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Showing posts from May, 2026

तीसरे विकल्प का आगाज है ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ है ? धर्मेंद्र कुमार

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भारतीय लोकतंत्र के तथाकथित अमृतकाल में देश का युवा अपने भविष्य व अधिकार को लेकर सड़क पर आंदोलनरत है। सरकार की लगातार बेरुखी एवं सड़े हुए सिस्टम का दंश झेल रहे युवाओं के सब्र का बांध तब टूट गया, जब देश की न्याय व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे माननीय ने अपने अधिकार के लिए आबाज बुलंद कर रहे युवाओं को कॉकरोच जैसे शब्दों से नवाजा। देश की युवा पीढ़ी ने इस गाली को चुनौती के तौर पर स्वीकार करते हुए कहा कि हां, हम उसी सड़े गले सिस्टम और सरकार की गलत नीतियों की उपज हैं। देश के युवाओं का मनोबल आज जिस गहराई तक टूट चुका है, वह केवल सरकार की नीतियों की विफलता नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जड़ता और संवेदनहीनता का परिणाम है। लगातार अत्याचार, बेरोजगारी, शिक्षा में गिरावट और अवसरों की कमी ने युवाओं को हताश व निराश कर दिया है। इतिहास हवाह है कि जब भी देश की युवा पीढ़ी नें अंगड़ाई ली, सत्ता परिवर्तन हो गया। चाहे स्वतंत्रता का आंदोलन हो या जेपी का आंदोलन।  राजनीतिक दलों से मोहभंग राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता में आने से पहले युवाओं से रोजगार, शिक्षा और अवसरों के वादे किए जाते हैं, लेकिन सत्ता हासिल करन...

भारतीय राजनीति के कलयुगी चाणक्य बनाम सत्ता का खेल धर्मेंद्र कुमार

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आचार्य चाणक्य का नाम सुनते ही मस्तिष्क में एक ऐसी नीति की छवि उभरती है जो राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखती थी। उनकी कूटनीति का केंद्रबिंदु था—राष्ट्र का निर्माण, शत्रुओं से रक्षा और प्रजा का कल्याण। उनके अर्थशास्त्र में राजा का पहला धर्म ‘प्रजा सुखे सुखं राज्ञः’ बताया गया था। यानी राजा का सुख प्रजा के सुख में है। आज के दौर में यह नीति अप्रासंगिक हो गया। राजा के सुख में प्रजा को सुख की अनुभूति करनी होगी यही जनता कि नियति बन चुकी है। जो जनता जनप्रतिनिधियों को पलकों पर बिठा कर सत्ता के सिंहासन पर बैठाती है वहीं सेवक सत्ता के सिंहासन पर पहुंचने के साथ ही स्वंय को प्रजा से असुरक्षित महसुस करने लगता है। और अपनी सुरक्षा के लिए अपनी चारों तरफ अंगरक्षकों की एक घेराबंदी बना लेता है ताकि जनता आसानी से उन तक नहीं पहुंच सके। आज की राजनीति व राजनताओं की कड़वी हकिकत है। दुर्भाग्य से आज की भारतीय राजनीति में जिन ‘चाणक्यों’ का उदय हुआ है, उनकी नीति चाणक्य के सिद्धांतों के ठीक उलट है। इन कलयुगी चाणक्यों के लिए राष्ट्रनिर्माण गौण है, सत्ता ही साध्य है। विपक्ष-मुक्त लोकतंत्र का खतरनाक खेल ...

जिला प्रशासन ने दिखाई संवेदनशीलता,बुजुर्ग को मिली राहत

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85 वर्षीय बुजुर्ग को 24 घंटे के भीतर मिला पेंशन और आयुष्मान योजना का लाभ रांची। बड़े अधिकारी व प्रशासन थोड़े संवेदनशील हो जाएं तो जनता के लिए यह किसी बड़े सौगात से कम नहीं। महीनों का मिनटों में संभव है। क्योंकि सुशासन की पहली शर्त प्रशासन का संवेदनशील होना है। रांची जिला प्रशासन की संवेदनशील कार्यशैली का एक प्रेरणादायक उदाहरण सामने आया है। जब उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री के निर्देश पर 85 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक राधेश्याम नाथ को 24 घंटे के भीतर सरकारी योजनाओं का लाभ उपलब्ध कराया गया। 16 मई को अपनी फरियाद लेकर उपायुक्त कार्यालय पहुंचे 85 वर्षीय किशोरगंज निवासी राधेश्याम नाथ की समस्या को उपायुक्त ने सुना और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि जल्द से जल्द बुजूर्ग को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलवाएं। उपायुक्त के निर्द्श पर पदाधिकारियों ने त्वरित कार्रवाई करते हुए सर्वजन पेंशन योजना के अंतर्गत पेंशन स्वीकृति प्रमाण पत्र उनके घर पहुंचकर उपलब्ध कराया गया। इसके साथ ही उनका आयुष्मान कार्ड भी बनवाकर सौंपा गया, ताकि उन्हें स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं का लाभ आसानी से मिल सके। ...

