जंतर-मंतर पर लाठीचार्ज: क्या सुप्रीम कोर्ट की जांच की आंच गृह मंत्रालय तक पहुंचेगी? धर्मेंद्र कुमार
जंतर-मंतर पर लाठीचार्ज: क्या सुप्रीम कोर्ट की जांच की आंच गृह मंत्रालय तक पहुंचेगी?
धर्मेंद्र कुमार
दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन के दौरान हुए लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल का मामला अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर है, जहां अदालत द्वारा एक उच्च-स्तरीय स्वतंत्र जांच समिति के गठन के फैसले ने देश के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। चूंकि दिल्ली पुलिस सीधे तौर पर केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करती है, इसलिए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या देश की शीर्ष अदालत में चल रही इस कानूनी लड़ाई की आंच अंततः गृह मंत्रालय तक पहुंचेगी?
इस पूरे विवाद की जड़ें 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर आयोजित 'संसद चलो' मार्च से जुड़ी हैं। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर दावा किया है कि भीड़ के हिंसक होने और बैरिकेड्स तोड़ने के बाद "न्यूनतम आवश्यक बल" और "चरणबद्ध तरीके" से कार्रवाई की गई। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों को सिरे से खारिज किया है।
हालांकि, याचिकाकर्ताओं द्वारा पेश किए गए साक्ष्य और सादे कपड़ों में बिना नेमप्लेट के भीड़ को नियंत्रित करते पुलिसकर्मियों के वीडियो ने कानून प्रवर्तन एजेंसी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए एक पूर्व जज, पूर्व डीजीपी और पूर्व सीबीआई निदेशक की सदस्यता वाली समिति बनाने का निर्देश दिया है। जब जांच का जिम्मा इतनी बड़ी समिति के पास हो, तो केवल मैदानी अधिकारियों को बलि का बकरा बनाकर शीर्ष नेतृत्व पल्ला नहीं झाड़ सकता।
गृह मंत्रालय पर आंच आने के प्रमुख कारण
दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश है जहां कानून-व्यवस्था और पुलिस प्रशासन की अंतिम जवाबदेही सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय की होती है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही इस सुनवाई की आंच गृह मंत्रालय तक पहुंचने के तीन मुख्य आधार दिखते हैं। जिसमें नीतिगत और रणनीतिक विफलता प्रमुख है। जंतर-मंतर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए क्या गृह मंत्रालय के स्तर पर कोई विशेष दिशा-निर्देश जारी किए गए थे? सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों की तैनाती और फेशियल रिकग्निशन तकनीक जैसी उन्नत प्रणालियों का उपयोग क्या मंत्रालय की मूक सहमति या नीतिगत फैसलों का हिस्सा था? क्या पेलेट गन की इस्तेमाल की अनुमति मंत्रालय द्वारा दी गई थी या इससे संबंधित जानकारी उनके पास थी ? स्वतंत्र जांच कमेटी इन पहलुओं को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
वहीं सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी इस लाठीचार्ज की कड़ी निंदा करते हुए गृह मंत्री को पत्र लिखकर न्यायिक जांच की मांग की थी। यदि जांच में यह साबित होता है कि छात्रों पर बर्बरता जानबूझकर की गई या उच्च स्तर से इसके लिए कड़े निर्देश थे, तो नैतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर उंगली गृह मंत्रालय की ओर ही उठेगी। अदालत ने स्पष्ट किया है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन नागरिकों का मौलिक अधिकार है। वहीं, सरकार और पुलिस इसे कानून-व्यवस्था और संप्रभुता को चुनौती देने वाले हिंसक प्रयास के रूप में देख रही है। इस संवैधानिक रस्साकशी में नीति निर्धारक के रूप में गृह मंत्रालय की भूमिका सीधे तौर पर जांच के घेरे में आ जाती है।
फिलहाल, दिल्ली पुलिस शीर्ष अदालत में तकनीकी और प्रक्रियात्मक दलीलों के सहारे अपना बचाव कर रही है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का यह रुख साफ करता है कि वह निहत्थे युवाओं और नागरिकों पर सत्ता के अत्यधिक बल प्रयोग को कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। यदि स्वतंत्र कमेटी की जांच में पुलिसिया कार्रवाई को असंवैधानिक या दुर्भावनापूर्ण पाया जाता है, तो इसकी आंच केवल पुलिस कमिश्नर या डीसीपी तक सीमित नहीं रहेगी। लोकतांत्रिक व्यवस्था में 'अंतिम जवाबदेही' के सिद्धांत के तहत इसका प्रभाव कहीं ना कहीं केंद्रीय गृह मंत्रालय की प्रशासनिक साख पर भी पड़ेगा।
Comments
Post a Comment