: “क्या बदलेगा बंगाल?”
बदलाव की राह
गृहमंत्री को केंद्रीय सुरक्षा बलों को यह स्पष्ट निर्देश देना चाहिए कि हिंसा करने वाले चाहे किसी भी दल से हों उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई करें। जीत के बाद तमाम गिले शिकवे को भुला कर प्रदेश में शांतिपूर्ण वातावरण बनाने का प्रयास होना चाहिए। विपक्ष को दुश्मन नहीं बल्कि लोकतंत्र का हिस्सा मानने की संस्कृति विकसित करनी होगी। विकास, रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दों पर ध्यान देकर ही जनता का विश्वास जीता जा सकता है।
बंगाल में झंडा बदलना आसान था, लेकिन डंडा और गुंडा संस्कृति को बदलना कठिन है। अगर बीजेपी सचमुच बदलाव का दावा करती है, तो उसे हिंसा की इस परंपरा को तोड़ना होगा। अन्यथा बंगाल की राजनीति केवल रंग बदलती रहेगी, चरित्र नहीं। बंगाल का असली पुनर्जागरण तब होगा, जब राजनीति से डर नहीं, विचार निकलेगा।

Tuesday, May 5, 2026

आजादी के सात दशक बाद बंगाल में लहराया भगवा --धर्मेंद्र कुमार

2026 के विधानसभा चुनाव में बंगाल की राजनीति ने ऐतिहासिक करवट ली, टीएमसी की करारी हार के साथ ही भाजपा की अभूतपूर्व जीत का सबसे बड़ा कारण एंटी-इनकंबेंसी नहीं बल्कि ‘एंटी-टीएमसी वेव’ था। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बंगाल की जनता ने बीजेपी को जिताने के लिए नहीं बल्कि ममता को हराने के लिए जमकर वोट किया, जिसके परिणाम स्वरुप बीजेपी की प्रचंड जीत हुई। सूत्रों की माने तो टीएमसी के सींडिकेट से बंगाल की आम जनमानस परेशान था। इसलिए बंगाल की जनता ने बीजेपी को एक विकल्प के तौर चुना। इसके साथ ही वोट शेयर में आई गिरावट, दक्षिण बंगाल के गढ़ का टूटना और 15 साल की सत्ता विरोधी लहर ने भी बखूबी अपना काम किया। वहीं चुनाव आयोग द्वारा 27 लाख लोगों को वोट देने से वंचित रखना भी कहीं ना कहीं इस चुनावी परिणाम में एक बड़ा कारक है, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता। जिसको लेकर किसी भी स्तर पर कोई चिंता और चर्चा नहीं हुई। इसके मायने क्या है? हमें इस विषय पर चितंन करने की आवश्यकता है।

आजादी के बाद पहली बार बंगाल में लहराया भगवा
आजादी के सात दशक बाद पहली बार जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जन्मस्थली बंगाल में भाजपा की पूर्ण वहुमत की सरकार बनेगी। 2015 से ही बंगाल फहत करने के मिशन में लगे बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व में अंततः 2026 इसे साकार कर दिखाया। इस मिशन को साकार करने में कई बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने अपनी कुर्बानी दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में भाजपा की इस प्रचंड जीत को उन बीजेपी के शहीद कार्यकर्ताओं को समर्पित करते हुए उनके प्रति आभार प्रकट किया. बंगाल में बीजेपी को मिली इस ऐतिहासिक जीत ने जहां बीजेपी के नेताओं एवं कार्यक्रताओं में एक नई ऊर्जा का संचार किया है। वहीं बंगाल की जनता की उम्मीदें भी भाजपा से बढ़ गई है।

