संसद का मॉनसून सत्र और विपक्ष की चुनौती --धर्मेंद्र कुमार
संसद का मॉनसून सत्र और विपक्ष की चुनौती
--धर्मेंद्र कुमार
भारतीय लोकतंत्र में संसद का हर सत्र केवल विधायी कार्यवाही का मंच नहीं होता, बल्कि अक्सर यह सत्ता और विपक्ष के बीच राजनीतिक संघर्ष का अखाड़ा भी बन जाता है। 20 जुलाई से शुरू होने जा रहे संसद के मॉनसून सत्र में विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपनी भूमिका को केवल शोरगुल तक सीमित न रखे, बल्कि ठोस मुद्दों पर सरकार को घेरने में सफल हो। बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार विपक्ष अपनी भूमिका को सार्थक ढंग से निभा पाएगा या फिर वही पुराने आरोप-प्रत्यारोप और शोरगुल में सत्र का अधिकांश समय व्यर्थ जाएगा।
वोट चोरी और एसआईआर विवाद
इस बार विपक्ष के एजेंडे में महंगाई, बेरोजगारी स्वास्थ्य के साथ सबसे प्रमुख मुद्दा वोट चोरी और एसआईआर विवाद है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल लगातार केंद्रीय चुनाव आयोग एवं सरकार पर वोट चोरी का आरोप लगाते रहे हैं। उनका कहना है कि हाल के दिनों में चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी आई है। एसआईआर के नाम पर जो कुछ हुआ है, वह लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करता है। दिलचस्प बात यह है कि एसआईआर जैसे मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा हो रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ(यूएनओ) तक में इसकी गूंज सुनाई दी है। ऐसे में यदि विपक्ष इस सत्र में इस विषय को नहीं उठाता, तो जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि उसने मौन स्वीकृति दे दी है। विपक्ष के लिए यह राजनीतिक आत्मघाती कदम होगा, क्योंकि उसकी पहचान ही सरकार की जवाबदेही तय करने से जुड़ी है। वहीं एसआईआर जैसे मुद्दों पर संसद में सरकार द्वारा जवाब देना बहुत कठिन होगा, सरकार इससे बचने की कोशिश करेगी।
पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था
दूसरा बड़ा मुद्दा है पेपर लीक। हाल के वर्षों में बार-बार परीक्षा प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं ने शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। इसके कारण लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित होता है, और यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि सामाजिक अन्याय भी है। विपक्ष यदि इस मुद्दे को संसद में मजबूती से उठाता है, तो वह न केवल सरकार को जवाबदेह बनाएगा बल्कि वह युवाओं का विश्वास भी अर्जित कर पाएगा।
विपक्ष की रणनीतिक दुविधा
विपक्ष के सामने चुनौती यह भी है कि वह इन मुद्दों को किस तरह प्रस्तुत करता है। यदि वह केवल नारेबाजी और वॉकआउट तक सीमित रहता है, तो जनता में यह धारणा बनेगी कि विपक्ष गंभीर बहस से बच रहा है। लेकिन यदि वह ठोस आंकड़ों, रिपोर्टों और वैकल्पिक सुझावों के साथ सरकार को घेरता है, इन मुद्दों पर सरकार को बहस कराने के मजबूर करता है तो उसकी भूमिका सार्थक और प्रभावी होगी।
लोकतांत्रिक संतुलन की कसौटी
संसद का मॉनसून सत्र इस बात की कसौटी बनेगा कि क्या विपक्ष वास्तव में लोकतंत्र की रक्षा के लिए खड़ा है या केवल राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए कार्य कर रहा है। राम मंदिर में चोरी, वोट चोरी और एसआईआर विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर बहस से बचना विपक्ष की कमजोरी होगी, जबकि इन पर गंभीर विमर्श करना उसकी ताकत। इसी तरह पेपर लीक जैसे मुद्दे पर ठोस बहस विपक्ष को जनता के साथ जोड़ सकती है।
मॉनसून सत्र विपक्ष के लिए परीक्षा की घड़ी है। क्या वह जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतर पाएगा? यदि विपक्ष केवल शोरगुल और अवरोध की राजनीति करेगा, तो उसकी भूमिका खोखली साबित होगी। लेकिन यदि वह ठोस मुद्दों पर गंभीर बहस करेगा, सरकार को जवाबदेह बनाएगा और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करेगा, तो उसकी भूमिका न केवल सार्थक होगी बल्कि लोकतंत्र को भी मजबूती प्रदान करेगी और जनता भी उसे गंभीर विकल्प के तौर पर स्वीकार करेगी। जनता के मन में अब भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या विपक्ष इस बार उनकी आवाज बन पाएगा, या फिर संसद का मॉनसून सत्र भी केवल राजनीतिक नाटक बनकर रह जाएगा?
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