Thursday, April 30, 2026

किसके माथे सजेगा बंगाल का ताज ?--धर्मेंद्र कुमार


लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा और सत्ता की जंग

पश्चिम बंगाल में बुधवार 29 अप्रेल को 2026 के विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण का मतदान शांतिपूर्ण संपन्न हो गया। दूसरे चरण में भी लगभग 93 प्रतिशत मतदान हुआ। यह जहां लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत हैं। वहीं लगभग 27 लाख मतदाता जो वोट देने से वंचित रह गए, यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काला अध्याय के तौर पर याद रखा जाएगा। यह कहीं ना कहीं भारतीय संविधान प्रदत्त भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकारों के हनन का मामला है। बड़ा सवाल यह है कि न्यायालय ने भी इस विषय को गंभीरता से नहीं लिया, सिवाय एक दो टिप्पणी करने के। यह लोकतंत्र के लिए खतरे का संकेत भी हैं। बंगाल का चुनाव सिर्फ 294 सीटों की जंग नहीं है। ये लड़ाई बंगाल की अस्मिता, सियासी दिशा, संघीय ढांचे और जनता के मूड की असली परीक्षा है। मुख्य रुप से बंगाल में टीएमसी और भाजपा के बीच सीधी टक्कर है। लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन और ISF जैसे दल भी समीकरण बदल सकते हैं।

कौन से मुद्दे रहे हावी ?

बंगाल के पूरे चुनाव में कोई एक मुद्दा ऐसा नहीं रहा जिससे किसी एक पक्ष में लहर चली हो। भाजपा ने प्रारंभ से घुसपैठिए, हिंदुत्व और ममता की सिंडिकेट एवं भ्रष्टाचार के मुद्दे पर फोकस किया। वहीं ममता ने केंद्र सरकार की ईडी, सीबीआई, चुनाव आयोग और संघीय ढ़ाचे पर हमले के साथ ही इसको बंगाल की अस्मिता से जुड़ा मुद्दा बनाने का प्रयास किया। इस चुनाव में एक बात सबसे महत्वपूर्ण रही कि लोग मुखर होकर किसी के भी पक्ष में बोलते नहीं दिखे। यह बात सही है कि शुरुआत से भाजपा ने एक नैरेटीव गढ़ने का प्रयास किया कि बंगाल के लोग ममता सरकार की सिंडिकेट से परेशान है, लोग बदलाव चाहते है और बंगाल में लोगों की पहली पसंद भाजपा है। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। वहीं ममता ने लगातार केंद्रीय एजेंसियों व चुनाव आयोग के खिलाफ जिस प्रकार के प्रदर्शन किया वह अपने समर्थकों व वोटरों को यह विश्वास दिलाने में कामयाब रही कि केंद्र की मोदी सरकार बंगाल की अस्मिता के साथ खिलवाड़ कर रही है। ममता ने चुनाव आयोग द्वारा एसआईआर के तहत काटे गए 90 लाख मतदाताओं के नाम को मुद्दा बनाने की पुरजोर कोशिश की इसका कितना लाभ ममता बनर्जी को मिलेगा यह देखना लाजमी होगा। 


भाजपा की चुनावी रणनीति

भाजपा ने बंगाल चुनाव को जीतने के लिए सभी प्रकार के दांव चले। तमाम केंद्रीय एजेंसियों के माध्यम से चारो तरफ से ममता को घेरने का प्रयास किया गया। जिसमें सबसे महत्वपूर्ण एसआईआर के माध्यम से टीएमसी के गढ़ माने जाने वाले क्षेत्र में भारी संख्या में मतदाताओं का नाम कटना। शांतिपूर्ण व निष्पक्ष चुनाव के नाम पर टीएमसी के सिंडिकेट के प्रमुख कार्यकर्ताओं के खिलाफ कानुनी कार्रवाई। इस संबंध में कोलकात्ता हाई कोर्ट ने टिप्पणी भी की। भारी संख्या में पदाधिकारियों का तबादला भी चर्चा का विषय बना था। इस बार भाजपा बंगाल को जीतने के लिए कोई कसर छोड़ना नहीं चाहती थी, उसने ममता को हर तरफ से घेरने का हरसंभव प्रयास किया। इसका कितना लाभ भाजपा को मिलेगा यह तो 4 मई को ही पता चलेगा।