ध्रुवीकरण का मंत्र काम आया

बीजेपी का हिंदु – मुस्लिम मुद्दा बंगाल में काम कर गया। बंगाल में मुस्लिमों की बढ़ती आबादी से कहीं ना कहीं बंगाल की हिंदुओं ने नाराजी थी। लेकिन ममता की डर से वे अपनी नाराजगी खुल कर प्रकट नहीं कर पा रहे थे। इस बार हिंदुओं ने खुलकर बीजेपी को समर्थन किया। तभी तो टीएमसी का सबसे मजबूत गढ़ माने जाने वाले हावड़ा, हुगली, दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में भाजपा ने गहरी पैठ बनाई।
वोट शेयर में गिरावट
टीएमसी के वोट शेयर में गिरावट उसकी हार की एक बड़ा कारण है। 2021 में टीएमसी का वोट शेयर था 48%, जो 2026 में घटकर 41% रह गया। यह 7% की गिरावट निर्णायक साबित हुई। भाजपा ने 25 में से 28 सीटें पलट दीं, जहां पिछली बार टीएमसी बेहद कम अंतर से जीती थी। ममता इसके लिए वोटर लिस्ट से हटे 91 लाख मतदाताओं के नाम को एक बड़ा कारण मानती है। जो कहीं ना कहीं सच भी है।
टीएमसी की हार केवल चुनावी पराजय नहीं, बल्कि ममता बनर्जी के राजनीतिक व्यक्तित्व के क्षरण का संकेत है। इस हार के लिए कहीं ना कहीं ममता स्वंय दोषी है। उन्होंने जो कांटे वामपंथियों के लिए बोये थे, वही कांटे आज उनकी हार की कारण बने। जनता ने यह साफ संदेश दिया कि लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली पार्टी अगर भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और असंतोष को दूर नहीं कर पाती, तो बदलाव अपरिहार्य हो जाता है। बंगाल का भगवामय होना इस बात का प्रतीक है कि अब राजनीति भावनाओं से आगे बढ़कर शासन और विकास के ठोस मुद्दों पर केंद्रित हो रही है।

Sunday, May 3, 2026

ममता की सोशल इंजीनियरिंग में क्या भाजपा कर पाएगी सेंधमारी ?--धर्मेंद्र कुमार


24 घंटों के बाद पश्चिम बंगाल में किसकी सरकार बनेगी यह स्थिती स्पष्ट हो जाएगी। पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से सामाजिक समीकरणों और सांस्कृतिक अस्मिता पर टिकी रही है। पहले वामपंथियों ने मुस्लिम एवं ग्रामीण जनता को अपने वोट बैंक के तौर पर संगठित एवं संरक्षित किया और उसी वोट बैंक के आसरे तीन दशकों तक बंगाल पर शासन किया। ममता ने उसी  परंपराओं को आगे बढ़ाया। ममता बनर्जी ने अपने तीन कार्यकालों में जिस तरह से सोशल इंजीनियरिंग  का ताना-बाना बुना है, वह तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी ताक़त बन चुका है। मुस्लिम वोट बैंक, ग्रामीण महिलाओं के बीच लोकप्रिय योजनाएं, और स्थानीय पहचान को मज़बूती से जोड़कर उन्होंने एक ऐसा सामाजिक गठजोड़ तैयार किया है जो भाजपा के लिए चुनौती बना हुआ है।

ममता की सोशल इंजीनियरिंग

ममता ने जहां ‘कन्याश्री’ और ‘रूपश्री’ जैसी योजनाओं ने महिलाओं के बीच गहरी पैठ बनाई है। वहीं मुस्लिम समुदाय का बड़ा हिस्सा अब भी तृणमूल के साथ मज़बूती से खड़ा है। ममता ने  बंगाल की संस्कृति, भाषा और स्थानीय गौरव को चुनावी विमर्श में लगातार प्रमुखता दी है।

