बिहार में 2025 के चुनावी मौसम ने लोकतंत्र की गरिमा को फिर से लहूलुहान कर दिया है. मोकामा में जन सुराज पार्टी के नेता दुलारचंद यादव की हत्या और सिवान में एक एएसआई की गला रेतकर हत्या ने यह साबित कर दिया कि ‘सुशासन बाबू’ के राज में कानून-व्यवस्था सिर्फ भाषणों तक सीमित हो कर रह गया है. यदि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्यमंत्री के नजर यह सुशासन व्यवस्था है तो आप सहज ही अंदाजा लगा सकते है कि जंगलराज में क्या स्थिती होगी. आज के दौर में तो यही जंगलराज पार्ट 2 है. बड़ा सवाल यही है कि क्या इसी सुशासन व्यवस्था से प्रदेश की जनमानस का कल्याण होगा, यह गंभीर चिंता का विषय है.
कुशासन का नया अवतार
आपको बता दे कि 30अक्टूबर 2025 को मोकामा के घोसवरी थाना क्षेत्र में जन सुराज समर्थक दुलारचंद यादव की गोली मारकर हत्या कर दी गई. वे चुनाव प्रचार में निकले थे, और यह हत्या चुनावी रंजिश का नतीजा बताई जा रही है. सिवान में एक एएसआई की गला रेतकर हत्या कर दी गई, और आरोप है कि इसमें शराब माफियाओं का हाथ है. इन दोनों घटनाओं ने बिहार की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या यह वही बिहार है जहाँ प्रधानमंत्री और गृहमंत्री द्वारा ‘सुशासन’ का दावा किया जाता है?
क्या कहते है आंकड़े
2024 में बिहार में हत्या के 3,800 से अधिक मामले दर्ज हुए, जो देश के टॉप 5 राज्यों में शामिल है. 2025 के पहले 10 महीनों में ही 3,200 से अधिक हत्या के मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से कई चुनावी रंजिश और आपराधिक गिरोहों से जुड़े हैं. शराबबंदी के बावजूद 2024 में 1.5 लाख से अधिक शराब जब्ती के मामले दर्ज हुए, और शराब माफियाओं की ताकत लगातार बढ़ती दिख रही है. यह तो महज दो वर्षों का आकड़ा है एनसीआरबी के आकड़ों के अनुसार पिछले 10 वर्षों अपराधिक घटनाओं में अप्रत्याशित बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
सुशासन या कुशासन
प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री लगातार 90 के दशक के ‘जंगलराज’ की बात करते हैं, लेकिन मौजूदा हालात तो प्रदेश में जंगलराज पार्ट 2 चल रहा है. बाहुबली नेताओं की वापसी हो चुकी है. पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता ने जनता का भरोसा डगमगा रहा है. ऐसा लगता है कि “बिहार में अब कुशासन का नया ब्रांड लॉन्च हुआ है—‘सुशासन 2.0’, जिसमें अपराधी VIP हैं और जनता RIP!”
बिहार की जनता को यह समझना होगा कि चुनाव सिर्फ वोट डालने का नहीं, जवाब मांगने का भी पर्व है. जब जनप्रतिनिधि सुरक्षा देने में नाकाम हों, और प्रशासन सिर्फ चुनावी रैलियों की भीड़ गिनने में व्यस्त हो, तो लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है. अब वक्त है कि जनता सवाल पूछे—कुशासन की इस नई परिभाषा में हमारा भविष्य कहाँ है?
No comments:
Post a Comment