संसद में घमासान: कैसे निकलेगा समाधान ? धर्मेंद्र कुमार

संसद में घमासान: कैसे निकलेगा समाधान ?
 धर्मेंद्र कुमार

संसद लोकतंत्र का वो सर्वोच्च मंच है जहां देश की दशा और दिशा तय होती है। जहां जनता की समस्याओं का समाधान खोजा जाता है। लेकिन हाल के दिनों में संसद का दृश्य देखकर यह बुनियादी परिभाषा धुंधली होती नजर आ रही है। विशेषकर युवाओं, पेपर लीक और चरमराती शिक्षा व्यवस्था जैसे अत्यंत संवेदनशील और गंभीर विषय पर जो सार्थक चर्चा होनी चाहिए थी, वह पूरी तरह डिरेल (पटरी से उतर) हो चुकी है। देश का भविष्य तय करने वाली यह बहस अब सत्ता पक्ष और विपक्ष के व्यक्तिगत 'अहम' और 'सम्मान' की लड़ाई में तब्दील हो गई है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या इस राजनीतिक घमासान से देश के करोड़ों युवाओं की समस्या का कोई वास्तविक समाधान निकल पाएगा?

अहं के टकराव में पिसता युवाओं का भविष्य
इस पूरे विवाद के केंद्र में शिक्षा व्यवस्था की खामियां और पेपर लीक की निरंतर घटनाएं हैं, लेकिन संसद के भीतर का विमर्श कहीं और ही भटक गया है। प्रियंका गांधी द्वारा नए शिक्षा मंत्री प्रहलाद जोशी पर की गई टिप्पणी के बाद संसद की कार्यवाही मुद्दों से ज्यादा मर्यादा और सम्मान की जंग बन गई। सत्ता पक्ष इस टिप्पणी को अपने मंत्रियों और सरकार के 'अपमान' और 'सम्मान' से जोड़कर देख रहा है, वहीं विपक्ष इसे सरकार की नाकामी को उजागर करने का जरिया मान रहा है।
इस राजनीतिक नूराकुश्ती का सबसे दुखद पहलू यह है कि लाखों युवाओं की मूल समस्या अब हाशिए पर चली गई है। छात्र महीनों-सालों तक रात-दिन एक करके परीक्षा की तैयारी करते हैं, लेकिन अंत में उन्हें मिलता है पेपर लीक और परीक्षा रद्द होने का मानसिक अवसाद। जब जनता के प्रतिनिधि संसद में बैठते हैं, तो छात्रों को उम्मीद होती है कि उनकी इस पीड़ा पर मरहम लगाया जाएगा, न कि राजनीतिक दलों के आपसी अहं को संतुष्ट किया जाएगा।

 क्या सिर्फ सख्त कानून ही समाधान है?
पेपर लीक की बीमारी को रोकने के लिए सरकार ने 2024 में कानून बनाए थे, उसके बावजूद पेपर लीक औऱ परीक्षाओं में गड़बड़ीयां हुई। अब इस कानून को और अधिक सख्त करने तथा इसमें संशोधनों की बात की जा रही है। सच्चाई यह है कि केवल कागजों पर कड़े कानून बना देने से अपराध नहीं रुकते। अगर ऐसा होता, तो पुराने कानून के रहते हुए भी पेपर लीक के संगठित गिरोह इस कदर बेखौफ न होते। बड़ा सवाल यह है कि क्या कानून में सजा की अवधि बढ़ा देने या जुर्माने की रकम दोगुनी कर देने से पेपर लीक होना बंद हो जाएगा? इसका सीधा जवाब है नहीं। जब तक कानून का क्रियान्वयन पूरी ईमानदारी से नहीं होगा और लीक की कड़ियों को अंदर से संरक्षण देने वाले सफेदपोशों पर शिकंजा नहीं कसेगा, तब तक नए संशोधन भी सिर्फ एक कागजी हथियार बनकर रह जाएंगे।

 नीति से नहीं 'नियत' से बदलेगी तस्वीर
शिक्षा व्यवस्था में सुधार और परीक्षाओं की शुचिता को बहाल करना किसी एक नए कानून या किसी नई प्रशासनिक कमिटी के गठन मात्र से संभव नहीं है। इसके लिए सबसे बुनियादी जरूरत है सरकार की साफ नियत और एक बेहद संवेदनशील दृष्टिकोण। शिक्षा को एक प्रशासनिक विषय के बजाय मानवीय और राष्ट्रीय भविष्य के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। जब तक व्यवस्था छात्रों के समय, पैसे और मानसिक तनाव को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाएगी, तब तक हर सुधार अधूरा रहेगा। पेपर लीक केवल तकनीकी खामी नहीं, बल्कि प्रशासनिक मिलीभगत और भ्रष्टाचार का नतीजा है। जब तक शीर्ष अधिकारियों और परीक्षा आयोजित कराने वाली संस्थाओं की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक लीक प्रूफ व्यवस्था का दावा खोखला ही रहेगा। सरकार को रक्षात्मक रवैया छोड़कर इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार करना होगा कि व्यवस्था में गहरी खामियां हैं। विपक्ष को भी केवल नारेबाजी से आगे बढ़कर रचनात्मक और व्यावहारिक सुझाव देने होंगे। 
संसद में चल रहा घमासान देश के युवाओं के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है। समाधान किसी के 'अहम' की जीत या किसी के 'सम्मान' की रक्षा से नहीं, बल्कि संसद के भीतर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एक सुर में छात्रों के हक में खड़े होने से निकलेगा।
सरकार को यह समझना होगा कि मजबूत नीतियां केवल मजबूत 'नियत' से ही जमीन पर उतरती हैं। जब तक सत्ता पक्ष और विपक्ष अपनी राजनीतिक प्रतिद्वंदिता को किनारे रखकर युवाओं के भविष्य को अपनी पहली प्राथमिकता नहीं बनाएंगे, तब तक 'संसद में घमासान' तो जारी रहेगा, लेकिन 'समाधान' हमेशा की तरह कोसों दूर रहेगा। देश के युवाओं को खोखले आश्वासनों और सख्त कानूनों की किताबों से ज्यादा, एक पारदर्शी, सुरक्षित और न्यायसंगत परीक्षा तंत्र जरुरत है।

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