संदर्भः छात्र आंदोलनअनशन-प्रदर्शन कहां हैं समाधान ? धर्मेंद्र कुमार
संदर्भः छात्र आंदोलन
अनशन-प्रदर्शन कहां हैं समाधान ?
धर्मेंद्र कुमार
आज देश का युवा एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहां उसकी वर्षों की मेहनत और सुनहरे भविष्य के सपने चंद रुपयों में बिक रहे हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार,पंजाब, कर्नाटक, झारखंड से लेकर दिल्ली तक चल रहे छात्र आंदोलन किसी राजनीतिक दल से प्रेरित नहीं हैं। यह पूरी तरह 'स्वयं स्फूर्त' हैं, जो व्यवस्था की नाकामी से उपजे आक्रोश को प्रकट करता है। सवाल बहुत गंभीर है कि क्या सरकारें छात्रों की वास्तविक समस्याओं को समझने में सक्षम हैं, या फिर हर बार की तरह केवल 'आईवॉश' और लीपापोती करके मामले को टालने का प्रयास किया जा रहा है?
छात्रों का देशव्यापी आक्रोश
छात्रों का यह आंदोलन किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने एक विकराल राष्ट्रीय संकट का रूप ले लिया है। झारखंड की राजधानी रांची में जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) परीक्षाओं में हुई धांधली और पेपर लीक को लेकर छात्र आमरण अनशन पर हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आयोग के अध्यक्ष को इस्तीफा तक देना पड़ा। वहीं उत्तर प्रदेश के प्रयागराज और लखनऊ में प्रतियोगी छात्र हुंकार मंच के बैनर तले लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। लेखपाल भर्ती, यूपी एसआई और यूपीपीएससी की परीक्षाओं में पारदर्शिता के अभाव को लेकर छात्र सड़कों पर हैं। बिहार में संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा के पेपर लीक मामले ने फिर शिक्षा माफियाओं के गठजोड़ को उजागर किया है, जिससे होनहार छात्र आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर हैं। वहीं दिल्ली का जंतर-मंतर NEET-UG जैसी राष्ट्रीय परीक्षाओं की अनियमितताओं के विरोध का केंद्र बना हुआ है। जबकि पंजाब और कर्नाटक में भी छात्र अपने विभिन्न मांगों को लेकर आंदोलनरत हैं।
समाधान या सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी?
सरकारों का रवैया हमेशा की तरह एक तय ढर्रे पर चलता दिखाई देता है। जब भी कोई पेपर लीक होता है या परीक्षाओं में गड़बड़ी की बात सामने आती है। तो शासन की तरफ से परीक्षा रद्द करने, जांच समिति या सीआईडी गठित करने और कुछ बिचौलियों को जेल भेजने जैसी रस्मी कार्रवाई कर पीठ थपथपा ली जाती है। लेकिन कोई भी सरकार समस्या के मूल कारणों को समाप्त करने के बजाय तात्कालिक कारणों के समाधान पर ध्यान केंद्रीत करती हैं। इससे समस्या जस की तस बनी रहती है। इधर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसे "राष्ट्रीय समस्या" कहा है। यह सच हो सकता है, लेकिन यह सरकारों को जवाबदेही से मुक्त नहीं करता। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट किया है कि केवल तकनीकी बदलावों से पेपर लीक माफिया का नेटवर्क ध्वस्त नहीं होगा। इसके लिए प्रशासनिक दृढ़ता और राजनीतिक इच्छाशक्ति होनी चाहिए।
लीपापोती की नीति
जब छात्र शांतिपूर्ण ढंग से आवाज बुलंद करते हैं, तो सरकारों का पहला रवैया संवाद के बजाय पुलिसिया दमन और लाठीचार्ज का होता है। प्रदर्शनकारियों पर फर्जी मुकदमे लाद दिए जाते हैं। यह रवैया साफ दर्शाता है कि सरकारें समस्या के मूल—'शिक्षा माफिया' और 'लचर तंत्र' पर प्रहार करने के बजाय केवल उस धुआं को दबाना चाहती हैं जो उनकी विफलता से उठ रहा है। हर परीक्षा के रद्द होने से छात्र का एक साल और पूरे परिवार की उम्मीदें दम तोड़ देती हैं। छात्र अब पारदर्शी परीक्षा कैलेंडर और सख्त केंद्रीय कानून की मांग कर रहे हैं।
सरकारों को यह समझना होगा कि देश की युवा आबादी निराशा के गर्त में डूब रही है। रोजगार के सीमित अवसर और दूषित भर्ती प्रक्रियाएं देश की आंतरिक स्थिरता के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। अब समय आ गया है कि सरकारें 'आईवॉश' की राजनीति छोड़ छात्रों के साथ मेज पर बैठें और परीक्षा प्रणाली का आमूलचूल पुनर्गठन करें। यदि अब भी केवल राजनीतिक नफा-नुकसान देखकर लीपापोती की गई, तो युवाओं का यह स्वतःस्फूर्त आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन की एक ऐसी आंधी में बदल सकता है जिसे संभालना किसी भी सरकार के लिए नामुमकिन होगा।
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