पटना। बिहार में राजनीति को जातिगत समीकरण से अलग करके नहीं देखा जा सकता है. बल्कि यह कहा जा सकता है कि बिहार की राजनीति में जाति हमेशा से एक निर्णायक कारक रही है. लेकिन अब यह सिर्फ "सवर्ण बनाम पिछड़ा" की लड़ाई नहीं रही—बल्कि "पिछड़ा बनाम अति पिछड़ा" की विमर्श ने एक नई राजनीतिक धुरी को जन्म दिया है. पिछले दिनों राहुल गांधी द्वारा अति पिछड़ा न्याय संकल्प पत्र के घोषणा करने के बाद एक बार फिर पिछड़ा बनाम अति पिछड़ा का मुद्दा चर्चा का विषय बन गया है. लालू यादव ने समाजिक न्याय आंदोलन के माध्यम से पिछड़ों को उनका हक दिलाने का प्रयास किया था. जिसके कारण पिछड़ा वर्ग पूरी तरह से लालू यादव के साथ जुड़ गया था. लेकिन नीतीश ने बिहार में सबसे पहले अति पिछड़ो की बात की उनको मुख्य धारा में लाने के प्रयास किए जिसके कारण अति पिछड़ा वर्ग नीतीश कुनार के साथ जुड़ गया. जो नीतीश कुमार के लिए एक मजबूत वोट बैंक के रुप में देखा जाता है. राहुल गांधी ने न्याय संकल्प पत्र के माध्यम से उसमें सेंधमारी करने का प्रयास किया है. इसका कितना लाभ कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को होगा यह देखना दिलचस्प होगा. क्योंकि बिहार में अति पिछड़ों की आबादी लगभग 25 प्रतिशत है.
जातिगत समीकरण: आंकड़ों की जुबानी
बिहार की जातिगत समीकरण की बात करें तो आपको बता दें कि बिहार की कुल आबादी का लगभग 30–35% पिछड़ा वर्ग वहीं अति पिछड़ा वर्ग (EBC) 20–25% दलित और महादलित लगभग 15% सवर्ण: 10–12% मुस्लिम लगभग 18% है. इनमें अति पिछड़ा वर्ग की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें शामिल जातियां विखंडित हैं, जैसे नाई, धोबी, कहार, कुर्मी, मल्लाह, आदि. यही विखंडन इन्हें राजनीतिक रूप से संगठित करने में चुनौती बनता रहा है.
नीतीश कुमार का वोट बैंक और राहुल गांधी की चुनौती
नीतीश कुमार ने अपने लंबे राजनीतिक करियर में अति पिछड़ा वर्ग को एकजुट कर उन्हें जदयू का स्थायी वोट बैंक बनाया. उनके शासन में अति पिछड़ों को आरक्षण, प्रतिनिधित्व और योजनाओं में प्राथमिकता मिली. लेकिन अब राहुल गांधी ने "ईबीसी न्याय संकल्प पत्र" के जरिए इस वर्ग को सीधे साधने की कोशिश की है. राहुल गांधी ने संकल्प पत्र के माध्यम से अति पिछड़ों की जातिवार जनगणना की मांग, सरकारी नौकरियों में विशेष आरक्षण की मांग के साथ ही पंचायत स्तर पर प्रतिनिधित्व की गारंटी की बात करते नजर आए. राहुल का न्याय संकल्प पत्र जहां नीतीश के पारंपरिक आधार को चुनौती देता है वहीं इंडिया गठबंधन के भीतरखाने में कांग्रेस की भूमिका को पुनर्परिभाषित करने का संकेत भी है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पिछड़ा वर्ग, विशेषकर यादव, कुर्मी और अल्पसंख्यक राजद और जदयू के साथ पारंपरिक रूप से जुड़ा रहा है. वहीं अति पिछड़ा वर्ग, जो पहले नीतीश के साथ था, अब कांग्रेस के नए वादों से आकर्षित हो सकता है. यदि इंडिया गठबंधन इस वर्ग को एकजुट कर पाने में सफल रहा, तो यह एनडीए के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है. राहुल गांधी की पहल यदि जमीनी स्तर पर असर करती है, तो अति पिछड़ा वर्ग के भीतर कांग्रेस की स्वीकार्यता बढ़ सकती है. ऐसे में इंडिया गठबंधन को 10–15% अतिरिक्त वोट शेयर मिल सकता है. लेकिन यह सब इस बात पर निर्भर करेगा कि संकल्प पत्र के वादों को कितनी गंभीरता से प्रचारित और लागू किया जाता है. कहीं यह सिर्फ चुनावी वादे बन कर न रह जाए.
बिहार की राजनीति अब सिर्फ जातियों की गिनती नहीं, बल्कि उनके भीतर की पहचान और प्रतिनिधित्व की लड़ाई बन चुकी है. राहुल गांधी का संकल्प पत्र इस लड़ाई को नया मोड़ दे सकता है, शर्ते यही है कि इंडिया गठबंधन इसे सिर्फ दस्तावेज़ नहीं, बल्कि जमीनी आंदोलन में बदले. यह भी देखना होगा कि राहुल गांधी के न्याय संकल्प पत्र को अति पिछड़ा वर्ग के लोग कितना गंभीरता से लेते है.
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