सत्ता और विपक्ष के गतिरोध की भेट चढ़ा मानसून सत्र धर्मेंद्र कुमार
सत्ता और विपक्ष के गतिरोध की भेट चढ़ा मानसून सत्र
धर्मेंद्र कुमार
संसद लोकतंत्र का सबसे पवित्र मंदिर होती है। जहां देश के भविष्य की दिशा और दशा तय करने वाले कानूनों पर गंभीर विमर्श, असहमति और फिर सहमति की बुनियाद रखी जाती है। लेकिन हाल ही में संपन्न हुआ संसद का मानसून सत्र जिस तरह की राजनीतिक उठापटक और गतिरोध की भेंट चढ़ा, उसने संसदीय लोकतांत्रिक मूल्यों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। इसे यदि सत्ता और विपक्ष की 'नूरा कुश्ती' का नाम दिया जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जनता के करोड़ों रुपये और देश का बहुमूल्य समय उस राजनीतिक खींचतान में स्वाहा हो गया, जिसका अंततः राष्ट्रहित से कोई सरोकार नहीं था।
इस सत्र की विडंबना का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पूरे सत्र के दौरान कई बार संसद बमुश्किल 15 मिनट भी सुचारू रूप से नहीं चल सकी। हंगामे, नारेबाजी और तख्तियां लहराने के शोर में सदन की कार्यवाही दिन-प्रतिदिन स्थगित होती रही। सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि इस शोर-शराबे के बीच कई महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले विधेयक बिना किसी गंभीर चर्चा के ही पारित कर दिए गए। जिन विधेयकों पर जनहित, आर्थिक नीतियों और नागरिक अधिकारों को लेकर तीखी बहस होनी चाहिए थी, उन्हें महज कुछ मिनटों में, बिना किसी लोकतांत्रिक विमर्श के ध्वनि मत से पास करा लिया गया। यह न केवल संसदीय परंपराओं का मखौल है, बल्कि देश की जनता के साथ भी एक बड़ा छलावा है।
इस पूरे घटनाक्रम में सत्तापक्ष की भूमिका और जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठते हैं। पूरे 20 दिनों के इस गतिरोध के दौरान देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की सदन से दूरी चर्चा का विषय बनी रही। एक जीवंत लोकतंत्र में कार्यपालिका सीधे तौर पर विधायिका के प्रति जवाबदेह होती है। जब देश की सर्वोच्च पंचायत ठप पड़ी हो, तो सरकार के शीर्ष नेतृत्व का सदन में न आना और गतिरोध को तोड़ने की कड़े प्रयास न करना, उनकी जवाबदेही पर सवालिया निशान लगाता है। क्या सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि वह विपक्ष को भरोसे में लेती और सदन को सुचारू रूप से चलाने के लिए ठोस पहल करती?
दूसरी तरफ, विपक्ष भी अपनी इस जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता। विपक्ष का काम सरकार को घेरना और सवाल पूछना जरूर है, लेकिन इसके लिए पूरे सत्र को बंधक बना देना कहां तक जायज है? किसी एक विशेष सवाल के जवाब या जिद के चक्कर में पूरे मानसून सत्र को बर्बाद कर देना विपक्ष के अपरिपक्व दृष्टिकोण को दर्शाता है। जनता ने विपक्ष को इसलिए चुनकर भेजा है ताकि वे सदन के भीतर जनहित के मुद्दों पर सरकार की घेराबंदी करें, न कि सदन को चलने ही न दें। चर्चा से भागकर या चर्चा का माहौल न बनने देकर विपक्ष ने सरकार को बिना बहस के ही मनमाने ढंग से कानून पास कराने का एक आसान रास्ता सौंप दिया।
अंततः, सत्ता और विपक्ष के इस आपसी अहंकार और 'नूरा कुश्ती' में हार सिर्फ और सिर्फ आम जनता की हुई है। जब कानून बिना चर्चा के बनते हैं, तो उनमें कमियां रह जाना स्वाभाविक है, जिसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ता है। अब समय आ गया है कि दोनों पक्ष अपनी राजनीतिक रोटियां सेकना बंद करें और संसद की गरिमा व अपनी संवैधानिक जवाबदेही को समझें, क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करने से चलता है।
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