गाली का राष्ट्रवाद: देशद्रोही गाली बनाम राष्ट्रहित के अपशब्द धर्मेंद्र कुमार

गाली का राष्ट्रवाद: देशद्रोही गाली बनाम राष्ट्रहित के अपशब्द
 धर्मेंद्र कुमार


आज के दौर में यदि आप शुद्ध भाषा का प्रयोग करते हैं, तो यकीन मानिए आप विकास की रेस में बहुत पीछे छूट चुके हैं। आधुनिक व्याकरण अब ‘संज्ञा, सर्वनाम और क्रिया’ से नहीं, बल्कि इस बात से तय होता है कि आपकी दी हुई गाली या झिड़की किस ‘कटेगरी’ में आती है। भाषा विज्ञान के नए शोधकर्ताओं ने गालियों का लोकशाहीकरण करते हुए उन्हें दो मुख्य विभागों में बांट दिया है—देशद्रोही गालियां और राष्ट्रहित के अपशब्द। दरअसल जब दूसरों को या दूसरों के लिए गाली दी जाती है तो वह हमारे लिए सहज होता है लेकिन वहीं अपशब्द या गाली हमारे लिए दी जाती है तो हम असहज हो जाते हैं। यही प्रकृति का नियम है। 
आइए, इस नए भाषाई राष्ट्रवाद को समझें, ताकि अगली बार जब आपके मुंह से कुछ 'अमर्यादित' निकले, तो कम से कम उसका 'केवाईसी' तो दुरुस्त रहे!
आजकल आंदोलनों का तरीका बदल गया है। अब तख्तियां लेकर नारे लगाने का जमाना पुराना हो गया है। अब आंदोलन रील्स, मीम्स और हैशटैग्स से चलते हैं। जब देश का 'जेन-ज़ी' (Gen Z) वर्ग रोजगार या अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरता है, तो उनका गुस्सा भी उसी 'कूल और अनफ़िल्टर्ड' अंदाज में निकलता है। कई बार इस आक्रोश में प्रधानमंत्री तक के लिए ऐसी गालियां और अपशब्द निकल जाते हैं, जिन्हें सुनकर पुराने जमाने के बुजुर्ग कान बंद कर लें। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि बच्चे गालियां सीखते कहां से हैं? शायद हमसे आपसे या फिर समाज से ही सीखते हैं। ये और बात है कि वो इसको फिल्टर करके आधुनिकता की चाशनी डूबोकर वापस भी करना बखूबी जानते हैं। 
इस पर सत्ता का रिस्पांस भी बेहद डिजिटल और आधुनिक होता है। खुद प्रधानमंत्री अपनी एक सोशल मीडिया रील में बेहद चेतावनी भरे, मगर पिता-तुल्य लहजे में युवाओं को 'माफ कर देने' की बात करते नजर आते हैं। रील्स का बैकग्राउंड म्यूजिक एकदम भावुक होता है, ऐसा लगता है मानो साक्षात 'क्षमा बड़न को चाहिए' की जीती-जागती रील चल रही हो। युवा बेचारे भावुक हो ही रहे होते हैं कि तभी बैकस्टेज से असली 'आईटी सेल' और नेताओं का कोरस शुरू हो जाता है।
यहीं से शुरू होता है इस भाषाई राष्ट्रवाद का असली खेल और पार्टी का 'दोहरा चरित्र'। प्रधानमंत्री जहां कैमरे के सामने युवाओं को माफ करने का बड़प्पन दिखा रहे होते हैं, वहीं उनके ठीक पीछे खड़े बीजेपी के माननीय सांसद, कद्दावर नेता और उनके वफादार 'आईटी सेल' के सिपाही गालियों का नया पिटारा खोल कर बैठ जाते हैं।
हक मांगने वाले उसी 'जेन-ज़ी' को नेताओं और सांसदों द्वारा ऑन-कैमरा "गटर-ज़ी" (Gutter Z) घोषित कर दिया जाता है। अगर आप अपनी मांगों पर अड़े रहे, तो ये ट्रोल सेना और नेता आपको इतिहास की टाइम मशीन में बिठाकर सीधे "बाबर के वंशज" की कैटगरी में डाल देंगे।
कमाल की बात यह है कि अगर कोई युवा गुस्से में एक ट्वीट कर दे, तो पुलिस उसके घर का दरवाजा खटखटाने पहुंच जाती है। लेकिन जब सांसद लाइव डिबेट में युवाओं को 'गटर' या 'बाबर की औलाद' कहते हैं, तो कानून को मोतियाबिंद हो जाता है। उनके खिलाफ न कोई एफआईआर होती है, न कोई कार्रवाई। उनके अपशब्द तो राष्ट्रहित के काढ़े की तरह हैं, कड़वे हैं, पर देश की सेहत के लिए जरूरी बताए जाते हैं।
इन गालियों की महिमा अपरंपार है। ये इम्युनिटी बूस्टर की तरह काम करती है। प्रधानमंत्री के अच्छे सेहत का राज शायद उन्हें प्रतिदिन मिलने वाली गालियां ही हैं। आप किसी को भी, कुछ भी बोल दीजिए, बस अंत में 'जय हिंद' या 'सनातनी' का हैशटैग लगा दीजिए। बस! आपकी सात पीढ़ियों के पाप धुल जाएंगे। आपकी गाली सीधे 'राष्ट्रहित' की श्रेणी में आ जाएगी।
सत्ता का यह दोहरापन अब न्यू नॉर्मल बन चुका है। अगर युवा प्रधानमंत्री या सरकार को कोसें, तो वह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है, संस्कृति का पतन है।
लेकिन अगर सत्ताधारी दल के नेता और उनकी ट्रोल आर्मी युवाओं को 'कीड़ा-मकोड़ा' या 'गटर' कहें, तो वह देश को साफ करने का 'स्वच्छ भारत अभियान' है। इस विमर्श के पीछे का कड़वा सच यह है कि हमने नफरत और दोहरेपन को 'राष्ट्रवाद' का खूबसूरत जामा पहना दिया है। गालियां कभी भी किसी देश का हित नहीं कर सकतीं, चाहे वे रील्स के जरिए दी जा रही हों या प्रेस कॉन्फ्रेंस में। जब राजा 'माफ' करने का अभिनय करे और उसके प्यादे 'गटर' कहकर डसने लगें, तो समझ जाना चाहिए कि लोकतंत्र का भाषाई संतुलन वेंटिलेटर पर है। देश डिजिटल हो चुका है, तो गालियां भी स्मार्ट और सिलेक्टिव हो चुकी हैं। इसलिए अगली बार जब आंदोलन में उतरें, तो अपनी शब्दावली जरा संभलकर चुनें! कहीं ऐसा न हो कि आपकी क्रोनोलॉजी बिगड़ जाए और आप गलत कटेगरी की गाली देकर सीधे 'टारगेट' पर आ जाएं, जबकि सामने वाले आपको 'गटर' कहकर भी 'संस्कारी' बने रहें।

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