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Showing posts from October, 2025

"कुशासन की नई परिभाषा या जंगलराज का रिवाइवल पार्ट 2?" ✍️ धर्मेंद्र कुमार

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बिहार में 2025 के चुनावी मौसम ने लोकतंत्र की गरिमा को फिर से लहूलुहान कर दिया है. मोकामा में जन सुराज पार्टी के नेता दुलारचंद यादव की हत्या और सिवान में एक एएसआई की गला रेतकर हत्या ने यह साबित कर दिया कि ‘सुशासन बाबू’ के राज में कानून-व्यवस्था सिर्फ भाषणों तक सीमित हो कर रह गया है. यदि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्यमंत्री के नजर यह सुशासन व्यवस्था है तो आप सहज ही अंदाजा लगा सकते है कि जंगलराज में क्या स्थिती होगी. आज के दौर में तो यही जंगलराज पार्ट 2 है. बड़ा सवाल यही है कि क्या इसी सुशासन व्यवस्था से प्रदेश की जनमानस का कल्याण होगा, यह गंभीर चिंता का विषय है. कुशासन का नया अवतार आपको बता दे कि 30अक्टूबर 2025 को मोकामा के घोसवरी थाना क्षेत्र में जन सुराज समर्थक दुलारचंद यादव की गोली मारकर हत्या कर दी गई. वे चुनाव प्रचार में निकले थे, और यह हत्या चुनावी रंजिश का नतीजा बताई जा रही है. सिवान में एक एएसआई की गला रेतकर हत्या कर दी गई, और आरोप है कि इसमें शराब माफियाओं का हाथ है. इन दोनों घटनाओं ने बिहार की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या यह वही बिहार है जहाँ...

लोकतंत्र में लोकलुभावन वादों से कैसे होगा जनता का कल्याण? धर्मेंद्र कुमार

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बिहार में चुनाव आते ही नेताओं की जुबान पर "जनकल्याण" के जुमले चिपक जाते हैं. इस दौरान हर गली, नुक्कड़, और चाय की दुकान पर बिना बादल, बिना मौसम, और बिना गारंटी के लगातार वादों की बरसात होती रहती है. हर चुनाव में नेता थोक के भाव में वादे करते हैं जैसे "हर युवा को नौकरी", "हर खेत को पानी", "हर घर को बिजली", और "हर वोट को सम्मान",महिलाओं को आर्थिक रुप से सशक्त बनाने के ले लोखों रुपये के लोन. अब तो नेताओं ने लोगों के आस्था को भी चुनावी वादों में शामिल करने का प्रयास किया. लेकिन जैसे ही चुनाव समाप्त होता है, नेताओं के ये खोखले वादे भी जुमलों में तब्दिल हो जाते हैं. जनता खेतों में पानी ढ़ूढ़ती रहती है और नेता सत्ता की मलाई चाभने में व्यस्त और मस्त रहते है. यही भारतीय लोकतंत्र की विशेषता है. हर पांच वर्षों के बाद सारी बेशर्मी को ताख पर रख कर उन्हीं वादों के साथ पुनः नेता जी जनता के समक्ष वोट मांगने के लिए प्रकट हो जाते है. यह भारतीय जनमानस की हृदय विशालता का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि जनता हर बार नेताओं के वादों पर भरोसा कर उन्हें अना स...

बिहार चुनाव 2025: कांग्रेस की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन? ✍️धर्मेंद्र कुमार