टीएमसी की रणनीति  

यह चुनाव टीएमसी एवं ममता बनर्जी के लिए 15 साल की सत्ता की अग्निपरीक्षा थी। ममता ने प्रारंभ से ही इस चुनाव को भीतरी बनाम बाहरी बनाने का प्रयास किया। वहीं बंगाल में केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग के साथ संघीय ढ़ाचे पर हमला को आगे रख कर स्वंय को एक विकटीम के तौर पर प्रस्तुत करने का प्रयास किया। इसका कितना लाभ ममता को मिलेगा यह तो फिलहाल ईवीएम में कैद है जो 4 मई को ही पता चलेगा।

किसका पक्ष कितना मजबूत

जहां तक ममता की बात करें तो लक्ष्मीर भंडार, कन्याश्री, रूपश्री जैसी योजनाओं के कारण ग्रामीण महिलाओं में ममता की मजबूत पकड़ है। वहीं बंगाल में 30 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय का वोट टीएमसी का एक मजबूत आधार है। हालांकि एसआईआर के तहत भारी संख्या में उनके वोट कटे हैं। शहरी क्षेत्र के मिडिल क्लास के वोटरों में टीएमसी की गहरी पैठ है। वहीं भाजपा की बात करें तो हिंदू ध्रुवीकरण का लाभ मिलेगा, मतुआ, राजबंशी SC वोटों में सेंधमारी सफल रही तो भाजपा को अच्छी बढ़त मिल सकती है। मतदाताओं के नाम कटने का सीधा फायदा भाजपा को ही मिलेगा। वहीं लेफ्ट-कांग्रेस और आईएसएफ का जितना वोट शेयरिंग बढ़ेगा उसका लाभ भी भाजपा को ही मिलेगा। भाजपा की कुछ सीटों का लाभ होता तो दिख रहा है लेकिन कितना यह कहना थोड़ा कठिन है।

क्या बोल रहे हैं एक्सपर्ट ?

 राजनीतिक जानकारों के अनुसार भ्रष्टाचार और एंटी-इंकम्बेंसी ममता पर भारी पड़ता दिख रहा है जिसके कारण इस बार जनता का रुझान भाजपा की ओर है। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि भाजपा की सीटें बढ़ने की उम्मीद तो है, लेकिन सरकार टीएमसी की ही बनेगी। एक्जिट पोल में ज्यादातर सर्वे भाजपा के पक्ष में हैं, वहीं कुछ टीएमसी के पक्ष में भी हैं। जहां भाजपा के लिए बंगाल का चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न है वहीं टीएमसी के लिए यह चुनाव उसके अस्तित्व से जुड़ा हुआ हैं। बंगाल के चुनाव में मतदान के बढ़ते प्रतिशत का सही सही आकलन कर पाना आसान नहीं कि यह किस ट्रेंड बढ़े हैं। 4 मई को पता चलेगा कि बंगाल की अस्मिता पर जनता ने किसे ताज पहनाया ?

Tuesday, April 28, 2026

पलटीमार गद्दार बनाम राजनीतिक अवसरवाद या लोकतांत्रिक मूल्यों का अवसान। धर्मेंद्र कुमार



भारतीय लोकतंत्र में दल बदल कोई नई घटना नहीं है। पिछले दिनों आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल हुए। इससे पहले कांग्रेस और अन्य दलों के कई सांसद व विधायक भी अपनी पार्टी छोड़कर दूसरे दलों में जा चुके हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या होता है कि राजनेता वर्षों तक जिस पार्टी में रहे, जहां उन्हे मान-सम्मान मिला, उसी पार्टी को अचानक "गलत" बताकर नेता रातों-रात दूसरी पार्टी में चले जाते हैं। तब उनके लिए नैतिकता, नीति और सिद्धांत कोई मायने नहीं रखता, ना ही उन्हें जनता की कोई फिक्र होती है, जिसने उनपर भरोसा किया और उन्हें सदन तक पहुंचाया। यह केवल राजनीतिक अवसरवाद नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ खिलवाड़ है। वर्तमान परिपेक्ष्य में नेताओं के लिए उनका निजी हित और स्वार्थ ज्यादा महत्वपूर्ण है।

किसने कब मारी पल्टी
1985 में दल बदल रोकने के लिए दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) लागू हुई। लेकिन नेताओं का दल बदलने का सिलसिला कभी रुका नहीं। हाल की कुछ घटनाओं की अगर बात करें तो 2019 में कर्नाटक  17 विधायकों ने सामूहिक इस्तीफा देकर कांग्रेस-जेडीएस की सरकार गिरा दिया और भाजपा में शामिल हो गए। 2020 में मध्यप्रदेश में  ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस के 22 विधायक भाजपा में शामिल हुए। दिल्ली (2026) – आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल हुए।

