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Showing posts from September, 2025

तुष्टिकरण बनाम ध्रुवीकरण: भारतीय राजनीति का बदलता परिदृश्य ✍️ धर्मेन्द्र कुमार

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भारतीय लोकतंत्र में चुनावी राजनीति का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. आज राजनीतिक विमर्श धर्म, जाति और पहचान की राजनीति में उलझ कर रह गया है. जब धर्म, जाति औऱ पहचान सियासत के लिए ईंधन का काम करने लगे तो सत्ता में बैठे लोगों की कोशिश होती है कि वो देश में लगातार ऐसा वातावरण बनी रहे ताकि लोग धर्म, जाति औऱ पहचान से इतर कुछ और ना सोच सकें. इसके लिए वो तमाम तरह के हथकंडे अपनाते भी हैं. और यह सब उनकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है ताकि जनता शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और महंगाई जैसे असल मुद्दों पर सवाल न उठाए? सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समाज का बुद्धिजीवी वर्ग भी इन मुद्दों पर बंटा हुआ नजर आता है. चिंता तब और बढ़ जाती है बुद्धिजीवी वर्ग लोग भी इन मुद्दों पर तथ्यहीन तर्क के आधार पर गलत बातों को सही साबित करने के लिए हरसंभव प्रयास करते है. सत्ता की रणनीति: ध्यान भटकाओ, भावनाएं भड़काओ जहां ध्रुवीकरण का उद्देश्य बहुसंख्यक समाज को सांस्कृतिक अस्मिता के नाम पर एकजुट करना है. राम मंदिर, समान नागरिक संहिता, लव जिहाद जैसे मुद्दे भावनात्मक तौर पर लोगों की बीच दरार पैदा करते हैं. वहीं तुष्टिकरण क...

असम के बोडो निकाय चुनाव में भाजपा की हार: ध्रुवीकरण की राजनीति पर जनजातीय अस्मिता की जीत धर्मेंद्र कुमार

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असम के बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) में हाल ही में संपन्न हुए निकाय चुनावों ने राज्य की राजनीति को एक नए मोड़ पर ला दिया है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), जो पिछले कुछ वर्षों से राज्य में सत्ता पर काबिज है, उसको इस चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा. यह पराजय न केवल स्थानीय जनमत का संकेत है, बल्कि भाजपा की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की रणनीति की करारी हार करती है. चुनाव के परिणाम बोडो के निकाय चुनाव में बीपीएफ (बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट) ने बहुमत हासिल करते हुए 28 सीटों पर जीत दर्ज की वहीं भाजपा मात्र 5 सीटों पर सिमट कर रह गई, जबकि उसने पिछली बार गठबंधन के तहत बेहतर प्रदर्शन किया था. अन्य क्षेत्रीय दलों ने भी सीमित लेकिन निर्णायक उपस्थिति दर्ज की. कहां हुई चूक ? चुनाव प्रचार में भाजपा ने हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण को प्रमुखता दी, जिसे स्थानीय मतदाताओं ने नकार दिया. बोडो जनजातीय अस्मिता, स्थानीय विकास, और रोजगार जैसे मुद्दों को नजरअंदाज करना बीजेपी सरकार को मंहगा पड़ा. मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की आक्रामक शैली और सांप्रदायिक बयानबाज़ी ने जनमत को विभाजित करने के बजाय भाजप...

