छात्र आंदोलन: विरोध से झारखंड बंद तक! धर्मेंद्र कुमार
छात्र आंदोलन: विरोध से झारखंड बंद तक!
धर्मेंद्र कुमार
झारखंड में जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं एवं नियुक्तियों में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ पिछले 17 दिनों से चल रहा छात्रों का आंदोलन आखिरकार राजनीतिक बिसात का हिस्सा बन ही गया है। 10 अगस्त को पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत छात्रों द्वारा किए गए विधानसभा घेराव के दौरान हुई पत्थरबाजी, तोड़फोड़ और उसके बाद प्रशासन द्वारा किए गए लाठीचार्ज व वाटर कैनन के प्रयोग ने इस आंदोलन को एक नया मोड़ दे दिया है। इसी लाठीचार्ज के विरोध में 11 अगस्त मंगलवार को मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा द्वारा राज्यव्यापी 'झारखंड बंद' का आह्वान किया गया है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जो आंदोलन पिछले 15 दिनों से पूरी तरह शांतिपूर्ण ढंग से, लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर चल रहा था, वह अचानक हिंसक और विशुद्ध रूप से राजनीतिक रंग में कैसे रंग गया?
क्या जानबूझकर बिगाड़ा गया माहौल?
विधानसभा घेराव के दौरान उत्पन्न हुई अराजक स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है। सरकार का यह आरोप बेहद विचारणीय है कि जब आंदोलनकारी छात्रों और सरकारी प्रतिनिधियों के बीच दो दौर की वार्ता सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ चुकी थी, तो फिर हिंसा क्यों भड़की? सरकार ने छात्रों की अधिकांश मांगों को जायज ठहराते हुए उन्हें स्वीकार भी कर लिया था। कुछ एक जटिल मांगें जो न्यायालय में लंबित होने के कारण कानूनी पेचीदगियों में फंसी हैं, उन पर भी सरकार ने बीच का रास्ता निकालने का भरोसा दिया था। ऐसे संवेदनशील मोड़ पर अचानक छात्रों के भेष में बैरिकेडिंग तोड़ने वाले और पत्थरबाजी करने वाले वो 'अदृश्य चेहरे' कौन थे? क्या यह कानून-व्यवस्था को चुनौती देकर सरकार को घेरने की कोई जानबूझकर रची गई राजनीतिक साजिश थी?
आंदोलन के 'हाईजैक' होने का खतरा
लोकतंत्र में विपक्ष को सरकार की नीतियों और कमियों के खिलाफ आवाज उठाने का पूरा अधिकार है, लेकिन जब युवाओं के भविष्य से जुड़े एक पवित्र आंदोलन का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए होने लगे, तो नुकसान सिर्फ और सिर्फ छात्रों का होता है। सरकार का यह दावा निराधार नहीं लगता कि विपक्ष इस पूरे संवेदनशील मामले को राजनीतिक रंग देने और आगामी चुनावों के मद्देनजर माहौल गरमाने का प्रयास कर रहा है। छात्रों के मंच से हिंसक तत्वों का सक्रिय होना और उसके तुरंत बाद विपक्षी दलों द्वारा बंद का मोर्चा संभाल लेना, इस बात का संकेत है कि आंदोलन का नियंत्रण वास्तविक परीक्षार्थियों के हाथों से फिसलकर राजनीतिक रणनीतिकारों के पास चला गया है।
संवाद ही एक मात्र विकल्प
यह सच है कि परीक्षाओं में पारदर्शिता और समय पर नियुक्तियां युवाओं का बुनियादी हक हैं, जिसके लिए वे 17 दिनों से सड़कों पर और भूख हड़ताल पर बैठे हैं। लेकिन जब सरकार वार्ता के जरिए समाधान निकालने की तत्परता दिखा रही है, तब छात्रों को भी यह समझना होगा कि हर नीति रातों-रात या अदालती प्रक्रियाओं की अनदेखी करके नहीं बदली जा सकती। अपनी सभी मांगों पर अड़े रहना और बातचीत के बावजूद सड़कों पर टकराव की स्थिति पैदा करना किसी भी रचनात्मक आंदोलन के हित में नहीं है। उग्रता और तोड़फोड़ से न तो नियुक्तियां साफ-सुथरी होंगी और न ही बंद कराने से पेपर लीक की समस्या का स्थायी समाधान निकलेगा। संवाद ही एक मात्र विकल्प है जिससे सभी समस्याओं का समाधान संभव है। सरकार जब छात्रों से वार्ता करने के लिए तैयार है, तो छात्रों की कोशिश होनी चाहिए की वो लगातार सरकार पर वार्ता के लिए दबाव बनाए रखे। ताकि सरकार मजबूरन वार्ता के माध्यम से समाधान निकालने के लिए प्रयास करें।
झारखंड के युवाओं का आक्रोश अपनी जगह पूरी तरह न्यायसंगत है, लेकिन उन्हें अपने इस आंदोलन को राजनीतिक दलों की बैसाखी बनने से बचाना होगा। छात्र संगठनों को आत्ममंथन करना चाहिए कि उनकी शांतिपूर्ण लड़ाई में 'हुड़दंगी तत्व' कैसे शामिल हो गए, जिन्होंने पुलिस को बल प्रयोग का मौका दे दिया। वहीं, सरकार को भी केवल 'विपक्ष की साजिश' का लेबल लगाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ना चाहिए। प्रशासन को वास्तविक छात्रों और राजनीतिक उपद्रवियों के बीच स्पष्ट लकीर खींचनी होगी। यदि सरकार वाकई छात्रों की मांगों के प्रति गंभीर है, तो उसे त्वरित नीतिगत फैसले लेकर इस पूरे विवाद का पटाक्षेप करना चाहिए, ताकि प्रदेश के युवाओं का भविष्य राजनीति की इस नूराकुश्ती की भेंट न चढ़े।
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