Tuesday, September 30, 2025

तुष्टिकरण बनाम ध्रुवीकरण: भारतीय राजनीति का बदलता परिदृश्य ✍️ धर्मेन्द्र कुमार


भारतीय लोकतंत्र में चुनावी राजनीति का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. आज राजनीतिक विमर्श धर्म, जाति और पहचान की राजनीति में उलझ कर रह गया है. जब धर्म, जाति औऱ पहचान सियासत के लिए ईंधन का काम करने लगे तो सत्ता में बैठे लोगों की कोशिश होती है कि वो देश में लगातार ऐसा वातावरण बनी रहे ताकि लोग धर्म, जाति औऱ पहचान से इतर कुछ और ना सोच सकें. इसके लिए वो तमाम तरह के हथकंडे अपनाते भी हैं. और यह सब उनकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है ताकि जनता शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और महंगाई जैसे असल मुद्दों पर सवाल न उठाए? सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समाज का बुद्धिजीवी वर्ग भी इन मुद्दों पर बंटा हुआ नजर आता है. चिंता तब और बढ़ जाती है बुद्धिजीवी वर्ग लोग भी इन मुद्दों पर तथ्यहीन तर्क के आधार पर गलत बातों को सही साबित करने के लिए हरसंभव प्रयास करते है.

सत्ता की रणनीति: ध्यान भटकाओ, भावनाएं भड़काओ

जहां ध्रुवीकरण का उद्देश्य बहुसंख्यक समाज को सांस्कृतिक अस्मिता के नाम पर एकजुट करना है. राम मंदिर, समान नागरिक संहिता, लव जिहाद जैसे मुद्दे भावनात्मक तौर पर लोगों की बीच दरार पैदा करते हैं. वहीं तुष्टिकरण का उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदायों को विशेष रियायतों के नाम पर वोट बैंक के तौर साधना है. मदरसा फंडिंग, हज सब्सिडी, पर्सनल लॉ जैसे मुद्दे इसी श्रेणी में आते हैं. इन दोनों प्रवृत्तियों का परिणाम यह है कि जनता की ऊर्जा पहचान आधारित मुद्दों पर खर्च होती है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, कृषि संकट जैसे मुद्दे विमर्श से गायब हो जाते हैं. आज देश में रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा है. बेरोजगारी पिछले 40 व्रषों का रिकार्ड तोड़ चुका है. लगातार पेपर लीक होने की खबरें आती है लेकिन सत्ता में बैठे लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता वो चाहते है कि युवा आई लव मोहम्मद, आई लव महाकाल, आई लव योगी, आई लव अखिलेश औऱ आई लव राहुल में उलझे रहें. ताकि उनकी राजनीति की दुकाने गुलजार रहें. आकड़ों के अनुसार 2024 में शिक्षा पर कुल जीडीपी का मात्र 2.9% खर्च किया गया वहीं स्वास्थ्य में 2.1% खर्च की गई. वहीं बेरोजगारी 7.8% दर्ज की गई.
 मीडिया और जन मानस
आज का मेन स्ट्रीम मीडिया में भी कुछ एक अपवाद को छोड़ दें तो प्राइम टाइम में बहसें अक्सर धर्म, जाति, और पहचान पर केंद्रित होती हैं. असल मुद्दों पर बहस या तो तकनीकी होती है या हाशिए पर. वहीं राजनीतिक दलों के घोषणापत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य का उल्लेख तो होता है, लेकिन प्रचार में भावनात्मक मुद्दे हावी रहते हैं. जनता की प्रतिक्रिया भी इसी दिशा में झुकती है. भावनात्मक मुद्दों पर जनता की प्रतिक्रिया तीव्र होती जबकि नीतिगत मुद्दों पर जनमानस का दबाव सीमित रहता है.
इस संबंध में प्रो. योगेंद्र यादव कहते हैं कि “राजनीति ने जनता को उपभोक्ता बना दिया है, जो भावनाओं के उत्पाद खरीदती है, न कि नीतियों का मूल्यांकन करती है.” वहीं जेएनयू की डॉ. रचना सिंह मानती हैं कि “ध्रुवीकरण और तुष्टिकरण दोनों ही विमर्श को नियंत्रित करने के उपकरण हैं, ताकि सत्ता से जवाबदेही की मांग न हो.”
ध्रुवीकरण और तुष्टिकरण की राजनीति केवल पहचान आधारित लामबंदी नहीं है, बल्कि यह एक रणनीतिक प्रयास है जिससे असल मुद्दों को दबाया जा सके. जब जनता धर्म और जाति के नाम पर बंटेगी तब शिक्षा की गुणवत्ता, अस्पतालों की हालत, युवाओं की बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दे सत्ता के लिए चुनौती नहीं रह जाएंगे. यह लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी भी है. अगर विमर्श को पुनः असल मुद्दों की ओर नहीं मोड़ा गया, तो लोकतंत्र केवल चुनावों का उत्सव बनकर रह जाएगा, जनहित का साधन नहीं.

Sunday, September 28, 2025

असम के बोडो निकाय चुनाव में भाजपा की हार: ध्रुवीकरण की राजनीति पर जनजातीय अस्मिता की जीत धर्मेंद्र कुमार



असम के बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) में हाल ही में संपन्न हुए निकाय चुनावों ने राज्य की राजनीति को एक नए मोड़ पर ला दिया है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), जो पिछले कुछ वर्षों से राज्य में सत्ता पर काबिज है, उसको इस चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा. यह पराजय न केवल स्थानीय जनमत का संकेत है, बल्कि भाजपा की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की रणनीति की करारी हार करती है.
चुनाव के परिणाम
बोडो के निकाय चुनाव में बीपीएफ (बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट) ने बहुमत हासिल करते हुए 28 सीटों पर जीत दर्ज की वहीं भाजपा मात्र 5 सीटों पर सिमट कर रह गई, जबकि उसने पिछली बार गठबंधन के तहत बेहतर प्रदर्शन किया था. अन्य क्षेत्रीय दलों ने भी सीमित लेकिन निर्णायक उपस्थिति दर्ज की.
कहां हुई चूक ?
चुनाव प्रचार में भाजपा ने हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण को प्रमुखता दी, जिसे स्थानीय मतदाताओं ने नकार दिया. बोडो जनजातीय अस्मिता, स्थानीय विकास, और रोजगार जैसे मुद्दों को नजरअंदाज करना बीजेपी सरकार को मंहगा पड़ा. मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की आक्रामक शैली और सांप्रदायिक बयानबाज़ी ने जनमत को विभाजित करने के बजाय भाजपा से दूर कर दिया. बोडो समाज में सांस्कृतिक पहचान और स्वायत्तता का मुद्दा अत्यंत संवेदनशील है,जिसे सरकार द्वारा नजरदांज किया गया. भाजपा की नीतियों को बाहरी हस्तक्षेप के रूप में देखा गया, जिससे जनजातीय समुदाय में सरकार के प्रति असंतोष बढ़ा. वहीं बीपीएफ ने स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता देकर जनता का विश्वास अर्जित किया.
विधानसभा चुनाव पर क्या पड़ेगा प्रभाव
यह हार भाजपा के लिए चेतावनी है कि सांप्रदायिक नैरेटिव अब सार्वभौमिक रूप से प्रभावी नहीं है. आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा को स्थानीय मुद्दों, जनजातीय अधिकारों और विकास योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करना होगा. विधानसभा चुनाव में बीपीएफ और अन्य क्षेत्रीय दलों की भूमिका निर्णायक हो सकती है. विशेषकर गठबंधन की राजनीति में.
बोडो निकाय चुनाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि असम की राजनीति अब सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से आगे बढ़ चुकी है. मतदाता अब स्थानीयता, अस्मिता और विकास को प्राथमिकता दे रहे हैं. भाजपा को यदि आगामी विधानसभा चुनावों में अपनी स्थिति मजबूत करनी है, तो उसे गंभीरतापूर्ण आत्ममंथन करना होगा.

स्वदेशी का स्वांग: मेक इन इंडिया बनाम मेड इन इंडिया ✍️ धर्मेंद्र कुमार


देशभक्ति अब एक ब्रांड है, जिसे पहनकर नेता भाषण देते हैं, और जनता सेल्फी लेती है. स्वदेशी के मंच से जब “मेक इन इंडिया” का शेर दहाड़ता है, तो उसके मेड इन चाइना वाले दांतों की चमक वहुत कुछ कहानी बंया करती है. “मेड इन इंडिया” का टैग तो चमकता है, पर उत्पाद की आत्मा विदेशी होती है. और इस तमाशे के निर्देशक वही हैं जो मंच पर स्वदेशी का राग अलापते हुए खुद विदेशी घड़ी, विदेशी चश्मा का उपयोग करते है और देशवासियों को स्वदेशी अपनाओ की सीख देते है. मजे की बात यह है कि स्वदेशी का प्रचार भी विदेशी ऐप से ट्वीट करके किया जाता हैं.

विदेशी ऐप से स्वदेशी का प्रचार
प्रधानमंत्री मंच से “वोकल फॉर लोकल” का नारा देते हैं, लेकिन उनकी घड़ी स्विट्ज़रलैंड की होती है, चश्मा इटली का और मोबाइल शायद अमेरिका का. यह वैसा ही है जैसे कोई योगगुरु हेल्थ ड्रिंक बेचते हुए खुद कोल्ड ड्रिंक पीते पकड़ा जाए. जब नेता विदेशी उत्पादों का उपयोग करते हुए स्वदेशी अपनाने की बात करते हैं, तो यह व्यंग्य नहीं, विडंबना का महाकाव्य बन जाता है. 
स्वदेशी की परिभाषा ही गलत
वर्तमान की सरकार विदेशी उत्पाद को स्वदेशी ब्राडिग व पैकेजिंग करके स्वदेशी के नाम पर प्रचारित एवं प्रसारित करने का प्रयास किया जा रहा है. इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है कि नेस्ले की मैगी तो स्पष्ट रूप से विदेशी ब्रांड है, लेकिन पतंजलि की मैगी को स्वदेशी बताने की साजिश चल रही है. अब आप तय करें कि पतंजलि की मैगी भी उसी विदेशी फॉर्मूले पर आधारित है. तो क्या सिर्फ पैकेजिंग बदलने मात्र से वह स्वदेशी हो जाएगा. दरअसल देश में स्वदेशी के नाम पर बड़ें पैमाने पर यही खेल चल रहा है. लोग खादी के नाम पर Gucci पहन कर स्वदेशी आंदोलन को बढ़ावा देने की बात कर रहें है. यहां बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ ब्रांड का नाम बदल देने से मात्र से उत्पाद स्वदेशी हो जाता है? अगर विदेशी तकनीक, विदेशी स्वाद और विदेशी पैकेजिंग का उपयोग हो रहा है, तो वह उत्पाद स्वदेशी नहीं, सिर्फ “स्वदेशी दिखने वाला” है. 
 भ्रम का बाजार
“मेक इन इंडिया” का मतलब भारत में उत्पादन की प्रक्रिया शुरू करना वहीं “मेड इन इंडिया” का मतलब भारत में बना हुआ उत्पाद. लेकिन हकीकत में दोनों का मतलब अक्सर एक ही होता है, भारत में असेंबल किया गया उत्पाद, बाकी सब बाहर से आया. मेक इन इंडिया का शेर अब इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर बन चुका है. जो हर ब्रांड को प्रमोट करता है, बस उसे टैग मिल जाए. स्वदेशी आंदोलन अब एक मार्केटिंग स्लोगन मात्र बनकर रह गया है, जहां खादी की बात करते हुए लोग Gucci पहनते हैं. “वोकल फॉर लोकल” का नारा इतना जोर से बोला गया कि लोकल उत्पाद डर के मारे चुप हो गए. 

