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Showing posts from June, 2026

*रामद्रोहियों पर क्यों खामोश है संघ ? धर्मेंद्र कुमार*

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रामद्रोहियों पर क्यों खामोश है संघ ?                      धर्मेंद्र कुमार अयोध्या रामलला मंदिर में चढ़ावे की चोरी ने न केवल भक्तों की आस्था को झकझोरा है, बल्कि मंदिर प्रबंधन और उससे जुड़े संगठनों की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राम मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। जब चढ़ावे की चोरी होती है और प्रबंधन पर सवाल उठते हैं, तो यह सीधे-सीधे भक्तों की भावनाओं पर हमला है। संघ और सरकार की चुप्पी इस हमले को और गहरा करती है। आस्था की रक्षा केवल नारों से नहीं, बल्कि पारदर्शी व्यवस्था से होती है।इस पूरे मामले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की रहस्यमयी चुप्पी का राज क्या है ? यह देश का प्रत्येक हिंदू जानना चाहता है। जबकि मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय बंसल सहित ज्यादातर सदस्य संघ से जुड़े हुए बताए जाते हैं। ऐसे में संगठन का मौन व्रत धारण करना यह इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं ट्रस्ट के सदस्यों को संरक्षण का कवच उपलब्ध कराया जा रहा है।  चोरी पर चुप क्यों संघ? सं...

*राम धन की लूट है या ईश्वरीय कृपा ? -धर्मेंद्र कुमार*

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राम धन की लूट है या ईश्वरीय कृपा ?         -धर्मेंद्र कुमार संत कबीर ने लगभग 500 वर्ष पहले ही कहा था कि राम नाम की लूट मची है जो चाहे जिस रुप में लूट सके तो लूट ले क्योंकि यह लूट की अवधि सीमित समय के लिए ही है। कबीर को शायद आभास था कि पांच सौ साल बाद जब रामलला अयोध्या में विराजमान होंगे, तो उनके ही दरबार में उनके ही नाम पर लूट मचेगी। फर्क बस इतना है कि तब लूट आस्था की थी, आज लूट नकदी और चढ़ावे की है। वहीं मीराबाई ने अपनी रचना के माध्यम से यह स्वीकार किया कि पायो जी मैंने राम रत्न धन पायो। जबकि आधुनिक गीतकार राजेंद्र कृष्ण ने कलयुग का चित्रण करते हुए क्या खूब लिखा कि रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा जहां हंस को दाना चुगना पड़ेगा और कौवा मोती खाएगा। जहां धर्म भी होगा और कर्म भी होगा लेकिन शर्म नहीं होगा। यह गीतकारों और कवियों की कोरी कल्पना नहीं बल्कि उनके लिखे गीत आज अक्षरसः सही सिद्ध हो रहे हैं। अयोध्या में स्थित राम मंदिर जहां रामलला विराजमान हैं। वहां के सेवक ही राम दरबार की चढ़ावे को लेकर चंपत हो गए। उधर राम भजन में मस्त औऱ व्यस्त मंदिर प्रबंधन स...

*भरत तिवारी की हत्या या इनकाउंटर: कौन है जिम्मेदार? -धर्मेंद्र कुमार*

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भरत तिवारी की हत्या या इनकाउंटर: कौन है जिम्मेदार?  -धर्मेंद्र कुमार बिहार के भोजपुर ज़िले के शाहाबाद क्षेत्र के बिलौटी गांव के युवक भरत तिवारी की हालिया कथित पुलिस मुठभेड़ (इनकाउंटर) में हुई मौत ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया है। स्थानीय जनता सड़कों पर उतरकर विरोध कर रही है और पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की मांग कर रही है। लोगों का यह आक्रोश केवल भरत तिवारी की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था पर घटते भरोसे का प्रतीक है। लोग पूछ रहे हैं कि जब अदालतें और कानून मौजूद हैं, तो पुलिस को "न्यायाधीश" बनने का अधिकार किसने दिया। इस बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने न्यायिक जांच का आदेश दिया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या बिहार या पूरे देश में, पुलिस को ‘न्याय का ठेकेदार’ बनने की छूट कब तक मिलती रहेगी? लोकतंत्र में गोली के बदले गोली का कोई स्थान नहीं है, बल्कि हर प्रकार की समस्याओं के समाधान के लिए न्याय व्यवस्था का प्रावधान है। यह भी सही है कि देश में न्याय प्रक्रिया धीमी है, महंगी है और थकाने वाली है। लेकिन न्याय व्यवस्था के विकल्प के तौर पर एवं ‘त्वरित न्य...

अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी बनाम आस्था पर डाका-धर्मेंद्र कुमार

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संदर्भ: अयोध्या राम मंदिर चढ़ावे की चोरी बनाम आस्था पर डाका  -धर्मेंद्र कुमार अयोध्या स्थित रामलला के भव्य मंदिर में जब श्रद्धा की लहरें उमड़ रही थीं, तभी चढ़ावे की चोरी की खबर ने पूरे देश के करोड़ों भक्तों को झकझोर कर रख दिया। दानपात्र से पैसा चोरी होने का अर्थ केवल नकदी का गायब होना नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के भरोसा व विश्वास पर सीधे सीधे डाका है। सवाल पैसा का नहीं है। सवाल उस विश्वास का है जिसके बल पर मंदिर खड़े होते हैं, और सभ्यताएं चलती हैं। यहां यह समझना होगा कि राम मंदिर कोई सामान्य इमारत नहीं। यह 500 साल के संघर्ष, प्रतीक्षा और पीढ़ियों की प्रार्थना का प्रतिफल है। यह चोरी समान्य चोरी नहीं है। रामलला मंदिर में चोरी का मतलब करोड़ों की आस्था पर चोट है। रिपोर्ट दर्ज हो भी जाए, पर जो विश्वास टूटता है वो रिपोर्ट में नहीं लिखा जा सकता।सबसे बड़ा सवाल है कि जब भगवान का घर सुरक्षित नहीं, तो दुनिया में क्या सुरक्षित होगा?” ट्रस्ट और पारदर्शिता का संकट    तिरुपति, वैष्णो देवी, शिरडी—हर बड़े मंदिर की साख उसकी पारदर्शिता से है। CCTV, ऑनलाइन दर्शन, डिजिटल रसीद। अयोध...

“विधायक/सांसद भी इंसान हैं भाई!”-धर्मेंद्र कुमार

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जनता नेताओं को चुनती है, उन्हें पलकों पर बिठाती है ताकि वे संसद में उनकी आवाज़ उठाएं। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि चुनाव जीतने के बाद यदि नेता निकुंश हो जाए तो जनता को पाँच साल तक इंतज़ार करना पड़ता है। जब कोई विधायक या सांसद अपनी जनता को भूलकर अपने या अपनों को याद कर लेता है, तो मीडिया और विपक्ष ऐसे बवाल मचाते हैं जैसे संसद भवन में चाय की जगह नींबू पानी परोस दिया गया हो। लेकिन जरा ठहरिए विधायक व सांसद भी तो इंसान ही हैं। इंसान की सबसे बड़ी खासियत है कि उसकी अंतरआत्मा समय–समय पर जाग जाती है। कभी चुनाव के वक्त, कभी वोटिंग के वक्त, और कभी–कभी तो राज्यसभा चुनाव के वक्त भी। और जब अंतरआत्मा जागती है, तो वह पुकारती है— “जाओ बेटा, आज पार्टी लाइन से हटकर मन की करो।” तो बेचारे विधायक क्या करें? अपनी अंतरआत्मा की आवाज़ दबाएं? नहीं! वे वही करते हैं जो हर इंसान करता है—मन की सुनते हैं। जब देश के प्रधानमंत्री मन की बात करते है, तो विधायकों व सांसदों को मन की बात सुनना ही चाहिए। मन की सुनने के बाद वे कभी–कभी गलती से दूसरे दल के आंगन में टहल आते हैं। इसे गद्दारी कहना गलत...