स्वदेशी का स्वांग: मेक इन इंडिया बनाम मेड इन इंडिया ✍️ धर्मेंद्र कुमार

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देशभक्ति अब एक ब्रांड है, जिसे पहनकर नेता भाषण देते हैं, और जनता सेल्फी लेती है. स्वदेशी के मंच से जब “मेक इन इंडिया” का शेर दहाड़ता है, तो उसके मेड इन चाइना वाले दांतों की चमक वहुत कुछ कहानी बंया करती है. “मेड इन इंडिया” का टैग तो चमकता है, पर उत्पाद की आत्मा विदेशी होती है. और इस तमाशे के निर्देशक वही हैं जो मंच पर स्वदेशी का राग अलापते हुए खुद विदेशी घड़ी, विदेशी चश्मा का उपयोग करते है और देशवासियों को स्वदेशी अपनाओ की सीख देते है. मजे की बात यह है कि स्वदेशी का प्रचार भी विदेशी ऐप से ट्वीट करके किया जाता हैं. विदेशी ऐप से स्वदेशी का प्रचार प्रधानमंत्री मंच से “वोकल फॉर लोकल” का नारा देते हैं, लेकिन उनकी घड़ी स्विट्ज़रलैंड की होती है, चश्मा इटली का और मोबाइल शायद अमेरिका का. यह वैसा ही है जैसे कोई योगगुरु हेल्थ ड्रिंक बेचते हुए खुद कोल्ड ड्रिंक पीते पकड़ा जाए. जब नेता विदेशी उत्पादों का उपयोग करते हुए स्वदेशी अपनाने की बात करते हैं, तो यह व्यंग्य नहीं, विडंबना का महाकाव्य बन जाता है.  स्वदेशी की परिभाषा ही गलत वर्तमान की सरकार विदेशी उत्पाद को स्वदेशी ब्राडिग व पैकेज...

सत्याग्रह बनाम सत्ता: सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी पर सुलगते सवाल धर्मेंद्र कुमार

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लद्दाख की शांत वादियों में इन दिनों लोकतंत्र की गूंज और सत्ता की प्रतिध्वनि टकरा रही है. पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी ने न केवल लद्दाख आंदोलन को एक निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा किया है कि क्या लोकतंत्र में असहमति अब असुविधा बन गई है? 26 सितंबर 2025 को वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हिरासत में लिया गया. सरकार का आरोप है कि उन्होंने युवाओं को “अरब स्प्रिंग” और “नेपाल के Gen Z आंदोलन” जैसे उदाहरण देकर हिंसा के लिए प्रेरित किया. इससे पहले, लद्दाख में छठी अनुसूची और पूर्ण राज्य की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन में चार लोगों की मृत्यु और 90 से अधिक लोग घायल हुए. साथ ही, उनकी संस्था SECMOL का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया गया, विदेशी फंडिंग में गड़बड़ी के आरोप लगाए गए. यह तो स्पष्ट है कि किसी भी परिस्थिती में हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता है. इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए कहीं वांगचुक के आंदोलन को बदनाम करने के लिए तो हिंसा का सहारा लिया गया क्योंकि यह आंदोलन तो काफी दिनों से शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा था. ...

बिहार में पिछड़ा बनाम अति पिछड़ा, कितना असरदार होगा न्याय संकल्प पत्र धर्मेंद्र कुमार

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पटना। बिहार में राजनीति को जातिगत समीकरण से अलग करके नहीं देखा जा सकता है. बल्कि यह कहा जा सकता है कि बिहार की राजनीति में जाति हमेशा से एक निर्णायक कारक रही है. लेकिन अब यह सिर्फ "सवर्ण बनाम पिछड़ा" की लड़ाई नहीं रही—बल्कि "पिछड़ा बनाम अति पिछड़ा" की विमर्श ने एक नई राजनीतिक धुरी को जन्म दिया है. पिछले दिनों राहुल गांधी द्वारा अति पिछड़ा न्याय संकल्प पत्र के घोषणा करने के बाद एक बार फिर पिछड़ा बनाम अति पिछड़ा का मुद्दा चर्चा का विषय बन गया है. लालू यादव ने समाजिक न्याय आंदोलन के माध्यम से पिछड़ों को उनका हक दिलाने का प्रयास किया था. जिसके कारण पिछड़ा वर्ग पूरी तरह से लालू यादव के साथ जुड़ गया था. लेकिन नीतीश ने बिहार में सबसे पहले अति पिछड़ो की बात की उनको मुख्य धारा में लाने के प्रयास किए जिसके कारण अति पिछड़ा वर्ग नीतीश कुनार के साथ जुड़ गया. जो नीतीश कुमार के लिए एक मजबूत वोट बैंक के रुप में देखा जाता है. राहुल गांधी ने न्याय संकल्प पत्र के माध्यम से उसमें सेंधमारी करने का प्रयास किया है. इसका कितना लाभ कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को होगा यह देखना द...

