Tuesday, September 16, 2025

बिहार में नीतीश का विकल्प कौन? ✍️ धर्मेन्द्र कुमार

पटना। बिहार की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जिन्होंने बीते दो दशकों में राज्य की राजनीति को एक नई दिशा दी, अब एक ऐसे दौर में हैं जहां जनता बदलाव की ओर देख रही है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या वर्तमान में बिहार की राजनीति में किसी भी दल में नीतीश कुमार का कोई ठोस और विश्वसनीय विकल्प मौजूद है? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब शायद किसी के पास नहीं. वैसे तो कई नेता स्वंय को नीतीश के विकल्प के तौर पर प्रस्तुत करने का हरसंभव प्रयास कर रहे हैं, लेकिन वो जिस पृष्ठभूमि से आते है एवं उनपर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और उनकी काबिलियत उन्हें इसकी इजाजत देती नहीं दिख रहीं है.
 निर्विवाद नीतीश कुमार ने रखी विकास की आधारशिला
1990 से 2004 तक फैले अराजकता व अपराध से बिहार को मुक्ति दिलाने में नीतीश कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका रही. उन्होंने 2005 में बिहार की सत्ता संभालते ही कई मोर्चों पर एक साथ काम करना शुरु किया. जिसके परिणाम भी जल्द ही दिखे. अपराध के पर्याय माने जाने वाले शहाबुद्दीन, आनंद मोहन, धुमल सिंह, सुनिल तिवारी जैसे अपराधी जेल के अंदर पहुंचा दिए गए. नीतीश कुमार की रणनीति रंग लाई और अपराधियों ने या बिहार छोड़ दिया या फिर अपराध जगत से अपना नाता तोड़ लिया. नीतीश कुमार की पहली पारी में दुरुस्त शासन व्यवस्था से जहां प्रदेश में शांति बहाल हुई लोगों ने राहत की सांस ली वहीं बिहार छोड़ चुके व्यापारियों ने फिर से बिहार की ओर रुख किया. इतना ही नहीं लालू प्रसाद के शासन काल में जब लोग सड़कों में गढ्ढे या गढ्ढों में सड़क विषय पर माथापेची करते रहते थे. नीतीश में आधारभूत संरचना को अपनी पहली प्राथमिकता में ऱख कर गांव, कस्बों एवं पंचायतों को मुख्य सड़क से जोड़ने का काम किया. बिहार के बाढ़ जिले में एनटीपीसी के आने के बाद प्रदेश बिजली हर गांव में पहुंच गई और लगभग 22 से 23 घंटे बिजली रहती भी है. इससे सामाजिक स्तर पर लोगों के जीवनस्तर में काफी सुधार हुआ. 2000 में झारखंड के बिहार से अलग होने के कारण प्रदेश में कल कारखाने नहीं होने के बावजूद नीतीश ने बालू से तेल निकाल कर बिहार में विकास को गति प्रदान करने का बेहतर उदाहरण प्रस्तुत किया है. पटना मेट्रो रेल परियोजना उनकी महत्वपूर्ण उपलब्धियों में एक है. कुमार ने स्थायित्व और बुनियादी ढांचे के विकास को प्राथमिकता दी जिसके कारण बिहार में सड़कों का जाल बिछ गया. गंगा, सोन एवं अन्य नदियों पर कई पुलों का निर्माण हुआ. ये और बात है कि चूहों की मेहरबानी से कई पूल समय से पूर्व काल के गाल में समा गए, बावजूद इसके लोगों को प्रतिदिन लगने वाले सड़क जाम से मूक्ति मिल गई है. अपने 20 वर्षों के कार्यकाल में कुमार ने अधारभूत संरचना के साथ ही शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में भी बेहतर कार्य किया. लेकिन रोजगार सृजन करने में चुक गए. प्रदेश में रोजगार के अवसर नहीं होने के कारण युवाओ के पलायन रोक पाने में असमर्थ दिखे. आज भी बिहार श्रम उत्पादक राज्य बन कर रह गया है. वहीं 20 वर्षों के कुमार के सुशासन व्यवस्था के बावजूद बिहार आज सबसे पिछड़े राज्यों में शुमार है.

