Sunday, September 28, 2025

स्वदेशी का स्वांग: मेक इन इंडिया बनाम मेड इन इंडिया ✍️ धर्मेंद्र कुमार


देशभक्ति अब एक ब्रांड है, जिसे पहनकर नेता भाषण देते हैं, और जनता सेल्फी लेती है. स्वदेशी के मंच से जब “मेक इन इंडिया” का शेर दहाड़ता है, तो उसके मेड इन चाइना वाले दांतों की चमक वहुत कुछ कहानी बंया करती है. “मेड इन इंडिया” का टैग तो चमकता है, पर उत्पाद की आत्मा विदेशी होती है. और इस तमाशे के निर्देशक वही हैं जो मंच पर स्वदेशी का राग अलापते हुए खुद विदेशी घड़ी, विदेशी चश्मा का उपयोग करते है और देशवासियों को स्वदेशी अपनाओ की सीख देते है. मजे की बात यह है कि स्वदेशी का प्रचार भी विदेशी ऐप से ट्वीट करके किया जाता हैं.

विदेशी ऐप से स्वदेशी का प्रचार
प्रधानमंत्री मंच से “वोकल फॉर लोकल” का नारा देते हैं, लेकिन उनकी घड़ी स्विट्ज़रलैंड की होती है, चश्मा इटली का और मोबाइल शायद अमेरिका का. यह वैसा ही है जैसे कोई योगगुरु हेल्थ ड्रिंक बेचते हुए खुद कोल्ड ड्रिंक पीते पकड़ा जाए. जब नेता विदेशी उत्पादों का उपयोग करते हुए स्वदेशी अपनाने की बात करते हैं, तो यह व्यंग्य नहीं, विडंबना का महाकाव्य बन जाता है. 
स्वदेशी की परिभाषा ही गलत
वर्तमान की सरकार विदेशी उत्पाद को स्वदेशी ब्राडिग व पैकेजिंग करके स्वदेशी के नाम पर प्रचारित एवं प्रसारित करने का प्रयास किया जा रहा है. इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है कि नेस्ले की मैगी तो स्पष्ट रूप से विदेशी ब्रांड है, लेकिन पतंजलि की मैगी को स्वदेशी बताने की साजिश चल रही है. अब आप तय करें कि पतंजलि की मैगी भी उसी विदेशी फॉर्मूले पर आधारित है. तो क्या सिर्फ पैकेजिंग बदलने मात्र से वह स्वदेशी हो जाएगा. दरअसल देश में स्वदेशी के नाम पर बड़ें पैमाने पर यही खेल चल रहा है. लोग खादी के नाम पर Gucci पहन कर स्वदेशी आंदोलन को बढ़ावा देने की बात कर रहें है. यहां बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ ब्रांड का नाम बदल देने से मात्र से उत्पाद स्वदेशी हो जाता है? अगर विदेशी तकनीक, विदेशी स्वाद और विदेशी पैकेजिंग का उपयोग हो रहा है, तो वह उत्पाद स्वदेशी नहीं, सिर्फ “स्वदेशी दिखने वाला” है. 
 भ्रम का बाजार
“मेक इन इंडिया” का मतलब भारत में उत्पादन की प्रक्रिया शुरू करना वहीं “मेड इन इंडिया” का मतलब भारत में बना हुआ उत्पाद. लेकिन हकीकत में दोनों का मतलब अक्सर एक ही होता है, भारत में असेंबल किया गया उत्पाद, बाकी सब बाहर से आया. मेक इन इंडिया का शेर अब इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर बन चुका है. जो हर ब्रांड को प्रमोट करता है, बस उसे टैग मिल जाए. स्वदेशी आंदोलन अब एक मार्केटिंग स्लोगन मात्र बनकर रह गया है, जहां खादी की बात करते हुए लोग Gucci पहनते हैं. “वोकल फॉर लोकल” का नारा इतना जोर से बोला गया कि लोकल उत्पाद डर के मारे चुप हो गए. 

 तथ्य क्या कहते हैं 
मेक इन इंडिया व मेड इन इंडिया और स्टार्टअप्स की हकिकत बयां करते सरकारी आकड़ों के अनुसार जुलाई 2020 से नवंबर 2024 के बीच कुल 61,469 एमएसएमई यूनिट्स ने अपना संचालन बंद किया है अर्थात यूनिट बंद हो गए. पिछले दो वर्षों में  28,638 स्टार्टअप्स  बंद हुए  जिसमें 2023 में 15,921 और 2024 में 12,717 बंद हुए. प्रमुख रुप से एग्रीटेक, फिनटेक, एडटेक, हेल्थटेक सेक्टर स्टार्टअप्स बंद हुए. भारत का विनिर्माण क्षेत्र का अभी भी जीडीपी में सिर्फ 16% योगदान है. वहीं चीन ने अपनी “मेड इन चाइना 2025” नीति से इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर पैनल और एआई में वैश्विक स्तर पर वर्चस्व स्थापित कर लिया. जबकि भारत अब भी विदेशी तकनीक और निवेश पर निर्भर है, और प्रचार में आत्मनिर्भरता का जयघोष होता है. 
स्वदेशी का मतलब सिर्फ “यहां बना” नहीं, बल्कि “यहां सोचा, बनाया और अपनाया” होना चाहिए. स्वदेशी का सीधा मतलब है कि उसमें यहां की संस्कृति की झलक के साथ यहां की मिट्टी की खुशबू हों.  जब तक नीति, नीयत और नेतृत्व तीनों स्वदेशी न हों, तब तक यह अभियान सिर्फ एक ब्रांडिंग ड्रामा रहेगा. और देशवासी तब तक भ्रमित रहेंगे जब तक उन्हें यह बताया जाता रहेगा कि पतंजलि की मैगी खाने से राष्ट्रवाद बढ़ता है. इस संबंध में आप क्या सोचते है जरुर बताएं.

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