तुष्टिकरण बनाम ध्रुवीकरण: भारतीय राजनीति का बदलता परिदृश्य ✍️ धर्मेन्द्र कुमार
भारतीय लोकतंत्र में चुनावी राजनीति का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. आज राजनीतिक विमर्श धर्म, जाति और पहचान की राजनीति में उलझ कर रह गया है. जब धर्म, जाति औऱ पहचान सियासत के लिए ईंधन का काम करने लगे तो सत्ता में बैठे लोगों की कोशिश होती है कि वो देश में लगातार ऐसा वातावरण बनी रहे ताकि लोग धर्म, जाति औऱ पहचान से इतर कुछ और ना सोच सकें. इसके लिए वो तमाम तरह के हथकंडे अपनाते भी हैं. और यह सब उनकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है ताकि जनता शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और महंगाई जैसे असल मुद्दों पर सवाल न उठाए? सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समाज का बुद्धिजीवी वर्ग भी इन मुद्दों पर बंटा हुआ नजर आता है. चिंता तब और बढ़ जाती है बुद्धिजीवी वर्ग लोग भी इन मुद्दों पर तथ्यहीन तर्क के आधार पर गलत बातों को सही साबित करने के लिए हरसंभव प्रयास करते है. सत्ता की रणनीति: ध्यान भटकाओ, भावनाएं भड़काओ जहां ध्रुवीकरण का उद्देश्य बहुसंख्यक समाज को सांस्कृतिक अस्मिता के नाम पर एकजुट करना है. राम मंदिर, समान नागरिक संहिता, लव जिहाद जैसे मुद्दे भावनात्मक तौर पर लोगों की बीच दरार पैदा करते हैं. वहीं तुष्टिकरण क...