भाजपा की रणनीति

भाजपा ने बंगाल में अपनी पकड़ मज़बूत करने के लिए अप्रत्यक्ष रुप से चुनाव आयोग सहित कई संवैधानिक एजेंसियों का खुलकर प्रयोग किया। इस रणनीति ने विपक्ष को संस्थागत दबाव के मुद्दे उठाने का मौका भी दिया। भाजपा ने बंगाल की राजनीति को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने के साथ ही हिंदूत्व वोट बैंक की ध्रवीकरण करने कि कोशिश की है। वहीं बीजेपी ने  बेरोज़गारी भत्ता और रोज़गार सृजन के वादों के ज़रिए युवा वर्ग को आकर्षित करने का प्रयास किया। जंगलमहल और उत्तर बंगाल में भाजपा ने सामाजिक असंतोष को भुनाने की रणनीति अपनाई है।

टकराव की स्थिति

ममता की सोशल इंजीनियरिंग का सबसे मज़बूत पहलू यह है कि उन्होंने वोटों का समेकन  किया है, जबकि भाजपा अब भी वोटों का विखंडन  रोकने की चुनौती से जूझ रही है। भाजपा ने 2021 में 77 सीटें जीतकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी, लेकिन 2026 में बहुमत की ओर बढ़ने के लिए उसे ममता के सामाजिक गठजोड़ में सेंध लगानी होगी जो आसान नहीं है।
बंगाल की राजनीति में भाजपा की चुनौती केवल चुनावी नहीं, बल्कि सामाजिक है। जब तक भाजपा ममता की सोशल इंजीनियरिंग को तोड़ने में सफल नहीं होगी, तब तक बंगाल में सत्ता परिवर्तन का सपना अधूरा ही रहेगा। यह चुनाव केवल सीटों का नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों की जंग  है—जहां हर वोट एक पहचान और हर पहचान एक राजनीतिक शक्ति बन चुकी है। एक बात जो महत्वपूर्ण है भाजपाइयों को समझनी होगी कि बंगाल की राजनीति देश के अन्य राज्यों की राजनीति से बिलकुल अलग है। बस इतना समझ लीजिए कि तमाम हथकंडे अपनाने के बाद भी भाजपा बंगाल के लोगों की भावनाओं को पूरी तरह समझने में असफल रही। पूरे देश की जनता की नजरें बंगाल चुनाव के नतीजों पर टिकी है। वैसे राजनीति संभावनाओं का खेल है कुछ भी हो सकता है। बंगाल का जनादेश यह तह करेगा कि भावनाओं की राजनीति भारी पड़ती है या विकास का वादा अपना रंग दिखाता है।

Saturday, May 2, 2026

नारी शक्ति वंदन – संकल्प या सिर्फ़ चुनावी लॉलीपॉप ? धर्मेंद्र कुमार

भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाला नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 ऐतिहासिक कदम कहा गया। लेकिन यह कदम ज़्यादा ‘पोस्ट-डेटेड चेक’ साबित हुआ। आधी आबादी को उम्मीद की चाबी थमा दी गई, मगर ताला 2034 से पहले खुलने का नाम नहीं लेता।

तालियों से लेकर ठंडे बस्ते तक

20 सितंबर 2023 को संसद ने सर्वसम्मति से इस बिल को पास किया और 27 सितंबर को राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दिया। भाजपा को लगा कि इस अधिनियम के सहारे वह 2024 की चुनावी वैतरणी पार कर लेगी। लेकिन सजग महिलाओं ने उन्हें ‘ठेंगा’ दिखा दिया। नतीजा—2024 में अपेक्षित सफलता नहीं मिली और कानून ठंडे बस्ते में चला गया।
2026 में जब पाँच राज्यों के चुनावी रण में सभी दल व्यस्त थे, तभी सरकार को अचानक याद आया कि महिलाओं को आरक्षण देना ज़रूरी है। आनन-फानन में 16,17 और 18 अप्रेल को तीन दिवसीय विशेष सत्र बुलाकर तीन विधेयक पेश किए गए:
• 131वां संविधान संशोधन विधेयक – लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 850।
• परिसीमन विधेयक – राज्यों में नई सीटों का निर्धारण।
• केंद्र शासित प्रदेश संशोधन विधेयक – दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी में महिलाओं को आरक्षण।
विपक्ष ने साफ कहा—“यदि सरकार की नियत साफ है तो मौजूदा 543 सीटों में ही 33% आरक्षण लागू कर दीजिए, हम समर्थन देंगे।” लेकिन सरकार की मंशा लागू करने की नहीं, बल्कि लटकाने और विपक्ष पर ठीकरा फोड़ने की थी।