*आदित्यपुर नगर निगम में 12वें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन*

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जमशेदपुर । आईडीबीआई बैंक, आदित्यपुर शाखा की ओर से रविवार को आदित्यपुर नगर निगम परिसर में 12वें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित अधिकारियों, कर्मचारियों एवं प्रतिभागियों ने सामूहिक रूप से योगाभ्यास किया तथा योग के महत्व एवं इसके स्वास्थ्य लाभों पर प्रकाश डाला गया। सभी ने नियमित योग को अपनी दिनचर्या में शामिल कर स्वस्थ, सुखी एवं तनावमुक्त जीवन जीने का संकल्प लिया। यह आयोजन “एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य के लिए योग” की भावना को साकार करने तथा समाज में स्वास्थ्य एवं जागरूकता को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ। इस अवसर पर आदित्यपुर नगर निगम के नगर आयुक्त एजाज अनवर, , पारुल सिंह, उप नगर आयुक्त, संजीव सरदार, महापौर, आदित्यपुर नगर निगम,  राकेश कुमार, वरिष्ठ क्षेत्रीय प्रमुख, आईडीबीआई बैंक, जमशेदपुर, विवेकानंद कुमार, शाखा प्रमुख, आईडीबीआई बैंक, आदित्यपुर शाखा  राकेश कुमार आदित्यपुर शाखा  अमित कुमार पॉल, आईडीबीआई बैंक जमशेदपुर मुख्य रूप से उपस्थित थे।

"राष्ट्रवाद का एकाधिकार: संघ का सौ साल और सवाल" - धर्मेंद्र कुमार

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जब कोई संगठन स्वयं को राष्ट्रभक्ति का ठेकेदार घोषित कर देता है, तो लोकतंत्र की आत्मा असहज हो उठती है। और जब वही संगठन अपने विचारों को एक धर्म, एक संस्कृति और एक भाषा तक सीमित कर लेता है, तो भारत जैसे बहुलतावादी देश में उनके राष्ट्रवादी होने का दावा बेमानी हो जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का सौ साल का सफर एक विचारधारात्मक प्रयोगशाला रहा है, जहां राष्ट्र की परिभाषा को बार-बार गढ़ा गया, बदला गया, और अब सत्ता के गलियारों में स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह परिभाषा भारत के संविधान और स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा से मेल खाती है? संविधान बनाम संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। उद्देश्य था—हिंदू समाज को संगठित करना. लेकिन प्रश्न यह है कि क्या "हिंदू" को राष्ट्र की परिभाषा का केंद्र बनाना, भारत की संवैधानिक आत्मा—"सर्व धर्म समभाव"—से मेल खाता है? भारत का संविधान सर्व धर्म समभाव व धर्मनिरपेक्षता की बात करता है, जबकि संघ का विचार "हिंदू राष्ट्र" की अवधारणा ...

रणनीतिक चूक से हुई कांग्रेस की हार --धर्मेंद्र कुमार

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संदर्भः- राज्यसभा चुनाव 2026 झारखंड राज्यसभा चुनाव के नतीजे ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि राजनीति केवल संख्याओं का खेल नहीं, बल्कि रणनीति और गठबंधन प्रबंधन की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। इस चुनाव में झामुमो के उम्मीदवार बैद्यनाथ राम और भाजपा समर्थित निर्दलीय परिमल नाथवाणी की जीत हुई, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा हार गए। जिसकी संभावना मीडिया द्वारा पहले से बताई जा रही थी। संख्या बल और वास्तविकता इंडिया गठबंधन के पास दो तीट के लिए 56 विधायकों का पर्याप्त संख्या बल था। कांग्रेस को भरोसा था कि झामुमो और अन्य सहयोगी दलों के साथ मिलकर वह आसानी से जीत दर्ज करेगी। लेकिन परिणाम ने यह दिखाया कि केवल अंकगणितीय समीकरण ही पर्याप्त नहीं होते, बल्कि राजनीतिक समीकरण भी उतने ही अहम होते हैं। जहां जेएमएम प्रत्याशी बैद्धनाथ राम को 30 वोट मिले वहीं कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा को 20 वोट मिले जबकि बीजेपी समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवाणी को 28 वोट मिले। वहीं 3 वोट अयोग्य करार दिए गए। इसके बावजूद कांग्रेस को 5 वोट कम मिले। जो कहीं ना कहीं पार्टी के चुनाव प्रभारी के रणनीतिक चूक...

