17 सितंबर को जब पूरा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन मना रहा था. उसी दौरान असम के मुख्यमंत्री हिमंत विस्व सरमा के निर्देश पर असम भाजपा मीडिया सेल द्वारा अपने सोशल मीडिया हैंडल से एक बीडियो वायरल किया गया. जिस वीडियो में यह बनाया गया है कि 2041 तक असम में मुसलमानों की जनसंख्या 99 प्रतिशत हो जाएगी. हर सरकारी संपतियों पर उनका कब्जा हो जाएगा. वीडियों में खुले आम गौ मांस काटते भी दिखाया गया. इस वीडियों के माध्यम से यह समझाने के प्रयास किया गया है यदि आप असम सहित पूरे देश में बीजेपी की सरकार नहीं बनवाएंगे तो हिंदू खतरे में पड़ सकते है औऱ घुसपैठीए हिंदुऔं की संपतियों पर कब्जा कर लेंगे. इसलिए आप सुरक्षित रहना चाहते है तो बीजेपी और मोदी को चुनना होगा क्योंकि वहीं देश के एक मात्र हिंदु हृदय सम्राट है. जबकि सच ठीक इसके उटल है.
चुनाव से पहले ही याद आते है घुसपैठिए
अक्सर चुनाव से ठीक पहले भारत में अवैध घुसपैठियों का मुद्दा अचानक सुर्खियों में आ जाता है. हालांकि असम में 2027 में चुनाव होना है. लेकिन 2025 में बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने हर चुनावी सभा में घुसपैठियों को बाहर करने का संकल्प प्रतिबद्धता दोहराते है. घुसपैठियों के कारण बिहार के सीमांचल क्षेत्रों में बदतले डेमोग्राफी पर चिंता ब्यक्त करते है. बीजेपी द्वारा लगातार कांग्रेस और उनके सहयोगियों पर घुसपैठियों को संरक्षण देने का आरोप लगाया है. घुसपैठियों को कांग्रेस व उनके सहयोगियां का वोट बैंक बताते है. 2024 में झारखंड में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले प्रदेश चुनावी प्रभारी शिवराज चौहान एवं सह प्रभारी हिमेत विस्व सरमा द्वारा घुसपैठियों का मुद्दा जोर शोर उठाया गया. इंडिया गठबंधन पर आरोप लगाया गया कि वे वोट के लिए घुसपैठियों को संरक्षण देते है. घुसपैठियों द्वारा आधिवासियों की जमीन पर कब्जा किया जा रहा है. इस मामले में रांची हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई. कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार से अपना पक्ष रखने का आदेश दिया गया. तब गृहमंत्रालय द्वारा रांची हाईकोर्ट में शपथ देकर बताया कि दरअसल उनके पास झारखंड में घुसपैठियों से संबंधित कोई आकड़ा उपलब्ध है. झारखंड की जनता में चुनाव परिणाम के तौर पर बीजेपी को करारा जवाब दिया.
क्या है घुसपैठियों का सच
यह सच है भारत धर्मशाला नहीं है कि यहां हम पूरी दूनिया के लोगों को संरक्षण दे. घुसपैठ का मामला राष्ट्रीय सुरक्षा, जनसंख्या असंतुलन और सांस्कृतिक संकट के लिए एक बड़ी चुनौती है. घुसपैठ का मुद्दा भारत के लिए गंभीर है, लेकिन जब इसे चुनावी मौसम में ही उठाया जाए, और वास्तविक कार्रवाई पिछली सरकार से भी कम हो, तो यह सवाल उठता है—क्या यह मुद्दा वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा बन गया है? हर चुनाव से ठीक पहले घुसपैठ का मुद्दा उठाकर फिर हिंदु मुस्लमान का कार्ड खेलना बीजेपी की राजनीति का हिस्सा बना गया है. घुसपैठियों पर कार्रवाई का यदि डा. मनमोहन सिंह सरकार और मोदी सरकार के पिछले 11 वर्षों की तुलनात्मक अध्यन करेंगे तो पाएंगे कि मनमोहन सरकार में लगभग 90 हजार घुसपैठियों को डिपोर्ट किया गया था जबकि मोदी के 11 वर्षों के कार्यकाल में मात्र 5 हजार घुसपैठियों को डिपोर्ट किया गया है. घुसपैठियों के खिलाफ की गई कार्रवाई का यह है सच. इसको कुछ आकड़ों से समझा जा सकता है – 2011 में 6,761, 2012 में 6,537, 2013 में 5,234 में घुसपैठियो को डिपोर्ट किया गया वहीं 2015 से 2017 तक गिरावट जारी रही, 2017 में सिर्फ 51 घुसपैठिए डिपोर्ट किए गए. बीजेपी व मोदी सरकार के लिए घुसपैठ का मुद्दा चुनावी मुद्दा है जो उन्हें हर चुनाव से ठीक पहले याद आता है. बिहार चुनाव से ठीक पहले यह मुद्दा एक बार फिर उठने लगा है. जबकि गृहमंत्रालय के पास बिहार में घुसपैठियोंसे संबंधित कोई आकड़ा मौजूद नहीं है. वहीं एसआईआर के दौरान कितने घुसपैठियों की पहचान की गई है इसके आकड़े भी आयोग नहीं बता पा रहा है.
यह सच है कि घुसपैठ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है. 2017 के बाद म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों की भारत में घुसपैठ देखी गई है. जो चिंता का विषय है. वहीं एक सरकारी अनुमान के अनुसार देश में लगभग 2 करोड़ से अधिक बंग्लादेशी अवैध तरीके से रह हैं. यहां बड़ा सवाल है कि 11 वर्षों में मोदी सरकार इनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कोई ठोस निर्णय कर पाई. क्या वह भी कार्रवाई करने से अधिक इसको चुनावी मुद्दा बनाए रखना चाहती है ताकि हिंदुओं को इसका डर दिखा अपनी राजनीतिक गोटी लाल करते रहें. तो क्या यह मान लिया जाए कि घुसपैठ का मुद्दा अब केवल चुनावी हथियार बनकर रह गया है, न कि राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर विषय? इस मुद्दे पर आप सोचते हैं जरुर बताएं.
No comments:
Post a Comment