पटना। वर्तमान समय में बिहार की राजनीति की चर्चा हो और प्रशांत किशोर की बात ना हो तो चर्चा अधूरी व बेमानी ही होगी. चुनाव में जन सुराज को कितनी सीटें मिलेंगी यह तो भविष्य के गर्भ में हैं. लेकिन यह भी सच है कि बिहार में प्रशांत किशोर राजनीति चर्चा के केंद्र बिंदू बने हुए हैं. उन्होंने प्रदेश के समग्र विकास के लिए बिहार की पारंपरिक जातिगत राजनीति से अलग एक नए राजनीतिक प्रयोग करने का जो जोखिम उठाया हैं उसकी जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है. यदि बिहार की जनता ने जन सुराज का साथ दिया तो उम्मीद की जा सकती है बिहार आने वाले समय में विकास के एक नए मॉडल के तौर पर उभरेगा. हाल के सी-वोटर सर्वे में तेजस्वी यादव 35% लोकप्रियता के साथ शीर्ष पर हैं, जबकि प्रशांत किशोर 23% के साथ दूसरे स्थान पर उभरते दिख रहे हैं. यह आंकड़ा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि दोनों प्रमुख गठबंधनों एनडीए और महागठबंधन के लिए चिंता का कारण भी बनता जा रहा है. प्रशांत के अनुसार पिछले तीन वर्षों में लगभग 1.5 करोड़ लोग जन सुराज पार्टी से जुड़े है. जिसमें 45 लाख लोगों ने 10रुपया देकर पार्टी की विधिवत सदस्यता ग्रहण की है. जो पार्टी को एक मजबूत आधार प्रदान करता है. इसी आधार पर वे बिहार के 243 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा भी करते हैं.
प्रशांत किशोर पर सेल कंपनियों से पैसे लेने का आरोप
भाजपा जदयू एवं राजद और कांग्रेस के नेताओं पर लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे प्रशांत किशोर पर भी सेल कंपनियों से पैसे लेने का आरोप सत्ता पक्ष द्वारा लगाया जा रहा है. जिस नवयूगा इंजीनियरिंग कंपनी से पैसे लेने की बात की चर्चा है. उस कंपनी पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं. हालांकि किशोर ने साफ तौर पर कहा है कि मैंने आपना आय व्यय का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक कर दिया है. यदि किसी को कोई संदेह हैं तो इसकी जांच करवा ले मैं तैयार हूं.
जन सुराज की चुनौती: जाति बनाम जनमत
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने राजनीति में एक वैकल्पिक विमर्श खड़ा करने की कोशिश की है. उनके अनुसार जहां जातिगत समीकरणों से ऊपर उठकर विकास और सुशासन की बात हो. लेकिन बिहार की राजनीति में जाति एक स्थायी तत्व रही है. किशोर स्वयं मानते हैं कि जातिगत सोच से ऊपर उठना आसान नहीं है, और यही उनकी सबसे बड़ी चुनौती भी है. उपचुनावों में जन सुराज को अब तक कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली है. 2023 के उपचुनावों में पार्टी को 1.2% से भी कम वोट मिले, जो दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर पार्टी की पकड़ अभी कमजोर है. यहां महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या जन सुराज भी जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखकर टिकट बांटेगी? यदि ऐसा होता है, तो पार्टी का वैकल्पिक नैरेटिव कमजोर पड़ सकता है. सी-वोटर सर्वे के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि प्रशांत किशोर को जनता सुन रही है, लेकिन क्या वह वोट में तब्दील होगा? यह सवाल अभी अनुत्तरित है.
सोशल केमिस्ट्री
यदि किशोर जाति से ऊपर उठकर एक सामाजिक केमिस्ट्री बना पाते हैं, जहां युवा, महिलाएं, और ग्रामीण मतदाता उन्हें एक विकल्प के रूप में देखें तो वे सत्ता के समीप पहुंच सकते हैं. लेकिन यदि यह समर्थन बिखरा रहा, तो वे सिर्फ वोटकटवा बनकर रह जाएंगे, जिससे किसी दूसरे गठबंधन को अप्रत्याशित लाभ मिल सकता है.
प्रशांत किशोर की राजनीति एक प्रयोग है. जो बिहार की पारंपरिक राजनीति को चुनौती देता है. लेकिन यह प्रयोग तभी सफल होगा जब जनता जातिगत खांचे से बाहर निकलकर विकास, पारदर्शिता और सुशासन के साथ ही बिहार के समग्र विकास को प्राथमिकता दे. जन सुराज पार्टी के लिए यह चुनाव सिर्फ एक राजनीतिक परीक्षा नहीं, बल्कि एक वैचारिक कसौटी भी है. वैसे राजनीति को संभावनाओं का खेल कहा जाता है. लोकतंत्र में जनता ही मालिक है. क्योंकि तमाम भविष्यवाणी और आकलनों के ठीक उलट नतीजे ने यह साबित किया है कि जनता जिसको चाहेगी वहीं सत्ता के शिखर पर होगा.
No comments:
Post a Comment