विकसित भारतः नारा या हकीकत? धर्मेंद्र कुमार
विकसित भारतः नारा या हकीकत?
धर्मेंद्र कुमार
भारत को वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र और वैश्विक पटल पर विश्व गुरु बनाने का संकल्प एक महत्वाकांक्षी विजन है। लेकिन कोई भी राष्ट्र केवल भव्य बुनियादी ढांचे, विशाल स्मारकों या राजनीतिक विज्ञापनों से विकसित नहीं बनता। किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक प्रगति इस बात से मापी जाती है कि उसकी व्यवस्था अपनी सबसे कमजोर और मूक आबादी के साथ कैसा व्यवहार करती है। जब देश की चौखट पर 80 करोड़ लाचार नागरिक, मजबूर किसान और करोड़ों बेरोजगार युवा खड़े हों, तब विकास के दावों की गहन समीक्षा अनिवार्य हो जाती है।
भारतीय लोकतंत्र में सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेतृत्व ने कभी 'प्रधान सेवक' तो कभी 'चौकीदार' की भूमिका को आत्मसात किया। यह शब्दावली जनता में एक गहरा विश्वास जगाती है कि देश की संपत्ति, सुरक्षा और आस्था सुरक्षित हाथों में है। लेकिन जब अयोध्या राम मंदिर जैसे देश की अगाध श्रद्धा के केंद्र से जुड़ी व्यवस्थाओं में पारदर्शिता की कमी या विसंगतियों के आरोप सामने आते हैं, तो करोड़ों श्रद्धालुओं की 'आस्था की चोरी' का अहसास गहराने लगता है। एक सजग प्रहरी की भूमिका केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं हो सकती, उसे जन-मानस के भरोसे की रक्षा भी करनी होगी।
राष्ट्र की आत्मा उसके खेतों और कक्षाओं में बसती है, लेकिन हालिया वर्षों में दोनों ही मोर्चों पर गहरे जख्म दिखे हैं। फसलों के उचित मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी जैसी मूलभूत मांग को लेकर साल भर से अधिक समय तक चले आंदोलन में लगभग 700 किसानों ने अपनी शहादत दी। अन्नदाता का यह बलिदान नीतिगत असंवेदनशीलता और संवादहीनता की कड़वी कहानी बयां करता है। दूसरी ओर, देश का भविष्य कहे जाने वाले छात्र जब पेपर लीक जैसी संगठित धांधलियों और जर्जर शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो लोकतंत्र का दायित्व उनकी बातों को सुनना है। लेकिन इसके विपरीत, युवाओं पर लाठियां बरसाना, पेलेट गन और प्रशासनिक दमन का सहारा लेना किसी भी सभ्य समाज को 'विश्व गुरु' की श्रेणी में नहीं खड़ा कर सकता। यह दमन केवल युवाओं के भविष्य का नहीं, बल्कि देश की योग्यता-आधारित व्यवस्था के विश्वास को कुचलता है।
सड़कों का जाल बिछाना और डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार करना विकास का केवल एक पहलू है। वास्तविक 'विकसित भारत' तब तक आकार नहीं ले सकता जब तक देश का किसान कर्ज से मुक्त न हो, युवा परीक्षा केंद्रों पर सुरक्षित महसूस न करे, और जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़ा बुजुर्ग इलाज के अभाव में दम न तोड़े। सत्ता को अपनी 'चौकीदारी' और 'सेवा' के दावों को धरातल पर चरितार्थ करने के लिए आलोचनाओं को स्वीकार करना होगा। दमन की राजनीति को छोड़कर जब तक संवाद, संवेदनशीलता और पारदर्शी शासन को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक 'विश्व गुरु' बनने की राह केवल एक कागजी और चुनावी नारा बनकर रह जाएगी।
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