राजनीति की बिसात पर 'सनातन' का कैसा अपमान! धर्मेंद्र कुमार
राजनीति की बिसात पर 'सनातन' का कैसा अपमान!
धर्मेंद्र कुमार
जो अनादि है, अनंत है, अजन्मा है और नश्वरता की सीमाओं से परे है, क्या उसे किसी मान - अपमान की अपेक्षा है? जो स्वयं संपूर्ण ब्रह्मांड का नियंता हो, उसका अपमान करने की हैसियत भला इस नश्वर संसार में किसकी हो सकती है? लेकिन आधुनिक भारत की राजनीति ने श्रद्धा और दर्शन के इस मूल तत्व को पूरी तरह बिसरा दिया है। आज 'सनातन' शब्द आध्यात्मिक उत्कर्ष का मार्ग होने के बजाय राजनीतिक ध्रुवीकरण की प्रयोगशाला का एक सबसे सुविधाजनक उपकरण बनकर रह गया है। सच तो यह है कि सनातन धर्म का सबसे बड़ा अपमान तब होता है, जब वोट बैंक की फसल काटने के लिए इसके प्रतीकों को चुनावी रैलियों या संसद की सीढ़ियों पर तमाशा बना दिया जाता है।
भारतीय राजनीति का यह चरित्र बेहद चिंताजनक है कि यहां धर्म और उसकी आस्था का उपयोग जनहित के मुद्दों को सुलझाने के लिए नहीं, बल्कि जनता को आपस में लड़ाने, बांटने और एक स्थायी राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा करने के लिए किया जाता है। जब तक कोई दल या नेता धर्म का उपयोग अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए करता रहता है, तब तक उसे 'सांस्कृतिक गौरव' का नाम दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर, जब विरोधी खेमा उसी शैली में पलटवार करता है, तो अचानक 'भावनाएं आहत' होने लगती हैं। इस पूरे चक्रव्यूह में धर्म का मूल तत्व पीछे छूट जाता है और केवल सतही स्वांग और नारेबाजी शेष रह जाती है।
हाल ही में लखनऊ में आयोजित भारतीय जनता पार्टी की एक रैली का वायरल हुआ वीडियो इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। जहां भगवान हनुमान का रूप धरे एक कलाकार को हाथ में पार्टी का झंडा लेकर नाचते हुए देखा गया। जिस संकटमोचन को करोड़ों लोग अपनी अगाध श्रद्धा का केंद्र मानते हैं, उन्हें एक राजनीतिक दल के स्वागत जुलूस में महज एक 'इवेंट मैनेजर' के तमाशे की तरह पेश कर दिया गया। क्या यह सनातन का अपमान नहीं है? लेकिन सत्ता की इस धुरी पर बैठे कर्णधारों के लिए यह केवल चुनावी उत्साह का हिस्सा बनकर रह गया।
राजनीतिक नौटंकी का दूसरा छोर संसद परिसर में देखने को मिला। जब पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने संसद परिसर के भीतर भगवा वस्त्र धारण कर एक अजीबोगरीब स्वांग रचा। राम मंदिर के चंदे में कथित अनियमितताओं के विरोध में उन्होंने एक नाटक का मंचन किया, जिसमें वे स्वयं भगवा चोले में नजर आए। विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए देश के सर्वोच्च सदन के परिसर को थियेटर में तब्दील कर देना और किसी पवित्र रंग या वेशभूषा को सीधे तौर पर अपराध से जोड़कर प्रदर्शित करना, एक गंभीर भटकाव को दर्शाता है।
सवाल यह है कि जब धर्म का राजनीतिकरण और ध्रुवीकरण होता है, तो क्या वास्तव में ईश्वर का अपमान होता है? इसका दार्शनिक उत्तर 'नहीं' है। जो शाश्वत सत्य है, उसे किसी इंसान के आचरण से न तो गौरव मिलता है और न ही क्षति पहुंचती है। दरअसल अपमान तो वास्तव में उस जनता की होती है, जिसे इस स्वांग के जरिए मूर्ख बनाया जाता है। राजनीति जब धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण का खेल खेलती है, तो वह आम नागरिकों की बुनियादी प्राथमिकताओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से उनका ध्यान भटकाने का असफल प्रयास करती है।
Comments
Post a Comment