छात्रों के आंदोलन से राहुल गांधी की दूरी क्यों? धर्मेंद्र कुमार

छात्रों के आंदोलन से राहुल गांधी की दूरी क्यों?
 धर्मेंद्र कुमार

भारतीय राजनीति में आंदोलनों और भूख हड़तालों का अपना अलग इतिहास रहा है। जब सरकार समान्य तौर पर लोगों की मांगों पर विचार नहीं करती है। तब सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ अपनी बातों को जोरदार तरीके से सांगठनिक तौर पर रखने को आंदोलन कहते हैं। अन्ना हज़ारे का 2011 का आंदोलन हो या जेपी आंदोलन, विपक्षी नेताओं की मौजूदगी अक्सर इन आंदोलनों को वैधता और ताक़त देती रही है। लेकिन दिल्ली के जंतर मंतर पर पिछले लगभग 25 दिनों से पेपर लीक मामले को लेकर आंदोलन कर रहे कॉककरोच जनता पार्टी(सीजेपी)से राहुल गांधी की दूरी को लेकर अब सवाल खड़े होने लगे हैं। वहीं इस आंदोलन को मजबूती प्रदान करने के लिए सोनम वांगचुक पिछले 19 दिनों से भूख हड़ताल पर हैं। विपक्षी के कई नेताओं ने वांगचुक से मिल कर उन्हें अपना समर्थन दिया है। ऐसे में देश में विपक्ष के सबसे बड़े दल के नेता के तौर राहुल गांधी का इस आंदोलन से दूर रहना समझ से परे है। जबकि कांग्रेस पार्टी द्वारा जून में ही कोटा में आयोजित गूंज कार्यक्रम में छात्रों से मिले थे और उनकी समस्याओं पर बात की थी। 17 जुलाई को भी देहरादून में कांग्रेस द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रम गूंज में राहूल छात्रों से सीधे संवाद करेंगे। देश के कोने कोने में राहुल गंधी छात्रों से मिल रहे हैं, बात कर रहे हैं। लेकिन शिक्षा व्यवस्था में बदलाव एवं शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे छात्रों एवं युवाओं से दूरी बनाए हुए हैं।   

दूरी के पीछे संभावित कारण

 कांग्रेस नेतृत्व शायद इस आंदोलन को पूरी तरह से अपनाने से हिचक रहा है। उनका माना है कि सीजेपी का आंदोलन अपेक्षाकृत नया है और इसे समर्थन देने से कांग्रेस पर आरोप लग सकते हैं कि वह "अनियमितताओं" के मुद्दे को राजनीतिक हथियार बना रही है। वहीं सोनम वांगचुक को एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते है। ऐसे में राहुल गांधी की मौजूदगी आंदोलन को "कांग्रेस प्रायोजित" बना सकती थी, जिससे वांगचुक की नैतिक ताक़त कमज़ोर पड़ सकती है, और यह आंदोलन विपक्ष बनाम सत्ता पक्ष का हो कर रह जाएगा। जिससे संभवतः आंदोलनरत छात्रों के नुकसान हो। वहीं जानकारों का मानना है कि विपक्षी दलों में एकजुटता की कमी कांग्रेस को आगे बढ़ने से रोक रही हैं। 2011 में अन्ना के आंदोलन में विपक्षी नेताओं और हस्तियों की भीड़ थी। इस बार विपक्ष बिखरा हुआ है और कांग्रेस शायद अकेले इस आंदोलन का भार उठाने से बच रही है। भले ही राहुल गांधी की इस आंदोलन से दूरी को कांग्रेस "रणनीतिक विवेक" बता सकती है, लेकिन यह दूरी जनता के बीच यह संदेश दे सकती है कि कांग्रेस को छात्रो की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं राहुल केवल दिखावा कर अपनी राजनीतिक रोटी सेकने का काम कर रहे हैं। यह राहुल गंधी और कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। जबकि राहुल गांधी के लिए यह एक अच्छा अवसर है, इस आंदोलन के बहाने वे छात्रों के साथ ही पूरे युवा वर्ग तक अपनी बातें पहुंचा सकते हैं। छात्रों और युवा वर्ग का भरोसा जीतकर वे युवाओं के रोल मॉडल बन सकते है। राहुल गांधी के इस आंदलन से जुड़ते ही पार्टी का कार्यकर्ता एवं समर्थक भी स्वंय जुड़ने लगेंगे और सरकार पर दबाव बढ़ेगा। ऐसे भी राहुल व कांग्रेस पार्टी के लिए इसमें खोने को कुछ भी नहीं हैं। सरकार झुकती है तो कांग्रेस इसका क्रेडिट ले सकती है नहीं तो वह इसको सरकार के खिलाफ एक बड़े मुद्दे तौर पर इस्तेमाल कर सकती है। 
राहुल गांधी का आंदोलन से दूर रहना कांग्रेस की राजनीतिक गणना का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह कदम उन्हें जनता के बीच "संवेदनशील विपक्षी नेता" की छवि बनाने से रोकता है। भारतीय राजनीति में आंदोलनों से दूरी अक्सर अवसर गंवाने के बराबर होती है। सवाल यही है कि क्या कांग्रेस ने इस दूरी से अपनी राजनीतिक साख बचा पाएगी, या फिर जनता की समर्थन पाने का एक और मौका खो दिया है?

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