जो मौन हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध – धर्मेंद्र कुमार
जो मौन हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध
– धर्मेंद्र कुमार
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने आपातकाल के दौर में चेताया था – “समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध; जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।”
यह चेतावनी आज के भारत में और भी प्रासंगिक हो उठी है। संविधानिक रूप से भले ही आपातकाल घोषित न हो, लेकिन हालात किसी अघोषित इमरजेंसी से कम नहीं लगते। अन्याय और शोषण के समय मौन रहना भी अपराध है। दिनकर ने तटस्थता को पाप के बराबर माना था—और आज यह पंक्ति लोकतंत्र की आत्मा को झकझोरती है।
तटस्थता का भ्रम
तटस्थता को अक्सर निष्पक्षता का नाम दिया जाता है। लेकिन जब समाज अन्याय और असमानता से जूझ रहा हो, तब तटस्थ रहना वस्तुतः अन्याय का समर्थन बन जाता है। जब सत्ता सवाल पूछने को गुनाह बना दे, असहमति को देशद्रोह ठहराया जाने लगे, तब मौन रहना लोकतंत्र की नींव को खोखला करता है। जनता की चुप्पी ही सत्ता को निरंकुश बनाती है। इतिहास केवल सक्रिय भागीदारी करने वालों को नहीं, बल्कि मौन रहने वालों को भी दर्ज करता है—और यह दर्ज़ होना अपराध की तरह ही होता है।
युवाओं का संघर्ष, समाज की चुप्पी
पिछले पंद्रह दिनों से देशभर में युवा पेपर लीक के खिलाफ सड़कों पर हैं। उनकी मांगें न्यायसंगत हैं—पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई। लेकिन समाज का बड़ा हिस्सा इसे “अपना मुद्दा नहीं” मानकर चुप है। यह चुप्पी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर भारी पड़ेगी। लोकतंत्र केवल मतदान से नहीं, बल्कि नागरिकों की सजग भागीदारी से जीवित रहता है। मौन नागरिक लोकतंत्र को कमजोर करते हैं, जबकि सक्रिय नागरिक ही सत्ता को जवाबदेह बनाते हैं।
बुद्धिजीवी और मीडिया की भूमिका
सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि समाज के अग्रणी—लेखक, विचारक, बुद्धिजीवी—भी मौन हैं। जब नेतृत्व करने वाले ही चुप हों, तो समाज को दिशा कौन देगा? लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया भी सत्ता के दबाव में झुक चुका है। परिणामस्वरूप जनता तक सही सवाल और सच्चाई नहीं पहुंच पा रही।
दिनकर की कविता हमें याद दिलाती है कि मौन रहना उतना ही बड़ा अपराध है जितना अन्याय करना। लोकतंत्र में तटस्थता कोई सुरक्षित विकल्प नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक अपराध है। यदि समाज मौन रहा, तो आने वाली पीढ़ियाँ इसकी कीमत चुकाएँगी। इतिहास मौन समाज को कभी माफ़ नहीं करता।
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