Tuesday, September 16, 2025

गाली पर गंभीर हो सरकार: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सामाजिक मर्यादा

जमशेदपुर। भारतीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक मूलभूत अधिकार है, लेकिन जब यह आजादी दूसरों की स्वतंत्रता के हनन, गाली-गलौज और अपमानजनक भाषा में बदल जाती है, तब यह न केवल सामाजिक मर्यादाओं को चुनौती देती है, बल्कि राजनीतिक विमर्श को भी दूषित करती है. पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रमों को देखे तो विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा जिस प्रकार सार्वजनिक मंचों से अपशब्दों का प्रयोग किया गया. यह किसी भी तरह से सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है. और उन नेताओं के खिलाफ सरकार की प्रतिक्रिया ने इस विषय को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है.
 गाली का बदलता स्वरूप
गाली कोई नई चीज़ नहीं है. यह हमारे संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रही है. यह प्राचीन काल से भावनात्मक अभिव्यक्ति का हिस्सा होने के साथ ही हास्य परिहास की प्रतिक रही है. इसका जिक्र महाभारत जैसे ग्रंथों में भी कटु शब्दों के रुप किए गए प्रयोग के तौर पर इसका उल्लेख मिलता है. दरअसल हमारे यहां गाली को “गारी” कहा जाता है या यूं कहे तो गारी का अपभ्रंश शब्द है गाली. दोनों बस इतना अंतर है कि गारी गाई जाती है जबकि गाली दी जाती है. हमारे यहां शादी विवाह में बिना गारी के विवाह समारोह सफल ही नहीं होता. तिलक या विवाह समारोह के लिए महिलाओं द्वारा कई दिनों पहले से गारी गाने का अभ्यास किया जाता था. और बेहतर गारी गाने पर वर एवं वधू पक्ष के लोगों द्वारा उन्हें पुरस्कत भी किया जाता था. लेकिन आज के वाट्सअप, सोशल मीडिया के दौर में जब लीविंग रिलेशनसीप काफी तेजी से फल फूल रहा है. ऐसे में हम अपने संस्कृति से विमुख होते जा रहे है. भाग दौड़ की जिंदगी में आज किसी के पास इतना समय नहीं कि वह महीनो तक चलने वाले शादी विवाह समारोह का आनंद ले सके. आज सबकुछ जल्दी चाहिए इसलिए सबकुछ आर्टीफिशियल हो गया है. और शायद इसलिए ही आज “गारी” गाली के स्वरुप में बदल गया है. लोग अपने अंदर के गुस्सा, गुब्बार व नाराजगी को शाब्दिक हिंसा के माध्यम से व्यक्त करते हैं.

हिंदी साहित्य में गाली का किया गया है प्रयोग

हिंदी साहित्य जगत के प्रसिद्ध उपन्यासकार श्रीलाल शुक्ल ने अपने उपन्यास “राग दरबारी” में गाली का बखूबी इस्तेमान किया है. जो कथानक औऱ प्रभावशाली बनाती है. उपन्यास में किरदार द्वारा प्रयोग किए जाने वाले गाली पाठकों को खलती नहीं है बल्कि आनंदित करती है. वहीं उपन्यासकार काशीनाथ सिंह द्वारा रचित “काशी का अस्सी” उपन्यास में गंवई भाषा में गालियों का भरपूर प्रयोग किया गया है. और वह पाठकों को असहज नहीं करता है. वहीं आज के दौर में सिनेमा, सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफार्म पर चलने वाले वेब सीरीज और राजनीति ने इसे एक नया आयाम दे दिया है. अब गालियां सिर्फ निजी गुस्से की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन गई हैं.

 राजनीति में गाली का प्रवेश
पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक मंचों पर गालियों का प्रयोग आम होता जा रहा है. जिस प्रकार चुनावी सभाओं में किसी विशेष वर्ग व समुदाय को निशाना बनाकर अपशब्दों के प्रयोग का प्रचलन बढ़ा है. इससे भारतीय राजनीति के स्तर में काफी गिरावट आई है. जिस देश के नेतृत्वकर्ता ही सार्वजनिक मंच से अपशब्दों का प्रयोग करने लगे तो उनके नेताओं व कार्यकर्ताओं की बात ही क्या करनी है. जब लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद के पटल पर सत्ता पक्ष के नेताओं द्वारा खुले तौर पर गालियां दी जाती है और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती है, तो उनका हौसला बढ़ना लाजमी है. राजनीतिक नेताओं का स्तर इतना गिर गया है कि बीजेपी के एक प्रवक्ता ने टीवी के लाइव डिबेट में कांग्रेस एक नेता के मां के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया और मजे की बात यह है कि पार्टी द्वारा उनके खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई. ऐसे में इन नेताओं का मन बढ़ना स्वाभाविक है. वहीं हाल ही में बिहार में एक राजनीतिक सभा के मंच से एक सिरफिरे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिवंगत मां के लिए कथित अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया. जिसके खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई भी की गई. लेकिन इसको लेकर एक सियासी तूफान खड़ा करने का प्रयास बीजेपी द्वारा किया गया. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस घटना की कड़ी निंदा की और इसे भारतीय परंपरा पर आघात बताया. लेकिन यहां बड़ा सबाल है कि जब उनके नेताओं द्वारा दूसरों की मां बहनों के संबंध में अपशब्दों का प्रयोग किया जाता है तब क्या भारतीय परंपरा पर आघात नहीं होता है, जिसका जवाब उनके पास नहीं. औऱ कमोवेश यहा बात दूसरे दलों पर भी लागू होता है.

 सामाजिक प्रभाव और नैतिकता
गाली सिर्फ शब्द नहीं होती, यह समाज की मानसिकता का प्रतिबिंब होती है. जब नेता सार्वजनिक मंचों से अपशब्दों का प्रयोग करते हैं, तो यह युवाओं और आम जनता के लिए एक गलत उदाहरण बनता है. इससे न केवल संवाद का स्तर गिरता है, बल्कि लोकतंत्र की गरिमा भी प्रभावित होती है. इसलिए माननीयों को शब्दों के मर्यादा का ध्यान रखना जरुरी है.
गाली पर गंभीर होना ना सिर्फ सरकार की जिम्मेवारी बल्कि पूर समाज की जिम्मेवारी है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि संवाद मर्यादित, तथ्यपरक और संवेदनशील हो. सरकार का सख्त रुख इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसे जनजागरण और नैतिक शिक्षा के साथ भी जोड़ना होगा ताकि एक स्वस्थ लोकतांत्रिक वातावरण तैयार किया जा सके.

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