 तथ्य क्या कहते हैं 
मेक इन इंडिया व मेड इन इंडिया और स्टार्टअप्स की हकिकत बयां करते सरकारी आकड़ों के अनुसार जुलाई 2020 से नवंबर 2024 के बीच कुल 61,469 एमएसएमई यूनिट्स ने अपना संचालन बंद किया है अर्थात यूनिट बंद हो गए. पिछले दो वर्षों में  28,638 स्टार्टअप्स  बंद हुए  जिसमें 2023 में 15,921 और 2024 में 12,717 बंद हुए. प्रमुख रुप से एग्रीटेक, फिनटेक, एडटेक, हेल्थटेक सेक्टर स्टार्टअप्स बंद हुए. भारत का विनिर्माण क्षेत्र का अभी भी जीडीपी में सिर्फ 16% योगदान है. वहीं चीन ने अपनी “मेड इन चाइना 2025” नीति से इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर पैनल और एआई में वैश्विक स्तर पर वर्चस्व स्थापित कर लिया. जबकि भारत अब भी विदेशी तकनीक और निवेश पर निर्भर है, और प्रचार में आत्मनिर्भरता का जयघोष होता है. 
स्वदेशी का मतलब सिर्फ “यहां बना” नहीं, बल्कि “यहां सोचा, बनाया और अपनाया” होना चाहिए. स्वदेशी का सीधा मतलब है कि उसमें यहां की संस्कृति की झलक के साथ यहां की मिट्टी की खुशबू हों.  जब तक नीति, नीयत और नेतृत्व तीनों स्वदेशी न हों, तब तक यह अभियान सिर्फ एक ब्रांडिंग ड्रामा रहेगा. और देशवासी तब तक भ्रमित रहेंगे जब तक उन्हें यह बताया जाता रहेगा कि पतंजलि की मैगी खाने से राष्ट्रवाद बढ़ता है. इस संबंध में आप क्या सोचते है जरुर बताएं.

Saturday, September 27, 2025

सत्याग्रह बनाम सत्ता: सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी पर सुलगते सवाल धर्मेंद्र कुमार


लद्दाख की शांत वादियों में इन दिनों लोकतंत्र की गूंज और सत्ता की प्रतिध्वनि टकरा रही है. पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी ने न केवल लद्दाख आंदोलन को एक निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा किया है कि क्या लोकतंत्र में असहमति अब असुविधा बन गई है? 26 सितंबर 2025 को वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हिरासत में लिया गया. सरकार का आरोप है कि उन्होंने युवाओं को “अरब स्प्रिंग” और “नेपाल के Gen Z आंदोलन” जैसे उदाहरण देकर हिंसा के लिए प्रेरित किया. इससे पहले, लद्दाख में छठी अनुसूची और पूर्ण राज्य की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन में चार लोगों की मृत्यु और 90 से अधिक लोग घायल हुए. साथ ही, उनकी संस्था SECMOL का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया गया, विदेशी फंडिंग में गड़बड़ी के आरोप लगाए गए. यह तो स्पष्ट है कि किसी भी परिस्थिती में हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता है. इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए कहीं वांगचुक के आंदोलन को बदनाम करने के लिए तो हिंसा का सहारा लिया गया क्योंकि यह आंदोलन तो काफी दिनों से शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा था.
 वांगचुक का पक्ष
वांगचुक ने स्पष्ट किया कि उनका आंदोलन गांधीवादी रहा है. भूख हड़ताल, पदयात्रा और शांतिपूर्ण सत्याग्रह के माध्यम से उन्होंने अपनी बातों को सरकार तक पहुंचाने का लगातार प्रयास किया हैं. उन्होंने हिंसा से स्पष्ट दूरी बनाई और कहा कि कुछ अज्ञात तत्वों ने आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश की. उनका यह भी कहना है कि सरकार ने उन्हें चुनावी समीकरणों के चलते निशाना बनाया है.
लोकतंत्र की आत्मा असहमति में ही बसती है. यदि शांतिपूर्ण विरोध को देशद्रोह या राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे के रूप में देखा जाए, तो यह लोकतंत्र की मूल भावना पर प्रश्नचिह्न है. NSA जैसे कानूनों का प्रयोग केवल असहमति को दबाने के लिए किया जाना सत्ता की असहिष्णुता का संकेत है. बिना ठोस सबूतों के गांधीवादी तरीकों से आंदोलन करने वाले व्यक्ति को हिंसा का दोषी ठहराना लोकतांत्रिक मूल्यों की अवहेलना है.

लद्दाख के लोगों के लिए किए गए वांगचुक के कार्य
वांगचुक ने लद्दाख के लोगों के लिए जो कार्य किए उससे वहां के लोगों के जीवन में काफी बदलाव आया. लद्दाख में सर्दियों में पानी की भरमार होती है, लेकिन गर्मियों में जब खेती की जरूरत होती है, तब पानी की भारी कमी होती थी. वांगचुक ने कृत्रिम ग्लेशियर बनाए जिन्हें आइस स्तूप कहा जाता है. ये शंक्वाकार बर्फ के स्तूप सर्दियों में नदी के पानी को जमा कर लेते हैं और गर्मियों में धीरे-धीरे पिघलते हैं, जिससे खेतों को सिंचाई के लिए पानी मिलता है. एक आइस स्तूप लगभग 100 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई में सहायक होता है। इससे किसानों की आजीविका में सुधार हुआ और जल संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया गया. आइस स्तूप मॉडल को स्विट्ज़रलैंड, अफगानिस्तान और नेपाल जैसे देशों ने अपनाया है.
वांगचुक ने लद्दाख की हिमालयी पारिस्थितिकी को बचाने के लिए कई अभियान चलाए. उन्होंने सौर ऊर्जा, स्थानीय निर्माण सामग्री, और क्लाइमेट-फ्रेंडली वास्तुकला को बढ़ावा दिया. उनकी परियोजनाएँ कम कार्बन उत्सर्जन और स्थानीय संसाधनों पर आधारित हैं.

सत्ता की रणनीति 
लद्दाख में आगामी चुनावों से पहले वांगचुक की लोकप्रियता सत्ता के लिए चुनौती बन गई थी. उन्होंने सरकार के पुराने वादों जैसे छठी अनुसूची और पूर्ण राज्य का दर्जा को याद दिलाया और सरकार को जवाबदेह ठहराया. इंटरनेट बंदी, सुरक्षा बलों की तैनाती और मीडिया नियंत्रण—ये सभी संकेत हैं कि सरकार आंदोलन को चुनावी नुकसान से बचाने की रणनीति के तहत देख रही है.
सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की परीक्षा है. यह तय करना होगा कि क्या सत्ता असहमति को सहन कर सकती है, या उसे कुचलने का प्रयास करेगी. आपको याद होगा किसान आंदोलन को भी बदनाम करने का हरसंभव प्रयास सरकार द्वारा किया गया था. यहां तक की किसानों को आतंकवाद से जोड़ा गया था. आखिरकार सरकार को किसानों के आगे झुकना पड़ा. यदि सरकार कि गलत नीतियों का विरोध करना और सरकार द्वारा किए गए वादों को याद दिलाना देशद्रोह तो सरकार को एक बार अपने निर्णयों पर विचार करने की आवश्यकता है. क्योंकि सशक्त लोकतंत्र का आधार ही गलत नीतियों का विरोध व असहमति एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है. यदि शांतिपूर्ण आंदोलन को हिंसा से जोड़कर दमन किया जाएगा, तो यह न केवल संविधान के खिलाफ है, बल्कि जनता के विश्वास को भी चोट पहुँचाता है. जयहिंद

Friday, September 26, 2025

बिहार में पिछड़ा बनाम अति पिछड़ा, कितना असरदार होगा न्याय संकल्प पत्र धर्मेंद्र कुमार


पटना। बिहार में राजनीति को जातिगत समीकरण से अलग करके नहीं देखा जा सकता है. बल्कि यह कहा जा सकता है कि बिहार की राजनीति में जाति हमेशा से एक निर्णायक कारक रही है. लेकिन अब यह सिर्फ "सवर्ण बनाम पिछड़ा" की लड़ाई नहीं रही—बल्कि "पिछड़ा बनाम अति पिछड़ा" की विमर्श ने एक नई राजनीतिक धुरी को जन्म दिया है. पिछले दिनों राहुल गांधी द्वारा अति पिछड़ा न्याय संकल्प पत्र के घोषणा करने के बाद एक बार फिर पिछड़ा बनाम अति पिछड़ा का मुद्दा चर्चा का विषय बन गया है. लालू यादव ने समाजिक न्याय आंदोलन के माध्यम से पिछड़ों को उनका हक दिलाने का प्रयास किया था. जिसके कारण पिछड़ा वर्ग पूरी तरह से लालू यादव के साथ जुड़ गया था. लेकिन नीतीश ने बिहार में सबसे पहले अति पिछड़ो की बात की उनको मुख्य धारा में लाने के प्रयास किए जिसके कारण अति पिछड़ा वर्ग नीतीश कुनार के साथ जुड़ गया. जो नीतीश कुमार के लिए एक मजबूत वोट बैंक के रुप में देखा जाता है. राहुल गांधी ने न्याय संकल्प पत्र के माध्यम से उसमें सेंधमारी करने का प्रयास किया है. इसका कितना लाभ कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को होगा यह देखना दिलचस्प होगा. क्योंकि बिहार में अति पिछड़ों की आबादी लगभग 25 प्रतिशत है. 
 जातिगत समीकरण: आंकड़ों की जुबानी
बिहार की जातिगत समीकरण की बात करें तो आपको बता दें कि बिहार की कुल आबादी का लगभग 30–35% पिछड़ा वर्ग वहीं अति पिछड़ा वर्ग (EBC) 20–25% दलित और महादलित लगभग 15% सवर्ण: 10–12% मुस्लिम लगभग 18% है. इनमें अति पिछड़ा वर्ग की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें शामिल जातियां विखंडित हैं, जैसे नाई, धोबी, कहार, कुर्मी, मल्लाह, आदि. यही विखंडन इन्हें राजनीतिक रूप से संगठित करने में चुनौती बनता रहा है.