बिहार में भ्रष्टाचार पर बवाल, चुनाव में किस पार्टी की गोटी होगी लाल? धर्मेंद्र कुमार

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पटना। जन सुराज पार्टी के संयोजक प्रशांत किशोर ने एनडीए के मंत्रियों व नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के बाद बिहार की राजनीति में भुचाल आ गया है. वहीं भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे इंडिया गठबंधन के नेता तेजस्वी यादव और राहुल गांधी को थोड़ी राहत मिलती दिख रही है. भ्रष्टाचार से जीरों टोलरेंशन की बात कहने वाली भाजपा और जदयू (एनडीए) के समक्ष भी संकट उत्पन्न हो गया है.  जनसुराज पार्टी के प्रशांत किशोर ने आरोपों को न केवल सार्वजनिक किया, बल्कि तथ्यों और दस्तावेज़ों के साथ एक संगठित राजनीतिक चुनौती के रूप में पेश किया है. इसके बाद आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरु हो गया है. एनडीए के नेता व मंत्री अपने उपर लगे आरोपों के जवाब देने के बजाए प्रशांत किशोर पर सेल कंपनियों से बड़ी मात्रा में पैसे लेने का आरोप लगा रहे हैं.   किस पर क्या है आरोप ? प्रशांत किशोर ने पिछले दिनों प्रेस कॉन्फ्रेंस कर एनडीए के नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. उन्होंने बीजेपी के विधायक व उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर हत्या मामले में नाबालिग बताकर रिहाई के साथ ही फर्जी डिग्री और नाम बदलने का आरोप...

"भस्मासुर बनता भ्रष्टाचार, भगवान भरोसे देश की जनता  धर्मेंद्र कुमार

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जमशेदपुर। जिस देश का अन्नदाता (किसान) एमएसपी के लिए वर्षों से संघर्षरत हो, उन्हें खाद के लिए जद्दोजहद करनी पड़े और खाद के बदले उसे लाठी डंडे का प्रसाद मिल रहा हो. वहीं रोजगार के लिए देश का युवाओं को सरकारी बर्बरता का सामना करना पड़े. सरकारी कर्मचारी हजारों की संख्या में अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत हो और उनकी मांगो पर विचार करने के बजाए उनको नौकरी से ही बर्खास्त कर दिया जाए. देश में फैले अव्यवस्था का अंदाजा लगाया जा सकता है. वहीं दूसरी ओर देश का एक वर्ग जिनके कंधों पर सरकारी योजनाओं को धरातल पर उतारने की महत्वपूर्ण जिम्मेवारी है. वो इन सबसे बेखबर व्यवस्था की कार्यालयों बैठ सरकारी योजनाओं की लूट व्यस्त और मस्त हैं. इस कथित अमृतकाल में जहां गरीब और अमीर की बीच की खाई और चौड़ी व गहरी हो जाए. जिस देश में ईमानदारी बेमानी लगने लगे और बेईमानी का काम पूरी ईमानदारी से होने लगे तो आप यकिन मानिए की उस देश को विश्व गुरु बनने से कोई रोक नहीं सकता है. भ्रष्टाचार की बैशाखियों पर टिकी हुई सरकार जब राजनीतिक मंचों से भ्रष्टाचार को मिटाने की बात करें तो यह समझ लेना चाहिए कि सरकार की मंशा भ्र...

घुसपैठ पर घमासान: 11 वर्षों में मात्र 5000 की हुई पहचान धर्मेंद्र कुमार

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 17 सितंबर को जब पूरा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन मना रहा था. उसी दौरान असम के मुख्यमंत्री हिमंत विस्व सरमा के निर्देश पर असम भाजपा मीडिया सेल द्वारा अपने सोशल मीडिया हैंडल से एक बीडियो वायरल किया गया. जिस वीडियो में यह बनाया गया है कि 2041 तक असम में मुसलमानों की जनसंख्या 99 प्रतिशत हो जाएगी. हर सरकारी संपतियों पर उनका कब्जा हो जाएगा. वीडियों में खुले आम गौ मांस काटते भी दिखाया गया. इस वीडियों के माध्यम से यह समझाने के प्रयास किया गया है यदि आप असम सहित पूरे देश में बीजेपी की सरकार नहीं बनवाएंगे तो हिंदू खतरे में पड़ सकते है औऱ घुसपैठीए हिंदुऔं की संपतियों पर कब्जा कर लेंगे. इसलिए आप सुरक्षित रहना चाहते है तो बीजेपी और मोदी को चुनना होगा क्योंकि वहीं देश के एक मात्र हिंदु हृदय सम्राट है. जबकि सच ठीक इसके उटल है. चुनाव से पहले ही याद आते है घुसपैठिए अक्सर चुनाव से ठीक पहले भारत में अवैध घुसपैठियों का मुद्दा अचानक सुर्खियों में आ जाता है. हालांकि असम में 2027 में चुनाव होना है. लेकिन 2025 में बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मो...

