Tuesday, October 28, 2025

बिहार चुनाव 2025: कांग्रेस की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन? ✍️धर्मेंद्र कुमार



“हवाहवाई रणनीति और ओवरकॉन्फिडेंस ने कांग्रेस को डुबोया

         

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कांग्रेस पार्टी की स्थिति एक शिकस्त खाई टीम जैसी दिख रही है. जिसका न तो रणनीति स्पष्ट, न संगठन मजबूत, और न ही नेतृत्व में वह समझदारी जो एक बड़े गठबंधन में अपेक्षित होती है. वोटर अधिकार यात्रा के दौरान मिले अपार जनसमर्थन के भ्रम में उलझे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं व रणनीतिकारों के अति उत्साह व ओवरकॉन्फिडेंस के कारण बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस न सिर्फ सीटों के मामले में पिछड़ गई बल्कि गठबंधन में उसकी स्थिती भी कमजोर हुई है. शुरुआती दौर में कांग्रेस के पास बार्गेनिंग पावर था लेकिन नेताओं के ओवरकॉन्फिडेंस के कारण सब गड़बड़ा गया. 

 नेतृत्व का ओवरकॉन्फिडेंस होना

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व व रणनीतिकारों के ओवरकॉन्फिडेंस के कारण प्रथम दृष्टया में बिहार विधानसभा चुनाव में नुकसान होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की चुनावी रणनीति बनाने व निर्णय लेने में हुई देरी के कारण पार्टी को सीटों का नुकसान हुआ. वहीं तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने में हिचकिचाहट दिखाना और फिर अंततः समर्थन देना. यह द्वंद्व पार्टी की असमंजस भरी स्थिति को दर्शाता है. वोट अधिकार यात्रा के दौरान जो जनसमर्थन इंडिया गठबंधन को मिला, उसे कांग्रेस ने अपने पक्ष में समझने की भूल की, जिससे रणनीतिक भ्रम पैदा हुआ. जब पार्टी के पास अपनी शर्तों पर गठबंधन के दलों के साथ बार्गेंनिंग करने का मौका था. तब नेताओं के ओवरकॉन्फिडेंस के कारण वे चुक गए. जिसका खामियाजा उन्हें कम सीटों के तौर पर भुगतना पड़ा. समय पर बार्गेंनिंग नहीं हो पाने के कारण असमंजस की स्थिती पैदा हो गई. जिसके कारण लगभग एकदर्जन सीटों पर राजद और कांग्रेस दोनो ने अपने उम्मीदवार मैदान में उतार दिए. इससे जनता में गलत मैसेज गया, जिसका नुकसान निश्चित रुप से गठबंधन को होना तय है.

 संगठनहीनता और जातिगत समीकरण की अनदेखी
पार्टी के शीर्ष नेताओं को बिहार में अपने संगठन की स्थिती के आधार पर निर्णय लेना चाहिए था. ऐसा लगता है कि कांग्रेस के नेताओं ने बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर ठीक से होमवर्क नहीं किया यही कारण है कि सब कुछ हवाहवाई में रह गया. यदि पार्टी के रणनीतिकार चुनाव को लेकर होमवर्क किए होते तो आज स्थिती कुछ और होती. वहीं प्रदेश प्रभारी कृष्णा अल्लावरू की बिहार की जातिगत और सामाजिक संरचना की समझ सीमित रही, जिससे टिकट वितरण में भारी चूक हुई. लगभग डेढ़ दर्जन सीटें ऐसे उम्मीदवारों को दी गईं. जिनके तार एनडीए से जुड़े रहे हैं. यह न सिर्फ गठबंधन की नीति के खिलाफ था, बल्कि मतदाताओं के विश्वास को भी डगमगाने वाला कदम है वहीं पार्टी कार्यकर्ताओं में निराशा का भाव उत्पन्न होना भी स्वाभाविक है.
 टिकट वितरण में खेल और अंदरूनी असंतोष
कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व द्वारा पार्टी के वैसे नेताओं को बिहार विधानसभा से अलग रखना नुकसानदेह साबित हुआ. जो बिहार की राजनीति एवं जातिगत समीकरण को बेहतर ढ़ग से समझते हैं. टिकट वितरण में बड़े पैमाने पर गुटबाज़ी और व्यक्तिगत समीकरणों का बोलबाला रहा. कई जिलों में स्थानीय नेताओं की अनदेखी की गई, जिससे जमीनी कार्यकर्ता हतोत्साहित हुए. पार्टी ने सर्वे और फीडबैक के बावजूद दो मौजूदा सीटें गंवा दीं, जो रणनीतिक विफलता का स्पष्ट संकेत है. 
चुनाव से पहले राहुल गांधी की सक्रियता और वोटर अधिकार यात्रा ने कुछ उम्मीदें जगाईं थी, लेकिन नेतृत्व की चुप्पी, निर्णय में देरी और संगठन की निष्क्रियता ने इन उम्मीदों को धुंधला कर दिया है ऐसा प्रतीत होता है. कांग्रेस ने आरजेडी के साथ आंख में आंख मिलाकर बात करने की कोशिश की, लेकिन सीट बंटवारे और सीएम फेस पर स्पष्टता की कमी से गठबंधन कमजोर हुआ. हालांकि 29 अक्टूबर से राहुल गांधी बिहार में तेजस्वी के साथ चुनाव प्रचार की शुरुआत करेंगे. यह देखना दिलचस्प होगा कि जब राहुल और तेजस्वी की जोड़ी चुनावी मैदान में प्रचार करने उतरती है तो इसका कितना प्रभाव पड़ता है.
बिहार चुनाव 2025 कांग्रेस के लिए परीक्षा की घड़ी है. संगठन के बिना उम्मीदें पालना आत्मघाती है. यदि पार्टी को भविष्य में कोई भूमिका निभानी है, तो उसे नेतृत्व में स्पष्टता, संगठन में मजबूती और ज़मीनी हकीकत की समझ विकसित करनी होगी. वरना हर चुनाव में कांग्रेस सिर्फ गठबंधन का “अनिवार्य लेकिन अप्रभावी” घटक बनकर रह जाएगी.

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