लोकतंत्र में चंदा बना राष्ट्रीय धंधा -धर्मेंद्र कुमार

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भारत में चंदा कोई साधारण शब्द नहीं, यह धार्मिक एवं राजनीतिक संरक्षण और संवर्द्धन का मजबूत आधार है। चंदा के बिना ना तो कोई सार्वजनिक धार्मिक अनुष्ठान संभव है और ना ही नेता जी का सम्मान समारोह। दरअसल चंदा से सामुहिकता का बोघ होता है। गली-मुहल्ले की पूजा,जागरण व धार्मिक अनुष्ठान से लेकर राम मंदिर तक या किसी लावारिश का दाह संस्कार करना हो या नेता जी का सम्मान समारोह हर जगह चंदा ही वह अदृश्य धागा है जो भक्तों, समर्थकों, आयोजकों और नेताओं को जोड़ता है। फर्क बस इतना है कि कहीं यह "धर्म" के नाम पर लिया जाता है, कहीं "सत्ता" के नाम पर। लेकिन हाल के वर्षों में चंदा का स्वरुप बदल गया है। अब चंदा दान ना होकर व्यापार अथवा सौ फीसदी सुरक्षित निवेश हो गया है। चंदा लोकतंत्र में एक बिजनेस मॉडल बन गया है।  चंदा का राष्ट्रीयकरण बचपन में मोहल्ले की पूजा उत्सवों एवं धार्मिक अनुष्ठान के लिए चंदा वसूली का नज़ारा बड़ा दिलचस्प होता था। लोग स्वेच्छा से दान करते थे, जो ज्यादा कानून झाड़ता था उसकों विभिन्न अलंकारों से सम्मानित भी किया जाता था। चंदा का राष्ट्रीयकरण तब हुआ, जब अयोध्या...

क्या कांग्रेस अपनी एकजुटता से बीजेपी को मात देगी? — धर्मेंद्र कुमार

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मध्यप्रदेश और झारखंड की राजनीति में राज्यसभा चुनाव इस बार केवल संख्याओं का खेल नहीं, बल्कि दलों की अनुशासन और रणनीति की परीक्षा भी है। मध्यप्रदेश विधानसभा में कुल 230 सीटें हैं। इस आधार पर एक राज्यसभा सीट के लिए 58 विधायकों का समर्थन चाहिए। वहीं विधानसभा में बीजेपी के पास कुल 163 विधायक हैं, जिसके आधार पर बीजेपी के पक्ष में दो सीट का जाना तय है। तीसरे सीट के लिए बीजेपी को 11 अतिरिक्त विधायकों का समर्थन चाहिए। कांग्रेस के पास कुल 66 विधायक हैं। यदि कांग्रेस के विधायक अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए मतदान से अपने को अलग करते हैं, तो बीजेपी के तीसरे प्रत्याशी की हार निश्चित है। इस प्रकार कांग्रेस मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द करने का बदला लेकर बीजेपी को उसकी भाषा में ही जवाब दे सकती है। ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग को मजबूरी में तीसरी सीट के लिए पुनः चुनाव कराना पड़ेगा और कांग्रेस को एक बार फिर मौका मिल सकता है। वही झारखंड में इंडिया गठबंधन अपनी चट्टानी एकता का परिचय देता है। दोनों सीट पर उनकी जीत पक्की है क्योंकि उनके पास दोनों सीट जितने के लिय 56 विधायकों का पर्याप्त संख्या...

चुनाव आयोग की निष्पक्षता बनाम लोकतंत्र की प्रासांगिकता --धर्मेंद्र कुमार

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संदर्भः- राज्यसभा चुनाव 2026   भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया में जनता की सामूहिक भागीदारी है। संविधान ने चुनाव आयोग को वह संवैधानिक अधिकार दिए हैं जिनका उद्देश्य जनता के मताधिकार की रक्षा करना और चुनावों को निष्पक्ष व पारदर्शी बनाना है। लेकिन हाल के वर्षों में आयोग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं, जो लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं हैं। बंगाल और बिहार में एसआईआर विवाद पश्चिम बंगाल में एसआईआर के नाम पर लगभग 27 लाख लोगों को मतदान से वंचित कर दिया गया। यह भारतीय चुनावी इतिहास में अभूतपूर्व घटना है। इससे पहले बिहार में भी इसी प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई थी। विपक्ष का आरोप है कि यह कदम जनता के अधिकारों को सुरक्षित रखने के बजाय सत्ता पक्ष को लाभ पहुंचाने के लिए उठाया गया। राज्यसभा चुनावों में दोहरे मापदंड मध्यप्रदेश और झारखंड में पांच सीटों के लिए होने वाले राज्यसभा चुनावों में आयोग के निर्णय से उसकी निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े हो गए हैं। एक ही तरह के मामले में जहां मध्यप्रदेश में कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्...