अर्थव्यवस्था का बंटाधार, क्या रेवड़ी बांट कर नीतीश करेंगे चुनावी वैतरणी पार ? ✍️ धर्मेंद्र कुमार

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पटना। भारतीय राजनीति में चुनावी मौसम आते ही लोकलुभावन वादों और मुफ्त योजनाओं की बौछार शुरू हो जाती है. इसे आम बोलचाल में "रेवड़ी संस्कृति" कहा जाता है. बिहार में आसन्न विधानसभा के मद्देनजर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की रणनीति भी अब इसी राह पर चलती दिख रही है. सवाल यह है कि क्या रेवड़ी बांटकर वे चुनावी वैतरणी पार कर पाएंगे, या यह नीति राज्य की अर्थव्यवस्था को और गर्त में ले जाएगी?  रेवड़ी संस्कृति: लोकतंत्र या मुफ्तखोरी? रेवड़ी संस्कृति का मूल उद्देश्य जनता को राहत देना बताया जाता है, लेकिन इसके पीछे छिपी चुनावी गणित को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट में इस पर बहस चल रही है कि मुफ्त योजनाएं लोकतांत्रिक मूल्यों और आर्थिक स्थिरता के खिलाफ हैं. राजनीतिक पार्टियां लगातार पांच वर्षों तक जनता की आकांक्षों को पूरा करने के बजाए चुनाव के ठीक पहले मुफ्त की रेवड़ियां वांट कर चुनाव जीतने के विकल्प को ज्यादा बेहतर समझती है. यही वजह है कि हाल के दिनों में रेवड़ी संस्कृति बेहद फल फूल रही है. वहीं जनता का मानना है कि चुनाव के पहले सरकार द्वारा रेवड़ी के तौर पर जो दिया जा...

पूर्वी सिंहभूम कांग्रेस की सियासी संग्राम : कौन होगा अगला कप्तान ? धर्मेंद्र कुमार

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जमशेदपुर। पूर्वी सिंहभूम जिला कांग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर चल रही सियासी हलचल अब एक नए मोड़ पर है. जहां पहले गुटबाजी, अनुभव और संगठनात्मक संतुलन की बात हो रही थी, वहीं अब चर्चा इस बात की है कि पार्टी नेतृत्व किस दिशा में निर्णय लेगा. क्या पार्टी का शीर्ष नेतृत्व को जिला अध्यक्ष के तौर पर संगठन को मजबूत करने वाला एक समर्पित कार्यकर्ता की तलाश है फिर जिला अध्यक्ष के तौर पर उन्हें विधायक या सांसद मेटेरियल चाहिए. जिला अध्यक्ष का चुनाव इसी विमर्श पर टिका है . जिला अध्यक्ष की जिम्मेवारी संगठन को पूर्वी सिंहभूम के छह विधानसभा सहित 11 प्रखंड और कुल 231 पंचायतों तक मजबूती करना अर्थात संगठन को ग्रास रूट तक पहुंचाने के साथ ही आम अवाम की समस्याओं के समाधान के लिए हर स्तर पर आंदोलन कर लोगों को न्याय दिलाने की है. संगठनकर्ता एवं विधायक मेटेरियल दोनो अलग है कांग्रेस कार्यकर्ताओं का स्पष्ट कहना है कि यदि एक व्यक्ति जिला अध्यक्ष भी बनेगा और वहीं विधायक के लिए दावेदारी करेगा तो संगठन से जुड़ं अन्य कार्यकर्ता क्या केवल दरी बिछाने और झंडा ढ़ोने के लिए है. नाम नहीं छापने की शर्त पर एक पार्टी के ...