 नीतीश कुमार का वोट बैंक और राहुल गांधी की चुनौती

नीतीश कुमार ने अपने लंबे राजनीतिक करियर में अति पिछड़ा वर्ग को एकजुट कर उन्हें जदयू का स्थायी वोट बैंक बनाया. उनके शासन में अति पिछड़ों को आरक्षण, प्रतिनिधित्व और योजनाओं में प्राथमिकता मिली. लेकिन अब राहुल गांधी ने "ईबीसी न्याय संकल्प पत्र" के जरिए इस वर्ग को सीधे साधने की कोशिश की है. राहुल गांधी ने संकल्प पत्र के माध्यम से अति पिछड़ों की जातिवार जनगणना की मांग, सरकारी नौकरियों में विशेष आरक्षण की मांग के साथ ही पंचायत स्तर पर प्रतिनिधित्व की गारंटी की बात करते नजर आए. राहुल का न्याय संकल्प पत्र जहां नीतीश के पारंपरिक आधार को चुनौती देता है वहीं इंडिया गठबंधन के भीतरखाने में कांग्रेस की भूमिका को पुनर्परिभाषित करने का संकेत भी है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पिछड़ा वर्ग, विशेषकर यादव, कुर्मी और अल्पसंख्यक राजद और जदयू के साथ पारंपरिक रूप से जुड़ा रहा है. वहीं अति पिछड़ा वर्ग, जो पहले नीतीश के साथ था, अब कांग्रेस के नए वादों से आकर्षित हो सकता है. यदि इंडिया गठबंधन इस वर्ग को एकजुट कर पाने में सफल रहा, तो यह एनडीए के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है. राहुल गांधी की पहल यदि जमीनी स्तर पर असर करती है, तो अति पिछड़ा वर्ग के भीतर कांग्रेस की स्वीकार्यता बढ़ सकती है. ऐसे में इंडिया गठबंधन को 10–15% अतिरिक्त वोट शेयर मिल सकता है. लेकिन यह सब इस बात पर निर्भर करेगा कि संकल्प पत्र के वादों को कितनी गंभीरता से प्रचारित और लागू किया जाता है. कहीं यह सिर्फ चुनावी वादे बन कर न रह जाए. 
बिहार की राजनीति अब सिर्फ जातियों की गिनती नहीं, बल्कि उनके भीतर की पहचान और प्रतिनिधित्व की लड़ाई बन चुकी है. राहुल गांधी का संकल्प पत्र इस लड़ाई को नया मोड़ दे सकता है, शर्ते यही है कि इंडिया गठबंधन इसे सिर्फ दस्तावेज़ नहीं, बल्कि जमीनी आंदोलन में बदले. यह भी देखना होगा कि राहुल गांधी के न्याय संकल्प पत्र को अति पिछड़ा वर्ग के लोग कितना गंभीरता से लेते है.

Thursday, September 25, 2025

बिहार में भ्रष्टाचार पर बवाल, चुनाव में किस पार्टी की गोटी होगी लाल? धर्मेंद्र कुमार

पटना। जन सुराज पार्टी के संयोजक प्रशांत किशोर ने एनडीए के मंत्रियों व नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के बाद बिहार की राजनीति में भुचाल आ गया है. वहीं भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे इंडिया गठबंधन के नेता तेजस्वी यादव और राहुल गांधी को थोड़ी राहत मिलती दिख रही है. भ्रष्टाचार से जीरों टोलरेंशन की बात कहने वाली भाजपा और जदयू (एनडीए) के समक्ष भी संकट उत्पन्न हो गया है.  जनसुराज पार्टी के प्रशांत किशोर ने आरोपों को न केवल सार्वजनिक किया, बल्कि तथ्यों और दस्तावेज़ों के साथ एक संगठित राजनीतिक चुनौती के रूप में पेश किया है. इसके बाद आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरु हो गया है. एनडीए के नेता व मंत्री अपने उपर लगे आरोपों के जवाब देने के बजाए प्रशांत किशोर पर सेल कंपनियों से बड़ी मात्रा में पैसे लेने का आरोप लगा रहे हैं. 

 किस पर क्या है आरोप ?
प्रशांत किशोर ने पिछले दिनों प्रेस कॉन्फ्रेंस कर एनडीए के नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. उन्होंने बीजेपी के विधायक व उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर हत्या मामले में नाबालिग बताकर रिहाई के साथ ही फर्जी डिग्री और नाम बदलने का आरोप लगाया. किशोर ने कहा कि चौधरी के पास मैट्रिक पास होने का प्रमाण नहीं हैं. वहीं जदयू के नेता औऱ मंत्री अशोक चौधरी  पर ₹200 करोड़ की बेनामी संपत्ति खरीदने का आरोप लगाया. किशोर ने आरोप लगाया कि संपत्ति ट्रांसफर में पारिवारिक ट्रस्ट की भूमिका रही है जिसकी जांच होना चाहिए. आयकर नोटिस के बाद संदिग्ध लेन-देन किया गया.
वहीं भाजपा नेता व मंत्री मंगल पांडे की पत्नी के बैंक खाते में ₹2.12 करोड़ की अघोषित राशि होने के साथ ही दिल्ली में फ्लैट खरीद मामले में किए गे फर्जीवाड़े का आरोप प्रशांत किशोर ने लगाया. बीजेपी के सांसद संजय जायसवाल पर पेट्रोल पंप से फर्जी बिलिंग के साथ ही बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जयसवाल पर हत्या के आरोप के साथ ही सिखों के मेडिकल कॉलेज को हड़पने का दावा किया है.
प्रतिक्रिया और बवाल
इन आरोपों के बाद भाजपा और जदयू में खलबली मच गई है. जहां जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि नीतीश कुमार के उपर अब तक भ्रष्टाचार के कोई आरोप नहीं है. इसलिए पार्टी की साख को बचाने के लिए नेताओं को अपने उपर लगे आरोपों का जवाब देना चाहिए. नीरज कुमार ने अशोक चौधरी से सार्वजनिक जवाब मांगते हुए पार्टी की साख बचाने की अपील की. वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता आर.के. सिंह ने कहा कि यदि आरोप झूठे हैं तो संबंधित नेताओं को मानहानि का मुकदमा करना चाहिए. लेकिन अब तक किसी भी मंत्री ने आरोपों का स्पष्ट खंडन नहीं किया है. यह चुप्पी जनता के बीच संदेह को और गहरा कर रही है. 

कहां है जीरो टोलरेंश की सरकार ?
प्रशांत किशोर ने बीजेपी एवं जदयू के नेताओं पर ना सिर्फ भ्रष्टाचार के आरोप लगाये बल्कि उससे संबंधित दस्तावेज भी सार्वजनिक किया. बावजूद इसके भ्रष्टाचार से जीरो टोलरेंश की बात करने वाली नीतीश सरकार की खोमोशी इन आरोप कहीं पुख्ता करती नजर आती है. आय से अधिक मामलों में जहां विपक्षी नेताओं के खिलाफ ईडी कार्रवाई करने में जितनी तत्परता दिखाती है वहीं इस मामले ईडी के द्वारा संज्ञान नहीं लिया जाना व कार्रवाई नहीं किया जान मोदी सरकार की भ्रष्टाचार के प्रति दोहरे मापदंड को दिखाता है. 

प्रशांत किशोर ने भ्रष्टाचार को एक नैतिक मुद्दा बनाकर जनता के बीच अपनी साख मजबूत की है. उनके आरोपों ने एनडीए की "सुशासन" की छवि को गहरा आघात पहुंचाया है. राजनीति जानकारों की माने तो जहां प्रशांत किशोर ने खुद को एक ईमानदार विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है. वहीं बैठे बिठाए विपक्ष को सत्ता पक्ष के खिलाफ एक मजबूत मुद्दा मिल गया है.  राजद और कांग्रेस अब इन आरोपों को चुनावी हथियार बनाकर चुनावी वैतरणी पार करने का हरसंभव प्रयास करेंगे. और यदि एनडीए की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं आया, तो भाजपा-जदयू की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगना तय है. भ्रष्टाचार के आरोपों ने बिहार की राजनीति को एक निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है. अब यह देखना लाजमी होगा कि सत्ता पक्ष के नेता व मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों का चुनाव पर कितना असर पड़ता हैं.

Saturday, September 20, 2025

"भस्मासुर बनता भ्रष्टाचार, भगवान भरोसे देश की जनता  धर्मेंद्र कुमार




जमशेदपुर। जिस देश का अन्नदाता (किसान) एमएसपी के लिए वर्षों से संघर्षरत हो, उन्हें खाद के लिए जद्दोजहद करनी पड़े और खाद के बदले उसे लाठी डंडे का प्रसाद मिल रहा हो. वहीं रोजगार के लिए देश का युवाओं को सरकारी बर्बरता का सामना करना पड़े. सरकारी कर्मचारी हजारों की संख्या में अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत हो और उनकी मांगो पर विचार करने के बजाए उनको नौकरी से ही बर्खास्त कर दिया जाए. देश में फैले अव्यवस्था का अंदाजा लगाया जा सकता है. वहीं दूसरी ओर देश का एक वर्ग जिनके कंधों पर सरकारी योजनाओं को धरातल पर उतारने की महत्वपूर्ण जिम्मेवारी है. वो इन सबसे बेखबर व्यवस्था की कार्यालयों बैठ सरकारी योजनाओं की लूट व्यस्त और मस्त हैं. इस कथित अमृतकाल में जहां गरीब और अमीर की बीच की खाई और चौड़ी व गहरी हो जाए. जिस देश में ईमानदारी बेमानी लगने लगे और बेईमानी का काम पूरी ईमानदारी से होने लगे तो आप यकिन मानिए की उस देश को विश्व गुरु बनने से कोई रोक नहीं सकता है. भ्रष्टाचार की बैशाखियों पर टिकी हुई सरकार जब राजनीतिक मंचों से भ्रष्टाचार को मिटाने की बात करें तो यह समझ लेना चाहिए कि सरकार की मंशा भ्रष्टाचार को समाप्त करने के बजाए वैसे घोटालेबाज व भ्रष्ट राजनेताओं को अपने पाले में करने की है जो अब तक विपक्षी खेमे की शोभा बढ़ा रहे है. भ्रष्ट नेताओं की फेहरिस्त लंबी है जो कमोवेश दोनो तरफ है. कई वरिष्ठ व्यूरोक्रेटस् भी भ्रष्टाचार के आरोप में जेल बंद है. विडंबना यह है कि देश की जनता को जिन शीर्ष अदालतों पर भरोसा था. पिछले कुछ घटनाओं ने न्यायपालिका और न्यायाधीशों की भी पोल खोल कर रख दी है.