NEET-UG के पेपर लीक का कौन है जिम्मेवार ?  धर्मेंद्र कुमार

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युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ आखिर कब तक ?   NEET-UG जैसी परीक्षा किसी छात्र के लिए सिर्फ एक टेस्ट नहीं, बल्कि जीवन भर का सपना होता है। एक डॉक्टर बनने की तपस्या। इस परीक्षा की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि परीक्षार्थियों को बिना जेब वाले कपड़े पहनने, चप्पल में आने और कान की बाली तक उतारने के निर्देश दिए जाते हैं। मेटल डिटेक्टर, जैमर, बायोमेट्रिक अटेंडेंस—हर कदम पर ‘कदाचार मुक्त’ परीक्षा का दावा किया जाता है। लेकिन विडंबना देखिए, जहां छात्र की शर्ट की जेब पर शक किया जाता है, वहीं सिस्टम की पूरी तिजोरी में सेंध लगी हुई है। 2024 से NEET-UG के पेपर लीक का जो सिलसिला खुले तौर पर शुरू हुआ, वह अब एक पैटर्न बन चुका है। प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले टेलीग्राम चैनलों पर बिक रहे हैं, 30-30 लाख में सौदे हो रहे हैं, और मेहनत करने वाला छात्र ठगा हुआ महसूस कर रहा है। बड़ा सवाल है कि इस पेपर लीक खेल का असली जिम्मेवार कौन है ?  चूक कहां हो रही है ?   NTA जैसी केंद्रीय एजेंसी की जिम्मेदारी है कि वह देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा को पारदर्शी बनाए। लेक...

जनता पर अत्याचार कब तक सरकार ? --धर्मेंद्र कुमार

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देश की जनता एक के बाद एक संकटों से जूझ रही है। कोविड-19 महामारी की मार से वह अभी पूरी तरह उबरी भी नहीं थी कि सरकार की नीतियों ने उसे फिर आर्थिक दलदल में धकेल दिया है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। यह वृद्धि केवल ईंधन तक सीमित नहीं, बल्कि ट्रांसपोर्ट महंगा होने से सब्जी, अनाज, दूध से लेकर हर जरूरी वस्तु की कीमत आसमान छू रही है। महंगाई की यह आग सीधे रसोई तक पहुंच चुकी है। चुनाव बाद कीमत वृद्धि: जनता से छल विपक्ष महीनों से आगाह कर रहा था कि चुनाव समाप्त होते ही सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाएगी। तब सत्ता पक्ष ने इसे ‘झूठा प्रचार’ बताकर खारिज कर दिया और दावा किया कि स्थिति सामान्य है। चुनाव निपटते ही दामों में उछाल ने साबित कर दिया कि विपक्ष की आशंका सही थी। सवाल यह है कि सरकार ने सच छिपाकर जनता का विश्वास क्यों तोड़ा? क्या लोकतंत्र में पारदर्शिता की कोई जगह नहीं बची? भारत ने रूस से अंतरराष्ट्रीय बाजार से काफी कम दाम पर कच्चा तेल 2022-23 में बड़े पैमाने पर खरीदा और अपनी ऊर्जा लागत नियंत्रित रखी। लेकिन अमेरिकी दबाव के आगे झुकते हुए स...