अध्यक्ष पद के कई दावेदार, कौन होगा एकजुटता का सूत्रधार? -- धर्मेंद्र कुमार

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जमशेदपुर। झारखंड की राजनीति में पूर्वी सिंहभूम जिला कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव एक साधारण संगठनात्मक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पार्टी के आला नेताओं के लिए एक गहरी राजनीतिक परीक्षा है. पूर्वी सिंहभूम जिला कांग्रेस एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन की दहलीज़ पर खड़ा है. 2025 का अध्यक्षीय चुनाव न केवल संगठन के भीतर शक्ति संतुलन को परिभाषित करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि कांग्रेस की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी. इस बार मुकाबला त्रिकोणीय है, जिसमें पुराने अनुभव, नई ऊर्जा और संगठनात्मक संतुलन के बीच संघर्ष स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है. पार्टी आलाकमान द्वारा पूर्वी सिंहभूम जिला के लिए गुजरात के विधायक अनंत पटेल को पर्वेक्षक बनाया गया है. अनंत पटेल लगातार पार्टी के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं से रायशुमारी कर रहे हैं. अब यह देखना लाजमी होगा कि पटेल कार्यकर्ताओं से की गई बातचीत व रायशुमारी के आधार पर निर्णय लेते है या फिर गणेश परिक्रमा वाली परंपरा को ही आगे बढ़ाते हैं. कांग्रेस पार्टी में गणेश परिक्रमा करने वालों को प्राथमिकता देने की परंपरा रही है. पूर्व में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बालमु...

बिहार में नीतीश का विकल्प कौन? ✍️ धर्मेन्द्र कुमार

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पटना। बिहार की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जिन्होंने बीते दो दशकों में राज्य की राजनीति को एक नई दिशा दी, अब एक ऐसे दौर में हैं जहां जनता बदलाव की ओर देख रही है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या वर्तमान में बिहार की राजनीति में किसी भी दल में नीतीश कुमार का कोई ठोस और विश्वसनीय विकल्प मौजूद है? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब शायद किसी के पास नहीं. वैसे तो कई नेता स्वंय को नीतीश के विकल्प के तौर पर प्रस्तुत करने का हरसंभव प्रयास कर रहे हैं, लेकिन वो जिस पृष्ठभूमि से आते है एवं उनपर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और उनकी काबिलियत उन्हें इसकी इजाजत देती नहीं दिख रहीं है.  निर्विवाद नीतीश कुमार ने रखी विकास की आधारशिला 1990 से 2004 तक फैले अराजकता व अपराध से बिहार को मुक्ति दिलाने में नीतीश कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका रही. उन्होंने 2005 में बिहार की सत्ता संभालते ही कई मोर्चों पर एक साथ काम करना शुरु किया. जिसके परिणाम भी जल्द ही दिखे. अपराध के पर्याय माने जाने वाले शहाबुद्दीन, आनंद मोहन, धुमल सिंह, सुनिल तिवारी जैसे अपराधी जेल के अंदर पहुंचा दिए गए. ...

गाली पर गंभीर हो सरकार: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सामाजिक मर्यादा

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जमशेदपुर। भारतीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक मूलभूत अधिकार है, लेकिन जब यह आजादी दूसरों की स्वतंत्रता के हनन, गाली-गलौज और अपमानजनक भाषा में बदल जाती है, तब यह न केवल सामाजिक मर्यादाओं को चुनौती देती है, बल्कि राजनीतिक विमर्श को भी दूषित करती है. पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रमों को देखे तो विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा जिस प्रकार सार्वजनिक मंचों से अपशब्दों का प्रयोग किया गया. यह किसी भी तरह से सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है. और उन नेताओं के खिलाफ सरकार की प्रतिक्रिया ने इस विषय को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है.  गाली का बदलता स्वरूप गाली कोई नई चीज़ नहीं है. यह हमारे संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रही है. यह प्राचीन काल से भावनात्मक अभिव्यक्ति का हिस्सा होने के साथ ही हास्य परिहास की प्रतिक रही है. इसका जिक्र महाभारत जैसे ग्रंथों में भी कटु शब्दों के रुप किए गए प्रयोग के तौर पर इसका उल्लेख मिलता है. दरअसल हमारे यहां गाली को “गारी” कहा जाता है या यूं कहे तो गारी का अपभ्रंश शब्द है गाली. दोनों बस इतना अंतर है कि गारी गाई जाती है जबकि गाली दी जाती है. ...