सुशासन बाबू से पलटूराम तक की सफर

 नीतीश कुमार ने 2005 में लालू प्रसाद की जातिगत समीकरण में सेंधमारी कर मुस्लिम एवं दलित वोट बैंक के साथ ही अगड़ी जाति को भी अपने पाले करने में सफल रहे और भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई. लेकिन 2015 में फिर वो राजद एवं कांग्रेस के साथ चुनाव लड़े जिसमें इस गठबंधन ने 178 सीट पर जीत दर्ज की. जिसमें राजद को 80, जदयू को 71 और कांग्रेस को 27 सीट पर जीत मिली थी. लेकिन नीतिश कुमार भला कहां बैठने वाले थे तो उन्होंने 2017 में पाला बदलते हुए भाजपा के खेमे में चले गए. 2020 में नीतीश एनडीए का हिस्सा रहे और मुख्यमंत्री बने. 2022 में उन्होंने एक बार फिर पलटी मारी और राजद के साथ सरकार बनाई. फिर जनवरी 2024 में पाला बदल कर भाजपा के साथ बिहार में सरकार बनाई. नीतीश कुमार के बार-बार पाला बदलने से उनके प्रति लोगों का अविश्वास बढ़ा है. वहीं हाल के वर्षों में प्रशासनिक निष्क्रियता और युवाओं के पलायन प्रदेश में बढ़ते अपराध जैसे मुद्दों से उनकी लोकप्रियता में कमी आई है.
 
नीतीश का विकल्प कौन

बिहार को जंगलराज से बाहर निकालने वाले नीतीश कुमार के शासन काल में अगर अपराधी बेलगाम और बेखौफ हो दिन दहाड़े घटना को अंजाम दे रहे हैं और प्रशासन मूकदर्शक बनी हुई है जबकि गृहमंत्रालय उनके पास है. ऐसे में यह सवाल वाजिब हो जाता है कि क्या नीतीश कुमार अब रिटारयमेंट के फेज में हैं. भाजपा यह भली भांति जानती है कि बिना नीतीश के वह राज्य में सरकार नहीं बना सकती है इसलिए नीतीश को आगे रखना बीजेपी की मजबूरी है और जरुरत भी. क्यों कि भाजपा बिहार में एक मजबूत दल होने बावजूद उनके पास मुख्यमंत्री पद के लिए कोई दमदार चेहरा नहीं है. चाहे वो सम्राट चौधरी हों, विजय सिन्हा हों, नंदकिशोर यादव हों या मंगल पांडे हों इन सभी नेताओं पर कहीं ना कहीं भ्रष्टाचार के आरोप हैं, जिससे जनता इन्हें मुख्यमंत्री के तौर स्वीकार नहीं कर पा रही है. वहीं सीमांचल जैसे क्षेत्र भाजपा की कमजोर कड़ी है, और दलित-ओबीसी वर्गों में असंतोष की सुगबुगाहट भी पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं.
वहीं अगर राजद से तेजस्वी यादव की बात करें तो वे युवा हैं, सामाजिक न्याय की राजनीति के वारिस हैं, और उनके पास एक मजबूत जनाधार है. जो हाल के वोटर अधिकार यात्रा में देखने को भी मिला, लेकिन प्रशासनिक अनुभव की कमी और गठबंधन की अस्थिरता उनके सामने बड़ी चुनौती है. हालांकि बेरोजगारी और शिक्षा जैसे मुद्दों पर उनकी सक्रियता युवाओं को आकर्षित कर रही है. लेकिन 90 दशक का जंगलराज अब भी उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है. हालांकि युवाओं के पहले पंसद के तौर पर तेजस्वी देखे भी जा रहे है. हाल के दिनों में विभिन्न एजेंसियों द्वारा की गई सर्वे में तेजस्वी लोगों के पहले पसंद बताए जा रहे हैं.
वहीं वर्षों तक बिहार पर राज करने वाली कांग्रेस पार्टी की बात करें तो कांग्रेस पार्टी बिहार में 90 दशक से लगातार कमजोर होती चली गई. संगठनात्मक ढांचे की कमी, नेतृत्व का अभाव और स्थानीय स्तर पर प्रभावहीन नेतृत्व ने पार्टी को विकल्प के रूप में पीछे धकेल दिया है. हालांकि कुछ सीटों पर कांग्रेस की पकड़ बनी हुई है, लेकिन राज्यव्यापी प्रभाव सीमित है. पार्टी के पास प्रदेश स्तर का कोई प्रभावशाली नेतृत्व नहीं है जिसके आसरे पार्टी राज्य में अपनी पकड़ को मजबूत कर सके. लेकिन हाल के दिनों में राहुल गांधी में बिहार पर फोकस किया है. संगठन स्तर पर भी बदलाव किए गए हैं. राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं में उर्जा का संचार करने का प्रयास भी किया है. लेकिन पार्टी के पास प्रदेश स्तर को कोई नेता नहीं होने के कारण कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी स्पष्ट तौर पर दिख रही है. कन्हैया कुमार और पप्पू यादव लगातार अपनी उपस्थिती दर्ज कराने का प्रयास कर रहे है लेकिन घटक दलों द्वारा उनके रास्ते में रोड़ अटकाने के प्रयास भी जारी है.