पप्पू सरदार ने मनाया सीने तारिका माधुरी दीक्षित का जन्मदिन

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सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने बांधा समां जमशेदपुर । पप्पू सरदार ने बॉलीवुड की धक-धक गर्ल माधुरी दीक्षित का जन्मदिन दुश्म से मनाया।  हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी शहर के साकची बाजार में भव्य दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा हैं। कार्यक्रम के प्रथम दिन गुरुवार शाम को आयोजन स्थल पर उत्सव (त्योहर) जैसा माहौल देखने को मिला। स्पर्श क्रिएटिव एकेडमी के बच्चों ने माधुरी दीक्षित के लोकप्रिय गीतों पर शानदार रंगारंग प्रस्तुतियां देकर दर्शकों का मन मोह लिया। बच्चों के आकर्षक नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने उपस्थित लोगों को देर रात तक बांधे रखा।  भजन कीर्तन से भक्तिमय हुआ वातावरण इसके साथ ही इस्कॉन की टीम द्वारा हरे राम-हरे कृष्ण संकीर्तन एवं धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन किया गया, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। कार्यक्रम की शुरुआत भगवान श्री गणेश की पूजा-अर्चना से हुई। पंडित संतोष कुमार त्रिपाठी ने पूजा संपन्न कराई, जबकि आयोजनकर्ता पप्पू सरदार यजमान के रूप में शामिल हुए। पूजा के दौरान माधुरी की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना की गयी।  मीडिया कर्मियों को किया गया ...

भारतीय लोकतंत्र में नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत?--धर्मेंद्र कुमार

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भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त उसकी विविधता और जनभागीदारी है, लेकिन हाल की कुछ घटनाएओं से स्वतः यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या विश्व के सबसे बड़े गणतंत्र में संविधान से इतर तानाशाही तंत्र की एक नई और चिंताजनक अध्याय की शुरुआत हो चुकी है ? भारतीय संविधान में जाति धर्म अमीर और गरीब का भेद नहीं करते हुए सभी को मतदान करने का समान अधिकार दिया गया है। यही भारतीय लोकतंत्र की खुबसूरती है और मजबूती भी। 2024 के लोकसभा चुनाव में केंद्रीय चुनाव आयोग ने शतप्रतिशत मतदान के लिए अभियान चलाया था। जिसके तहत जो वोटर मतदान केंद्रों तक जाने में असमर्थ थे, उनके घर जा कर वोट कास्ट कराया गया था। आयोग का यह प्रयास था कि एक भी मतदाता ना छुटे, लेकिन भाजपा के अमृतकाल में हालात बदल गए हैं। चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के शुद्धिकरण के नाम पर अपने हिसाब से मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए एवं जोड़े जा रहे हैं। अब लाखों लोग यदि वोट देने से वंचित रह जाएं, तब भी यह चुनाव आयोग के लिए कोई चिंता का विषय नहीं है क्योंकि यह सब उनका ही कुकृत है। जबकि लोकतंत्र का तकाजा है कि एक भी वोटर अपने मताधिकार से न चुक...

बंगाल में झंडा बदला, लेकिन डंडा और गुंडा वही – बदलाव की असली परीक्षा– धर्मेंद्र कुमार

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सत्ता का अंत, हिंसा का सिलसिला जारी बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की प्रचंड जीत ने 15 वर्षों के टीएमसी शासन का पटाक्षेप कर दिया। लेकिन चुनावी नतीजों के बाद जो दृश्य सामने आ रहे हैं, वे बंगाल की राजनीति की पुरानी बीमारी को उजागर करते हैं। बदले की भावना से टीएमसी कार्यालयों पर हमले एवं कार्यकर्ताओं की पिटाई तो कहीं बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्याएं। यह राजनीतिक प्रतिशोध की घटनाएं यह दिखाती हैं कि बंगाल में सत्ता बदलने से हिंसा का चरित्र नहीं बदला। झंडा बदला, संस्कृति नहीं टीएमसी के कार्यकर्ता जो कल तक सत्ता के संरक्षण में थे, ऐसा प्रतित हो रहा है कि आज वही लोग नए झंडे के नीचे खड़े हैं। बंगाल की राजनीति में “डंडा और गुंडा” संस्कृति इतनी गहरी जड़ें जमा चुकी है कि केवल चुनावी परिणाम इसे मिटा नहीं सकते। सवाल यह है कि क्या बीजेपी इस हिंसक राजनीतिक संस्कृति को बदल पाएगी, या वही सिलसिला नए रंग में भी जारी रहेगा। केंद्रीय बलों की मौजूदगी और सवाल चुनाव के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों की मौजूदगी ने मतदान को अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण बनाया। लेकिन चुनाव बाद की हिंसा यह बताती है कि...

