Saturday, October 4, 2025

विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोट का गणित क्या बदलेगा सत्ता का समीकरण? ✍️ ध्रर्मेंद्र कुमार


पटना। बिहार की राजनीति में मुस्लिम मतदाता लंबे समय से एक निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं. एक बार फिर बिहार की राजनीति मुस्लिम वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूमती दिख रही है. जहां इंडिया गठबंधन मुस्लिम वोट के प्रति आश्वस्त दिख रहा है वहीं एनडीए ने घुसपैठ जैसे मुद्दे के आसरे हिंदु वोट को साधने का प्रयास शुरु कर दिया है. इन सबके बीच ओवैसी ने सीमांचल के 20 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर इंडिया गठबंधन की चिंता बढ़ा दी है. इस बार के चुनाव में सीमांचल से सत्ता में हिस्सेदारी और नेतृत्व की मांग उठने लगी है जो सिर्फ आश्वासन एवं वादे से दबाया नहीं जा सकता. राज्य की लगभग 18% मुस्लिम आबादी, विशेषकर सीमांचल क्षेत्र में, 2025 के विधानसभा चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकती है. कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया और अररिया जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाता 40–70% तक हैं, और इनकी लगभग 20 सीटों पर सीधा प्रभाव है. जिलावार विधानसबा सीटों की बात करें, तो किशनगंज जिला के तीन विधानसभा सीट किशनगंज, बहादुरगंज, ठाकुरगंज सीट, अररिया के नरपतगंज, जोकीहाट, अररिया, सिकटी विधानसभा वहीं पूर्णिया के अमौर, बैसी, कदवा, पूर्णिया और कटिहार जिला के कटिहार, बलरामपुर, बरारी, मनिहारी विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाता की आबादी की बहुलता सीधे तौर पर निर्णायक होती है. इसके अलावा दरभंगा की केवटी, बहादुरपुर, हायाघाट और  मधुबनी की फुलपरास, खजौली सीटों पर मुस्लिम मतदाता फैक्टर रहा है. इतनी ही नहीं गया जिला के वजीरगंज, इमामगंज और सीवान के दरौंधा, रघुनाथपुर विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की आबादी सीमांचल की अपेक्षाककृ कम है बावजूद इसके इन सीटों पर भी मुस्लिम मतदाताओं का प्रभाव रहता है.

किसे कितना मिला वोट
बिहार में मुस्लिम वोट की बात करें तो 2015 में राजद,जदयू और कांग्रेस गठबंधन को फायदा मिला था. इस गठबंधन को लगभग 85 प्रतिशत मुस्लिम वोट मिले थे. वहीं एनडीए के बीजेपी,एलजेपी व अन्य गठबंधन को लगभग 7 प्रतिशत वोट पर ही संतोष करना पड़ा था. जबकि 2020 में जब जदयू एनडीए में शामिल हो कर चुनाव लड़ा तो मुस्लिम वोट में 5 प्रतिशत का इजाफा हुआ और एनडीए को कुल 12 प्रतिशत मुस्लिम वोट मिला. वहीं इंडिया गठबंधन को 8 प्रतिशत का नुकसान हुआ और 77 प्रतिशत वोट मिला था. वहीं ओवैसी की पार्टी ने 11 प्रतिशत वोट प्राप्त कर सीमांचल की 5 सीटों पर जीत हासिल की. इस बार ओवैसी सीमांचल की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की बात कर रहे हैं. यदि ओवैसी सीमांचल के 20 सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारते है तो मुस्लिम वोट का बिखरना तय माना जा रहा है. जानकारों की माने तो इसका असर पूरे बिहार चुनाव में दिखेगा. ऐसे में सीधा नुकसान तो इंडिया गठबंधन को होता दिख रहा है. 

ओवैसी ने बढ़ाई परेशानी

2020 में AIMIM ने सीमांचल की 5 सीटें जीतकर यह साबित किया कि मुस्लिम नेतृत्व की मांग को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. बावजूद इसके, बार-बार आग्रह के बाद भी ओवैसी की पार्टी को इंडिया गठबंधन में शामिल नहीं किया जाने से सीमांचल में ओवैसी का पक्ष मजबूत होता दिख रहा है. इस संबंध में गठबंधन के नेताओं का तर्क था कि AIMIM की मौजूदगी से वोटों का ध्रुवीकरण होगा, वहीं ओवैसी ने इसे "मुस्लिम नेतृत्व को नकारने की साजिश" बताया है और सीमांचल की सभी मुस्लिम बहुल सीटों पर प्रत्याशी उतारने का ऐलान किया है. लेकिन सीमांचल की राजनीति केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है. बल्कि यहाँ की जनता भावनात्मक और आध्यात्मिक अभिव्यक्तियों से जुड़ी है. ओवैसी की भाषण शैली और सांस्कृतिक जुड़ाव इस भावभूमि को छूते हैं, जबकि INDIA गठबंधन इस पहलू को नज़रअंदाज़ करता दिख रहा है. इससे वोटों के विभाजन की आशंका है, जिससे राजद-कांग्रेस को नुकसान और एनडीए को अप्रत्यक्ष रुप से लाभ मिल सकता है. जाहिर तौर पर यदि 20 सीटें प्रभावित होंगी तो इसका सीधा लाभ एनडीए को मिलेगा और इंडिया गठबंधन सत्ता से दूर रह जाएगा.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या गठबंधन की रणनीतिक चूक सीमांचल में भारी पड़ेगी? क्या ओवैसी की भावनात्मक अपील मुस्लिम मतदाताओं को संगठित कर पाएगी? और क्या सांस्कृतिक-सामाजिक जुड़ाव को नज़रअंदाज़ करना राजनीतिक नुकसान का कारण बनेगा?
2025 का चुनाव इन सवालों के जवाब देगा. लेकिन इतना तय है कि सीमांचल की राजनीति अब केवल जाति और विकास की बात नहीं है बल्कि यह भावनाओं, नेतृत्व की पहचान और सांस्कृतिक आत्मसम्मान की भी लड़ाई बन चुकी है. वैसे चुनाव संभावनाओं का खेल है अंतिम समय जनता क्या निर्णय करती है यह उसके विवेक पर निर्भर करता है. कई बार जनता ने तमाम विशेषज्ञों की भविष्यवाणी को पलट कर रख दिया है. तो थोड़ा करिए इंतजार, नमस्कार.

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