कानून की असलियत

कानून कहता है कि पहले जनगणना होगी, फिर परिसीमन होगा, तब जाकर 2029 में महिलाएँ 181 सीटों पर लड़ पाएँगी। जनगणना 2027 तक, परिसीमन 2028 में और उसके बाद चुनाव। यानी 2023 में तालियाँ बटोरने वाला कानून 2029 तक कागज़ पर ही रहेगा। इसे ‘लॉलीपॉप’ न कहें तो क्या कहें?

अधूरा न्याय

33% में SC/ST महिलाओं को हिस्सा मिला, पर OBC बहनें कहाँ गईं? देश की 60% आबादी की महिलाओं को कानून ने छुआ तक नहीं। राज्यसभा और विधान परिषद को भी बाहर रखा गया—जहाँ असली नीति बनती है, वहाँ महिलाओं की हिस्सेदारी 13% ही रहेगी। यह कैसा सशक्तिकरण, जो आधे रास्ते में ही दम तोड़ दे? नारी शक्ति वंदन अधिनियम का नाम जितना भव्य है, उसका असर उतना ही खोखला। यह अधिनियम महिलाओं के सशक्तिकरण का संकल्प है या सिर्फ़ चुनावी लॉलीपॉप—यह सवाल जनता के सामने है। सरकार ने आधी आबादी को उम्मीद का सपना दिखाया, लेकिन उसकी ‘एक्सपायरी डेट’ 2029 लिख दी।

सरकार की मंशा

सिंतबर 2023 में संसद में नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के पास होने के साथ ही इसको लागू करने लिए जनगणना का कार्य की शुरुआत करनी चाहिए थी लेकिन मजे की बात यह है कि इस अधिनियम के कानून बनने के बाद इसको नोटिफाई 2026 में किया गया। इससे इश कानून को लागू करने की सरकार की मंशा साफ है। संसद में मुहंकी खाने के बाद सरकार इसको लेकर विपक्ष को घेरने का प्रयास किया लेकिन देश की आधी आबादी बहुत ही समझदार है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विधानसभा एक निंदा प्रस्ताव लाया गया जिस पर चर्चा हुई। विपक्ष का स्पष्ट तोर पर कहना है कि सरकार की नियत साफ है तो 543 में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू कर दो हम समर्थन देने को तैयार है।
1996 से लटका बिल पास होना अपने-आप में क्रांति है। 454-2 का बहुमत बताता है कि देश की सियासत मन से तैयार है। पंचायतों में 14.5 लाख महिलाएं आज नेतृत्व कर रही हैं - वही मॉडल संसद में दोहराया जाए तो तस्वीर बदल सकती है। यदि पार्टियां नैतिक जिम्मेदारी लेकर कानून का इंतजार किए बिना ही चुनाव में 33% टिकट महिलाओं को दें। 
नारी शक्ति वंदन अधिनियम ‘ऐतिहासिक’ तभी बनेगा जब वह ‘तत्काल’ बने। वरना आने वाली पीढ़ी इसे किताबों में ‘चुनावी लॉलीपॉप’ के नाम से ही पढ़ेगी। संकल्प को सिद्धि में बदलने के लिए नीयत के साथ ‘तारीख’ भी चाहिए। वरना ताली दोनों हाथ से नहीं बजती - एक हाथ कानून का है, दूसरा सरकार की इच्छाशक्ति का। फिलहाल, आधी आबादी इंतजार कर रही है। सवाल बस इतना है: इंतजार कब तक?