Friday, November 7, 2025

बढ़ता मतदान, बदलता बिहार: 2025 के पहले चरण की लोकतांत्रिक तस्वीर धर्मेंद्र कुमार



बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण में 18 जिलों की 121 सीटों पर 64.66% मतदान हुआ जो पिछले 20 वर्षों के सभी रिकार्ड को धवस्त कर एक नया प्रतिमान स्थापित किया. यह आंकड़ा न केवल पिछले चुनावों की तुलना में अधिक है, बल्कि यह राज्य की राजनीतिक चेतना, जन-सक्रियता और संभावित सत्ता परिवर्तन की आहट भी देता है. मतदान में हुए इस वृद्धि का आकलन सभी दलों द्वारा अपने अपने पक्ष में बताया जा रहा है. वहीं राजनीतिक जानकार भी मतदान में हुए इस वृद्धि को लेकर स्पष्ट रुप से कुछ भी कहने से बचते दिख रहे है. 

मतदान प्रतिशत में वृद्धि के मायने

राजनीति जानकारों ने बिहार के प्रथम चरण में मतदान प्रतिशत में हुई वृद्धि के कई कारण की चर्चा की. उनका मानना है कि  जनता की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी के कारण वोट प्रतिशत में वृद्धि हुई है. इसमें जहां युवाओं और पहली बार वोट डालने वालों की भागीदारी ने इस प्रतिशत को ऊपर उठाया है. वहीं दूसरी ओर सत्ता विरोधी लहर की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है. यह बदलाव की चाहत या विकल्प की तलाश के कारण भी सकता है. बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि जैसे स्थानीय मुद्दों ने मतदाताओं को प्रेरित किया. जानकारों के अनुसार वोट प्रतिशत में वृद्धि का एक प्रमुख कारण मतदान में  महिलाओं की बढ़ती भागीदारी है. कई जिलों में तो महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा. यह सामाजिक जागरूकता और महिला सशक्तिकरण का संकेत है,  2020 में कुल 57.05% मतदान हुआ था जिसमें महिलाओं का मतदान प्रतिशत 59.6% था जबकि पुरुषों का 54.7% था. वहीं  2025 के प्रथम चरण में कुल मतदान 64.66% रहा, जिसमें महिलाओं का मतदान प्रतिशत लगभग 69% और पुरुषों का 61% रहा. 2020 के मुकाबले 2025 में महिलाओं के वोट प्रतिशत में लगभग 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इस बार के चुनाव में महिलाओं ने अपने पुराने रिकार्ड को पीछे छोड़ दिया. इसका मुख्य कारण नीतीश सरकार द्वारा ठीक चुनाव से पहले 1.21 करोड़ महिलाओं के खाते में 10 हजार रुपये दिया जाना बताया जा रहा है. इस कारण भी एनडीए इसको अपने पक्ष होने का दावा कर रही है और इसमें कुछ तो सत्यता भी है. वहीं दूसरी ओर महागठबंधन वहीं पुराने ढर्रे पर चलते हुए इस बढ़ते हुए वोट प्रतिशत को सरकार के खिलाफ लोगों के गुस्सा को बताया जा रहा है. लेकिन एक बात तो तय है कि यदि यही ट्रेंड दूसरे चरण के मतदान में भी कायम रहा तो एक बात तो स्पष्ट है कि जिस गठबंधन की जीत होगी उसको प्रचंड बहुमत मिलेगा. 
कहां कितना हुआ मतदान
बिहार के बेगूसराय जिला में सबसे अधिक मतदान 67.32% दर्ज की गई वहीं मधेपूरा में 65.74% मुजफ्फरपुर में 65.23% गोपालगंज में 64.96% पटना में 62% बक्सर में 63% भोजपुर में 64% कैमूर में 65% रोहतास में 66% औरंगाबाद में 67% अरवल में 64% सहित अन्य जिलों में भी कमोवेश 60% से अधिक मतदान हुए. कई जिलों में रिकॉर्ड मतदान ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान खींचा है, जहां सामाजिक आंदोलनों और युवा नेतृत्व की भूमिका अहम रही.
 बिहार में बढ़ा हुआ मतदान प्रतिशत लोकतंत्र की मजबूती और जन-जागरण का प्रतीक है. यह संकेत देता है कि मतदाता अब केवल दर्शक नहीं, बल्कि निर्णायक भूमिका में हैं. 2025 का यह चुनाव न केवल सीटों का गणित बदलेगा, बल्कि राजनीतिक विमर्श और जन अपेक्षाओं की दिशा भी तय करेगा.