सिस्टम हुआ भ्रष्ट

देश का पूरा सिस्टम ही भ्रष्टाचार के आगोश में है. हर छोटे से बड़ा काम बिना चढ़ावे के समय पर पूरा नहीं होता है. घूसखोरी जब शुकराना से शुरु होकर नजराना और फिर जबराना तक पहुंचता है तब वह अधिकारियों के अधिकार एवं हक में तब्दील हो कर सिस्टम का हिस्सा बन जाता है. इसके माध्यम से होने वाली कमाई में सबका हिस्सा तय होता है. कोई चाह कर भी इस सिस्टम की खिलाफत नहीं कर सकता. सिस्टम से खिलाफत करने वालों को हाशिए पर धकेल दिया जाता है. वहीं कहीं कोई अधिकारी भ्रष्टाचार के आरोप में पकड़ा भी जाता है तो पूरा सिस्टम उसकों बचाने के लिए एक साथ खड़ा हो जाता है. चिंता तब ज्यादा होती है जब युवा अधिकारी अपने करियर को दाव पर लगा कर भ्रष्टाचार में आकंठ तक डूब जाते है. हाल की कुछ घटनाएं विचलित करती है जो देश के लिए भी चिंता का विषय है. हाल की दो घटनाएं—असम प्रशासनिक सेवा की अधिकारी नुपूर बोरा और ओडिशा प्रशासनिक सेवा के टॉपर अश्विनी कुमार पांडा की गिरफ्तारी हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या युवा अधिकारी भी अब अपने करियर को दांव पर लगाकर भ्रष्टाचार के दलदल में उतरने लगे हैं?
पहली घटना नुपूर बोरा से संबंधित है, जो असम प्रशासनिक सेवा 2019 बैच की टॉपर है. अपनी सेवा की मात्र छह वर्षों में अवैध कमाई से अकूत संपत्ति अर्जित कर ली है. भ्रष्टाचार के आरोप में असम पुलिस द्वारा जब नुपूर को गिरफ्तार किया गया तो उसकी बैग से 97 लाख रुपये नकद बरामद किए गए. जिसमें 100,200 और 500 के नोटों के बंडल मिले. वहीं जांच में सामने आया कि महज छह वर्षों में उन्होंने अपनी आय से 416 प्रतिशत अधिक संपत्ति अर्जित की है. यह आंकड़ा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि यह दर्शाता है कि किस स्तर तक भ्रष्टाचार ने जड़ें जमा ली हैं.
वहीं दूसरी घटना ओडिशा प्रशासनिक सेवा के 2019 बैच के टॉपर अश्विनी कुमार पांडा को 15,000 रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया. एक अधिकारी जिसने कड़ी मेहनत से सर्वोच्च रैंक हासिल की, वह इतनी मामूली राशि के लिए अपनी नैतिकता बेच बैठा. उनके घर से 4.73 लाख रुपये नकद, सोने के आभूषण और संदिग्ध दस्तावेज भी बरामद हुए.
नुपूर बोरा और अश्विनी पांडा की घटनाएं केवल व्यक्तिगत पतन नहीं हैं, बल्कि यह उस सामाजिक और संस्थागत विफलता की प्रतीक हैं जो भ्रष्टाचार को पनपने देती है. यदि आज हम नहीं चेते, तो कल यह भस्मासुर रूपी भ्रष्टाचार पूरे तंत्र को निगल जाएगा.

Wednesday, September 17, 2025

घुसपैठ पर घमासान: 11 वर्षों में मात्र 5000 की हुई पहचान धर्मेंद्र कुमार


 17 सितंबर को जब पूरा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन मना रहा था. उसी दौरान असम के मुख्यमंत्री हिमंत विस्व सरमा के निर्देश पर असम भाजपा मीडिया सेल द्वारा अपने सोशल मीडिया हैंडल से एक बीडियो वायरल किया गया. जिस वीडियो में यह बनाया गया है कि 2041 तक असम में मुसलमानों की जनसंख्या 99 प्रतिशत हो जाएगी. हर सरकारी संपतियों पर उनका कब्जा हो जाएगा. वीडियों में खुले आम गौ मांस काटते भी दिखाया गया. इस वीडियों के माध्यम से यह समझाने के प्रयास किया गया है यदि आप असम सहित पूरे देश में बीजेपी की सरकार नहीं बनवाएंगे तो हिंदू खतरे में पड़ सकते है औऱ घुसपैठीए हिंदुऔं की संपतियों पर कब्जा कर लेंगे. इसलिए आप सुरक्षित रहना चाहते है तो बीजेपी और मोदी को चुनना होगा क्योंकि वहीं देश के एक मात्र हिंदु हृदय सम्राट है. जबकि सच ठीक इसके उटल है.

चुनाव से पहले ही याद आते है घुसपैठिए

अक्सर चुनाव से ठीक पहले भारत में अवैध घुसपैठियों का मुद्दा अचानक सुर्खियों में आ जाता है. हालांकि असम में 2027 में चुनाव होना है. लेकिन 2025 में बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने हर चुनावी सभा में घुसपैठियों को बाहर करने का संकल्प प्रतिबद्धता दोहराते है. घुसपैठियों के कारण बिहार के सीमांचल क्षेत्रों में बदतले डेमोग्राफी पर चिंता ब्यक्त करते है. बीजेपी द्वारा लगातार कांग्रेस और उनके सहयोगियों पर घुसपैठियों को संरक्षण देने का आरोप लगाया है. घुसपैठियों को कांग्रेस व उनके सहयोगियां का वोट बैंक बताते है. 2024 में झारखंड में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले प्रदेश चुनावी प्रभारी शिवराज चौहान एवं सह प्रभारी हिमेत विस्व सरमा द्वारा घुसपैठियों का मुद्दा जोर शोर उठाया गया. इंडिया गठबंधन पर आरोप लगाया गया कि वे वोट के लिए घुसपैठियों को संरक्षण देते है. घुसपैठियों द्वारा आधिवासियों की जमीन पर कब्जा किया जा रहा है. इस मामले में रांची हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई. कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार से अपना पक्ष रखने का आदेश दिया गया. तब गृहमंत्रालय द्वारा रांची हाईकोर्ट में शपथ देकर बताया कि दरअसल उनके पास झारखंड में घुसपैठियों से संबंधित कोई आकड़ा उपलब्ध है. झारखंड की जनता में चुनाव परिणाम के तौर पर बीजेपी को करारा जवाब दिया.

क्या है घुसपैठियों का सच

यह सच है भारत धर्मशाला नहीं है कि यहां हम पूरी दूनिया के लोगों को संरक्षण दे. घुसपैठ का मामला राष्ट्रीय सुरक्षा, जनसंख्या असंतुलन और सांस्कृतिक संकट के लिए एक बड़ी चुनौती है. घुसपैठ का मुद्दा भारत के लिए गंभीर है, लेकिन जब इसे चुनावी मौसम में ही उठाया जाए, और वास्तविक कार्रवाई पिछली सरकार से भी कम हो, तो यह सवाल उठता है—क्या यह मुद्दा वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा बन गया है? हर चुनाव से ठीक पहले घुसपैठ का मुद्दा उठाकर फिर हिंदु मुस्लमान का कार्ड खेलना बीजेपी की राजनीति का हिस्सा बना गया है. घुसपैठियों पर कार्रवाई का यदि डा. मनमोहन सिंह सरकार और मोदी सरकार के पिछले 11 वर्षों की तुलनात्मक अध्यन करेंगे तो पाएंगे कि मनमोहन सरकार में लगभग 90 हजार घुसपैठियों को डिपोर्ट किया गया था जबकि मोदी के 11 वर्षों के कार्यकाल में मात्र 5 हजार घुसपैठियों को डिपोर्ट किया गया है. घुसपैठियों के खिलाफ की गई कार्रवाई का यह है सच. इसको कुछ आकड़ों से समझा जा सकता है – 2011 में 6,761, 2012 में 6,537, 2013 में 5,234 में घुसपैठियो को डिपोर्ट किया गया वहीं 2015 से 2017 तक गिरावट जारी रही, 2017 में सिर्फ 51 घुसपैठिए डिपोर्ट किए गए. बीजेपी व मोदी सरकार के लिए घुसपैठ का मुद्दा चुनावी मुद्दा है जो उन्हें हर चुनाव से ठीक पहले याद आता है. बिहार चुनाव से ठीक पहले यह मुद्दा एक बार फिर उठने लगा है. जबकि गृहमंत्रालय के पास बिहार में घुसपैठियोंसे संबंधित कोई आकड़ा मौजूद नहीं है. वहीं एसआईआर के दौरान कितने घुसपैठियों की पहचान की गई है इसके आकड़े भी आयोग नहीं बता पा रहा है.

यह सच है कि घुसपैठ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है. 2017 के बाद म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों की भारत में घुसपैठ देखी गई है. जो चिंता का विषय है. वहीं एक सरकारी अनुमान के अनुसार देश में लगभग 2 करोड़ से अधिक बंग्लादेशी अवैध तरीके से रह हैं. यहां बड़ा सवाल है कि 11 वर्षों में मोदी सरकार इनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कोई ठोस निर्णय कर पाई. क्या वह भी कार्रवाई करने से अधिक इसको चुनावी मुद्दा बनाए रखना चाहती है ताकि हिंदुओं को इसका डर दिखा अपनी राजनीतिक गोटी लाल करते रहें. तो क्या यह मान लिया जाए कि घुसपैठ का मुद्दा अब केवल चुनावी हथियार बनकर रह गया है, न कि राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर विषय? इस मुद्दे पर आप सोचते हैं जरुर बताएं.

अर्थव्यवस्था का बंटाधार, क्या रेवड़ी बांट कर नीतीश करेंगे चुनावी वैतरणी पार ? ✍️ धर्मेंद्र कुमार

पटना। भारतीय राजनीति में चुनावी मौसम आते ही लोकलुभावन वादों और मुफ्त योजनाओं की बौछार शुरू हो जाती है. इसे आम बोलचाल में "रेवड़ी संस्कृति" कहा जाता है. बिहार में आसन्न विधानसभा के मद्देनजर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की रणनीति भी अब इसी राह पर चलती दिख रही है. सवाल यह है कि क्या रेवड़ी बांटकर वे चुनावी वैतरणी पार कर पाएंगे, या यह नीति राज्य की अर्थव्यवस्था को और गर्त में ले जाएगी?

 रेवड़ी संस्कृति: लोकतंत्र या मुफ्तखोरी?