 क्या कहता है दल बदल कानून
 
दल बदल कानून कहता है कि यदि कोई सांसद/विधायक अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त हो सकती है। लेकिन यदि दल का एक बड़ा समूह (कम से कम दो-तिहाई) टूटकर दूसरी पार्टी में जाता है, तो यह "विलय" कहलाता है और सदस्यता बच जाती है। इस कानून में कई त्रुटियां हैं जिसके आसरे नेता अपनी सदस्यता बचाने में सफल रहते है। नेता अक्सर पद से इस्तीफा नहीं देते, बल्कि संवैधानिक पद पर बने रहते हुए ही दल बदल करते हैं। विधायक औऱ सांसद की सदस्यता का समाप्त करने का अधिकार सदन के अध्यक्ष पास होता है। यही कारण है कि दल बदल के मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं।
नेताओं का अपने हित साधने के लिए दूसरे दलों में शामिल होना केवल राजनीतिक अवसरवाद नहीं, बल्कि यह जनता के साथ विश्वासघात है। जनता जिस विचारधारा और पार्टी के नाम पर वोट देती है, वही नेता अपनी हीत व सुख सुविधा के लिए उस जनादेश को बदल देता है। भारतीय राजनीति में दल बदल की प्रवृत्ति लोकतंत्र की विश्वसनीयता को कमजोर करती है। यदि किसी नेता को सचमुच लगता है कि वह गलत पार्टी में था, तो उसे सबसे पहले अपने पद से इस्तीफा देकर जनता के सामने जाना चाहिए। लेकिन ऐसा शायद ही कभी होता है। लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए ज़रूरी है कि दल बदल कानून को और कठोर बनाया जाए, ताकि जनादेश का सम्मान हो और राजनीति में "गद्दारी" की जगह "निष्ठा" को महत्व मिले।

 

Wednesday, April 22, 2026

झालमुड़ी पर चुनावी बवाल – लोकतंत्र का नया स्वाद! धर्मेंद्र कुमार



झाड़ग्राम की झालमुड़ी ने ऐसा तूफ़ान खड़ा कर दिया कि बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और महँगाई जैसे मुद्दे अब कहीं पीछे छुट गए हैं। अब चुनावी बहस का नया एजेंडा बन गया है—झालमुड़ी का स्वाद और उसकी प्लेटिंग! महंगाई के इस दौर में भी कम कीमत में झालमुड़ी आपके मुंह का स्वाद बदल सकता है। झालमुड़ी में मुख्य रुप से मुड़ी और मसालों का इसतेमाल किया जाता है। मुड़ी जिसे बिहार में भुंजा या चबेनी वहीं दिल्ली, गुजरात में मुरमुरा भी कहा जाता है। आज के दौर में झालमुड़ी राज्यों के दायरे से उपर उठ कर सर्वव्यापी हो गया है। जहां मुड़ी बंगाल के कल्चर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वहीं ओड़िशा में मुड़ी के साथ घुघनी या छोले और पकोड़े नाश्ते के तौर पर लोग खाना पसंद करते है।

ममता दीदी की मिर्ची

प्रधानमंत्री मोदी के चटकारे लेते ही ममता दीदी का पारा चढ़ गया। उन्होंने इसे “स्क्रिप्टेड ड्रामा” करार दिया और आरोप लगाया कि कैमरा पहले से फिट था, झालमुड़ी भी SPG के जवान से बनवाई गई। यानी अब बंगाल की राजनीति में झालमुड़ी भी सुरक्षा कवच में लिपटी हुई है।

भाजपा का नमकीन जवाब

भाजपा समर्थक इसे जनता से जुड़ाव बताते हैं। लेकिन विपक्ष का तंज़ है—“जनता से जुड़ना है तो झालमुड़ी खाकर नहीं, महँगाई घटाकर और बेरोज़गारी मिटाकर जुड़िए।” जनता सोच रही है कि अगर रोज़गार मिल जाए तो झालमुड़ी भी रोज़ खाई जा सकती है।
हेलिकॉप्टर बनाम झालमुड़ी
तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि पीएम के झालमुड़ी ब्रेक की वजह से हेमंत सोरेन का हेलिकॉप्टर हवा में ही मंडराता रह गया। अब लोकतंत्र का सवाल यह है—हेलिकॉप्टर की लैंडिंग ज़्यादा अहम है या झालमुड़ी की प्लेटिंग?

मुफ़्त झालमुड़ी योजना?