Thursday, November 6, 2025

सरकार के नहीं दोष गोसाई धर्मेंद्र कुमार



गोस्वामी तुलसीदास जी ने सदियों पहले लिख दिया था — "समरथ के नहीं दोष गोसाई." त्रेता युग में राम थे, द्वापर में कृष्ण. और कलियुग में सरकार है. अब सरकार कोई साधारण संस्था नहीं, यह एक चमत्कारी सत्ता है. जो चाह ले तो जनता से थाली ताली बजवा सकती है, दीया जलवा सकती है, मोबाइल की टॉर्च से कोरोना को डरवा सकती है. यह वही सरकार है जो भ्रष्टाचारियों को सत्य हरिशचंद्र बना सकती है और सच बोलने वालों को कालकोठरी में तपस्या का अवसर प्रदान करती है. और यदि सरकार डबल इंजन वाली हो तो फिर वहां कथित रुप से राम राज्य होने की बात कही जाती है. डबल इंजन वाली सरकार में ना खाता ना बही जिधर बुलडोजर चल जाए वही सही. वहां पीड़ितों को न्याय मिले या मिले लेकिन सरकार के खिलाफ बोलने वालो को पुलिस प्रशासन द्वारा निश्चित रुप से पुरस्कृत किया जाता है और पुरस्कार इतना जबर्दस्त मिलता है कि पुरस्कार पाने .वालो के आने वाली सात पीढ़ीयां फिर कभी सपने में भी सरकार के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे. अपराधी, वर्तमान समय में बलात्कारी, भ्रष्टाचारी और कलंकी नेता ही कलयुग का कलिंक अवतार माना जाता है.
समर्थता का नया परिभाषा
सब साधन संपन्न सरकार समर्थवान है क्योंकि उसके पास जनता की याददाश्त से तेज़ वाइपिंग पावर है. सरकार समर्थ है क्योंकि वह सवालों को देशद्रोह में बदलने की योग्यता रखती है. वह सवाल को ही झूठा साबित कर उसको खारिज कर देती है. सरकार समर्थ है क्योंकि वह विकास की परिभाषा को रील्स और रैप में बदल चुकी है. अब दोष किसका है? दोष उनका है जो सरकार से सवाल पूछते हैं. दोषी वो हैं जो कहते हैं कि "बेरोजगारी बढ़ रही है", "महंगाई चरम पर है", "लोकतंत्र सिकुड़ रहा है". अरे भाई आप क्यों नहीं समझते है कि सरकार से सवाल पूछना मतलब राष्ट्र से सवाल पूछना क्योंकि सरकार ने यह सिद्ध कर दिया है कि वही राष्ट्र है, और राष्ट्र से सवाल पूछना मतलब राष्ट्रविरोध.
 आत्मनिर्भरता का नया स्वरुप
सरकार ने कहा — "आत्मनिर्भर बनो." तो जनता ने पकोड़े तले, रील्स बनाए, और कुछ ने तो जेल की रोटियों में भी आत्मनिर्भरता खोज ली. अब सरकार ने जनता पर भरोसा नहीं करते हुए स्वंय को आत्मनिर्भर बनाने की राह ढ़ूढ़ निकाली है. सरकार ने इस आत्मनिर्भर प्लान पर काम करना शुरु भी कर दिया है. सरकार ने जनता के वोट को अपने नाम करने का अनोखा तरीका है. इसमें जोखिम बिलकुल भी नहीं सही रहा तो सरकार के पक्ष में और अगर चोरी पकड़ी गई तो संवैधानिंक संस्था की जिम्मेवारी यह प्लान रंग भी ला रहा है. आप सरकार से उम्मीद क्यों करते हैं? क्या सरकार ने सबका ठेका ले रखा है? क्या आपको हर बार बताना पड़ेगा कि सरकार का काम सिर्फ चुनाव जीतना और सरकार चलाना है जनकल्याण करना नहीं?
 लोकतंत्र का नया रंगमंच
संसद अब बहस का नहीं, बहिष्कार का मंच बन चुकी है. मीडिया अब सवाल नहीं पूछता, सरकार की चालीसा गाता है. न्यायपालिका अब न्याय नहीं देती, टिप्पणी से काम चला लेती है. और जनता? जनता अब मेमोरी कार्ड की तरह है. जब तक फॉर्मेट नहीं होती, तब तक पुराने सवालों को याद करती रहती है. इसलिए हे गोसाई, हे भक्तगण, हे आत्मनिर्भर नागरिकों — दोष मत ढूंढो, सवाल मत पूछो, थाली बजाओ, दीया जलाओ, रील बनाओ, सरकार से मिलने वाली रेवड़ीयों का आनंद लीजिए और सरकार को समरथ मानकर उसकी हर लीला को रामलीला समझकर जयकारा लगाइए. क्योंकि — "समरथ सरकार के नहीं दोष गोसाई!" तो प्रेम से समरथ सरकार की जय बोलिए. जय हो.