आजादी के सात दशक बाद बंगाल में लहराया भगवा --धर्मेंद्र कुमार

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2026 के विधानसभा चुनाव में बंगाल की राजनीति ने ऐतिहासिक करवट ली, टीएमसी की करारी हार के साथ ही भाजपा की अभूतपूर्व जीत का सबसे बड़ा कारण एंटी-इनकंबेंसी नहीं बल्कि ‘एंटी-टीएमसी वेव’ था। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बंगाल की जनता ने बीजेपी को जिताने के लिए नहीं बल्कि ममता को हराने के लिए जमकर वोट किया, जिसके परिणाम स्वरुप बीजेपी की प्रचंड जीत हुई। सूत्रों की माने तो टीएमसी के सींडिकेट से बंगाल की आम जनमानस परेशान था। इसलिए बंगाल की जनता ने बीजेपी को एक विकल्प के तौर चुना। इसके साथ ही वोट शेयर में आई गिरावट, दक्षिण बंगाल के गढ़ का टूटना और 15 साल की सत्ता विरोधी लहर ने भी बखूबी अपना काम किया। वहीं चुनाव आयोग द्वारा 27 लाख लोगों को वोट देने से वंचित रखना भी कहीं ना कहीं इस चुनावी परिणाम में एक बड़ा कारक है, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता। जिसको लेकर किसी भी स्तर पर कोई चिंता और चर्चा नहीं हुई। इसके मायने क्या है? हमें इस विषय पर चितंन करने की आवश्यकता है। आजादी के बाद पहली बार बंगाल में लहराया भगवा आजादी के सात दशक बाद पहली बार जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी...

ममता की सोशल इंजीनियरिंग में क्या भाजपा कर पाएगी सेंधमारी ?--धर्मेंद्र कुमार

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24 घंटों के बाद पश्चिम बंगाल में किसकी सरकार बनेगी यह स्थिती स्पष्ट हो जाएगी। पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से सामाजिक समीकरणों और सांस्कृतिक अस्मिता पर टिकी रही है। पहले वामपंथियों ने मुस्लिम एवं ग्रामीण जनता को अपने वोट बैंक के तौर पर संगठित एवं संरक्षित किया और उसी वोट बैंक के आसरे तीन दशकों तक बंगाल पर शासन किया। ममता ने उसी  परंपराओं को आगे बढ़ाया। ममता बनर्जी ने अपने तीन कार्यकालों में जिस तरह से सोशल इंजीनियरिंग  का ताना-बाना बुना है, वह तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी ताक़त बन चुका है। मुस्लिम वोट बैंक, ग्रामीण महिलाओं के बीच लोकप्रिय योजनाएं, और स्थानीय पहचान को मज़बूती से जोड़कर उन्होंने एक ऐसा सामाजिक गठजोड़ तैयार किया है जो भाजपा के लिए चुनौती बना हुआ है। ममता की सोशल इंजीनियरिंग ममता ने जहां ‘कन्याश्री’ और ‘रूपश्री’ जैसी योजनाओं ने महिलाओं के बीच गहरी पैठ बनाई है। वहीं मुस्लिम समुदाय का बड़ा हिस्सा अब भी तृणमूल के साथ मज़बूती से खड़ा है। ममता ने  बंगाल की संस्कृति, भाषा और स्थानीय गौरव को चुनावी विमर्श में लगातार प्रमुखता दी है। भाजपा की रणनीति भाजपा...

नारी शक्ति वंदन – संकल्प या सिर्फ़ चुनावी लॉलीपॉप ? धर्मेंद्र कुमार

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भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाला नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 ऐतिहासिक कदम कहा गया। लेकिन यह कदम ज़्यादा ‘पोस्ट-डेटेड चेक’ साबित हुआ। आधी आबादी को उम्मीद की चाबी थमा दी गई, मगर ताला 2034 से पहले खुलने का नाम नहीं लेता। तालियों से लेकर ठंडे बस्ते तक 20 सितंबर 2023 को संसद ने सर्वसम्मति से इस बिल को पास किया और 27 सितंबर को राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दिया। भाजपा को लगा कि इस अधिनियम के सहारे वह 2024 की चुनावी वैतरणी पार कर लेगी। लेकिन सजग महिलाओं ने उन्हें ‘ठेंगा’ दिखा दिया। नतीजा—2024 में अपेक्षित सफलता नहीं मिली और कानून ठंडे बस्ते में चला गया। 2026 में जब पाँच राज्यों के चुनावी रण में सभी दल व्यस्त थे, तभी सरकार को अचानक याद आया कि महिलाओं को आरक्षण देना ज़रूरी है। आनन-फानन में 16,17 और 18 अप्रेल को तीन दिवसीय विशेष सत्र बुलाकर तीन विधेयक पेश किए गए: • 131वां संविधान संशोधन विधेयक – लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 850। • परिसीमन विधेयक – राज्यों में नई सीटों का निर्धारण। • केंद्र शासित प्रदेश संशोधन विधेयक – दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी म...