Thursday, October 30, 2025

लोकतंत्र में लोकलुभावन वादों से कैसे होगा जनता का कल्याण? धर्मेंद्र कुमार


बिहार में चुनाव आते ही नेताओं की जुबान पर "जनकल्याण" के जुमले चिपक जाते हैं. इस दौरान हर गली, नुक्कड़, और चाय की दुकान पर बिना बादल, बिना मौसम, और बिना गारंटी के लगातार वादों की बरसात होती रहती है. हर चुनाव में नेता थोक के भाव में वादे करते हैं जैसे "हर युवा को नौकरी", "हर खेत को पानी", "हर घर को बिजली", और "हर वोट को सम्मान",महिलाओं को आर्थिक रुप से सशक्त बनाने के ले लोखों रुपये के लोन. अब तो नेताओं ने लोगों के आस्था को भी चुनावी वादों में शामिल करने का प्रयास किया. लेकिन जैसे ही चुनाव समाप्त होता है, नेताओं के ये खोखले वादे भी जुमलों में तब्दिल हो जाते हैं. जनता खेतों में पानी ढ़ूढ़ती रहती है और नेता सत्ता की मलाई चाभने में व्यस्त और मस्त रहते है. यही भारतीय लोकतंत्र की विशेषता है. हर पांच वर्षों के बाद सारी बेशर्मी को ताख पर रख कर उन्हीं वादों के साथ पुनः नेता जी जनता के समक्ष वोट मांगने के लिए प्रकट हो जाते है. यह भारतीय जनमानस की हृदय विशालता का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि जनता हर बार नेताओं के वादों पर भरोसा कर उन्हें अना समर्थन देती है. लेकिन मोटी चमड़े वाले नेताओं की नियत भी कुत्ते की दुम की तरह ही होती है.
आपको बता दें कि  लोकतंत्र में वादे करना एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है. इसमें पहले जनता की भावनाओं को मापा जाता है, फिर उन्हें लुभाने के लिए शब्दों का ऐसा मिश्रण तैयार होता है जो सुनने में तो मधुर व मनभावन लगे, लेकिन पूरा करना असंभव हो. शायद इसे ही "चुनावी जुगलबंदी" कहते हैं. जहां तक चुनावी वादों के बिहार मॉडल की बात है, तो यहां चुनावी वादे ऐसे होते हैं जैसे "बिहार को सिंगापुर बना देंगे", कोई कहता है "हर छात्र को लैपटॉप देंगे", और कोई तो "बेरोजगारी भत्ता" को ऐसे पेश करता है जैसे शादी में मिठाई बांटी जा रही हो.
 जनकल्याण की धारणा वास्तव में एक रहस्य है. नेता इसे हर भाषण में दोहराते हैं, लेकिन इसको पूरा करने का कोई ठोस आधार नहीं बताते हैं. शायद यह वही चीज है जो चुनाव के बाद गायब हो जाती है, जैसे सरकारी योजनाओं का बजट.  जब तक वादों की पूर्ति की कोई जवाबदेही नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र लोकलुभावन वादों का अखाड़ा बना रहेगा. जनता हर बार उम्मीदों की गठरी लेकर वोट देगी और हर बार उसकी झोली खाली ही रहेगी. क्योंकि कड़वी हकिकत यही है कि सिर्फ भाषण से कभी राशन नहीं मिलता.

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