लोकतंत्र की छाती पर लाठियां और जवाबदेही के सुलगते सवाल -- धर्मेंद्र कुमार

लोकतंत्र की छाती पर लाठियां और जवाबदेही के सुलगते सवाल -- धर्मेंद्र कुमार 


दिल्ली की सड़कों पर परीक्षा सुधारों और धांधलियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर रहे छात्रों का आंदोलन अब भले ही शांत हो गया हो, लेकिन 20 जुलाई की उस काली तारीख ने देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर गहरे घाव छोड़े हैं। आंदोलन स्थगित होना इस बात की गारंटी नहीं है कि उस दिन जो बर्बरता हुई, उस पर मिट्टी डाल दी जाए। आज भी दिल्ली की फिजाओं में कई गंभीर और तीखे सवाल तैर रहे हैं, जिनका जवाब दिए बिना सरकार सदन में अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकती। मॉनलून सत्र के दौरान विपक्ष सदन में पेपर लीक एवं शिक्षा व्यवस्था में सुधार जैसे युवाओं से जुड़े गंभीर विषय पर चर्चा करें। साथ ही छात्रों पर दिल्ली पुलिस द्वारा की गई बर्बरतापूर्ण कार्रवाई पर भी सरकार को सदन में जवाब देने के लिए मजबूर करें।
सबसे बड़ा और बुनियादी सवाल यह है कि 20 जुलाई को निहत्थे छात्रों पर बर्बरता से लाठीचार्ज करने का आदेश आखिरकार किसने दिया था? संसद मार्च कर रहे देश के भविष्य पर उस बलप्रयोग की क्या सीमा तय की गई थी, जिसमें कथित तौर पर पेलेट गन और कीलें लगी लाठियों के इस्तेमाल की भयावह तस्वीरें सामने आईं? लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन क्या सरकार ने छात्रों को अपराधी मान लिया था? मॉनलून सत्र के दौरान विपक्ष सदन में पेपर लीक एवं शिक्षा व्यवस्था में सुधार जैसे युवाओं से जुड़े गंभीर विषय पर चर्चा करें। साथ ही छ
इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली और संदिग्ध बात प्रदर्शन स्थल पर सादे लिबास में घूम रहे उन अज्ञात हुड़दंगियों की मौजूदगी थी, जिनके हाथों में डंडे थे और जिन्हें पुलिस का खुला संरक्षण प्राप्त था। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो गवाही दे रहे हैं कि हेलमेट पहने ये सादे कपड़ों वाले लोग प्रदर्शनकारियों पर लाठियां भांज रहे थे। दिल्ली पुलिस को अपनी प्रशासनिक जवाबदेही के तहत यह स्पष्ट करना होगा कि वे 'गुंडे' कौन थे? क्या वे पुलिस महकमे के ही लोग थे या उन्हें प्रदर्शन को हिंसक बनाने के लिए जानबूझकर संरक्षण दिया गया था? बिना नंबर प्लेट की आरएएफ (RAF) और पुलिस की गाड़ियां वहां क्या कर रही थीं? क्या यह पहचान छुपाकर कानूनी कार्रवाई से बचने की कोई सोची-समझी रणनीति थी?
सदन में सरकार को घेरने का सबसे बड़ा हथियार महिला प्रदर्शनकारियों के साथ हुई बदसलूकी बनेगी। वीडियो साक्ष्यों में पुरुष पुलिस कर्मियों को युवा छात्राओं को दौड़ा-दौड़ा कर पीटते और घसीटते देखा गया। क्या दिल्ली पुलिस के पास महिला प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए महिला विंग नहीं थी? महिलाओं पर हाथ उठाने वाले उन जवानों पर अब तक क्या दंडात्मक कार्रवाई हुई है?
चूंकि दिल्ली पुलिस सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के अधीन आती है, इसलिए जवाबदेही का सिरा सीधे गृहमंत्री के दफ्तर तक जाता है। क्या यह सब शीर्ष नेतृत्व के इशारे पर हुआ, या पुलिस अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर निरंकुश हो चुकी थी? अगर सरकार संसद में इन सवालों के ठोस और निष्पक्ष जवाब नहीं देती, तो यह साफ हो जाएगा कि सत्ता अब युवाओं के संवाद से डरती है और केवल दमन के बल पर व्यवस्था चलाना चाहती है। सरकार को यह समझना होगा कि छात्रों की आवाज को दबाया जा सकता है, लेकिन उनके द्वारा उठाए गए जायज सवालों को हमेशा के लिए दफन नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है कि सत्ता आलोचना को सुनने का साहस रखे।

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