क्या कांग्रेस का खेल बिगाड़ेंगे नाथवाणी? --धर्मेंद्र कुमार

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झारखंड की राजनीति इन दिनों राज्यसभा चुनाव को लेकर गरमाई हुई है। 18 जून को राज्यसभा की दो सीटों के लिए मतदान होना है और 8 जून नामांकन की अंतिम तारीख है। इस चुनाव में यदि यूपीए गठबंधन ने एकजुटता दिखाई तो दोनो सीट यूपीए के खाते में जाना लगभग तय है। लेकिन भाजपा ने अंतिम समय अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं करके निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवाणी को अपने समर्थन करने की घोषणा कर दी. इससे कहीं ना कहीं राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग एवं हार्स ट्रेंडिंग की संभावना बढ़ गई है। इस चुनावी गणित में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती परिमल नाथवाणी के रूप में खड़ी दिख रही है।  संख्याओं का खेल झारखंड में राज्यसभा की कुल दो सीटों के लिए मतदान होना है। झारखंड विधानसभा में कुल 81 विधायक हैं। एक सीट के जीत के लिए 28 विधायकों का समर्थन चाहिए। यूपीए गठबंधन के पास कुल 56 विधायक है। जिसमें जेएमएम 34,कांग्रेस 16, राजद 4 औऱ माले के 2 विधायक है। वहीं एनडीए के पास 24 विधायक है। जिसमें भाजपा 21,आजसू 1,जदयू 1 और लोक जनशक्ति पार्टी का 1 विधायक है।वहीं एक विधायक जेकेएलएम का है। ऐसे में आकड़ों के आधार पर राज...

पूछ रहा है देश का युवा: पेपर लीक का जिम्मेदार कौन?--धर्मेंद्र कुमार

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भारत के लोकतंत्र में आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि लगातार हो रहे पेपर लीक का जिम्मेदार कौन है? 6 जून, शनिवार को दिल्ली के जंतर मंतर पर देशभर से आए युवाओं ने यही सवाल सीधे सरकार से पूछा। लेकिन सरकार के पास इस सवाल का कोई ठोस जवाब नहीं था। शायद इसलिए कि इस पूरे खेल में शामिल लोगों को बचाने की कोशिश हो रही है। युवाओं का आक्रोश भारत की आबादी का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा युवा है। यही युवा अपने भविष्य और अधिकारों को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। परीक्षा घोटाले, पेपर लीक और भर्ती प्रक्रिया में धांधली ने उनके सपनों को चकनाचूर कर दिया है। कहने को तो युवा देश उज्जवल भविष्य होता है। लेकिन जब युवाओं का भविष्य ही अंधकारमय हो और सरकार असंवेदनशील हो तो देश का भविष्य क्या होगा ?   सरकार की चुप्पी और संवेदनहीनता केंद्र की भाजपा सरकार युवाओं के भरोसे लगातार चुनाव जीत रही है, लेकिन युवाओं के सवालों पर मौन है। सरकार का मानना है कि यदि जनता इतनी परेशान है तो फिर चुनावों में जीत कैसे मिल रही है? बड़ा सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र का पैमाना केवल चुनाव जीतना ही रह गया है? यह ऐसा सवाल जिसपर देश की ज...