झालमुड़ी अब राष्ट्रीय मुद्दा बन चुकी है। जनता उम्मीद लगाए बैठी है कि अगली बार चुनावी घोषणापत्र में “मुफ़्त झालमुड़ी योजना” भी शामिल होगी। अगर यही रफ़्तार रही तो संसद के अगले सत्र में “मुफ़्त झालमुड़ी योजना” लागू करने को लेकर सत्ता एवं विपक्ष बहस करते हुए दिखेंगे। जहां सत्ता पक्ष कहेगा “झालमुड़ी सबको मिलेगी”, वहीं विपक्ष अपने अंदाज में तंज़ कसेगा “ झालमुड़ी में नमक कम है, मिर्च ज़्यादा है”।

क्या भाजपा बंगाल में करेगी किला फतह या करना होगा थोड़ा और इंतजार — धर्मेंद्र कुमार



आईविजन। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के कारण प्रदेश का राजनीतिक तापमान काफी बढ़ गया है। पिछले 15 वर्षों से बंगाल की राजनीति तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के इर्द-गिर्द घूमती रही है। 2021 विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने 215 सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया था, जबकि भाजपा ने 77 सीटों पर कब्ज़ा जमाया और स्वयं को बंगाल में एक मज़बूत विपक्ष के रूप में स्थापित किया।
2021 के विधानसभा चुनाव में वोट प्रतिशत की बात करें तो टीएमसी को 48.02 प्रतिशत, भाजपा को 38.15 प्रतिशत और कांग्रेस को 2.94 प्रतिशत वोट मिले थे। लेकिन कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई। वोट प्रतिशत के दृष्टिकोण से देखें तो टीएमसी और भाजपा में लगभग 10 प्रतिशत का अंतर था। यही अंतर भाजपा को सत्ता से दूर रखने में सबसे बड़ी बाधा बना।

वर्तमान परिदृश्य (2026)

बंगाल की सत्ता पर टीएमसी की मजबूत पकड़ है और विशेषकर मुस्लिम वोट बैंक उसका स्थायी आधार बना हुआ है। ममता सरकार ने स्वास्थ्य और शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया, जिससे आम लोगों को राहत मिली। सरकारी योजनाओं का लाभ हर वर्ग तक पहुँचाने की कोशिश भी की गई। हालांकि रोजगार सृजन के मामले में सरकार कहीं न कहीं असफल रही, बावजूद इसके बंगाल की जनता की पहली पसंद अब भी ममता ही हैं।
दूसरी ओर भाजपा बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और घुसपैठ जैसे मुद्दों को लेकर चुनावी मैदान में उतरी है।

चुनाव आयोग की तैयारी

केंद्रीय चुनाव आयोग 2026 का विधानसभा चुनाव निष्पक्ष कराने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों का बड़े पैमाने पर फेरबदल और अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती से स्पष्ट है कि आयोग इस बार किसी भी प्रकार का जोखिम उठाने के मूड में नहीं है। वहीं समय पर एसआईआर को पूरा कराने के लिए आयोग ने जजों की नियुक्ति भी की है, ताकि उसकी निष्पक्षता पर कोई सवाल न उठ सके।

भाजपा की रणनीति
भाजपा का शीर्ष नेतृत्व जानता है कि बंगाल में सत्ता तक पहुँचने के लिए 2021 के लगभग 10 प्रतिशत वोट अंतर को समाप्त करना होगा। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम मतदाता लगभग 27% हैं और उनका प्रभाव 70–85 विधानसभा सीटों पर निर्णायक माना जाता है।
2021 चुनाव में इन मुस्लिम-बहुल सीटों में से लगभग 85 पर मुकाबला हुआ था, जिनमें से टीएमसी ने 75 सीटें जीती थीं। ऐसे में वोट अंतर को समाप्त किए बिना भाजपा के लिए सत्ता तक पहुँचना कठिन है।
एसआईआर के दौरान 10 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं के नाम काटे गए। चुनाव आयोग के आँकड़ों से स्पष्ट है कि सीमावर्ती जिलों—कूचबिहार, उत्तर दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया और उत्तर व दक्षिण 24 परगना—में सबसे अधिक नाम हटाए गए हैं। कहा जा रहा है कि इनमें से अधिकांश वोटर टीएमसी समर्थक थे। इसका सीधा असर चुनाव पर पड़ेगा और संभावना है कि भाजपा को इसका लाभ मिल सकता है। यदि ऐसा हुआ तो भाजपा बंगाल में सरकार बनाने में सफल हो सकती है।
राजनीति में कुछ भी संभव है। 2026 का विधानसभा चुनाव टीएमसी के लिए अग्नि परीक्षा है, वहीं भाजपा के लिए यह अवसर है कि वह वोट अंतर को कम करके सत्ता तक पहुँचने की कोशिश करे।