रेवड़ी संस्कृति का मूल उद्देश्य जनता को राहत देना बताया जाता है, लेकिन इसके पीछे छिपी चुनावी गणित को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट में इस पर बहस चल रही है कि मुफ्त योजनाएं लोकतांत्रिक मूल्यों और आर्थिक स्थिरता के खिलाफ हैं. राजनीतिक पार्टियां लगातार पांच वर्षों तक जनता की आकांक्षों को पूरा करने के बजाए चुनाव के ठीक पहले मुफ्त की रेवड़ियां वांट कर चुनाव जीतने के विकल्प को ज्यादा बेहतर समझती है. यही वजह है कि हाल के दिनों में रेवड़ी संस्कृति बेहद फल फूल रही है. वहीं जनता का मानना है कि चुनाव के पहले सरकार द्वारा रेवड़ी के तौर पर जो दिया जाता है उसे लेने में कोई बूराई नहीं क्योंकि चुनाव के जीतने के बाद नेता गायव हो जाते है और सरकार अपने किए गए वादों को भुल जाती है. पिछले दिनों दिल्ली चुनाव के ठीक पहले बीजेपी द्वारा किए गए वादों का हश्र सबके सामने है कमोवेश वहीं हाल झारखंड में मईंया सम्मान योजना की है. अब बिहार में भी यह संस्कृति गहराने लगी है. विपक्षी दलों द्वारा मुफ्त बिजली, बेरोजगारी भत्ता और अन्य योजनाओं के वादे किए जा रहे हैं. नीतीश कुमार, जो पहले इस राजनीति से दूरी बनाए रखते थे, अब दबाव में आकर इसी दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं.
बिहार की आर्थिक स्थिति
बिहार का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) वर्ष 2024-25 में ₹7.5 लाख करोड़ रहा, जो देश के औसत से काफी नीचे है. वहीं बिहार में बेरोजगारी दर 2025 में 12.5% रही, जो राष्ट्रीय औसत (7.8%) से अधिक है. आपको बता दें कि बिहार में प्रति व्यक्ति औद्योगिक निवेश ₹3,000 से भी कम है, जबकि महाराष्ट्र में यह ₹15,000 से अधिक है. वहीं राज्य का राजकोषीय घाटा 2024-25 में ₹25,000 करोड़ के पार पहुंच गया. राज्य पर लगभग 3.5 लाख करोड़ का कर्ज है. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि बिहार की अर्थव्यवस्था पहले से ही दबाव में है, और मुफ्त योजनाओं से यह और जर्जर हो सकती है.
 नीतीश कुमार की चुनावी रणनीति
2025 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए नीतीश कुमार को इंडिया गठबंधन से कड़ी चुनौती मिल रही है. तेजस्वी ने पहले ही बेरोजगारी भत्ता, मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी योजनाओं का वादा किया है. ऐसे में नीतीश कुमार के पास दो ही विकल्प बचते हैं. पहला अपनी पारंपरिक "विकास पुरुष" की छवि को बनाए रखें और दूसरा कि रेवड़ी बांटने की होड़ में शामिल होकर चुनावी लाभ लेने की कोशिश करें. नीतिश कुमार के लिए दूसरे विकल्प को चुनना मजबुरी भी है और जरुरी भी है.
हालांकि, उनके सात निश्चय योजना ने कुछ क्षेत्रों में सकारात्मक प्रभाव डाला है, लेकिन दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता के लिए यह पर्याप्त नहीं है. रेवड़ी संस्कृति अल्पकालिक राजनीतिक लाभ तो दे सकती है, लेकिन यह दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लिए बाधक है. नीतीश कुमार जैसे अनुभवी नेता से अपेक्षा है कि वे जनता को मुफ्त योजनाओं पर निर्भर करने के बजाय उन्हें सशक्त बनाने की दिशा में काम करें. चुनाव जीतने के लिए सिर्फ वादे नहीं, बल्कि ठोस नीति और आर्थिक दूरदृष्टि की आवश्यकता है.

पूर्वी सिंहभूम कांग्रेस की सियासी संग्राम : कौन होगा अगला कप्तान ? धर्मेंद्र कुमार

जमशेदपुर। पूर्वी सिंहभूम जिला कांग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर चल रही सियासी हलचल अब एक नए मोड़ पर है. जहां पहले गुटबाजी, अनुभव और संगठनात्मक संतुलन की बात हो रही थी, वहीं अब चर्चा इस बात की है कि पार्टी नेतृत्व किस दिशा में निर्णय लेगा. क्या पार्टी का शीर्ष नेतृत्व को जिला अध्यक्ष के तौर पर संगठन को मजबूत करने वाला एक समर्पित कार्यकर्ता की तलाश है फिर जिला अध्यक्ष के तौर पर उन्हें विधायक या सांसद मेटेरियल चाहिए. जिला अध्यक्ष का चुनाव इसी विमर्श पर टिका है . जिला अध्यक्ष की जिम्मेवारी संगठन को पूर्वी सिंहभूम के छह विधानसभा सहित 11 प्रखंड और कुल 231 पंचायतों तक मजबूती करना अर्थात संगठन को ग्रास रूट तक पहुंचाने के साथ ही आम अवाम की समस्याओं के समाधान के लिए हर स्तर पर आंदोलन कर लोगों को न्याय दिलाने की है.

संगठनकर्ता एवं विधायक मेटेरियल दोनो अलग है
कांग्रेस कार्यकर्ताओं का स्पष्ट कहना है कि यदि एक व्यक्ति जिला अध्यक्ष भी बनेगा और वहीं विधायक के लिए दावेदारी करेगा तो संगठन से जुड़ं अन्य कार्यकर्ता क्या केवल दरी बिछाने और झंडा ढ़ोने के लिए है. नाम नहीं छापने की शर्त पर एक पार्टी के वरिष्ठ नेता ने कहा कि कांग्रेस आज हाशिए पर है तो इसके लिए पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जिम्मेदार है. उन्होंने बताया कि विधानसभा चुनाव के दौरान आनंद बिहारी दुबे ने जिला अध्यक्ष रहते हुए टिकट के लिए जिस प्रकार दबाव बनाया था और टिकट नहीं मिलने पर पार्टी विरोधी कार्य किया. जिसका परिणाम यह हुआ कि जमशेदपुर पश्चिम की सीटिंग सीट भी पार्टी हार गई और पार्टी को बड़ा नुकसान हुआ. उसके बावजूद उनके खिलाफ पार्टी द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई. यहीं काम यदि बीजेपी में होता उनके खिलाफ कार्रवाई हो गई होती. यह तो पार्टी के शीर्ष नेताओं को तय करना है कि उन्हें कैसा जिला अध्यक्ष चाहिए.
जिला प्रभारी की भूमिका संदिग्ध
कार्यकर्ताओं की माने तो प्रदेश द्वारा बनाए जिला प्रभारी बलजीत सिंह बेदी और सुंदरी तिर्की की भूमिका निष्पक्ष नहीं है. उनका झुकाव स्पष्ट तौर पर वर्तमान जिला अध्यक्ष की ओर दिख रहा है. यह जिला अध्यक्ष का चुनाव तो केवल आईवॉश है जो स्थिति बनती दिख रही है, उससे साफ तौर पर कहा जा सकता है कि आनंद बिहारी दुबे ही फिर अध्यक्ष बनाए जाएंगे. जिला प्रभारियों की राय है कि जिला अध्यक्ष के लिए वर्तमान में दुबे से बेहतर कोई उम्मीदवार नहीं है. उनकी जिला अध्यक्ष की खोज दुबे से शुरु होकर दुबे पर समाप्त हो जाती है. इसके पीछे क्या राज है यह तो वे ही बखूबी बता सकते है. लेकिन जब तक नेतृत्व परिवर्तन नहीं होगा तो कैसे पता चलेगा कि कौन बेहतर है. लोगों का मानना है कि सभी के लिए अवसर के द्वार खुले होने चाहिए ताकि विकास की संभावना बनी रहे. यह मान लेना की इससे बेहतर कोई हो ही नहीं सकता यह तमाम विकास की संभावनाओं पर पूर्ण विराम लगा देता है जो पार्टी के लिए शुभ संकेत नहीं. 

70 ने की दावेदारी कौन है मजबूत दावेदार
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि प्रदेश की राजधानी रांची के जिला अध्यक्ष के लिए केवल 12 लोगों ने दावेदारी की है जबकि पूर्वी सिंहभूम जिला अध्यक्ष के लिए लगभग 70 लोगों ने दावेदारी की है. जो एक अलग की कहानी कहता है. ज्यादा दावेदारी के पीछे ही गुढ़ रहस्य छिपा हुआ है. बस यूं समझ लीजिए की समझदार के लिए इशारा ही काफी है. दावेदारों की लंबी फेहरिस्त है. सभी लोगों के नामों की जिक्र यहां कर पाना संभव नहीं है. पहली किस्त में कई नामों की चर्चा मैंने की थी यहां भी कुछ मजबूत दावेदारों की चर्चा करुंगा. उसके पीछे के कारणों पर भी बात होगी. पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को इस दृष्टिकोण से भी सोचना चाहिए कि पूर्वी सिंहभूम जिला में बहुतायत में कल कारखाने होने के कारण यहां श्रमिकों की तादाद ज्यादा है. ऐसे में मजदूर नेताओं को भी पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका देने पर विचार करना चाहिए ताकि संगठित एवं असंगठित क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों को पार्टी से जोड़ा जा सके. ऐसे में विजय यादव जिनका संबंध टिमकेन वर्कर्स यूनियन से है और वे लगातार मजदूरों की आवाज उठाते रहे है, मजदूरों की हक के लड़ाई लड़ने का काम किया है. सबको साथ लेकर चलने की क्षमता उनमें है. संगठन के विभिन्न पदों पर रहते हुए पार्टी के लिए उन्होंने काम किया है. 
एक और नाम जो हर दृष्टिकोण से जिला अध्यक्ष के सबसे मजबूत दावेदार है उसके पीछे उनका वर्षों का अनुभव और पार्टी के प्रति उनका समर्पण है. परविंदर सिंह आपने सही पहचाना एनएसयूआई से अपना करियर शुरु करने वाले परविंदर वर्तमान में हजारीबाग जिला के प्रभारी है वह मूलतः जमशेदपुर निवासी है. उनके पास संगठनात्मक अनुभव है. एक अच्छा नेतृत्वकर्ता के साथ ही वक्ता भी है और सबसे बड़ी बात वर्तमान प्रदेश प्रभारी के राजू के साथ काम करने का अनुभव भी है.यदि पार्टी परर्विंदर पर दाव लगाती है तो एक साथ कई मोर्चे फतह कर सकती है. परविंदर सिख समुदाय से आते है. 1984 के बाद से पार्टी से दुर हुए सिख समुदाय को सिख अध्यक्ष बनाकर साधा जा सकता है, यह कोई बड़ी बात नहीं सिख समुदाय में परविंदर की अच्छी पकड़ है. वहीं छात्र नेतृत्वकर्ता होने का लाभ भी पार्टी को मिलेगा और एक बेहतर संगठनकर्ता तो पार्टी को मिलेगा ही जिसके पास संगठन का नेतृत्व करने का अच्छा खासा अनुभव है. सबसे बड़ी बात इन पर कोई आपराधिक आरोप नहीं है. 
वहीं राजकिशोर यादव की छवि ठीक है और उनके पास भी संगठन के लिए कार्य करने का अनुभव हैं. वैसे और कई नाम भी लाइन में है जैसे राकेश कुमार तिवारी, अवधेश कुमार सिंह, राजकिशोर प्रसाद, तापस चटर्जी, प्रिंस सिंह, सफी अहमद खान, अमर कुमार मिश्रा, सनातन भकत, सोमेन मंडल, अनुप मिश्रा (ज्योति), शाहनवाज अहमद, पप्पू शुक्ला, सनत चक्रवर्ती, संजय यादव, फिरोज खान, कृष्ण कान्त शुक्ला, संजीव कुमार श्रीवास्तव, राहुल कुमार (राजा सिंह राजपूत), सुल्तान अहमद, गुरदीप सिंह, जसवंत सिंह, अभिषेक कुमार सिंह, विनोद कुमार यादव, शैलेन्द्र कुमार सिंह, राजीव मिश्रा, उदय कुमार सिंह, रंजीत झा, अमित श्रीवास्तव, बबलू झा और बलदेव सिंह सहित कई और नाम भी है सभी का जिक्र करना संभव नहीं है.

