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Showing posts from November, 2025

बढ़ता मतदान, बदलता बिहार: 2025 के पहले चरण की लोकतांत्रिक तस्वीर धर्मेंद्र कुमार

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण में 18 जिलों की 121 सीटों पर 64.66% मतदान हुआ जो पिछले 20 वर्षों के सभी रिकार्ड को धवस्त कर एक नया प्रतिमान स्थापित किया. यह आंकड़ा न केवल पिछले चुनावों की तुलना में अधिक है, बल्कि यह राज्य की राजनीतिक चेतना, जन-सक्रियता और संभावित सत्ता परिवर्तन की आहट भी देता है. मतदान में हुए इस वृद्धि का आकलन सभी दलों द्वारा अपने अपने पक्ष में बताया जा रहा है. वहीं राजनीतिक जानकार भी मतदान में हुए इस वृद्धि को लेकर स्पष्ट रुप से कुछ भी कहने से बचते दिख रहे है.  मतदान प्रतिशत में वृद्धि के मायने राजनीति जानकारों ने बिहार के प्रथम चरण में मतदान प्रतिशत में हुई वृद्धि के कई कारण की चर्चा की. उनका मानना है कि  जनता की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी के कारण वोट प्रतिशत में वृद्धि हुई है. इसमें जहां युवाओं और पहली बार वोट डालने वालों की भागीदारी ने इस प्रतिशत को ऊपर उठाया है. वहीं दूसरी ओर सत्ता विरोधी लहर की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है. यह बदलाव की चाहत या विकल्प की तलाश के कारण भी सकता है. बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि जैसे स्थानीय...

सरकार के नहीं दोष गोसाई धर्मेंद्र कुमार

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गोस्वामी तुलसीदास जी ने सदियों पहले लिख दिया था — "समरथ के नहीं दोष गोसाई." त्रेता युग में राम थे, द्वापर में कृष्ण. और कलियुग में सरकार है. अब सरकार कोई साधारण संस्था नहीं, यह एक चमत्कारी सत्ता है. जो चाह ले तो जनता से थाली ताली बजवा सकती है, दीया जलवा सकती है, मोबाइल की टॉर्च से कोरोना को डरवा सकती है. यह वही सरकार है जो भ्रष्टाचारियों को सत्य हरिशचंद्र बना सकती है और सच बोलने वालों को कालकोठरी में तपस्या का अवसर प्रदान करती है. और यदि सरकार डबल इंजन वाली हो तो फिर वहां कथित रुप से राम राज्य होने की बात कही जाती है. डबल इंजन वाली सरकार में ना खाता ना बही जिधर बुलडोजर चल जाए वही सही. वहां पीड़ितों को न्याय मिले या मिले लेकिन सरकार के खिलाफ बोलने वालो को पुलिस प्रशासन द्वारा निश्चित रुप से पुरस्कृत किया जाता है और पुरस्कार इतना जबर्दस्त मिलता है कि पुरस्कार पाने .वालो के आने वाली सात पीढ़ीयां फिर कभी सपने में भी सरकार के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे. अपराधी, वर्तमान समय में बलात्कारी, भ्रष्टाचारी और कलंकी नेता ही कलयुग का कलिंक अवतार माना जाता है. समर...

वादों की बारिश में भीगता लोकतंत्र: चुनावी मौसम का विज्ञान ✍️धर्मेंद्र कुमार

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जब आसमान बिलकुल साफ नीला हो और बिन बादल  वादों की बारिश हो तो यकिन मानिए वह चुनावी मौसम आगाज़ है. चुनावी मौसम में अक्सर लगातार वादों की बारिश होती रहती है. यह वो बारिश है जिसमें जनता भींगती नहीं है बल्कि वादों कि बारिश की बूंदें कानों के रास्ते दिल तक पहुंच कर गुदगुदी करती हैं, और दिमाग में भ्रम पैदा करती हैं. यह चुनावी मौसम का असर है इसका कोई इलाज नहीं है.  वादों का मानसून हर पांच साल में लोकतंत्र के आंगन में एक विशेष प्रकार का मानसून आता है, जिसमें माननीय नेतागण बादलों की तरह गरजते हैं, बिजली की तरह चमकते हैं, और फिर वादों की बौछार करते हैं. इस खुशनुमा चुनावी मौसम की बारिश का अपना ही आनंद है. माननीय लोग वादों की झड़ी लगा देते है और बेचारी जनता इस वादों की बारिश को हमेशा की तरह झेलती है. उसे पता है कि यह चुनावी मौसम की बादों की बारिश से ना तो “हर हाथ को काम मिलता है,” ना ही “हर खेत को पानी,” ना ही “हर जेब में पैसा और हर घर में वाई फाई,” और इतने वर्षों में ना ही “भ्रष्टाचार खत्म हो पाया और ना ही समाज के अंतिम पायदान पर खड़े आम नागरिकों का ही विकास हुआ.” जनता भी इस ...