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“हवाहवाई रणनीति और ओवरकॉन्फिडेंस ने कांग्रेस को डुबोया           बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कांग्रेस पार्टी की स्थिति एक शिकस्त खाई टीम जैसी दिख रही है. जिसका न तो रणनीति स्पष्ट, न संगठन मजबूत, और न ही नेतृत्व में वह समझदारी जो एक बड़े गठबंधन में अपेक्षित होती है. वोटर अधिकार यात्रा के दौरान मिले अपार जनसमर्थन के भ्रम में उलझे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं व रणनीतिकारों के अति उत्साह व ओवरकॉन्फिडेंस के कारण बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस न सिर्फ सीटों के मामले में पिछड़ गई बल्कि गठबंधन में उसकी स्थिती भी कमजोर हुई है. शुरुआती दौर में कांग्रेस के पास बार्गेनिंग पावर था लेकिन नेताओं के ओवरकॉन्फिडेंस के कारण सब गड़बड़ा गया.   नेतृत्व का ओवरकॉन्फिडेंस होना कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व व रणनीतिकारों के ओवरकॉन्फिडेंस के कारण प्रथम दृष्टया में बिहार विधानसभा चुनाव में नुकसान होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की चुनावी रणनीति बनाने व निर्णय लेने में हुई देरी के कारण पार्टी को सीटों का नुकसान हुआ. वहीं त...

चुनावी मौसम में नेता जी का राजनीतिक योगाभ्यास व प्राणायाम धर्मेंद्र कुमार

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बिहार में चुनावी मौसम आते ही नेता जी का शरीर लचीला हो जाता है. नहीं, योगाभ्यास से नहीं बल्कि वोट पाने की साधना से. हर पांच साल में एक बार नेता जी पूरे जतन से ‘वोट-योग’ की तपस्या करते हैं, जिसमें वे जनता को लुभाने के लिए ऐसे-ऐसे आसन करते हैं कि बड़े बड़े योग गुरु भी अचंभित जाएं. इसमें तो कई नेताओं को महारत हासिल है. चुनाव के दौरान नेता जी द्वारा राजनीतिक योगासन के विभिन्न आसन के माध्यम से जनता को उनकी बेहतर राजनीतिक स्वास्थ्य का जानकारी प्रदान करते हैं. इन राजनीति आसन से किसे कितना फायदा पहुंचा है यह विमर्श का विषय हो सकता है लेकिन नेता जी हर पांच वर्षों पर यह करते जरुर हैं.  वादाासन सबसे पहले नेता जी के वादासन की बात करें तो इस आसन में जनता के सामने वादों की माला जपते हैं कि जीतने के साथ ही “हर खेत तक पानी पहुंचेगा,” “हर हाथ को काम मिलेगा,” “हर सड़क पर विकास दौड़ेगा.” इस आसन में नेता जी की गर्दन ऊपर, आंखें चमकदार, और ज़ुबान इतनी लचीली कि कल के वादे आज के बयान से मेल न खाएं तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता.  पलटासन पलटासन नेता जी का पसंदीदा आसन है. इसमें वे अपने कपड़ों की ...

लोकआस्था के महापर्व छठ के आसरे लोकतंत्र का महापर्व को साधने की कवायद धर्मेंद्र कुमार

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लोकआस्था का महापर्व छठ केवल एक पर्व नहीं अपितु त्याग,समर्पण,श्रद्धा, अनुशासन और सामाजिक समरसता का जीवंत दस्तावेज है. यह वह क्षण होता है जब करोड़ों श्रद्धालु प्रकृति, सूर्य और जल के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं. आस्था से जुड़ा दुनिया का एक मात्र ऐसा पर्व है जिसमें सबसे पहले डुबते हुए (अस्ताचलगामी) सूर्य को अर्घ्य देते हैं इस विश्वास के साथ कि कल नई उर्जा, उम्मीद व आकांक्षा के प्रतिकके तौर सबके कल्यार्थ भगवान भास्कर का उदय होगा और दूसरे दिन छठ व्रती उदीयमान अर्थात उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं. यही इस पर्व की विशेषता और महानता है. लेकिन जब केवल सत्ता के लिए इस आस्था का राजनीतिकरण किया जाता है, तो सवाल उठते हैं और उठने भी चाहिए.  यमुना किनारे आस्था बनाम व्यवस्था दिल्ली में छठ पूजा के लिए यमुना नदी के किनारे लाखों श्रद्धालु जुटते हैं. लेकिन इस बार दृश्य कुछ अलग होगा. आप जानते है कि बिहार में चुनाव का माहौल है और देश की राजधानी में बिहारियों की अच्छी खासी आबादी है तो भला प्रधानमंत्री कैसे पीछे रह जाते है. तो सोमवार की शाम को देश के प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी भी लोकआस...

