"भस्मासुर बनता भ्रष्टाचार, भगवान भरोसे देश की जनता  धर्मेंद्र कुमार




जमशेदपुर। जिस देश का अन्नदाता (किसान) एमएसपी के लिए वर्षों से संघर्षरत हो, उन्हें खाद के लिए जद्दोजहद करनी पड़े और खाद के बदले उसे लाठी डंडे का प्रसाद मिल रहा हो. वहीं रोजगार के लिए देश का युवाओं को सरकारी बर्बरता का सामना करना पड़े. सरकारी कर्मचारी हजारों की संख्या में अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत हो और उनकी मांगो पर विचार करने के बजाए उनको नौकरी से ही बर्खास्त कर दिया जाए. देश में फैले अव्यवस्था का अंदाजा लगाया जा सकता है. वहीं दूसरी ओर देश का एक वर्ग जिनके कंधों पर सरकारी योजनाओं को धरातल पर उतारने की महत्वपूर्ण जिम्मेवारी है. वो इन सबसे बेखबर व्यवस्था की कार्यालयों बैठ सरकारी योजनाओं की लूट व्यस्त और मस्त हैं. इस कथित अमृतकाल में जहां गरीब और अमीर की बीच की खाई और चौड़ी व गहरी हो जाए. जिस देश में ईमानदारी बेमानी लगने लगे और बेईमानी का काम पूरी ईमानदारी से होने लगे तो आप यकिन मानिए की उस देश को विश्व गुरु बनने से कोई रोक नहीं सकता है. भ्रष्टाचार की बैशाखियों पर टिकी हुई सरकार जब राजनीतिक मंचों से भ्रष्टाचार को मिटाने की बात करें तो यह समझ लेना चाहिए कि सरकार की मंशा भ्रष्टाचार को समाप्त करने के बजाए वैसे घोटालेबाज व भ्रष्ट राजनेताओं को अपने पाले में करने की है जो अब तक विपक्षी खेमे की शोभा बढ़ा रहे है. भ्रष्ट नेताओं की फेहरिस्त लंबी है जो कमोवेश दोनो तरफ है. कई वरिष्ठ व्यूरोक्रेटस् भी भ्रष्टाचार के आरोप में जेल बंद है. विडंबना यह है कि देश की जनता को जिन शीर्ष अदालतों पर भरोसा था. पिछले कुछ घटनाओं ने न्यायपालिका और न्यायाधीशों की भी पोल खोल कर रख दी है.

सिस्टम हुआ भ्रष्ट

देश का पूरा सिस्टम ही भ्रष्टाचार के आगोश में है. हर छोटे से बड़ा काम बिना चढ़ावे के समय पर पूरा नहीं होता है. घूसखोरी जब शुकराना से शुरु होकर नजराना और फिर जबराना तक पहुंचता है तब वह अधिकारियों के अधिकार एवं हक में तब्दील हो कर सिस्टम का हिस्सा बन जाता है. इसके माध्यम से होने वाली कमाई में सबका हिस्सा तय होता है. कोई चाह कर भी इस सिस्टम की खिलाफत नहीं कर सकता. सिस्टम से खिलाफत करने वालों को हाशिए पर धकेल दिया जाता है. वहीं कहीं कोई अधिकारी भ्रष्टाचार के आरोप में पकड़ा भी जाता है तो पूरा सिस्टम उसकों बचाने के लिए एक साथ खड़ा हो जाता है. चिंता तब ज्यादा होती है जब युवा अधिकारी अपने करियर को दाव पर लगा कर भ्रष्टाचार में आकंठ तक डूब जाते है. हाल की कुछ घटनाएं विचलित करती है जो देश के लिए भी चिंता का विषय है. हाल की दो घटनाएं—असम प्रशासनिक सेवा की अधिकारी नुपूर बोरा और ओडिशा प्रशासनिक सेवा के टॉपर अश्विनी कुमार पांडा की गिरफ्तारी हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या युवा अधिकारी भी अब अपने करियर को दांव पर लगाकर भ्रष्टाचार के दलदल में उतरने लगे हैं?
पहली घटना नुपूर बोरा से संबंधित है, जो असम प्रशासनिक सेवा 2019 बैच की टॉपर है. अपनी सेवा की मात्र छह वर्षों में अवैध कमाई से अकूत संपत्ति अर्जित कर ली है. भ्रष्टाचार के आरोप में असम पुलिस द्वारा जब नुपूर को गिरफ्तार किया गया तो उसकी बैग से 97 लाख रुपये नकद बरामद किए गए. जिसमें 100,200 और 500 के नोटों के बंडल मिले. वहीं जांच में सामने आया कि महज छह वर्षों में उन्होंने अपनी आय से 416 प्रतिशत अधिक संपत्ति अर्जित की है. यह आंकड़ा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि यह दर्शाता है कि किस स्तर तक भ्रष्टाचार ने जड़ें जमा ली हैं.
वहीं दूसरी घटना ओडिशा प्रशासनिक सेवा के 2019 बैच के टॉपर अश्विनी कुमार पांडा को 15,000 रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया. एक अधिकारी जिसने कड़ी मेहनत से सर्वोच्च रैंक हासिल की, वह इतनी मामूली राशि के लिए अपनी नैतिकता बेच बैठा. उनके घर से 4.73 लाख रुपये नकद, सोने के आभूषण और संदिग्ध दस्तावेज भी बरामद हुए.
नुपूर बोरा और अश्विनी पांडा की घटनाएं केवल व्यक्तिगत पतन नहीं हैं, बल्कि यह उस सामाजिक और संस्थागत विफलता की प्रतीक हैं जो भ्रष्टाचार को पनपने देती है. यदि आज हम नहीं चेते, तो कल यह भस्मासुर रूपी भ्रष्टाचार पूरे तंत्र को निगल जाएगा.

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