अस्तित्व के लिए संघर्षरत है जमशेदपुर की जीवनदायिनी स्वर्णरेखा--धर्मेंद्र कुमार

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जमशेदपुर की पहचान सिर्फ़ इस्पात उद्योग से नहीं है, बल्कि उसकी आत्मा स्वर्णरेखा नदी से भी जुड़ी है। यह शहर के पश्चिमी और दक्षिण-पूर्वी हिस्से से होकर बहती है और खरकाई नदी के साथ मिलकर जमशेदपुर को एक विशिष्ट भूगोल प्रदान करती है।यह नदी दशकों से शहर की प्यास बुझाती रही, खेतों को सींचती रही और जीवन का आधार बनी रही। स्वर्णरेखा मात्र एक नदी नहीं बल्कि जमशेदपुर की लाइफलाइन है। शहर के लिए जल का एक मात्र प्राकृतिक श्रोत स्वर्णरेखा  आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। जिस नदी के बालू रुपी आंचल में कभी सोने के कण पाए जाते थे, आज वहीं नदी प्रदूषण और प्रशासनिक उदासीनता का दंश झेलने को अभिशप्त है। औद्योगिक कचरे और नालों का बोझ स्वर्णरेखा में कंपनियों का औद्योगिक अपशिष्ट और शहर की लगभग दर्जनभर नालियों का गंदा पानी सीधे गिरता है। नदी का जल धीरे-धीरे जहरीला होता जा रहा है। विडंबना यह है कि इस पर चर्चा तो खूब होती है। गंगा की तर्ज पर गंगा आरती  जैसी कार्यक्रमों का आयोजन भी होता हैं। स्वर्णरेखा के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए प्रत्येक वर्ष नदी तट पर चर्चाएं भी होती ...

बंगाल में बदलाव या बदले की राजनीति? – धर्मेंद्र कुमार

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 पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि यदि प्रदेश में भाजपा की सरकार बनती है तो “बदलाव की राजनीति” होगी। जनता ने इस वादे पर भरोसा कर भाजपा को सत्ता सौंपी। लेकिन सत्ता मिलने के बाद से राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से जो घटनाएं सामने आ रही हैं। वे ना सिर्फ इस भरोसे को झकझोर रही हैं बल्कि प्रदेश में ध्वस्त कानून व्यवस्था की भयानक तस्वीर पेश कर रही है। जो चिंताजनक है। प्रदेश में जारी है हिंसा का दौर विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद से ही बंगाल में लगातार टीएमसी कार्यकर्ताओं, नेताओं और सांसदों पर हमले हो रहे हैं। हाल ही में एक स्पताह के अंदर पहले पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी और फिर सांसद कल्याण बनर्जी पर भीड़ द्वारा हमले किए गए। महत्वपूर्ण बात यह है कि इन हमलों को लेकर सरकार द्वारा कोई अफसोस तक व्यक्त नहीं किया गया और ना ही घटना कै दौरान उपस्थित पुलिस के जवानों के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई। सासंद की सुरक्षा की जिम्मेवारी राज्य सरकार की होती है। लेकिन सरकार द्वारा इन घटनाओं को गंभीरता से नहीं लिया जाना लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है। ...

कांग्रेस को क्यों है भरोसे का संकट ?--धर्मेंद्र कुमार

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भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में सबसे बड़ा सवाल यही है कि स्वाधीनता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली  कांग्रेस पार्टी को आज भरोसे का संकट क्यों है? वह जनता का विश्वास क्यों नहीं जीत पा रही है, जबकि देश में वर्तमान सरकार के खिलाफ लोगों में भारी असंतोष और नाराजगी हैं। महंगाई, बेरोजगारी, किसान के समक्ष संकट और पेपर लीक जैसी घटनाएं जनता को गहराई से प्रभावित कर रही हैं। फिर भी कांग्रेस को जनसमर्थन नहीं मिल रहा है। वहीं  अनजाने में किए गए एक छोटे से प्रयास से कॉकरोच जनता पार्टी को इतने कम समय में सोशल मीडिया पर जो प्रचंड जनसमर्थन मिल रहा है। वो इस बात के संकेत है कि सरकार और सिस्टम के खिलाफ लोगों में आक्रोश और नाराजगी है, ऐसे में लोगों को एक भरोसेमंद विकल्प की तलाश है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्यों देशवासियों को कांग्रेस पर भरोसा नहीं हो पा रहा है ? क्या कांग्रेस के बड़े नेता इस विषय पर चिंतन कर संगठन एवं नीतियों में बदलाव के पक्षधर है या फिर वही घिसी पीटी हुई नीति व विचारधारा के साथ ही रहने को मजबूर है क्योंकि वह उनके वोट बैंक की दृष्टिकोण से उन्हें सुट कर...