बिहार चुनाव 2025: सवर्ण समाज की राजनीति में वापसी की बेचैनी धर्मेंद्र कुमार

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बिहार की राजनीति में सवर्ण जातियों ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ—का एक दौर था जब वे सत्ता के केंद्र में थे. 90 के दशक से पहले कांग्रेस की रीढ़ यही वर्ग था. फिर सामाजिक न्याय की लहर आई और लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में पिछड़ा वर्ग राजनीति का नया चेहरा बना. हालांकि सामाजिक न्याय के नाम पर लालू में पिछड़ी जातियों का कितना विकास किया यह चर्चा का विषय हो सकता है. लेकिन उन्होंने अगड़ों और पिछड़ों के बीच एक गहरी खाई जरुर बना दी. लालू ने अगड़ी जाति को पिछड़ी जाति के एक दुश्मन के तौर पर पेश करने की पूरजोर कोशिश कि जिसके परिणाम स्वरुप 90 के दशक में कई नरसंहार हुए. जिसमें अगड़ी और पिछड़ी दोनो जातियों के लोगों की जानें गई. लालू प्रसाद ने सामाजिक न्याय के आसरे सत्ता पर काबिज हुए और बिहार का बंटाधार कर दिया. पिछड़ी जातियों को रोजगार नहीं देकर उनके हाथों में लाठी डंडे जरुर थमा दिए. वहीं 2005 में नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली और भाजपा के साथ मिलकर एक नया समीकरण गढ़ा जिसमें सवर्णों ने फिर से निर्णायक भूमिका निभाई. लेकिन आज 2025 के चुनावी परिदृश्य में सवर्ण समाज खुद को राजनीतिक हाशिए प...

नीतीश ही होंगे मुख्यमंत्री इससे किसे है इंकार

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बीजेपी को चाहिए बिहार में रिमोट कंट्रोंल सीएम                         धर्मेंद्र कुमार बिहार की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर है जहां तमाम उठापटक, गठबंधन, बयानबाज़ी और एक दूसरे को पछाड़ने की रणनीति के बावजूद एक नाम सबसे ऊपर है या यूं कहे कि उनके बिना बिहार की राजनीति की चर्चा अधूरी है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. जी हां आपने सही पहचाना मैं नीतीश कुमार की बात कर रहा हूं. 2025 के विधानसभा चुनावों की सरगर्मी के बीच यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? लेकिन जवाब हर बार नीतीश की ओर ही इशारा करता है. मैंने अपने पिछले आलेख में इस बात का जिक्र किया था कि नीतीश के बाद कौन लेकिन जबाव किसी के पास नहीं है. नीतीश ने बिहार को विकास पथ पर बढ़ाया आगे  नीतीश कुमार अब मात्र एक नेता नहीं रहे बल्कि वे बिहार के विकास मॉडल के एक ब्रांड के तौर पर स्थापित हो चुके हैं. संभव है आपको मेरी यह बात ठीक ना लगे, लेकिन जिन लोगों ने बिहार के लालू राज व 90 के दशक को देखा, समझा औऱ भोगा है उनके लिए तो हर हाल में नीतीश कुमार ही ...

