Sunday, October 26, 2025

लोकआस्था के महापर्व छठ के आसरे लोकतंत्र का महापर्व को साधने की कवायद धर्मेंद्र कुमार



लोकआस्था का महापर्व छठ केवल एक पर्व नहीं अपितु त्याग,समर्पण,श्रद्धा, अनुशासन और सामाजिक समरसता का जीवंत दस्तावेज है. यह वह क्षण होता है जब करोड़ों श्रद्धालु प्रकृति, सूर्य और जल के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं. आस्था से जुड़ा दुनिया का एक मात्र ऐसा पर्व है जिसमें सबसे पहले डुबते हुए (अस्ताचलगामी) सूर्य को अर्घ्य देते हैं इस विश्वास के साथ कि कल नई उर्जा, उम्मीद व आकांक्षा के प्रतिकके तौर सबके कल्यार्थ भगवान भास्कर का उदय होगा और दूसरे दिन छठ व्रती उदीयमान अर्थात उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं. यही इस पर्व की विशेषता और महानता है. लेकिन जब केवल सत्ता के लिए इस आस्था का राजनीतिकरण किया जाता है, तो सवाल उठते हैं और उठने भी चाहिए.
 यमुना किनारे आस्था बनाम व्यवस्था
दिल्ली में छठ पूजा के लिए यमुना नदी के किनारे लाखों श्रद्धालु जुटते हैं. लेकिन इस बार दृश्य कुछ अलग होगा. आप जानते है कि बिहार में चुनाव का माहौल है और देश की राजधानी में बिहारियों की अच्छी खासी आबादी है तो भला प्रधानमंत्री कैसे पीछे रह जाते है. तो सोमवार की शाम को देश के प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी भी लोकआस्था के महापर्व के अवसर पर छठ व्रतियों के साथ यमुना नदी के घाट पर भगवान सूर्य को अर्घ्य देंगे देना भी चाहिए. लेकिन यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रधानमंत्री के लिए यमुना नदी के किनारे एक विशेष घाट बनाया गया है. नकली यमुना जिसमें फिल्टर पानी भरा गया है. वहीं आम जनता उसी असली यमुना में खड़ी हो कर भगवान सूर्य को अर्घ्य देगी, जिसकी हालत दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति की रिपोर्ट के अनुसार "गंदा ही नहीं, जहरीला" है.
सवाल यह नहीं कि प्रधानमंत्री अर्घ्य देंगे, सवाल यह है कि पिछले 11 वर्षों में उन्हें छठ की याद क्यों नहीं आई? और अब जब बिहार की राजनीति गरम है, तो अचानक सूर्योपासना की आस्था क्यों जाग गई?
 आस्था या राजनीतिक अवसरवाद
भाजपा ने इस बार छठ को एक राजनीतिक अवसर की तरह साधने के लिए वासुदेव घाट पर प्रधानमंत्री के लिए वजीराबाद जल शोधन संयंत्र से पाइपलाइन द्वारा फिल्टर पानी लाया गया. आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया कि यह पूर्वांचलियों को "मूर्ख बनाने" की कोशिश है. छठ के बहाने पूर्वांचलियों को लुभाने की कोशिश कोई नई बात नहीं. लेकिन जब आस्था को दिखावे और वोट के गणित से जोड़ दिया जाए, तो यह लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचाता है.

आम जनता के लिए जहरीली यमुना 

दिल्ली जल बोर्ड ने हथिनीकुंड बैराज से अतिरिक्त पानी छोड़ने और डी-फोमिंग स्प्रे के प्रयोग की बात कही. लेकिन क्या यह पर्याप्त है? रिपोर्टों के अनुसार यमुना में मल पदार्थ की मात्रा खतरनाक स्तर पर है. ऐसे में आम श्रद्धालु की सुरक्षा और स्वास्थ्य का क्या?
प्रधानमंत्री के लिए अलग घाट, अलग पानी, अलग व्यवस्था और आम जनता के लिए वही जहरीली यमुना. क्या यही लोकतंत्र है? क्या यही लोकआस्था का सम्मान है?
लोकआस्था के महापर्व छठ में दिखावा बिलकुल स्वीकार्य नहीं होता. व्रती बिना नमक का भोजन करते हैं, दिन-रात उपवास रखते हैं, और नदी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं. यह त्याग, अनुशासन और श्रद्धा का पर्व है. लेकिन जब इसी पर्व को राजनीतिक अवसर बना दिया जाए, तो यह आस्था का अपमान है.
लोकतंत्र का महापर्व चुनाव है. लेकिन अगर उसमें लोक की आस्था को केवल वोट के लिए इस्तेमाल किया जाए, तो यह लोकतंत्र नहीं, अवसरवाद है. छठ के बहाने राजनीति करना तो आसान है, लेकिन आस्था की गहराई को समझना बहुत कठिन.

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