Wednesday, September 17, 2025

पूर्वी सिंहभूम कांग्रेस की सियासी संग्राम : कौन होगा अगला कप्तान ? धर्मेंद्र कुमार

जमशेदपुर। पूर्वी सिंहभूम जिला कांग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर चल रही सियासी हलचल अब एक नए मोड़ पर है. जहां पहले गुटबाजी, अनुभव और संगठनात्मक संतुलन की बात हो रही थी, वहीं अब चर्चा इस बात की है कि पार्टी नेतृत्व किस दिशा में निर्णय लेगा. क्या पार्टी का शीर्ष नेतृत्व को जिला अध्यक्ष के तौर पर संगठन को मजबूत करने वाला एक समर्पित कार्यकर्ता की तलाश है फिर जिला अध्यक्ष के तौर पर उन्हें विधायक या सांसद मेटेरियल चाहिए. जिला अध्यक्ष का चुनाव इसी विमर्श पर टिका है . जिला अध्यक्ष की जिम्मेवारी संगठन को पूर्वी सिंहभूम के छह विधानसभा सहित 11 प्रखंड और कुल 231 पंचायतों तक मजबूती करना अर्थात संगठन को ग्रास रूट तक पहुंचाने के साथ ही आम अवाम की समस्याओं के समाधान के लिए हर स्तर पर आंदोलन कर लोगों को न्याय दिलाने की है.

संगठनकर्ता एवं विधायक मेटेरियल दोनो अलग है
कांग्रेस कार्यकर्ताओं का स्पष्ट कहना है कि यदि एक व्यक्ति जिला अध्यक्ष भी बनेगा और वहीं विधायक के लिए दावेदारी करेगा तो संगठन से जुड़ं अन्य कार्यकर्ता क्या केवल दरी बिछाने और झंडा ढ़ोने के लिए है. नाम नहीं छापने की शर्त पर एक पार्टी के वरिष्ठ नेता ने कहा कि कांग्रेस आज हाशिए पर है तो इसके लिए पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जिम्मेदार है. उन्होंने बताया कि विधानसभा चुनाव के दौरान आनंद बिहारी दुबे ने जिला अध्यक्ष रहते हुए टिकट के लिए जिस प्रकार दबाव बनाया था और टिकट नहीं मिलने पर पार्टी विरोधी कार्य किया. जिसका परिणाम यह हुआ कि जमशेदपुर पश्चिम की सीटिंग सीट भी पार्टी हार गई और पार्टी को बड़ा नुकसान हुआ. उसके बावजूद उनके खिलाफ पार्टी द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई. यहीं काम यदि बीजेपी में होता उनके खिलाफ कार्रवाई हो गई होती. यह तो पार्टी के शीर्ष नेताओं को तय करना है कि उन्हें कैसा जिला अध्यक्ष चाहिए.
जिला प्रभारी की भूमिका संदिग्ध
कार्यकर्ताओं की माने तो प्रदेश द्वारा बनाए जिला प्रभारी बलजीत सिंह बेदी और सुंदरी तिर्की की भूमिका निष्पक्ष नहीं है. उनका झुकाव स्पष्ट तौर पर वर्तमान जिला अध्यक्ष की ओर दिख रहा है. यह जिला अध्यक्ष का चुनाव तो केवल आईवॉश है जो स्थिति बनती दिख रही है, उससे साफ तौर पर कहा जा सकता है कि आनंद बिहारी दुबे ही फिर अध्यक्ष बनाए जाएंगे. जिला प्रभारियों की राय है कि जिला अध्यक्ष के लिए वर्तमान में दुबे से बेहतर कोई उम्मीदवार नहीं है. उनकी जिला अध्यक्ष की खोज दुबे से शुरु होकर दुबे पर समाप्त हो जाती है. इसके पीछे क्या राज है यह तो वे ही बखूबी बता सकते है. लेकिन जब तक नेतृत्व परिवर्तन नहीं होगा तो कैसे पता चलेगा कि कौन बेहतर है. लोगों का मानना है कि सभी के लिए अवसर के द्वार खुले होने चाहिए ताकि विकास की संभावना बनी रहे. यह मान लेना की इससे बेहतर कोई हो ही नहीं सकता यह तमाम विकास की संभावनाओं पर पूर्ण विराम लगा देता है जो पार्टी के लिए शुभ संकेत नहीं. 