महिलाओ को भी मिले हिस्सेदारी 

इस बार कई महिला नेताओं ने भी अपनी दावेदारी पेश की है, जिनमें उषा सिंह, नलिनी सिन्हा, सुनिता ओझ और अपर्णा गुहा जैसे नाम शामिल हैं. आज जब हर ओर आधी आबादी की बात हो रही है तो ऐसे में यह कांग्रेस के लिए एक अवसर हो सकता है कि वह महिला नेतृत्व को प्राथमिकता देकर संगठन में लैंगिक संतुलन स्थापित करे. महिला कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे लंबे समय से पार्टी के लिए काम कर रही हैं, लेकिन नेतृत्व के पदों पर उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला. पार्टी में महिलाओं को भी उचित एवं बराबरी का मौका मिलना चाहिए. यह पार्टी के लिए हितकारी होगा.
 यदि शीर्ष नेताओं द्वारा संगठनात्मक मजबूती को प्राथमिकता दी जाती है, तो ऐसे उम्मीदवारों को मौका मिल सकता है जो शांत, कर्मठ और कार्यकर्ता-केन्द्रित हैं. पूर्वी सिंहभूम कांग्रेस का यह चुनाव केवल एक पद का चयन नहीं है, बल्कि यह पार्टी की सोच, प्राथमिकताओं और भविष्य की दिशा तय करेगा.

अध्यक्ष पद के कई दावेदार, कौन होगा एकजुटता का सूत्रधार? -- धर्मेंद्र कुमार

जमशेदपुर। झारखंड की राजनीति में पूर्वी सिंहभूम जिला कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव एक साधारण संगठनात्मक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पार्टी के आला नेताओं के लिए एक गहरी राजनीतिक परीक्षा है. पूर्वी सिंहभूम जिला कांग्रेस एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन की दहलीज़ पर खड़ा है. 2025 का अध्यक्षीय चुनाव न केवल संगठन के भीतर शक्ति संतुलन को परिभाषित करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि कांग्रेस की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी. इस बार मुकाबला त्रिकोणीय है, जिसमें पुराने अनुभव, नई ऊर्जा और संगठनात्मक संतुलन के बीच संघर्ष स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है. पार्टी आलाकमान द्वारा पूर्वी सिंहभूम जिला के लिए गुजरात के विधायक अनंत पटेल को पर्वेक्षक बनाया गया है. अनंत पटेल लगातार पार्टी के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं से रायशुमारी कर रहे हैं. अब यह देखना लाजमी होगा कि पटेल कार्यकर्ताओं से की गई बातचीत व रायशुमारी के आधार पर निर्णय लेते है या फिर गणेश परिक्रमा वाली परंपरा को ही आगे बढ़ाते हैं. कांग्रेस पार्टी में गणेश परिक्रमा करने वालों को प्राथमिकता देने की परंपरा रही है. पूर्व में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बालमुचू ने तमाम विरोध के बावजूद अपने प्रिय रविन्द्र कुमार झा उर्फ नट्टू झा को पूर्वी सिंहभूम कांग्रेस पार्टी का जिला अध्यक्ष बनाया था और वो लगभग सात वर्षों तक जिला अध्यक्ष पद को सुशोभित करते रहे. वहीं जब सुखदेव भगत प्रदेश अध्यक्ष बने तो उन्होंने भी विजय खां को जिला अध्यक्ष बनाया था. विजय खां 2014 से 2022 तक अध्यक्ष रहें. फिर 2022 में प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे जी कृपा से आनंद बिहारी दुबे कांग्रेस पार्टी के जिला अध्यक्ष बनें. 

60 से ज्यादा लोगों ने की दावेदारी

जिला अध्यक्ष पद के लिए लगभग 65 लोगों ने दावेदारी की हैं. पार्टी सूत्रों की माने तो एक रणनीति के तहत वर्तमान जिला अध्यक्ष आनंद बिहारी दुबे द्वारा अपने लोगों से ज्यादा से ज्यादा दावेदारी कराई गई है ताकि अध्यक्ष के चुनाव के समय वे दुबे को अध्यक्ष बनाए जाने पर अपनी दावेदारी वापस लेने की बात कर पूरा माहौल आनंद बिहारी दुबे के पक्ष में बनाया जा सके. वैसे दावेदारी करने वाले में कई पुराने कांग्रेसी है. जिनमें महेंद्र पांडे,कमलेश कुमार पांडे, अखिलेश सिंह यादव, राकेश तिवारी,विजय यादव, ज्योति मिश्रा,मनोज कुमार सिंह, अंसार खान, प्रिंस सिंह,राकेश साहू, परितोष सिंह सहित एक लंबी फेहरिस्त है. पर्यवेक्षक विधायक अनंत पटेल को अब निर्णय करना है कि वो किसको अध्यक्ष बनाए. कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए पटेल ने कहा कि जो व्यक्ति पार्टी को अपना पूरा समय दे सकता हो साथ ही सच्चा कांग्रेसी भी हो वही अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी करें. वर्तमान जिला अध्यक्ष आनंद बिहारी दुबे का संबंध झामुमो रहा है. यदि सच्चा कांग्रेसी होना पैमाना होगा तो कई नाम स्वतः छट जाएंगे लेकिन ऐसा होगा लगता नहीं है.   

कौन है मजबूत दमदार दावेदार 

आनंद बिहारी दुबे 2022 में जिला अध्यक्ष बने. अपने छोटे से कार्यकाल में दृढ़इच्छा शक्ति का परिचय देते हुए उन्होंने पार्टी के जिला कार्यालय तिलक पुस्तकालय को जीर्णोद्धार किया. जो उनके लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. हालांकि विरोधियों का कहना है कि तिलक पूस्तकालय के जीर्णोद्धार में लागत से ज्यादा खर्च बताया गया. वहीं इस पूरे मामले में पारदर्शिता नहीं रखी गई. जिसकी शिकायत पार्टी के महासचिव के सी वेणुगोपाल को भी की गई है. वहीं दुबे ने संगठन को मजबूत करने के बजाय स्वंय को मजबूत करने पर ज्यादा जोर दिया और गुटबाजी को बढ़ावा दिया. अपने लोगों को उपक्रित करते हुए विभिन्न पदों पर आसिन्न किया. जिसके कारण दुबे को कई बार कार्यकर्ताओं के विरोध का सामना भी करना पड़ा. यदि वे संगठन की मजबूती पर ध्यानकेंद्रित किए होते तो 2024 के लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव में परिणाम कुछ और होता. जिस प्रकार लोकसभा चुनाव में झामुमो के प्रत्याशी समीर महंती ने खुले तौर पर आनंद बिहारी दुबे पर पैसे लेने का आरोप लगाया उसको झुठलाया नहीं जा सकता है. वहीं विधानसभा चुनाव में पूर्वी विधानसभा से टिकट नहीं मिलने के कारण जिस प्रकार दुबे ने कांग्रेस प्रत्याशी डा. अजय कुमार के साथ भीतरघात किया वो जगजाहिर है और लोग आज भी खुलकर इस बात की चर्चा करते है कि यदि आनंद बिहारी दुबे खुले मन से पार्टी के लिए काम किए होते तो परिणाम पार्टी के पक्ष में होता. इतना ही नहीं इनके जिला अध्यक्ष रहते हुए जमशेदपुर पश्चिम की सीटींग सीट भी पार्टी हार गई. यह सही है कि दुबे पूरा समय पार्टी को देते है उसके बावजूद यदि पार्टी जिला स्तर पर मजबूत संगठन के तौर पर खड़ा नहीं हो पायी तो इसके मायने क्या है एक बार पार्टी के वरीय पदाधिकारियों को जरुर विचार करना चाहिए.
वहीं बात अगर कार्यकारी नगर अध्यक्ष धर्मेंद्र सोनकर की करें तो डा. अजय कुमार की कृपा से वे कार्यकारी नगर अध्यक्ष बने. पार्टी में नगर कार्यकारी अध्यक्ष जैसा कोई पद अभी तक नहीं रहा है. धर्मेंद्र सोनकर के पास संगठनात्मक अनुभव की कमी है. वहीं अपने कार्यकाल में उन्होंने ऐसा कुछ बड़ा या महत्वपूर्ण कार्य नहीं किया जिसके कारण जिला अध्यक्ष पद के लिए उनकी दावेदारी थोड़ी कमजोर दिखती है. इनकी पहुंच भी सीमित है. वैसे यदि पार्टी के वरीय नेता ओबीसी को ही अध्यक्ष पद के लिए महत्वपूर्ण आधार मान कर निर्णय करना चाहे तो बात अलग है. विरोधियों के अनुसार सोनकर के उपर गंभीर आपराधिक आरोप भी लगे थे. सोनकर गणेश परिक्रमा करने में माहिर बताए जाते है. सोनकर की पहचान सोशल मीडिया नेता एवं फोटोजीवी नेता के तौर पर ज्यादा है. 
 वहीं अगर अखिलेश सिंह यादव की बात करें तो विरोधियों का स्पष्ट कहना है कि उनका भाजपाई बैकग्राउंड हैं. जमशेदपुर के ट्रांसपोर्टर सह ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के मैनेजमेंट कमिटी के निर्वाचित प्रतिनिधि अखिलेश सिंह यादव ने भी जिला अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी की है. हालांकि उनके विरोधियों ने आलाकमान को उनका भाजपाई बैकग्राउंड बताते हुए जिलाध्यक्ष नहीं बनाने की मांग की. आपको बता दे कि अखिलेश सिंह यादव के भाई मिथिलेश सिंह यादव झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री सह जमशेदपुर पूर्वी के 25 वर्षों तक विधायक रहे रघुवर दास के विधायक प्रतिनिधि थे. अखिलेश सिंह यादव को छोड़कर उनका पूरा परिवार भाजपा समर्थक रहा है. ऐसे में अखिलेश सिंह यादव को कांग्रेस संगठन में इतनी बड़ी जिम्मेदारी देना से पार्टी के सिए कितना फायदेमंद होगा यह तो पार्टी के वरीय नेताओं को तय करना होगा. 
वहीं इंटक नेता एवं टाटा मोटर्स वर्कर्स यूनियन के पदाधिकारी मनोज कुमार सिंह की बात करें तो इनकी शांत एवं निर्विवाद छवि और संगठनात्मक अनुभव जिला अध्यक्ष के लिए एक दमदार उम्मीदवार है. लेकिन मनोज कुमार सिंह टाटा मोटर्स में कार्यरत होने के कारण वे पार्टी के लिए कितना समय दे पाएंगे यह महत्वपूर्ण सवाल है. क्योंकि नौकरी पेशा होने के कारण पार्टी को पूरा समय देना उनके लिए एक बड़ी समस्या हो सकती है.
वहीं बात अगर जिला परिषद् सदस्य डा. परितोष सिंह की बात करें तो युवा कांग्रेस के जिला अध्यक्ष सहित कई पदों पर रहते हुए पार्टी को संगठित करने के साथ ही पार्टी को संगठित करने अनुभव उनके पास है. परितोष ज्यादातर कार्यकर्ताओं एवं आम लोगों के बीच रहते है. सिंह लगातार आम लोगों की विभिन्न समस्याओं पानी, बिजली, सड़क सहित मूलभुत समस्या को लेकर आंदोलन करते रहते हैं. वहीं इनकी छवि जुझारु एवं कर्मठ नेता के तौर पर है. आम लोगों के लिए सर्व सुलभ परितोष सिंह सही मायने में जिला अध्यक्ष पद के लिए एक बेहतर उम्मीदवार है. उनके खिलाफ कोई आपराधिक आरोप भी नहीं है सबको साथ लेकर चलने एवं व्यवहारिक परितोष एक प्रखर वक्ता भी है.
वहीं एक और जुझारु युवा नेता राकेश साहू जो ओबीसी से आते है. विगत दो दशक से ज्यादा समय से कांग्रेस पार्टी के जुड़ कर लगातार कार्य कर रहे है. पहले एनएसयूआई फिर युवा कांग्रेस में सक्रिय रहने वाले राकेश ने भी जिला अध्यक्ष के लिए अपनी दावेदारी की है. हर मुद्दे पर अखबार की सुर्खियों में रहने वाले राकेश को मीडिया में बने रहने का हुनर है. वहीं कई महिलाओं ने जिसमें उषा सिंह, नलिनी सिन्हा, अपर्णा गुहा जैसा नेत्रियों ने भी अपनी दावेदारी पेश की है. 
कई कार्यकर्ताओं ने तो जिला अध्यक्ष के लिए सिर्फ इसलिए दावेदारी क्योंकि सभी लोग दावे कर रहे थे. वहीं कई लोग इस उम्मीद से की कहीं गलती से पार्टी के नेताओं की उनपर नजरें इनायत हो जाए. वहीं कुछ इसलिए दावेदारी की ताकि जुगाड़ तंत्र से कुछ काम बन जाए. दावेदारों की एक लंबी फेहरिस्त है. हर किसी की बात करना यहां संभव नहीं हैं.