अत्यंत अद्भुत गुणकारी है चुनावी मौसम में श्री सत्ता नारायण भगवान की कथा ✍️धर्मेंद्र कुमार

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जब-जब लोकतंत्र संकट में आता है, तब-तब श्री सत्ता नारायण भगवान अवतरित होते हैं. उनका आगमन न तो पुष्पक विमान से और न ही किसी तपस्वी की तपस्या से बल्कि वे आते हैं चुनाव आयोग की घोषणा के साथ, और जाते हैं परिणाम की घोषणा के बाद. इस दौरान वे जनता के बीच चमत्कार करते हैं, वादों की वर्षा करते हैं, और हर गली-नुक्कड़ में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं.  अवतार की लीला श्री सत्ता नारायण भगवान के अवतार अनेक रूपों में होते हैं, कभी वे किसान के हमदर्द बनते हैं तो कभी बेरोजगारों के मसीहा. चुनावी मौसम में उनके चमत्कारों की गति इतनी तीव्र होती है कि पांच सालों की निष्क्रियता एकदम से सक्रियता में बदल जाती है. सड़कें बनती हैं, घोषणाएं होती हैं, और जनता को याद दिलाया जाता है कि "आप ही हमारे मालिक हैं" बशर्ते वोट सही बटन पर पड़े.  प्रसाद वितरण श्री सत्ता नारायण भगवान की कथा में प्रसाद का विशेष महत्व होता है. भक्तों को मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, और मुफ्त वादों का प्रसाद मिलता है. कुछ विशेष भक्तों को तो टिकट नामक अमृत भी मिलता है, जिससे वे स्वयं सत्ता के हिस्सेदार बन जाते हैं. इस प्रसाद की ...

अंधभक्त बनाम चमचे: कौन है नंबर वन ? ✍️ धर्मेंद्र कुमार

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  राजनीति का मंच अब अखाड़ा बन चुका है.  जहां विचारधाराओं की कुश्ती नहीं बल्कि  वफादारी की डब्ल्यू डब्ल्यू इ (WWE) चल रही है. एक ओर अंधभक्त हैं, जो अपने नेताओं की हर बात को वेदवाक्य मानते हैं और उनके झूठे बयानों को भी सच बताने के लिए तमाम तरह के गलत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. थेथरई उनका अमोध अस्त्र है, यदि उससे भी बात नहीं बनी तो गाली गलौज व मारपीट पर उतर जाते हैं. दरअसल अंधभक्तों की शिक्षा मूलतः व्हाट्स्अप यूनिवर्सिटी से हुई है. व्हाट्स्अप यूनिवर्सिटी से तो आप वाकिफ होंगे ही. आजकल उसी का ट्रेंड है. वहीं दूसरी ओर चमचों की बिरादरी है, जो अपने नेताओं के जूते चमकाने में इतनी महारत रखते हैं कि कभी-कभी इनके नेता खुद भ्रमित हो जाता है कि वो नेता है या सेलिब्रिटी.  तथ्यों की तिजोरी में ताले इन दोनों वर्गों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनको तथ्यों से परहेज़ है. इतिहास की जानकारी तो इन्हें व्हाट्स्अप यूनिवर्सिटी से मिलती है, और भूगोल इनके लिए एक ट्रोल पोस्ट मात्र हैं. जब भी कोई सवाल उठता है, तो जवाब में आते हैं गूगल से प्राप्त अधकचरे आंकड़े, पुरानी क्लिपिंग्स, और भ...

नेता जी कहिन: नाच ना आवे, आंगन टेढ़ा ✍️ धर्मेंद्र कुमार

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वर्तमान परिपेक्ष्य में भारतीय राजनीति का मंच अब सिर्फ भाषणों का नहीं बल्कि यह एक रंगमंच बन गया है, जहां नेता जी कभी भावुकता का भरतनाट्यम करते हैं, कभी वादों की कथकली, और कभी-कभी तो विरोधियों पर आरोपों की ब्रेक डांस भी कर डालते हैं. चुनावी मौसम आते ही देश के हर कोने में "नेता नृत्य महोत्सव" शुरू हो जाता है जहां टिकट फ्री और ड्रामा गारंटीड. डांस दिखाओ वोटर रिझाओ के इस महाकुंभ में फ्री में जनता का भरपूर मनोरंजन होता है. लोकतंत्र में नाच के प्रकार  वैसे तो भारतीय शास्त्रीय संगीत में नृत्य का महत्वपूर्ण स्थान है. नृत्य के कई प्रकार भी हैं. लेकिन भारतीय राजनीति में नाच व नृत्य की बात ही कुछ और है. राजनीति में नाच कई प्रकार के होते हैं, जिनका कोई शास्त्रीय वर्गीकरण तो नहीं हैं. लेकिन वह जनभावनाओं में गहराई से पैठ बना चुके हैं. बात अगर राजनीति नृत्य की करें तो पहले नंबर पर वोट-लुभावन तांडव नृत्य आता है.  इसमें नेता जी विकास की ऐसी झड़ी लगाते हैं कि जनता को लगता है, बस अब रामराज्य आने ही वाला है. सड़क, बिजली, पानी सब वादों की ताल पर थिरकते हैं. वहीं दूसरा नंबर आरोप-प्रत्या...