70 ने की दावेदारी कौन है मजबूत दावेदार
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि प्रदेश की राजधानी रांची के जिला अध्यक्ष के लिए केवल 12 लोगों ने दावेदारी की है जबकि पूर्वी सिंहभूम जिला अध्यक्ष के लिए लगभग 70 लोगों ने दावेदारी की है. जो एक अलग की कहानी कहता है. ज्यादा दावेदारी के पीछे ही गुढ़ रहस्य छिपा हुआ है. बस यूं समझ लीजिए की समझदार के लिए इशारा ही काफी है. दावेदारों की लंबी फेहरिस्त है. सभी लोगों के नामों की जिक्र यहां कर पाना संभव नहीं है. पहली किस्त में कई नामों की चर्चा मैंने की थी यहां भी कुछ मजबूत दावेदारों की चर्चा करुंगा. उसके पीछे के कारणों पर भी बात होगी. पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को इस दृष्टिकोण से भी सोचना चाहिए कि पूर्वी सिंहभूम जिला में बहुतायत में कल कारखाने होने के कारण यहां श्रमिकों की तादाद ज्यादा है. ऐसे में मजदूर नेताओं को भी पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका देने पर विचार करना चाहिए ताकि संगठित एवं असंगठित क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों को पार्टी से जोड़ा जा सके. ऐसे में विजय यादव जिनका संबंध टिमकेन वर्कर्स यूनियन से है और वे लगातार मजदूरों की आवाज उठाते रहे है, मजदूरों की हक के लड़ाई लड़ने का काम किया है. सबको साथ लेकर चलने की क्षमता उनमें है. संगठन के विभिन्न पदों पर रहते हुए पार्टी के लिए उन्होंने काम किया है. 
एक और नाम जो हर दृष्टिकोण से जिला अध्यक्ष के सबसे मजबूत दावेदार है उसके पीछे उनका वर्षों का अनुभव और पार्टी के प्रति उनका समर्पण है. परविंदर सिंह आपने सही पहचाना एनएसयूआई से अपना करियर शुरु करने वाले परविंदर वर्तमान में हजारीबाग जिला के प्रभारी है वह मूलतः जमशेदपुर निवासी है. उनके पास संगठनात्मक अनुभव है. एक अच्छा नेतृत्वकर्ता के साथ ही वक्ता भी है और सबसे बड़ी बात वर्तमान प्रदेश प्रभारी के राजू के साथ काम करने का अनुभव भी है.यदि पार्टी परर्विंदर पर दाव लगाती है तो एक साथ कई मोर्चे फतह कर सकती है. परविंदर सिख समुदाय से आते है. 1984 के बाद से पार्टी से दुर हुए सिख समुदाय को सिख अध्यक्ष बनाकर साधा जा सकता है, यह कोई बड़ी बात नहीं सिख समुदाय में परविंदर की अच्छी पकड़ है. वहीं छात्र नेतृत्वकर्ता होने का लाभ भी पार्टी को मिलेगा और एक बेहतर संगठनकर्ता तो पार्टी को मिलेगा ही जिसके पास संगठन का नेतृत्व करने का अच्छा खासा अनुभव है. सबसे बड़ी बात इन पर कोई आपराधिक आरोप नहीं है. 
वहीं राजकिशोर यादव की छवि ठीक है और उनके पास भी संगठन के लिए कार्य करने का अनुभव हैं. वैसे और कई नाम भी लाइन में है जैसे राकेश कुमार तिवारी, अवधेश कुमार सिंह, राजकिशोर प्रसाद, तापस चटर्जी, प्रिंस सिंह, सफी अहमद खान, अमर कुमार मिश्रा, सनातन भकत, सोमेन मंडल, अनुप मिश्रा (ज्योति), शाहनवाज अहमद, पप्पू शुक्ला, सनत चक्रवर्ती, संजय यादव, फिरोज खान, कृष्ण कान्त शुक्ला, संजीव कुमार श्रीवास्तव, राहुल कुमार (राजा सिंह राजपूत), सुल्तान अहमद, गुरदीप सिंह, जसवंत सिंह, अभिषेक कुमार सिंह, विनोद कुमार यादव, शैलेन्द्र कुमार सिंह, राजीव मिश्रा, उदय कुमार सिंह, रंजीत झा, अमित श्रीवास्तव, बबलू झा और बलदेव सिंह सहित कई और नाम भी है सभी का जिक्र करना संभव नहीं है.

महिलाओ को भी मिले हिस्सेदारी 

इस बार कई महिला नेताओं ने भी अपनी दावेदारी पेश की है, जिनमें उषा सिंह, नलिनी सिन्हा, सुनिता ओझ और अपर्णा गुहा जैसे नाम शामिल हैं. आज जब हर ओर आधी आबादी की बात हो रही है तो ऐसे में यह कांग्रेस के लिए एक अवसर हो सकता है कि वह महिला नेतृत्व को प्राथमिकता देकर संगठन में लैंगिक संतुलन स्थापित करे. महिला कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे लंबे समय से पार्टी के लिए काम कर रही हैं, लेकिन नेतृत्व के पदों पर उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला. पार्टी में महिलाओं को भी उचित एवं बराबरी का मौका मिलना चाहिए. यह पार्टी के लिए हितकारी होगा.
 यदि शीर्ष नेताओं द्वारा संगठनात्मक मजबूती को प्राथमिकता दी जाती है, तो ऐसे उम्मीदवारों को मौका मिल सकता है जो शांत, कर्मठ और कार्यकर्ता-केन्द्रित हैं. पूर्वी सिंहभूम कांग्रेस का यह चुनाव केवल एक पद का चयन नहीं है, बल्कि यह पार्टी की सोच, प्राथमिकताओं और भविष्य की दिशा तय करेगा.

No comments:

Post a Comment