परिणाम और प्रभाव

 जिला अध्यक्ष चुनाव का परिणाम न केवल जिला कांग्रेस की दिशा तय करेगा, बल्कि यह संकेत भी देगा कि पार्टी स्थानीय स्तर पर किस प्रकार के नेतृत्व को प्राथमिकता देती है. अनुभव और संतुलन, या आक्रामकता और लोकप्रियता. अगर गुटबाजी और आंतरिक असंतोष को नहीं सुलझाया गया, तो इसका असर भी पार्टी के सेहत पर पड़ सकता है. निर्णय पार्टी के आला नेताओं को करना हैं.

Tuesday, September 16, 2025

बिहार में नीतीश का विकल्प कौन? ✍️ धर्मेन्द्र कुमार

पटना। बिहार की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जिन्होंने बीते दो दशकों में राज्य की राजनीति को एक नई दिशा दी, अब एक ऐसे दौर में हैं जहां जनता बदलाव की ओर देख रही है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या वर्तमान में बिहार की राजनीति में किसी भी दल में नीतीश कुमार का कोई ठोस और विश्वसनीय विकल्प मौजूद है? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब शायद किसी के पास नहीं. वैसे तो कई नेता स्वंय को नीतीश के विकल्प के तौर पर प्रस्तुत करने का हरसंभव प्रयास कर रहे हैं, लेकिन वो जिस पृष्ठभूमि से आते है एवं उनपर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और उनकी काबिलियत उन्हें इसकी इजाजत देती नहीं दिख रहीं है.
 निर्विवाद नीतीश कुमार ने रखी विकास की आधारशिला
1990 से 2004 तक फैले अराजकता व अपराध से बिहार को मुक्ति दिलाने में नीतीश कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका रही. उन्होंने 2005 में बिहार की सत्ता संभालते ही कई मोर्चों पर एक साथ काम करना शुरु किया. जिसके परिणाम भी जल्द ही दिखे. अपराध के पर्याय माने जाने वाले शहाबुद्दीन, आनंद मोहन, धुमल सिंह, सुनिल तिवारी जैसे अपराधी जेल के अंदर पहुंचा दिए गए. नीतीश कुमार की रणनीति रंग लाई और अपराधियों ने या बिहार छोड़ दिया या फिर अपराध जगत से अपना नाता तोड़ लिया. नीतीश कुमार की पहली पारी में दुरुस्त शासन व्यवस्था से जहां प्रदेश में शांति बहाल हुई लोगों ने राहत की सांस ली वहीं बिहार छोड़ चुके व्यापारियों ने फिर से बिहार की ओर रुख किया. इतना ही नहीं लालू प्रसाद के शासन काल में जब लोग सड़कों में गढ्ढे या गढ्ढों में सड़क विषय पर माथापेची करते रहते थे. नीतीश में आधारभूत संरचना को अपनी पहली प्राथमिकता में ऱख कर गांव, कस्बों एवं पंचायतों को मुख्य सड़क से जोड़ने का काम किया. बिहार के बाढ़ जिले में एनटीपीसी के आने के बाद प्रदेश बिजली हर गांव में पहुंच गई और लगभग 22 से 23 घंटे बिजली रहती भी है. इससे सामाजिक स्तर पर लोगों के जीवनस्तर में काफी सुधार हुआ. 2000 में झारखंड के बिहार से अलग होने के कारण प्रदेश में कल कारखाने नहीं होने के बावजूद नीतीश ने बालू से तेल निकाल कर बिहार में विकास को गति प्रदान करने का बेहतर उदाहरण प्रस्तुत किया है. पटना मेट्रो रेल परियोजना उनकी महत्वपूर्ण उपलब्धियों में एक है. कुमार ने स्थायित्व और बुनियादी ढांचे के विकास को प्राथमिकता दी जिसके कारण बिहार में सड़कों का जाल बिछ गया. गंगा, सोन एवं अन्य नदियों पर कई पुलों का निर्माण हुआ. ये और बात है कि चूहों की मेहरबानी से कई पूल समय से पूर्व काल के गाल में समा गए, बावजूद इसके लोगों को प्रतिदिन लगने वाले सड़क जाम से मूक्ति मिल गई है. अपने 20 वर्षों के कार्यकाल में कुमार ने अधारभूत संरचना के साथ ही शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में भी बेहतर कार्य किया. लेकिन रोजगार सृजन करने में चुक गए. प्रदेश में रोजगार के अवसर नहीं होने के कारण युवाओ के पलायन रोक पाने में असमर्थ दिखे. आज भी बिहार श्रम उत्पादक राज्य बन कर रह गया है. वहीं 20 वर्षों के कुमार के सुशासन व्यवस्था के बावजूद बिहार आज सबसे पिछड़े राज्यों में शुमार है.

सुशासन बाबू से पलटूराम तक की सफर

 नीतीश कुमार ने 2005 में लालू प्रसाद की जातिगत समीकरण में सेंधमारी कर मुस्लिम एवं दलित वोट बैंक के साथ ही अगड़ी जाति को भी अपने पाले करने में सफल रहे और भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई. लेकिन 2015 में फिर वो राजद एवं कांग्रेस के साथ चुनाव लड़े जिसमें इस गठबंधन ने 178 सीट पर जीत दर्ज की. जिसमें राजद को 80, जदयू को 71 और कांग्रेस को 27 सीट पर जीत मिली थी. लेकिन नीतिश कुमार भला कहां बैठने वाले थे तो उन्होंने 2017 में पाला बदलते हुए भाजपा के खेमे में चले गए. 2020 में नीतीश एनडीए का हिस्सा रहे और मुख्यमंत्री बने. 2022 में उन्होंने एक बार फिर पलटी मारी और राजद के साथ सरकार बनाई. फिर जनवरी 2024 में पाला बदल कर भाजपा के साथ बिहार में सरकार बनाई. नीतीश कुमार के बार-बार पाला बदलने से उनके प्रति लोगों का अविश्वास बढ़ा है. वहीं हाल के वर्षों में प्रशासनिक निष्क्रियता और युवाओं के पलायन प्रदेश में बढ़ते अपराध जैसे मुद्दों से उनकी लोकप्रियता में कमी आई है.
 
