Sunday, May 3, 2026

ममता की सोशल इंजीनियरिंग में क्या भाजपा कर पाएगी सेंधमारी ?--धर्मेंद्र कुमार


24 घंटों के बाद पश्चिम बंगाल में किसकी सरकार बनेगी यह स्थिती स्पष्ट हो जाएगी। पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से सामाजिक समीकरणों और सांस्कृतिक अस्मिता पर टिकी रही है। पहले वामपंथियों ने मुस्लिम एवं ग्रामीण जनता को अपने वोट बैंक के तौर पर संगठित एवं संरक्षित किया और उसी वोट बैंक के आसरे तीन दशकों तक बंगाल पर शासन किया। ममता ने उसी  परंपराओं को आगे बढ़ाया। ममता बनर्जी ने अपने तीन कार्यकालों में जिस तरह से सोशल इंजीनियरिंग  का ताना-बाना बुना है, वह तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी ताक़त बन चुका है। मुस्लिम वोट बैंक, ग्रामीण महिलाओं के बीच लोकप्रिय योजनाएं, और स्थानीय पहचान को मज़बूती से जोड़कर उन्होंने एक ऐसा सामाजिक गठजोड़ तैयार किया है जो भाजपा के लिए चुनौती बना हुआ है।

ममता की सोशल इंजीनियरिंग

ममता ने जहां ‘कन्याश्री’ और ‘रूपश्री’ जैसी योजनाओं ने महिलाओं के बीच गहरी पैठ बनाई है। वहीं मुस्लिम समुदाय का बड़ा हिस्सा अब भी तृणमूल के साथ मज़बूती से खड़ा है। ममता ने  बंगाल की संस्कृति, भाषा और स्थानीय गौरव को चुनावी विमर्श में लगातार प्रमुखता दी है।

भाजपा की रणनीति

भाजपा ने बंगाल में अपनी पकड़ मज़बूत करने के लिए अप्रत्यक्ष रुप से चुनाव आयोग सहित कई संवैधानिक एजेंसियों का खुलकर प्रयोग किया। इस रणनीति ने विपक्ष को संस्थागत दबाव के मुद्दे उठाने का मौका भी दिया। भाजपा ने बंगाल की राजनीति को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने के साथ ही हिंदूत्व वोट बैंक की ध्रवीकरण करने कि कोशिश की है। वहीं बीजेपी ने  बेरोज़गारी भत्ता और रोज़गार सृजन के वादों के ज़रिए युवा वर्ग को आकर्षित करने का प्रयास किया। जंगलमहल और उत्तर बंगाल में भाजपा ने सामाजिक असंतोष को भुनाने की रणनीति अपनाई है।

टकराव की स्थिति

ममता की सोशल इंजीनियरिंग का सबसे मज़बूत पहलू यह है कि उन्होंने वोटों का समेकन  किया है, जबकि भाजपा अब भी वोटों का विखंडन  रोकने की चुनौती से जूझ रही है। भाजपा ने 2021 में 77 सीटें जीतकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी, लेकिन 2026 में बहुमत की ओर बढ़ने के लिए उसे ममता के सामाजिक गठजोड़ में सेंध लगानी होगी जो आसान नहीं है।
बंगाल की राजनीति में भाजपा की चुनौती केवल चुनावी नहीं, बल्कि सामाजिक है। जब तक भाजपा ममता की सोशल इंजीनियरिंग को तोड़ने में सफल नहीं होगी, तब तक बंगाल में सत्ता परिवर्तन का सपना अधूरा ही रहेगा। यह चुनाव केवल सीटों का नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों की जंग  है—जहां हर वोट एक पहचान और हर पहचान एक राजनीतिक शक्ति बन चुकी है। एक बात जो महत्वपूर्ण है भाजपाइयों को समझनी होगी कि बंगाल की राजनीति देश के अन्य राज्यों की राजनीति से बिलकुल अलग है। बस इतना समझ लीजिए कि तमाम हथकंडे अपनाने के बाद भी भाजपा बंगाल के लोगों की भावनाओं को पूरी तरह समझने में असफल रही। पूरे देश की जनता की नजरें बंगाल चुनाव के नतीजों पर टिकी है। वैसे राजनीति संभावनाओं का खेल है कुछ भी हो सकता है। बंगाल का जनादेश यह तह करेगा कि भावनाओं की राजनीति भारी पड़ती है या विकास का वादा अपना रंग दिखाता है।

Saturday, May 2, 2026

नारी शक्ति वंदन – संकल्प या सिर्फ़ चुनावी लॉलीपॉप ? धर्मेंद्र कुमार

भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाला नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 ऐतिहासिक कदम कहा गया। लेकिन यह कदम ज़्यादा ‘पोस्ट-डेटेड चेक’ साबित हुआ। आधी आबादी को उम्मीद की चाबी थमा दी गई, मगर ताला 2034 से पहले खुलने का नाम नहीं लेता।

