सरकार की ‘गले की हड्डी’ बना JPSC-JSSC आंदोलन! --धर्मेंद्र कुमार
सरकार की ‘गले की हड्डी’ बना JPSC-JSSC आंदोलन!
धर्मेंद्र कुमार
झारखंड की राजनीति में युवाओं और रोजगार का मुद्दा हमेशा से बेहद संवेदनशील रहा है। लेकिन वर्तमान समय में झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की कार्यप्रणाली को लेकर उपजा जनाक्रोश, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। राज्य के युवाओं का यह असंतोष अब महज सोशल मीडिया की बहसों तक सीमित नहीं है, बल्कि सड़कों पर उतरकर 20 अगस्त को मुख्यमंत्री आवास के घेराव की दी गई खुली चेतावनी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पानी अब सिर से ऊपर गुजर चुका है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह स्थिति सरकार के लिए 'गले की हड्डी' जैसी बन गई है।
सरकार की साख का संकट
इस पूरे विवाद के केंद्र में परीक्षाओं की शुचिता, पेपर लीक के आरोप और चयन प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताएं हैं। JSSC-CGL परीक्षा को रद्द करने की मांग, JPSC परीक्षाओं के विवाद, और परीक्षा आयोजित करने वाली बाहरी एजेंसियों की भूमिका पर उठते सवाल इस आक्रोश का मुख्य कारण हैं। युवाओं का आरोप है कि परीक्षा प्रणाली में भ्रष्टाचार इस कदर फैल चुका है कि योग्य अभ्यर्थियों का भविष्य दांव पर लग गया है।
रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में पिछले 23 दिनों से चल रहा छात्रों का धरना, भूख हड़ताल, और 10 अगस्त को विधानसभा मार्च के दौरान हुआ लाठीचार्ज इस आंदोलन की गंभीरता को रेखांकित करता है। जब किसी राज्य का पढ़ा-लिखा युवा वर्ग गांधीवादी रास्तों को छोड़कर उग्र मार्ग पर चलने को विवश होने लगे, तो यह मान लेना चाहिए कि व्यवस्था के प्रति उसका विश्वास पूरी तरह डगमगा चुका है।
विपक्ष का 'दोहरा मापदंड'
इस आंदोलन की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि छात्रों की वास्तविक और जायज मांगों को अब पूरी तरह से राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगा है, जो कहीं से भी उचित नहीं है। इस मोड़ पर विपक्ष (विशेषकर भाजपा) की भूमिका और उसके दोहरे राजनीतिक रुख की समीक्षा करना अनिवार्य हो जाता है। यहां उल्लेखनीय है कि जब देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र और युवा प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे NEET) में धांधली को लेकर ऐतिहासिक प्रदर्शन कर रहे थे, तब इसी विपक्ष के राष्ट्रीय नेतृत्व ने उस आंदोलन को 'देश-विरोधी ताकतों' से प्रेरित बताने की कोशिश की थी। जंतर-मंतर पर देश-विरोधी नारे लगने और अवांछित तत्वों के शामिल होने के बड़े-बड़े राजनीतिक आरोप तो लगाए गए, लेकिन विपक्ष इन दावों को सही साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया।
इसके ठीक विपरीत, जब वही छात्र आंदोलन रांची की सड़कों पर उतरता है, तो विपक्ष का वही धड़ा इसे शत-प्रतिशत सही ठहराते हुए राज्य सरकार पर छात्रों के साथ ज्यादती और दमन का आरोप लगाने लगता है। राजनीतिक अवसरवाद का यह विरोधाभास तब और उजागर हो गया जब 10 अगस्त को रांची में विधानसभा घेराव के दौरान भारी पथराव, तोड़फोड़ और हिंसा हुई। इस हिंसा में कौन लोग शामिल थे, किन राजनीतिक तत्वों ने भीड़ को उकसाया और छात्रों के नाम पर अराजकता फैलाने की कोशिश की, इसके सारे तथ्य और वीडियो फुटेज अब सामने आ चुके हैं। यह स्पष्ट करता है कि छात्र आंदोलन की आड़ में राजनीतिक रोटियां सेकने और चुनावी माहौल को भुनाने का खेल परदे के पीछे से बखूबी खेला जा रहा है।
राजनीतिक असर
हेमंत सरकार यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाती है, तो झारखंड का यह छात्र आंदोलन राजनीतिक रूप से भी सरकार के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है। हालांकि सरकार ने इस मुद्दे की को लेकर अपनी संजीदगी का परिचय देते हुए 17 अगस्त को छात्रों के प्रतिनिधियों को वार्ता के लिए पुनः आमंत्रित किया है। इस वार्ता में छात्रों के प्रतिनिधियों के साथ ही उनके लीगल एक्सपर्ट भी शामिल होंगे।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि युवाओं के भविष्य को किसी भी दल के लिए पक्ष-विपक्ष की राजनीति का मोहरा नहीं बनने दिया जा सकता। लोकतंत्र में 'युवा शक्ति' किसी भी सरकार को बनाने या बिगाड़ने की ताकत रखती है। सीएम आवास घेरने की धमकी महज एक कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि यह सरकार के लिए आत्ममंथन की अंतिम चेतावनी है। हेमंत सरकार को यह समझना होगा कि सिर्फ आश्वासन, ईमेल आईडी जारी करने या चार-सदस्यीय मंत्रियों की कमेटियों के गठन से युवाओं का गुस्सा शांत नहीं होने वाला।
यदि सरकार को इस 'गले की हड्डी' से मुक्ति पानी है, तो उसे राजनीति से ऊपर उठकर छात्रों से सीधे और आमने-सामने बैठकर बात करनी होगी। उन्हें किसी बिचौलिए या राजनीतिक चश्मे के बिना छात्रों की चिंताओं को सुनना होगा और उनका खोया हुआ भरोसा वापस जीतना होगा। परीक्षाओं के लिए एक त्रुटिहीन और पारदर्शी अकादमिक कैलेंडर लागू करना, पेपर लीक के असली दोषियों को सलाखों के पीछे भेजना और छात्रों के प्रतिनिधियों से सीधा संवाद स्थापित करना ही इस अभूतपूर्व संकट का एकमात्र और वास्तविक समाधान है।
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