नीतीश का विकल्प कौन

बिहार को जंगलराज से बाहर निकालने वाले नीतीश कुमार के शासन काल में अगर अपराधी बेलगाम और बेखौफ हो दिन दहाड़े घटना को अंजाम दे रहे हैं और प्रशासन मूकदर्शक बनी हुई है जबकि गृहमंत्रालय उनके पास है. ऐसे में यह सवाल वाजिब हो जाता है कि क्या नीतीश कुमार अब रिटारयमेंट के फेज में हैं. भाजपा यह भली भांति जानती है कि बिना नीतीश के वह राज्य में सरकार नहीं बना सकती है इसलिए नीतीश को आगे रखना बीजेपी की मजबूरी है और जरुरत भी. क्यों कि भाजपा बिहार में एक मजबूत दल होने बावजूद उनके पास मुख्यमंत्री पद के लिए कोई दमदार चेहरा नहीं है. चाहे वो सम्राट चौधरी हों, विजय सिन्हा हों, नंदकिशोर यादव हों या मंगल पांडे हों इन सभी नेताओं पर कहीं ना कहीं भ्रष्टाचार के आरोप हैं, जिससे जनता इन्हें मुख्यमंत्री के तौर स्वीकार नहीं कर पा रही है. वहीं सीमांचल जैसे क्षेत्र भाजपा की कमजोर कड़ी है, और दलित-ओबीसी वर्गों में असंतोष की सुगबुगाहट भी पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं.
वहीं अगर राजद से तेजस्वी यादव की बात करें तो वे युवा हैं, सामाजिक न्याय की राजनीति के वारिस हैं, और उनके पास एक मजबूत जनाधार है. जो हाल के वोटर अधिकार यात्रा में देखने को भी मिला, लेकिन प्रशासनिक अनुभव की कमी और गठबंधन की अस्थिरता उनके सामने बड़ी चुनौती है. हालांकि बेरोजगारी और शिक्षा जैसे मुद्दों पर उनकी सक्रियता युवाओं को आकर्षित कर रही है. लेकिन 90 दशक का जंगलराज अब भी उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है. हालांकि युवाओं के पहले पंसद के तौर पर तेजस्वी देखे भी जा रहे है. हाल के दिनों में विभिन्न एजेंसियों द्वारा की गई सर्वे में तेजस्वी लोगों के पहले पसंद बताए जा रहे हैं.
वहीं वर्षों तक बिहार पर राज करने वाली कांग्रेस पार्टी की बात करें तो कांग्रेस पार्टी बिहार में 90 दशक से लगातार कमजोर होती चली गई. संगठनात्मक ढांचे की कमी, नेतृत्व का अभाव और स्थानीय स्तर पर प्रभावहीन नेतृत्व ने पार्टी को विकल्प के रूप में पीछे धकेल दिया है. हालांकि कुछ सीटों पर कांग्रेस की पकड़ बनी हुई है, लेकिन राज्यव्यापी प्रभाव सीमित है. पार्टी के पास प्रदेश स्तर का कोई प्रभावशाली नेतृत्व नहीं है जिसके आसरे पार्टी राज्य में अपनी पकड़ को मजबूत कर सके. लेकिन हाल के दिनों में राहुल गांधी में बिहार पर फोकस किया है. संगठन स्तर पर भी बदलाव किए गए हैं. राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं में उर्जा का संचार करने का प्रयास भी किया है. लेकिन पार्टी के पास प्रदेश स्तर को कोई नेता नहीं होने के कारण कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी स्पष्ट तौर पर दिख रही है. कन्हैया कुमार और पप्पू यादव लगातार अपनी उपस्थिती दर्ज कराने का प्रयास कर रहे है लेकिन घटक दलों द्वारा उनके रास्ते में रोड़ अटकाने के प्रयास भी जारी है.

बिहार को बदलने एवं अस्मिता को बचाने की बात करने वाले प्रशांत किशोर ने विगत दो वर्षों से लगातार प्रदेश में जनसुराज यात्रा के माध्यम से जनता से सीधा संवाद स्थापित किया है. वे खुद को “किंगमेकर” नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं. बिहार में लगातार यात्राएं की गांव गांव जाकर लोगों को समझाने का प्रयास किया. उनकी बैठकों और सभाओं में भी लोगों उपस्थिति अच्छी खासी रही. वो बिहार के 243 सीट पर चुनाव लड़ने का दावा कर रहे हैं. प्रशांत किशोर ने करगहर सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है. उनका दावा है कि या तो उनकी पार्टी बहुमत में आएगी या 10 सीटों से भी कम पर सिमट जाएगी. उनका यह आत्मविश्वास उन्हें एक संभावित तीसरे मोर्चे के रूप में स्थापित करता है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि बिहार की जातिगत राजनीति में प्रशांत किशोर क्या सेंधमारी कर एक नई सोशल केमेस्ट्री बना पाएंगे.
बिहार का युवा मतदाता बदलाव चाहता है. ग्रामीण क्षेत्रों में स्थायित्व की मांग है, जबकि शहरी मतदाता पारदर्शिता और विकास को प्राथमिकता देता है. सीमांचल जैसे क्षेत्रों में मुस्लिम वोट बैंक, जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे चुनावी परिणामों को प्रभावित करेंगे. नीतीश कुमार ने बिहार में जो विकास की एक लंबी लकीर खींची है उसे कौन आगे बढ़ाएगा यह बड़ा सवाल है. यहां नीतीश कुमार का विकल्प खोजना केवल एक व्यक्ति की तलाश नहीं है, बल्कि एक नई राजनीतिक संस्कृति की मांग है. भाजपा की रणनीति, राजद की जनाधार, कांग्रेस की जड़ता और जनसुराज की चुनौती—इन सबके बीच बिहार की जनता अब ऐसे नेतृत्व की अपेक्षा कर रही है जो न केवल वादे करे, बल्कि उन्हें निभाने की ईमानदार कोशिश भी करे और नीतीश के विकास की विरासत को आगे बढ़ाए.
2025 का विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक पुनर्रचना का अवसर हो सकता है. सवाल अब यह है—क्या बिहार तैयार है एक नए नेतृत्व के लिए, या फिर वही पुराना चेहरा एक बार फिर लौटेगा.

गाली पर गंभीर हो सरकार: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सामाजिक मर्यादा

जमशेदपुर। भारतीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक मूलभूत अधिकार है, लेकिन जब यह आजादी दूसरों की स्वतंत्रता के हनन, गाली-गलौज और अपमानजनक भाषा में बदल जाती है, तब यह न केवल सामाजिक मर्यादाओं को चुनौती देती है, बल्कि राजनीतिक विमर्श को भी दूषित करती है. पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रमों को देखे तो विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा जिस प्रकार सार्वजनिक मंचों से अपशब्दों का प्रयोग किया गया. यह किसी भी तरह से सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है. और उन नेताओं के खिलाफ सरकार की प्रतिक्रिया ने इस विषय को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है.
 गाली का बदलता स्वरूप
गाली कोई नई चीज़ नहीं है. यह हमारे संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रही है. यह प्राचीन काल से भावनात्मक अभिव्यक्ति का हिस्सा होने के साथ ही हास्य परिहास की प्रतिक रही है. इसका जिक्र महाभारत जैसे ग्रंथों में भी कटु शब्दों के रुप किए गए प्रयोग के तौर पर इसका उल्लेख मिलता है. दरअसल हमारे यहां गाली को “गारी” कहा जाता है या यूं कहे तो गारी का अपभ्रंश शब्द है गाली. दोनों बस इतना अंतर है कि गारी गाई जाती है जबकि गाली दी जाती है. हमारे यहां शादी विवाह में बिना गारी के विवाह समारोह सफल ही नहीं होता. तिलक या विवाह समारोह के लिए महिलाओं द्वारा कई दिनों पहले से गारी गाने का अभ्यास किया जाता था. और बेहतर गारी गाने पर वर एवं वधू पक्ष के लोगों द्वारा उन्हें पुरस्कत भी किया जाता था. लेकिन आज के वाट्सअप, सोशल मीडिया के दौर में जब लीविंग रिलेशनसीप काफी तेजी से फल फूल रहा है. ऐसे में हम अपने संस्कृति से विमुख होते जा रहे है. भाग दौड़ की जिंदगी में आज किसी के पास इतना समय नहीं कि वह महीनो तक चलने वाले शादी विवाह समारोह का आनंद ले सके. आज सबकुछ जल्दी चाहिए इसलिए सबकुछ आर्टीफिशियल हो गया है. और शायद इसलिए ही आज “गारी” गाली के स्वरुप में बदल गया है. लोग अपने अंदर के गुस्सा, गुब्बार व नाराजगी को शाब्दिक हिंसा के माध्यम से व्यक्त करते हैं.

हिंदी साहित्य में गाली का किया गया है प्रयोग

हिंदी साहित्य जगत के प्रसिद्ध उपन्यासकार श्रीलाल शुक्ल ने अपने उपन्यास “राग दरबारी” में गाली का बखूबी इस्तेमान किया है. जो कथानक औऱ प्रभावशाली बनाती है. उपन्यास में किरदार द्वारा प्रयोग किए जाने वाले गाली पाठकों को खलती नहीं है बल्कि आनंदित करती है. वहीं उपन्यासकार काशीनाथ सिंह द्वारा रचित “काशी का अस्सी” उपन्यास में गंवई भाषा में गालियों का भरपूर प्रयोग किया गया है. और वह पाठकों को असहज नहीं करता है. वहीं आज के दौर में सिनेमा, सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफार्म पर चलने वाले वेब सीरीज और राजनीति ने इसे एक नया आयाम दे दिया है. अब गालियां सिर्फ निजी गुस्से की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन गई हैं.

 राजनीति में गाली का प्रवेश
पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक मंचों पर गालियों का प्रयोग आम होता जा रहा है. जिस प्रकार चुनावी सभाओं में किसी विशेष वर्ग व समुदाय को निशाना बनाकर अपशब्दों के प्रयोग का प्रचलन बढ़ा है. इससे भारतीय राजनीति के स्तर में काफी गिरावट आई है. जिस देश के नेतृत्वकर्ता ही सार्वजनिक मंच से अपशब्दों का प्रयोग करने लगे तो उनके नेताओं व कार्यकर्ताओं की बात ही क्या करनी है. जब लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद के पटल पर सत्ता पक्ष के नेताओं द्वारा खुले तौर पर गालियां दी जाती है और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती है, तो उनका हौसला बढ़ना लाजमी है. राजनीतिक नेताओं का स्तर इतना गिर गया है कि बीजेपी के एक प्रवक्ता ने टीवी के लाइव डिबेट में कांग्रेस एक नेता के मां के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया और मजे की बात यह है कि पार्टी द्वारा उनके खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई. ऐसे में इन नेताओं का मन बढ़ना स्वाभाविक है. वहीं हाल ही में बिहार में एक राजनीतिक सभा के मंच से एक सिरफिरे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिवंगत मां के लिए कथित अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया. जिसके खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई भी की गई. लेकिन इसको लेकर एक सियासी तूफान खड़ा करने का प्रयास बीजेपी द्वारा किया गया. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस घटना की कड़ी निंदा की और इसे भारतीय परंपरा पर आघात बताया. लेकिन यहां बड़ा सबाल है कि जब उनके नेताओं द्वारा दूसरों की मां बहनों के संबंध में अपशब्दों का प्रयोग किया जाता है तब क्या भारतीय परंपरा पर आघात नहीं होता है, जिसका जवाब उनके पास नहीं. औऱ कमोवेश यहा बात दूसरे दलों पर भी लागू होता है.

 सामाजिक प्रभाव और नैतिकता
गाली सिर्फ शब्द नहीं होती, यह समाज की मानसिकता का प्रतिबिंब होती है. जब नेता सार्वजनिक मंचों से अपशब्दों का प्रयोग करते हैं, तो यह युवाओं और आम जनता के लिए एक गलत उदाहरण बनता है. इससे न केवल संवाद का स्तर गिरता है, बल्कि लोकतंत्र की गरिमा भी प्रभावित होती है. इसलिए माननीयों को शब्दों के मर्यादा का ध्यान रखना जरुरी है.
गाली पर गंभीर होना ना सिर्फ सरकार की जिम्मेवारी बल्कि पूर समाज की जिम्मेवारी है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि संवाद मर्यादित, तथ्यपरक और संवेदनशील हो. सरकार का सख्त रुख इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसे जनजागरण और नैतिक शिक्षा के साथ भी जोड़ना होगा ताकि एक स्वस्थ लोकतांत्रिक वातावरण तैयार किया जा सके.