Saturday, October 25, 2025

बिहार चुनाव 2025: सवर्ण समाज की राजनीति में वापसी की बेचैनी धर्मेंद्र कुमार



बिहार की राजनीति में सवर्ण जातियों ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ—का एक दौर था जब वे सत्ता के केंद्र में थे. 90 के दशक से पहले कांग्रेस की रीढ़ यही वर्ग था. फिर सामाजिक न्याय की लहर आई और लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में पिछड़ा वर्ग राजनीति का नया चेहरा बना. हालांकि सामाजिक न्याय के नाम पर लालू में पिछड़ी जातियों का कितना विकास किया यह चर्चा का विषय हो सकता है. लेकिन उन्होंने अगड़ों और पिछड़ों के बीच एक गहरी खाई जरुर बना दी. लालू ने अगड़ी जाति को पिछड़ी जाति के एक दुश्मन के तौर पर पेश करने की पूरजोर कोशिश कि जिसके परिणाम स्वरुप 90 के दशक में कई नरसंहार हुए. जिसमें अगड़ी और पिछड़ी दोनो जातियों के लोगों की जानें गई. लालू प्रसाद ने सामाजिक न्याय के आसरे सत्ता पर काबिज हुए और बिहार का बंटाधार कर दिया. पिछड़ी जातियों को रोजगार नहीं देकर उनके हाथों में लाठी डंडे जरुर थमा दिए. वहीं 2005 में नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली और भाजपा के साथ मिलकर एक नया समीकरण गढ़ा जिसमें सवर्णों ने फिर से निर्णायक भूमिका निभाई. लेकिन आज 2025 के चुनावी परिदृश्य में सवर्ण समाज खुद को राजनीतिक हाशिए पर महसूस कर रहा है. 
 जनसंख्या में गिरावट, हिस्सेदारी में कटौती
बिहार की जातिगत जनगणना के अनुसार सवर्ण जातियों की कुल आबादी लगभग 15% है. जिसमें राजपूत 5%, भूमिहार 5%, ब्राह्मण 4% और कायस्थ 1–1.2% की आबादी शामिल है. इस सीमित जनसंख्या के कारण राजनीतिक दलों ने टिकट वितरण में इन जातियों को प्राथमिकता देना बंद कर दिया है. 2025 के चुनाव में टिकटों की संख्या देखें तो राजपूतों को अपेक्षाकृत अधिक टिकट मिले वहीं भूमिहार को भी ठीक ठाक प्रतिनिधित्व मिला. लेकिन ब्राह्मण और कायस्थों की हिस्सेदारी नगण्य रही.
 राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं बदली
आज की राजनीति में पिछड़ा वर्ग (OBC), दलित और मुस्लिम वोट बैंक को साधना प्राथमिकता बन चुकी है. सवर्ण समाज, जो कभी सत्ता का निर्णायक स्तंभ था, अब "गणना में नहीं, गिनती में है". राजनीतिक दलों की रणनीति अब संख्यात्मक प्रभाव पर आधारित है, न कि ऐतिहासिक योगदान पर.
 सवर्ण समाज की बेचैनी और आत्ममंथन
बिहार के चुनाव में सवर्ण समाज के भीतर एक नई बेचैनी दिख रही है. पिछले दिनों बाहुबली नेता और पूर्व सांसद आनंद मोहन ने रघुवंश प्रसाद सिंह की पुण्यतिथि पर कहा कि “बिहार की सत्ता का फैसला ‘भूरा बाल’ करेगा.” यहाँ ‘भूरा बाल’ का अर्थ है भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला (कायस्थ). यह बयान न सिर्फ सवर्ण समाज को एकजुट होने का संकेत देता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सत्ता की चाबी अब भी इनके पास हो सकती है—यदि वे संगठित हों. वहीं भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूढ़ी ने कहा कि “मैं सवर्णों की आवाज बन चुका हूं. अब समय आ गया है कि सवर्ण समाज एकजुट हो.” उन्होंने यह भी दावा किया कि बिहार की 70 सीटों पर राजपूत समाज निर्णायक भूमिका निभा सकता है. उनका यह बयान सवर्ण समाज के भीतर नेतृत्व की तलाश और राजनीतिक पुनर्स्थापन की भावना को दर्शाता है. इन नेताओं के बयानों ने सवर्ण समाज को एक बार सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम सिर्फ "डालने वाले वोटर" रह गए हैं? क्या हमारी भूमिका अब सिर्फ "बैकबेंचर" की रह गई है?
इन सवालों ने सवर्ण समाज को आत्ममंथन की स्थिति में ला दिया है. कई युवा सवर्ण अब राजनीतिक दलों से दूरी बना रहे हैं, तो कुछ नए मंचों की तलाश में हैं. संख्या कम होने के बावजूद सवर्ण समाज का वोट निर्णायक हो सकता है. बशर्ते वो एकजूट हों. लगभग 70 सीटों पर सवर्ण समाज निर्णायक की भूमिका निभा सकते है, यदि वो एकजुट होकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करें. कई सीटों पर तो हार-जीत का अंतर 5–10% वोट से तय होता है. यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अपनी प्रतिष्ठा को बचाने के लिए सवर्ण समाज एकजुट होकर वोट करेगा या फिर वहीं ढ़ाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ होगी. 
बिहार की राजनीति में सवर्ण समाज भले ही संख्या में कम हो, लेकिन उसकी ऐतिहासिक भूमिका, वैचारिक ताकत और संगठित चेतना उसे आज भी निर्णायक बना सकती है. 2025 का चुनाव सवर्ण समाज के लिए सिर्फ वोट डालने का नहीं, अपना अस्तित्व बचाने का चुनाव है.

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