विजयादशमी, जिसे दशहरा भी कहा जाता है, भारतीय संस्कृति में बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है. हर वर्ष रावण के विशालकाय पुतले का दहन कर हम प्रतीकात्मक रूप से अधर्म का अंत करने का ढ़ोंग मात्र करते है. रावण के पूतले को जलाकर हम यह मान लेते हैं कि रावण के जलने के साथ ही समाज से बुराईयों का सफाया हो गया लेकिन क्या यह पूरा सच है शायद नहीं. जबकि आप पाएंगे कि समाज में लगातार अत्याचार, हत्या और बलात्कार जैसी घटनाओं में वृद्धि दर्ज की जा रही है. यहां महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जब हम प्रत्येक वर्ष विजयादशमी के दिन रावणों का दहन करते है. फिर यह समाज में रावण रुपी अत्याचारी कहां से पैदा हो रहे है. मतलब साफ है कि केवल बाह्य रावण का दहन ही पर्याप्त नहीं है, समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान केवल उत्सवों व प्रतिकों को जलाने से संभव नहीं. बल्कि हमें अपने अंदर के रावण( लोभ,हवस, नफरत,अंहकार, दुराचार) को समाप्त करना होगा. तभी स्वस्थ और समृद्ध समाज का निर्माण हो पाएगा.
अवगुण ही रावण के अंत का कारण बना
शास्त्रों के ज्ञाता रावण को वेदों, आयुर्वेद, संगीत और ज्योतिष का गहन ज्ञान था. शिव तांडव स्तोत्र जैसी रचनाएँ उसकी साहित्यिक प्रतिभा का प्रमाण हैं. पुष्पक विमान, जो इच्छानुसार उड़ सकता था, रावण की तकनीकी दक्षता और वैज्ञानिक सोच का प्रतीक माना जाता है. वहीं सोने की लंका केवल भौतिक समृद्धि नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित और उन्नत राज्य व्यवस्था का संकेत देती है. इन सबके बावजूद, रावण का पतन हुआ क्योंकि रावण ने अपने ज्ञान और शक्ति को आत्ममुग्धता में बदल दिया. यही उसका सबसे बड़ा शत्रु बना. सीता हरण केवल एक स्त्री का अपहरण नहीं था, बल्कि धर्म और मर्यादा की अवहेलना थी. रावण ने सत्ता को साधन नहीं, स्वार्थ का लक्ष्य बना लिया. यही उसकी नियति को विनाश की ओर ले गया.
रावण अभी जिंदा है
रावण एक व्यक्ति नहीं, एक मानसिकता है. आज का समाज साधन-संपन्न होने के साथ ही उसमें विभिन्न प्रकार की बुराईयां का भी समावेश हैं. भारत में 2025 तक इंटरनेट उपयोगकर्ता 85 करोड़ से अधिक हो चुके हैं. तकनीकी क्षेत्र में भारत विश्व के अग्रणी देशों में है. शिक्षा और स्वास्थ्य में निरंतर सुधार हो रहा है. इसके बावजूद समाज में अहंकार और स्वार्थ की राजनीति हावी है. लिंगभेद, जातिवाद और भ्रष्टाचार जैसी सामाजिक बुराइयाँ चरण पर हैं. स्वस्थ समाज का निर्माण केवल बाह्य प्रतीकों से नहीं, बल्कि आंतरिक सुधार से होगा. क्या हमारा उद्देश्य समाज का कल्याण है या केवल व्यक्तिगत लाभ? क्या हम दूसरों की भलाई के लिए खड़े भी होते हैं?
विजयादशमी केवल एक पर्व नहीं, बल्किन एक आह्वान है, अपने अंदर के रावण (बुराईयों, अहंकार) को पहचानने और उसे पराजित करने का. जब हम अपने भीतर की बुराइयों को खत्म करेंगे, तभी एक न्यायपूर्ण, समृद्ध और स्वस्थ समाज का निर्माण संभव होगा. विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं.
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