जब शब्दों की चोट कम पड़ जाए, तब जूता बोलता है. यह गाथा उन जूतों की है, जो सिर्फ पैरों में नहीं रहे—कभी मंच पर उछले, कभी संसद में गूंजे, और कभी सड़क पर न्याय की पुकार बने. यह कथा है उन जूतों की, जो मौन नहीं रहे. जो सत्ता को चुनौती भी देते हैं, और कभी-कभी खुद सत्ता का प्रतीक बन जाते हैं.
जूता एक साधारण वस्तु नहीं, बल्कि एक असाधारण कथा है. यह सिर्फ चमड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि समाज का आईना है. जो जूता बनाता है, वह समाज की सीढ़ी के सबसे नीचे पायदान पर खड़ा होता है, और जो पहनता है, वह ऊँचाई पर बैठा अपनी प्रतिष्ठा नापता है. यही है हमारी सामाजिक विडंबना कि जूता बनाने वाला दलित होता है, जबकि पहनने वाला स्वर्ण जाति का . और बनाने वाले दलित को स्वर्ण समाज के समक्ष उसे पहनने की इजाजत भी नहीं है. जूता बनाने वाले को सदियों से दलित(‘नीच’) कहा गया, लेकिन उसके बनाए जूते ने ‘उच्च’ वर्ग की चाल को संभाला. समाजवाद की किताबों में बराबरी की बातें होती हैं, लेकिन जूता बताता है कि बराबरी सिर्फ भाषणों तक सीमित है. जूता पहनने वाला मंच पर भाषण देता है, और बनाने वाला मंच के नीचे बैठा तालियाँ बजाता है.
जहां चमकदार जूता आपकी हैसियत का प्रमाणपत्र है वहीं फटा हुआ जूता आपकी औकात का खुलासा. जूता देखकर लोग तय करते हैं कि आप किस कुर्सी पर बैठने लायक हैं. और दुल्हे को शादी में जूते की कीमत तब समझ आती है जब सालियाँ उसे चुरा लेती हैं. वह जूता नहीं, दहेज का हिस्सा हो जाता है.जिसे पाने के लिए बड़ी मशक्कत के साथ कीमत भी चुकानी पड़ती है.
जब न्यायालय के शीर्ष पर बैठे न्यायमूर्ति पर जूता फेंका गया, तब जूता सिर्फ वस्तु नहीं रहा बल्कि वह प्रतिरोध का प्रतिक बन गया. वह चीख था उस वर्ग का, जिसकी आवाज़ अदालतों में नहीं सुनी जाती है. जूता तब गूंगा नहीं था, वह बोल रहा था—“अब बहुत हो गया.”
जब मंदिर में पूजा करके बाहर आने पर जब जूता नदारद मिले तो समझ में आता है कि भगवान ने आशीर्वाद नहीं बल्कि कर्मों का हिसाब चुकता कर दिया है. मंदिर से जूता का गायब होना पुण्य नहीं बल्कि पापों की रसीद है. कभी-कभी लगता है कि भगवान भी कह रहे हैं—“अब नंगे पाँव चलो, ताकि अहंकार उतर जाए.”
जूते भी कई प्रकार के होतें हैं. राजनीतिक जूता जो विरोध में उड़ता है, शादी वाला जूता जो प्रेम और लेन-देन का प्रतीक है. स्कूल का जूता जो अनुशासन की मार झेलता है. फटा जूता जो गरीबी का दस्तावेज़ है और ब्रांडेड जूता जो दिखावे की दौड़ में सबसे आगे है. सैनिकों के जूते संघर्ष और समर्पण की कहानी कहते है. वह जाति धर्म से उपर उठ कर देश की सरहदों पर हर वक्त सैनिकों के साथ देश की सुरक्षा में तैनात रहता है. वह किसी भी परिस्थिती में देश के सम्मान के साथ समझौता नहीं करता जब कभी दुश्मनों के साथ संघर्ष के दौरान सैनिक शहीद हो जाता है तब भी जूता उसका साथ नहीं छोड़ता यही उसकी देश,समाज और सैनिक के प्रति समर्पण है.
जूता अब सिर्फ पहनने की वस्तु नहीं रहा, जहां वह हमारे समाज के ताने बाने में भेदभाव का प्रतिक है, वहीं सत्ता का प्रतीक है, और विरोध की भाषा है. जूता दिला सकता है मान, और जूता से हो सकता है अपमान. इसलिए अगली बार जब आप जूता पहनें, तो सोचिएगा—आप क्या पहन रहे हैं? एक वस्त्र? या एक विचार? जय राम जी की
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