बीजेपी को चाहिए बिहार में रिमोट कंट्रोंल सीएम
धर्मेंद्र कुमार
बिहार की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर है जहां तमाम उठापटक, गठबंधन, बयानबाज़ी और एक दूसरे को पछाड़ने की रणनीति के बावजूद एक नाम सबसे ऊपर है या यूं कहे कि उनके बिना बिहार की राजनीति की चर्चा अधूरी है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. जी हां आपने सही पहचाना मैं नीतीश कुमार की बात कर रहा हूं. 2025 के विधानसभा चुनावों की सरगर्मी के बीच यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? लेकिन जवाब हर बार नीतीश की ओर ही इशारा करता है. मैंने अपने पिछले आलेख में इस बात का जिक्र किया था कि नीतीश के बाद कौन लेकिन जबाव किसी के पास नहीं है.
नीतीश ने बिहार को विकास पथ पर बढ़ाया आगे
नीतीश कुमार अब मात्र एक नेता नहीं रहे बल्कि वे बिहार के विकास मॉडल के एक ब्रांड के तौर पर स्थापित हो चुके हैं. संभव है आपको मेरी यह बात ठीक ना लगे, लेकिन जिन लोगों ने बिहार के लालू राज व 90 के दशक को देखा, समझा औऱ भोगा है उनके लिए तो हर हाल में नीतीश कुमार ही स्वीकार्य होंगे. यह ठीक है कि 20 वर्षों के शासनकाल में बिहार का जितना विकास होना चाहिए था उतना नहीं हो पाया, विशेषकर रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में औऱ आज भी बिहार सबसे पिछड़ा औऱ बीमारु प्रदेश के तौर पर जाना ताजा है. निश्चित रुप से इसके लिए नीतीश ही जिम्मेवार है लेकिन बिहार में आज जो आधारभूत संरचना के मामले में तरक्की हुई है उसका क्रेडिट तो कुमार की इच्छाशक्ति जाता है. उन्होंने कभी भी जातिगत राजनीति को साधने के लिए बिहार के विकास के साथ समझौता नहीं किया. तभी आज बिहार में सड़कों का जाल सा बिछ गया है. हाल के कुछ महीनों में बिहार में अपराधिक घटनाओं में वृद्धि हुई है जो चिंता का विषय तो है. वहीं सरकार के मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बावजूद नीतीश की खामोशी, उनको जानने वालों को लिए भी अनबुझ पहेली नब गई है. उनकी खामोशी का राज क्या है सीएम की कुर्सी या अप्रत्यक्ष दबाव ?
बीजेपी को चाहिए बिहार में रिमोट कंट्रोल मुख्यमंत्री
एनडीए ने भले ही अब तक नीतीश कुमार को औपचारिक रूप से मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित नहीं किया है, लेकिन चुनावी तैयारियों और प्रचार में उनका नाम और चेहरा लगातार सामने आ रहा है. भाजपा के शीर्ष नेता अमित शाह ने हाल ही में नीतीश से मुलाकात की और चुनावी रणनीति पर चर्चा की. लेकिन मुख्यमंत्री के चेहरा के नाम पर विधायक दल के नेता तय करने की बात कह कर नीतीश को मुख्यमंत्री का चेहरा खुले तोर पर घोषित करने से बचते दिखे. बीजेपी की मजबूरी कहे या जरुरत बिना नीतीश के अपने दम पर बिहार में बीजेपी के लिए सरकार बनाना संभव नहीं है. इसलिए नीतीश पर दबाव बनाने के लिए चिराग पासवान को 29 सीट देकर जदयू पर अप्रत्यक्ष रुस से दबाव बनाने का प्रयास किया गया. भाजपा का नेतृत्व यह जानता है कि यदि सीधे सीधे नीतीश को मुख्यमंत्री मानने से इंकार कर दिया तो संभव है कि नीतीश एक बार फिर इंडिया गठबंधन की ओर रुख कर दे जिसकी संभावना हर समय बनी हुई है. वहीं उनके वोट बैंक का लाभ भी नहीं मिल पाएगा. इसलिए बीजेपी नीतीश को उनके ही दल में अलग थलग करने की रणनीति पर काम कर रही है. जिसका एहसास भी उनको हो गया है. भाजपा को बिहार में एक ऐसा मुख्यमंत्री चाहिए जो रिमोट से कंट्रोल हो और उनके इशारे पर काम करें. ताकि वो बिहार में अपना एजेंडा सेट कर सकें. यही कारण है कि तमाम गंभीर आरोपों के बावजूद सम्राट चौधरी के खिलाफ पार्टी द्वारा कोई कार्रवाई नहीं किया जाना यह स्पष्ट संकेत है कि यदि गणित ठीक बैठ गया तो सम्राट चौधरी को सीएम बनाया जा सकता है. ताकि चौधरी के आसरे बिहार को साधा जा सके.