तालियों से लेकर ठंडे बस्ते तक

20 सितंबर 2023 को संसद ने सर्वसम्मति से इस बिल को पास किया और 27 सितंबर को राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दिया। भाजपा को लगा कि इस अधिनियम के सहारे वह 2024 की चुनावी वैतरणी पार कर लेगी। लेकिन सजग महिलाओं ने उन्हें ‘ठेंगा’ दिखा दिया। नतीजा—2024 में अपेक्षित सफलता नहीं मिली और कानून ठंडे बस्ते में चला गया।
2026 में जब पाँच राज्यों के चुनावी रण में सभी दल व्यस्त थे, तभी सरकार को अचानक याद आया कि महिलाओं को आरक्षण देना ज़रूरी है। आनन-फानन में 16,17 और 18 अप्रेल को तीन दिवसीय विशेष सत्र बुलाकर तीन विधेयक पेश किए गए:
• 131वां संविधान संशोधन विधेयक – लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 850।
• परिसीमन विधेयक – राज्यों में नई सीटों का निर्धारण।
• केंद्र शासित प्रदेश संशोधन विधेयक – दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी में महिलाओं को आरक्षण।
विपक्ष ने साफ कहा—“यदि सरकार की नियत साफ है तो मौजूदा 543 सीटों में ही 33% आरक्षण लागू कर दीजिए, हम समर्थन देंगे।” लेकिन सरकार की मंशा लागू करने की नहीं, बल्कि लटकाने और विपक्ष पर ठीकरा फोड़ने की थी।

कानून की असलियत

कानून कहता है कि पहले जनगणना होगी, फिर परिसीमन होगा, तब जाकर 2029 में महिलाएँ 181 सीटों पर लड़ पाएँगी। जनगणना 2027 तक, परिसीमन 2028 में और उसके बाद चुनाव। यानी 2023 में तालियाँ बटोरने वाला कानून 2029 तक कागज़ पर ही रहेगा। इसे ‘लॉलीपॉप’ न कहें तो क्या कहें?

अधूरा न्याय

33% में SC/ST महिलाओं को हिस्सा मिला, पर OBC बहनें कहाँ गईं? देश की 60% आबादी की महिलाओं को कानून ने छुआ तक नहीं। राज्यसभा और विधान परिषद को भी बाहर रखा गया—जहाँ असली नीति बनती है, वहाँ महिलाओं की हिस्सेदारी 13% ही रहेगी। यह कैसा सशक्तिकरण, जो आधे रास्ते में ही दम तोड़ दे? नारी शक्ति वंदन अधिनियम का नाम जितना भव्य है, उसका असर उतना ही खोखला। यह अधिनियम महिलाओं के सशक्तिकरण का संकल्प है या सिर्फ़ चुनावी लॉलीपॉप—यह सवाल जनता के सामने है। सरकार ने आधी आबादी को उम्मीद का सपना दिखाया, लेकिन उसकी ‘एक्सपायरी डेट’ 2029 लिख दी।

सरकार की मंशा

सिंतबर 2023 में संसद में नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के पास होने के साथ ही इसको लागू करने लिए जनगणना का कार्य की शुरुआत करनी चाहिए थी लेकिन मजे की बात यह है कि इस अधिनियम के कानून बनने के बाद इसको नोटिफाई 2026 में किया गया। इससे इश कानून को लागू करने की सरकार की मंशा साफ है। संसद में मुहंकी खाने के बाद सरकार इसको लेकर विपक्ष को घेरने का प्रयास किया लेकिन देश की आधी आबादी बहुत ही समझदार है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विधानसभा एक निंदा प्रस्ताव लाया गया जिस पर चर्चा हुई। विपक्ष का स्पष्ट तोर पर कहना है कि सरकार की नियत साफ है तो 543 में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू कर दो हम समर्थन देने को तैयार है।
1996 से लटका बिल पास होना अपने-आप में क्रांति है। 454-2 का बहुमत बताता है कि देश की सियासत मन से तैयार है। पंचायतों में 14.5 लाख महिलाएं आज नेतृत्व कर रही हैं - वही मॉडल संसद में दोहराया जाए तो तस्वीर बदल सकती है। यदि पार्टियां नैतिक जिम्मेदारी लेकर कानून का इंतजार किए बिना ही चुनाव में 33% टिकट महिलाओं को दें। 
नारी शक्ति वंदन अधिनियम ‘ऐतिहासिक’ तभी बनेगा जब वह ‘तत्काल’ बने। वरना आने वाली पीढ़ी इसे किताबों में ‘चुनावी लॉलीपॉप’ के नाम से ही पढ़ेगी। संकल्प को सिद्धि में बदलने के लिए नीयत के साथ ‘तारीख’ भी चाहिए। वरना ताली दोनों हाथ से नहीं बजती - एक हाथ कानून का है, दूसरा सरकार की इच्छाशक्ति का। फिलहाल, आधी आबादी इंतजार कर रही है। सवाल बस इतना है: इंतजार कब तक?