बिहार को बदलने एवं अस्मिता को बचाने की बात करने वाले प्रशांत किशोर ने विगत दो वर्षों से लगातार प्रदेश में जनसुराज यात्रा के माध्यम से जनता से सीधा संवाद स्थापित किया है. वे खुद को “किंगमेकर” नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं. बिहार में लगातार यात्राएं की गांव गांव जाकर लोगों को समझाने का प्रयास किया. उनकी बैठकों और सभाओं में भी लोगों उपस्थिति अच्छी खासी रही. वो बिहार के 243 सीट पर चुनाव लड़ने का दावा कर रहे हैं. प्रशांत किशोर ने करगहर सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है. उनका दावा है कि या तो उनकी पार्टी बहुमत में आएगी या 10 सीटों से भी कम पर सिमट जाएगी. उनका यह आत्मविश्वास उन्हें एक संभावित तीसरे मोर्चे के रूप में स्थापित करता है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि बिहार की जातिगत राजनीति में प्रशांत किशोर क्या सेंधमारी कर एक नई सोशल केमेस्ट्री बना पाएंगे.
बिहार का युवा मतदाता बदलाव चाहता है. ग्रामीण क्षेत्रों में स्थायित्व की मांग है, जबकि शहरी मतदाता पारदर्शिता और विकास को प्राथमिकता देता है. सीमांचल जैसे क्षेत्रों में मुस्लिम वोट बैंक, जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे चुनावी परिणामों को प्रभावित करेंगे. नीतीश कुमार ने बिहार में जो विकास की एक लंबी लकीर खींची है उसे कौन आगे बढ़ाएगा यह बड़ा सवाल है. यहां नीतीश कुमार का विकल्प खोजना केवल एक व्यक्ति की तलाश नहीं है, बल्कि एक नई राजनीतिक संस्कृति की मांग है. भाजपा की रणनीति, राजद की जनाधार, कांग्रेस की जड़ता और जनसुराज की चुनौती—इन सबके बीच बिहार की जनता अब ऐसे नेतृत्व की अपेक्षा कर रही है जो न केवल वादे करे, बल्कि उन्हें निभाने की ईमानदार कोशिश भी करे और नीतीश के विकास की विरासत को आगे बढ़ाए.
2025 का विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक पुनर्रचना का अवसर हो सकता है. सवाल अब यह है—क्या बिहार तैयार है एक नए नेतृत्व के लिए, या फिर वही पुराना चेहरा एक बार फिर लौटेगा.

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