Wednesday, September 17, 2025

अर्थव्यवस्था का बंटाधार, क्या रेवड़ी बांट कर नीतीश करेंगे चुनावी वैतरणी पार ? ✍️ धर्मेंद्र कुमार

पटना। भारतीय राजनीति में चुनावी मौसम आते ही लोकलुभावन वादों और मुफ्त योजनाओं की बौछार शुरू हो जाती है. इसे आम बोलचाल में "रेवड़ी संस्कृति" कहा जाता है. बिहार में आसन्न विधानसभा के मद्देनजर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की रणनीति भी अब इसी राह पर चलती दिख रही है. सवाल यह है कि क्या रेवड़ी बांटकर वे चुनावी वैतरणी पार कर पाएंगे, या यह नीति राज्य की अर्थव्यवस्था को और गर्त में ले जाएगी?

 रेवड़ी संस्कृति: लोकतंत्र या मुफ्तखोरी?

रेवड़ी संस्कृति का मूल उद्देश्य जनता को राहत देना बताया जाता है, लेकिन इसके पीछे छिपी चुनावी गणित को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट में इस पर बहस चल रही है कि मुफ्त योजनाएं लोकतांत्रिक मूल्यों और आर्थिक स्थिरता के खिलाफ हैं. राजनीतिक पार्टियां लगातार पांच वर्षों तक जनता की आकांक्षों को पूरा करने के बजाए चुनाव के ठीक पहले मुफ्त की रेवड़ियां वांट कर चुनाव जीतने के विकल्प को ज्यादा बेहतर समझती है. यही वजह है कि हाल के दिनों में रेवड़ी संस्कृति बेहद फल फूल रही है. वहीं जनता का मानना है कि चुनाव के पहले सरकार द्वारा रेवड़ी के तौर पर जो दिया जाता है उसे लेने में कोई बूराई नहीं क्योंकि चुनाव के जीतने के बाद नेता गायव हो जाते है और सरकार अपने किए गए वादों को भुल जाती है. पिछले दिनों दिल्ली चुनाव के ठीक पहले बीजेपी द्वारा किए गए वादों का हश्र सबके सामने है कमोवेश वहीं हाल झारखंड में मईंया सम्मान योजना की है. अब बिहार में भी यह संस्कृति गहराने लगी है. विपक्षी दलों द्वारा मुफ्त बिजली, बेरोजगारी भत्ता और अन्य योजनाओं के वादे किए जा रहे हैं. नीतीश कुमार, जो पहले इस राजनीति से दूरी बनाए रखते थे, अब दबाव में आकर इसी दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं.
बिहार की आर्थिक स्थिति
बिहार का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) वर्ष 2024-25 में ₹7.5 लाख करोड़ रहा, जो देश के औसत से काफी नीचे है. वहीं बिहार में बेरोजगारी दर 2025 में 12.5% रही, जो राष्ट्रीय औसत (7.8%) से अधिक है. आपको बता दें कि बिहार में प्रति व्यक्ति औद्योगिक निवेश ₹3,000 से भी कम है, जबकि महाराष्ट्र में यह ₹15,000 से अधिक है. वहीं राज्य का राजकोषीय घाटा 2024-25 में ₹25,000 करोड़ के पार पहुंच गया. राज्य पर लगभग 3.5 लाख करोड़ का कर्ज है. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि बिहार की अर्थव्यवस्था पहले से ही दबाव में है, और मुफ्त योजनाओं से यह और जर्जर हो सकती है.
 नीतीश कुमार की चुनावी रणनीति
2025 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए नीतीश कुमार को इंडिया गठबंधन से कड़ी चुनौती मिल रही है. तेजस्वी ने पहले ही बेरोजगारी भत्ता, मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी योजनाओं का वादा किया है. ऐसे में नीतीश कुमार के पास दो ही विकल्प बचते हैं. पहला अपनी पारंपरिक "विकास पुरुष" की छवि को बनाए रखें और दूसरा कि रेवड़ी बांटने की होड़ में शामिल होकर चुनावी लाभ लेने की कोशिश करें. नीतिश कुमार के लिए दूसरे विकल्प को चुनना मजबुरी भी है और जरुरी भी है.
हालांकि, उनके सात निश्चय योजना ने कुछ क्षेत्रों में सकारात्मक प्रभाव डाला है, लेकिन दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता के लिए यह पर्याप्त नहीं है. रेवड़ी संस्कृति अल्पकालिक राजनीतिक लाभ तो दे सकती है, लेकिन यह दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लिए बाधक है. नीतीश कुमार जैसे अनुभवी नेता से अपेक्षा है कि वे जनता को मुफ्त योजनाओं पर निर्भर करने के बजाय उन्हें सशक्त बनाने की दिशा में काम करें. चुनाव जीतने के लिए सिर्फ वादे नहीं, बल्कि ठोस नीति और आर्थिक दूरदृष्टि की आवश्यकता है.

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