Tuesday, September 30, 2025

तुष्टिकरण बनाम ध्रुवीकरण: भारतीय राजनीति का बदलता परिदृश्य ✍️ धर्मेन्द्र कुमार


भारतीय लोकतंत्र में चुनावी राजनीति का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. आज राजनीतिक विमर्श धर्म, जाति और पहचान की राजनीति में उलझ कर रह गया है. जब धर्म, जाति औऱ पहचान सियासत के लिए ईंधन का काम करने लगे तो सत्ता में बैठे लोगों की कोशिश होती है कि वो देश में लगातार ऐसा वातावरण बनी रहे ताकि लोग धर्म, जाति औऱ पहचान से इतर कुछ और ना सोच सकें. इसके लिए वो तमाम तरह के हथकंडे अपनाते भी हैं. और यह सब उनकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है ताकि जनता शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और महंगाई जैसे असल मुद्दों पर सवाल न उठाए? सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समाज का बुद्धिजीवी वर्ग भी इन मुद्दों पर बंटा हुआ नजर आता है. चिंता तब और बढ़ जाती है बुद्धिजीवी वर्ग लोग भी इन मुद्दों पर तथ्यहीन तर्क के आधार पर गलत बातों को सही साबित करने के लिए हरसंभव प्रयास करते है.

सत्ता की रणनीति: ध्यान भटकाओ, भावनाएं भड़काओ

जहां ध्रुवीकरण का उद्देश्य बहुसंख्यक समाज को सांस्कृतिक अस्मिता के नाम पर एकजुट करना है. राम मंदिर, समान नागरिक संहिता, लव जिहाद जैसे मुद्दे भावनात्मक तौर पर लोगों की बीच दरार पैदा करते हैं. वहीं तुष्टिकरण का उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदायों को विशेष रियायतों के नाम पर वोट बैंक के तौर साधना है. मदरसा फंडिंग, हज सब्सिडी, पर्सनल लॉ जैसे मुद्दे इसी श्रेणी में आते हैं. इन दोनों प्रवृत्तियों का परिणाम यह है कि जनता की ऊर्जा पहचान आधारित मुद्दों पर खर्च होती है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, कृषि संकट जैसे मुद्दे विमर्श से गायब हो जाते हैं. आज देश में रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा है. बेरोजगारी पिछले 40 व्रषों का रिकार्ड तोड़ चुका है. लगातार पेपर लीक होने की खबरें आती है लेकिन सत्ता में बैठे लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता वो चाहते है कि युवा आई लव मोहम्मद, आई लव महाकाल, आई लव योगी, आई लव अखिलेश औऱ आई लव राहुल में उलझे रहें. ताकि उनकी राजनीति की दुकाने गुलजार रहें. आकड़ों के अनुसार 2024 में शिक्षा पर कुल जीडीपी का मात्र 2.9% खर्च किया गया वहीं स्वास्थ्य में 2.1% खर्च की गई. वहीं बेरोजगारी 7.8% दर्ज की गई.
 मीडिया और जन मानस
आज का मेन स्ट्रीम मीडिया में भी कुछ एक अपवाद को छोड़ दें तो प्राइम टाइम में बहसें अक्सर धर्म, जाति, और पहचान पर केंद्रित होती हैं. असल मुद्दों पर बहस या तो तकनीकी होती है या हाशिए पर. वहीं राजनीतिक दलों के घोषणापत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य का उल्लेख तो होता है, लेकिन प्रचार में भावनात्मक मुद्दे हावी रहते हैं. जनता की प्रतिक्रिया भी इसी दिशा में झुकती है. भावनात्मक मुद्दों पर जनता की प्रतिक्रिया तीव्र होती जबकि नीतिगत मुद्दों पर जनमानस का दबाव सीमित रहता है.
इस संबंध में प्रो. योगेंद्र यादव कहते हैं कि “राजनीति ने जनता को उपभोक्ता बना दिया है, जो भावनाओं के उत्पाद खरीदती है, न कि नीतियों का मूल्यांकन करती है.” वहीं जेएनयू की डॉ. रचना सिंह मानती हैं कि “ध्रुवीकरण और तुष्टिकरण दोनों ही विमर्श को नियंत्रित करने के उपकरण हैं, ताकि सत्ता से जवाबदेही की मांग न हो.”
ध्रुवीकरण और तुष्टिकरण की राजनीति केवल पहचान आधारित लामबंदी नहीं है, बल्कि यह एक रणनीतिक प्रयास है जिससे असल मुद्दों को दबाया जा सके. जब जनता धर्म और जाति के नाम पर बंटेगी तब शिक्षा की गुणवत्ता, अस्पतालों की हालत, युवाओं की बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दे सत्ता के लिए चुनौती नहीं रह जाएंगे. यह लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी भी है. अगर विमर्श को पुनः असल मुद्दों की ओर नहीं मोड़ा गया, तो लोकतंत्र केवल चुनावों का उत्सव बनकर रह जाएगा, जनहित का साधन नहीं.

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