जूता की गाथा: जूता बढ़ाए मान, जूता से हो अपमान धर्मेंद्र कुमार

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  जब शब्दों की चोट कम पड़ जाए, तब जूता बोलता है. यह गाथा उन जूतों की है, जो सिर्फ पैरों में नहीं रहे—कभी मंच पर उछले, कभी संसद में गूंजे, और कभी सड़क पर न्याय की पुकार बने. यह कथा है उन जूतों की, जो मौन नहीं रहे. जो सत्ता को चुनौती भी देते हैं, और कभी-कभी खुद सत्ता का प्रतीक बन जाते हैं. जूता एक साधारण वस्तु नहीं, बल्कि एक असाधारण कथा है. यह सिर्फ चमड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि समाज का आईना है. जो जूता बनाता है, वह समाज की सीढ़ी के सबसे नीचे पायदान पर खड़ा होता है, और जो पहनता है, वह ऊँचाई पर बैठा अपनी प्रतिष्ठा नापता है. यही है हमारी सामाजिक विडंबना कि जूता बनाने वाला दलित होता है, जबकि पहनने वाला स्वर्ण जाति का . और बनाने वाले दलित को स्वर्ण समाज के समक्ष उसे पहनने की इजाजत भी नहीं है. जूता बनाने वाले को सदियों से दलित(‘नीच’) कहा गया, लेकिन उसके बनाए जूते ने ‘उच्च’ वर्ग की चाल को संभाला. समाजवाद की किताबों में बराबरी की बातें होती हैं, लेकिन जूता बताता है कि बराबरी सिर्फ भाषणों तक सीमित है. जूता पहनने वाला मंच पर भाषण देता है, और बनाने वाला मंच के नीचे बैठा तालियाँ बजाता...

पूर्वी सिंहभूम कांग्रेस में बगावत के सुर: कार्यकर्ता बोले, नहीं चलेगा मनमाना फैसला

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सिख समुदाय की वापसी की उम्मीद: कांग्रेस ने परविंदर सिंह पर जताया भरोसा जमशेदपुर। ( धर्मेंद्र कुमार ) कांग्रेस पार्टी आलाकमान की ओर 4 अक्टूबर को झारखंड प्रदेश के नव नियुक्त जिला अध्यक्षों की सूची जारी की गई. सूची जारी होने के साथ ही प्रदेश स्तर पर नव नियुक्त अध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर कार्यकर्ताओं ने मोर्चा खोल दिया है. यह विवाद अब थमने का नाम नहीं ले रहा है. पूर्वी सिंहभून,देवघर,हजारीबाग सहित कई अन्य जिलों में कार्यकर्ताओं ने विरोध के स्वर को बुलंद किया है. सोशल मीडिया पर बयान जारी किए जा रहे हैं. वहीं पार्टी आलाकमान को पत्र एवं ईमेल के माध्यम से जिला अध्यक्षों की नियुक्ति में कथित तौर पर हुई गड़बड़ी से संबंधित जानकारी दी गई है. वहीं पर्वेक्षक द्वार भेजी गई सूची को सार्वजनिक करने की मांग की गई है. हालांकि अभी तक पार्टी इस संबंध बहुत गंभीर नहीं दिख रही है. मनोनित ही करना तो रायशुमारी का नाटक क्यों कांग्रेस के प्रदेश स्तरीय एक वरिष्ठ नेता ने नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर बताया कि जिला अध्यक्षों कि नियुक्ति को लेकर पार्टी द्वारा जो प्रक्रिया अपनाई गई ...

क्या बिहार में नया सोशल केमिस्ट्री गढ़ पाएंगे प्रशांत किशोर या वोटकटवा बनकर रह जाएंगे? -- धर्मेंद्र कुमार

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पटना। वर्तमान समय में बिहार की राजनीति की चर्चा हो और प्रशांत किशोर की बात ना हो तो चर्चा अधूरी व बेमानी ही होगी. चुनाव में जन सुराज को कितनी सीटें मिलेंगी यह तो भविष्य के गर्भ में हैं. लेकिन यह भी सच है कि बिहार में प्रशांत किशोर राजनीति चर्चा के केंद्र बिंदू बने हुए हैं. उन्होंने प्रदेश के समग्र विकास के लिए बिहार की पारंपरिक जातिगत राजनीति से अलग एक नए राजनीतिक प्रयोग करने का जो जोखिम उठाया हैं उसकी जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है. यदि बिहार की जनता ने जन सुराज का साथ दिया तो उम्मीद की जा सकती है बिहार आने वाले समय में विकास के एक नए मॉडल के तौर पर उभरेगा. हाल के सी-वोटर सर्वे में तेजस्वी यादव 35% लोकप्रियता के साथ शीर्ष पर हैं, जबकि प्रशांत किशोर 23% के साथ दूसरे स्थान पर उभरते दिख रहे हैं. यह आंकड़ा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि दोनों प्रमुख गठबंधनों एनडीए और महागठबंधन के लिए चिंता का कारण भी बनता जा रहा है. प्रशांत के अनुसार पिछले तीन वर्षों में लगभग 1.5 करोड़ लोग जन सुराज पार्टी से जुड़े है. जिसमें 45 लाख लोगों ने 10रुपया देकर पार्टी की विधिवत सदस्यता ग्रहण की है. जो प...

विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोट का गणित क्या बदलेगा सत्ता का समीकरण? ✍️ ध्रर्मेंद्र कुमार

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पटना। बिहार की राजनीति में मुस्लिम मतदाता लंबे समय से एक निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं. एक बार फिर बिहार की राजनीति मुस्लिम वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूमती दिख रही है. जहां इंडिया गठबंधन मुस्लिम वोट के प्रति आश्वस्त दिख रहा है वहीं एनडीए ने घुसपैठ जैसे मुद्दे के आसरे हिंदु वोट को साधने का प्रयास शुरु कर दिया है. इन सबके बीच ओवैसी ने सीमांचल के 20 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर इंडिया गठबंधन की चिंता बढ़ा दी है. इस बार के चुनाव में सीमांचल से सत्ता में हिस्सेदारी और नेतृत्व की मांग उठने लगी है जो सिर्फ आश्वासन एवं वादे से दबाया नहीं जा सकता. राज्य की लगभग 18% मुस्लिम आबादी, विशेषकर सीमांचल क्षेत्र में, 2025 के विधानसभा चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकती है. कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया और अररिया जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाता 40–70% तक हैं, और इनकी लगभग 20 सीटों पर सीधा प्रभाव है. जिलावार विधानसबा सीटों की बात करें, तो किशनगंज जिला के तीन विधानसभा सीट किशनगंज, बहादुरगंज, ठाकुरगंज सीट, अररिया के नरपतगंज, जोकीहाट, अररिया, सिकटी विधानसभा वहीं पूर्णिया के अमौर, बैसी, कदवा, पूर्णिया...

विजयादशमीः पूतले का दहन पर्याप्त नहीं, अपने अंदर के रावण को मारना होगा धर्मेंद्र कुमार

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विजयादशमी, जिसे दशहरा भी कहा जाता है, भारतीय संस्कृति में बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है. हर वर्ष रावण के विशालकाय पुतले का दहन कर हम प्रतीकात्मक रूप से अधर्म का अंत करने का ढ़ोंग मात्र करते है. रावण के पूतले को जलाकर हम यह मान लेते हैं कि रावण के जलने के साथ ही समाज से बुराईयों का सफाया हो गया लेकिन क्या यह पूरा सच है शायद नहीं. जबकि आप पाएंगे कि समाज में लगातार अत्याचार, हत्या और बलात्कार जैसी घटनाओं में वृद्धि दर्ज की जा रही है. यहां महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जब हम प्रत्येक वर्ष विजयादशमी के दिन रावणों का दहन करते है. फिर यह समाज में रावण रुपी अत्याचारी कहां से पैदा हो रहे है. मतलब साफ है कि केवल बाह्य रावण का दहन ही पर्याप्त नहीं है, समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान केवल उत्सवों व प्रतिकों को जलाने से संभव नहीं. बल्कि हमें अपने अंदर के रावण( लोभ,हवस, नफरत,अंहकार, दुराचार) को समाप्त करना होगा. तभी स्वस्थ और समृद्ध समाज का निर्माण हो पाएगा.   अवगुण ही रावण के अंत का कारण बना शास्त्रों के ज्ञाता रावण को वेदों, आयुर्वेद, संगीत और ज्योतिष का गहन ज्ञान था. शिव तां...