लद्दाख की शांत वादियों में इन दिनों लोकतंत्र की गूंज और सत्ता की प्रतिध्वनि टकरा रही है. पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी ने न केवल लद्दाख आंदोलन को एक निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा किया है कि क्या लोकतंत्र में असहमति अब असुविधा बन गई है? 26 सितंबर 2025 को वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हिरासत में लिया गया. सरकार का आरोप है कि उन्होंने युवाओं को “अरब स्प्रिंग” और “नेपाल के Gen Z आंदोलन” जैसे उदाहरण देकर हिंसा के लिए प्रेरित किया. इससे पहले, लद्दाख में छठी अनुसूची और पूर्ण राज्य की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन में चार लोगों की मृत्यु और 90 से अधिक लोग घायल हुए. साथ ही, उनकी संस्था SECMOL का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया गया, विदेशी फंडिंग में गड़बड़ी के आरोप लगाए गए. यह तो स्पष्ट है कि किसी भी परिस्थिती में हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता है. इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए कहीं वांगचुक के आंदोलन को बदनाम करने के लिए तो हिंसा का सहारा लिया गया क्योंकि यह आंदोलन तो काफी दिनों से शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा था.
वांगचुक का पक्ष
वांगचुक ने स्पष्ट किया कि उनका आंदोलन गांधीवादी रहा है. भूख हड़ताल, पदयात्रा और शांतिपूर्ण सत्याग्रह के माध्यम से उन्होंने अपनी बातों को सरकार तक पहुंचाने का लगातार प्रयास किया हैं. उन्होंने हिंसा से स्पष्ट दूरी बनाई और कहा कि कुछ अज्ञात तत्वों ने आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश की. उनका यह भी कहना है कि सरकार ने उन्हें चुनावी समीकरणों के चलते निशाना बनाया है.
लोकतंत्र की आत्मा असहमति में ही बसती है. यदि शांतिपूर्ण विरोध को देशद्रोह या राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे के रूप में देखा जाए, तो यह लोकतंत्र की मूल भावना पर प्रश्नचिह्न है. NSA जैसे कानूनों का प्रयोग केवल असहमति को दबाने के लिए किया जाना सत्ता की असहिष्णुता का संकेत है. बिना ठोस सबूतों के गांधीवादी तरीकों से आंदोलन करने वाले व्यक्ति को हिंसा का दोषी ठहराना लोकतांत्रिक मूल्यों की अवहेलना है.
लद्दाख के लोगों के लिए किए गए वांगचुक के कार्य
वांगचुक ने लद्दाख के लोगों के लिए जो कार्य किए उससे वहां के लोगों के जीवन में काफी बदलाव आया. लद्दाख में सर्दियों में पानी की भरमार होती है, लेकिन गर्मियों में जब खेती की जरूरत होती है, तब पानी की भारी कमी होती थी. वांगचुक ने कृत्रिम ग्लेशियर बनाए जिन्हें आइस स्तूप कहा जाता है. ये शंक्वाकार बर्फ के स्तूप सर्दियों में नदी के पानी को जमा कर लेते हैं और गर्मियों में धीरे-धीरे पिघलते हैं, जिससे खेतों को सिंचाई के लिए पानी मिलता है. एक आइस स्तूप लगभग 100 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई में सहायक होता है। इससे किसानों की आजीविका में सुधार हुआ और जल संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया गया. आइस स्तूप मॉडल को स्विट्ज़रलैंड, अफगानिस्तान और नेपाल जैसे देशों ने अपनाया है.
वांगचुक ने लद्दाख की हिमालयी पारिस्थितिकी को बचाने के लिए कई अभियान चलाए. उन्होंने सौर ऊर्जा, स्थानीय निर्माण सामग्री, और क्लाइमेट-फ्रेंडली वास्तुकला को बढ़ावा दिया. उनकी परियोजनाएँ कम कार्बन उत्सर्जन और स्थानीय संसाधनों पर आधारित हैं.
सत्ता की रणनीति
लद्दाख में आगामी चुनावों से पहले वांगचुक की लोकप्रियता सत्ता के लिए चुनौती बन गई थी. उन्होंने सरकार के पुराने वादों जैसे छठी अनुसूची और पूर्ण राज्य का दर्जा को याद दिलाया और सरकार को जवाबदेह ठहराया. इंटरनेट बंदी, सुरक्षा बलों की तैनाती और मीडिया नियंत्रण—ये सभी संकेत हैं कि सरकार आंदोलन को चुनावी नुकसान से बचाने की रणनीति के तहत देख रही है.
सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की परीक्षा है. यह तय करना होगा कि क्या सत्ता असहमति को सहन कर सकती है, या उसे कुचलने का प्रयास करेगी. आपको याद होगा किसान आंदोलन को भी बदनाम करने का हरसंभव प्रयास सरकार द्वारा किया गया था. यहां तक की किसानों को आतंकवाद से जोड़ा गया था. आखिरकार सरकार को किसानों के आगे झुकना पड़ा. यदि सरकार कि गलत नीतियों का विरोध करना और सरकार द्वारा किए गए वादों को याद दिलाना देशद्रोह तो सरकार को एक बार अपने निर्णयों पर विचार करने की आवश्यकता है. क्योंकि सशक्त लोकतंत्र का आधार ही गलत नीतियों का विरोध व असहमति एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है. यदि शांतिपूर्ण आंदोलन को हिंसा से जोड़कर दमन किया जाएगा, तो यह न केवल संविधान के खिलाफ है, बल्कि जनता के विश्वास को भी चोट पहुँचाता है. जयहिंद
No comments:
Post a Comment