छात्रों के आंदोलन को डिरेल करना चाहती है सरकार? धर्मेंद्र कुमार
छात्रों के आंदोलन को डिरेल करना चाहती है सरकार?
धर्मेंद्र कुमार
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब देश का भविष्य सड़कों पर उतरकर अपने हक और न्याय की भीख मांगने को मजबूर हो जाए, तो वह स्थिति किसी भी चुनी हुई सत्ता की नैतिक और प्रशासनिक विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण बन जाती है। वर्तमान में दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट (NEET) 2026 पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की मांग को लेकर चल रहा ऐतिहासिक छात्र आंदोलन इसी कड़वी हकीकत को बयां कर रहा है। इस युवा आंदोलन को कुचलने, बदनाम करने और इसके मुख्य मुद्दों से भटकाकर इसे 'डिरेल' करने के सत्ता प्रायोजित प्रयास अब पूरी तरह सतह पर आ चुके हैं। सत्ता का यह चरित्र होता है कि उसके खिलाफ उठने वाली सभी आवाजों को किसी भी तरह खामोश कर दिया जाए। वर्तमान सरकार भी इसी प्रयास में है। सवाल यह है कि क्या छात्रों द्वारा पेपर लीक पर रोक लगाने और शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की करना गलत है ? और यदि बच्चों की मांग सही है तो इनसे संवाद करने में सरकार को क्या परेशानी है ? ये बच्चे अपने ही तो हैं।
लाठी और आंसू गैस से आवाज दबाने की कोशिश
जब सत्ता का अहंकार सर चढ़ कर बोलता है तो सरकार किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन को डिरेल करना उनकी पहली प्राथमिकता होती है। 20 जुलाई 2026 को जब युवाओं ने 'संसद चलो' मार्च का आह्वान किया, तब शांतिपूर्ण मार्च पर दिल्ली पुलिस द्वारा बर्बर लाठीचार्ज किया गया और आंसू गैस के गोले छोड़े गए। यह दमन इस बात का साफ संकेत है कि सरकार छात्रों के तर्कसंगत सवालों का सामना करने के बजाय उन्हें भयभीत कर घर वापस भेजने की हड़बड़ी में थी। इसके अतिरिक्त, जंतर-मंतर के 1.5 किलोमीटर के दायरे में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद करना और धारा 144 का हवाला देकर छात्रों को ऑटो-रिक्शा से उतारकर धरना स्थल तक पहुंचने से रोकना, साफ तौर पर आंदोलन की रीढ़ को तोड़ने और उसके संचार तंत्र को ठप करने की प्रशासनिक साजिश है।
'विदेशी' और 'आतंकवादी' नैरेटिव गढ़ने की राजनीति
जब सरकार ने यह महसूस किया कि बलप्रयोग से इस आंदोलन को समाप्त नहीं किया जा सकता है। तब उनके द्वारा अपने मीडिया सेल को एक्टिव किया गया। तब सरकार ने आंदोलन को वैचारिक रूप से अपवित्र करने का खेल शुरू किया। सरकार और उसके नुमाइंदों का रवैया इस बात की तस्दीक करता है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा प्रदर्शनकारी छात्रों को "आतंकवादियों की बी-टीम" कहना, भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा छात्रों को देशद्रोही कहना लोकतांत्रिक मर्यादाओं का खुला उल्लंघन है। इतना ही नहीं, सोशल मीडिया और सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं द्वारा इन मेधावी छात्रों को समाज पर हमला करने वाले "तिलचट्टे" और "दीमक" के रूप में प्रचारित करना, उनके आंदोलन के प्रति आम जनता की सहानुभूति को खत्म करने की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। जब एक जायज मांग को 'देशविरोधी' या राजनीतिक एजेंडा बताया जाता है, तो मूल मुद्दा स्वतः ही विमर्श से बाहर हो जाता है। और सरकार की मंशा यही है।
सांप्रदायिक और हिंसक रंग देने की साजिश
इस आंदोलन को डिरेल करने का सबसे खतरनाक प्रयास इसे 'हाईजैक' करने का नैरेटिव गढ़ना है। वर्तमान में यह खबरें फैलाई जा रही हैं कि शांतिपूर्ण भीड़ में धार्मिक नारे लगे और हथियारों का प्रदर्शन हुआ। हालांकि आंदोलन के प्रणेताओं और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के करीबियों ने स्पष्ट अपील की है कि दिल्ली में अन्यत्र होने वाली किसी भी हिंसा या बाहरी तत्वों को जंतर-मंतर के अनुशासित छात्रों से कोई सरोकार नहीं है। स्पष्ट है कि जब छात्रों की नैतिक ताकत को हराना असंभव हो जाता है, तो व्यवस्था उसमें अराजकता का तत्व ढूंढने या खुद प्लांट करने का प्रयास करती है ताकि जनता की नजरों में आंदोलन अपनी शुचिता खो दे।
खोखली बातचीत का दिखावा और जवाबदेही से पलायन
सरकार द्वारा बातचीत के निमंत्रण को भी आंदोलन को कमजोर करने के एक टूल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। 25 दिनों के बाद बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा द्वारा बातचीत का जो प्रस्ताव दिया गया, उसे छात्रों ने इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि सरकार बंद कमरों में अपनी शर्तों पर बात करना चाहती है। जबकि छात्र खुले मंच पर पारदर्शी संवाद करना चाहते हैं ताकि जो भी बातें हो वह सबके सामने हो। वहीं प्रधानमंत्री द्वारा इतने दिनों बाद फास्ट-ट्रैक कोर्ट के गठन की घोषणा सिर्फ एक कानूनी प्रक्रियात्मक लीपापोती है, क्योंकि प्रधानमंत्री की नीयत छात्रों की समस्याओं के समाधान का नहीं बल्कि उनको लुभाने और भरमाने का है। वरना वो संसद के चल रहे मानसूत्र में संसद के पटल पर बयान देकर ना सिर्फ बच्चों बल्कि विपक्ष सहित पूरे देश को विश्वास दिलाते की सरकार इस मामले में कार्रवाई करने के लिए पर्तिबद्ध है। जब तक शिक्षा मंत्री का इस्तीफा नहीं होता और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के ढांचे को पूरी तरह बदला नहीं जाता, तब तक हर सरकारी आश्वासन छात्रों को थकाकर घर भेजने का एक जरिया मात्र है।
सच्चाई यह है कि यह आंदोलन केवल परीक्षा घोटाले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के युवाओं का उस पूरी जर्जर व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह है जो उनके भविष्य को अंधकार में धकेल रही है। लाठीचार्ज, इंटरनेट बंदी, चरित्र-हनन और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के प्रयास इस बात के पुख्ता गवाह हैं कि सरकार किसी भी कीमत पर इस आंदोलन को डिरेल करना चाहती है। लेकिन सत्ता को यह समझना होगा कि राष्ट्र का भविष्य युवा अब सरकार चालबाजियों से बहलने वाले नहीं हैं। दमन से आक्रोश केवल दबता है, समाप्त नहीं होता।
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