महागठबंधन की खुलती खिड़की
राजद और महागठबंधन के भीतर भी नेतृत्व को लेकर असमंजस है. तेजस्वी को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का चेहरा खेल तौर पर स्वीकार नहीं किया है क्योंकि इसकी अबतक महागठबंधन की और से आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है. क्योंकि अंदरखाने में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. यही कारण है कि गठबंधन स्तर पर कोई सर्वमान्य चेहरा अब तक सामने नहीं आया. ऐसे में अगर चुनाव परिणामों में जदयू को अपेक्षित सीटें नहीं मिलतीं और एनडीए नीतीश को दरकिनार करने की कोशिश करता है, तो यह संभावना बलवती हो जाती है कि नीतीश कुमार महागठबंधन की ओर रुख कर सकते हैं. नीतीश का राजनीतिक इतिहास भी इस संभावना को मजबूत करता है. वे पहले भी परिस्थितियों के अनुसार गठबंधन बदलते रहे हैं, और हर बार सत्ता की चाबी उन्हीं के हाथ में रही है. राजद सुप्रीमों लालू प्रसाद ने भी संकेत दिया है कि यदि नीतीश महागठबंधन के साथ आते है तो वे ही मुख्यमंत्री होंगे. वे जानते है कि नीतीश के आसरे बिहार की सत्ता पर आसानी से काबिज हुआ जा सकता है. उनके लिए ऐनकेन प्रकारेण सत्ता में बने रहना जरुरी है.
जनता की पसंद और राजनीतिक गणित
बिहार की जनता नीतीश को सुशासन बाबू के रूप में जानती है. उनके नेतृत्व में राज्य ने कई मोर्चों पर सुधार देखा है. यही कारण है कि भाजपा जैसे दल भी उनके नाम को पूरी तरह नकार नहीं सकते. उत्तराखंड और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री तक बिहार आकर नीतीश के नेतृत्व में विकास की बात कर रहे हैं. सबसे बड़ी बात की नीतीश पर कोई सीधे तौर पर दाग नहीं है और बिहार के विकास को लेकर विजन भी साफ है. इसकी बानगी तो बिहार में देखने को मिल रही है. हालांकि हाल के दिनों पर शासन व्यवस्था पर नीतीश की पकड़ बहुत कमजोर हुई है. इसके पीछे उनका स्वास्थ्य एक बड़ा कारण हो सकता है. लेकिन इन सबके बावजूद नीतीश के मुख्यमंत्री होने को लेकर कोई भी दल खुलकर विरोध करने की स्थिती में नहीं है इसका सबसे मजबूत कारण उनके साथ मजबूती के साथ खड़ा अति पिछड़ों का एक बड़ा वोट बैंक है जो नीतीश को अपना सर्वमान्य नेता मानता है. बिहार की राजनीति में चाहे जितनी भी चालें चली जाएं, एक बात साफ है—नीतीश कुमार को पूरी तरह नकारना किसी भी गठबंधन के लिए आसान नहीं होगा. वे न केवल राजनीतिक अनुभव का पर्याय हैं, बल्कि सत्ता संतुलन के ऐसे केंद्र हैं जिनके बिना कोई भी समीकरण अधूरा है.
वहीं, टिकट वितरण में असंतोष और बगावत की खबरें एनडीए और महागठबंधन दोनों में हैं. ऐसे में एक स्थिर और अनुभवी नेतृत्व की तलाश में नीतीश कुमार फिर से सबसे उपयुक्त विकल्प बन जाते हैं.
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