Wednesday, November 5, 2025

वादों की बारिश में भीगता लोकतंत्र: चुनावी मौसम का विज्ञान ✍️धर्मेंद्र कुमार



जब आसमान बिलकुल साफ नीला हो और बिन बादल  वादों की बारिश हो तो यकिन मानिए वह चुनावी मौसम आगाज़ है. चुनावी मौसम में अक्सर लगातार वादों की बारिश होती रहती है. यह वो बारिश है जिसमें जनता भींगती नहीं है बल्कि वादों कि बारिश की बूंदें कानों के रास्ते दिल तक पहुंच कर गुदगुदी करती हैं, और दिमाग में भ्रम पैदा करती हैं. यह चुनावी मौसम का असर है इसका कोई इलाज नहीं है.
 वादों का मानसून
हर पांच साल में लोकतंत्र के आंगन में एक विशेष प्रकार का मानसून आता है, जिसमें माननीय नेतागण बादलों की तरह गरजते हैं, बिजली की तरह चमकते हैं, और फिर वादों की बौछार करते हैं. इस खुशनुमा चुनावी मौसम की बारिश का अपना ही आनंद है. माननीय लोग वादों की झड़ी लगा देते है और बेचारी जनता इस वादों की बारिश को हमेशा की तरह झेलती है. उसे पता है कि यह चुनावी मौसम की बादों की बारिश से ना तो “हर हाथ को काम मिलता है,” ना ही “हर खेत को पानी,” ना ही “हर जेब में पैसा और हर घर में वाई फाई,” और इतने वर्षों में ना ही “भ्रष्टाचार खत्म हो पाया और ना ही समाज के अंतिम पायदान पर खड़े आम नागरिकों का ही विकास हुआ.” जनता भी इस मौसम की अनुभवी है. वो जानती है कि माननीयों द्वारा आयोजित ये वादों की नकली बारिश दरअसल जनकल्याण के लिए अपितु लोगों को दिगभ्रमित करने के लिए की जाती है.
 चुनावी कैटवॉक
चुनाव मौसम में माननीय नेताओं के फैशन परेड के क्या कहने हैं. माननीय लोग ऐसे सज-धज कर निकलते हैं जैसे हर ओर फैशन शो हो रहा हो. कोई टोपी बदलता है, कोई रंग तो कोई पार्टी ही बदल देता है. भाषणों में "गरीबों का मसीहा" बनने की होड़ लग जाती है. और जनता? वो हर बार उम्मीद करती है कि “इस बार शायद सचमुच कुछ बदले,” बदलाव तो होता है लेकिन सिर्फ नारों में. अफसोस जनता हर बार छली जाती है. यही लोकतंत्र कि विशेषता है कि जिसके दम पर लोकतंत्र जीवित है उसी लोकतंत्र में तंत्र हमेशा लोक पर हावी रहता है. 
वादों की प्रयोगशाला
नेताओं के पास एक गुप्त लैब होती है, जहां काफी जांच परख के बाद वादों को तैयार किया जाता है. वहां से निकलते हैं.  त्वरित विकास के कैप्सूल, मुफ़्तख़ोरी बम व मुफ्त की रेवड़ी योजनाएं, धर्मनिरपेक्ष सिरप और राष्ट्रवाद का नूडल्स . इनका सेवन करने से जनता को कुछ समय के लिए लोकतंत्र का स्वाद आता है, लेकिन बाद में पेट में मरोड़ और पछतावा होता है.
 जनता का जादू
फिर भी, सबसे बड़ा वोट का जादू जनता के पास होता है. वो चाहे तो राजा को रंक बना दे, और रंक को राजा.  लेकिन अक्सर वो जादू या तो जाति में उलझ जाता है, या जुमलों में फंस कर रह जाता हैं. चुनावी मौसम में वादों की बारिश का आनंद वही ले सकता है जो जानता है कि ये बारिश नहीं, बर्फबारी है. जो ऊपर से मुलायम लगती है, लेकिन नीचे सब कुछ जमा देती है. इस बार भी चुनावी मौसम आया है. वादों की बौछार शुरू है. छाता मत निकालिए, नज़रें तेज कीजिए.  क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत वादों को परखने में है, न कि  उनमें भीगने में. तो चुनावी मौसम का आंनद लीजिए और मस्त रहिए.

Tuesday, November 4, 2025

अत्यंत अद्भुत गुणकारी है चुनावी मौसम में श्री सत्ता नारायण भगवान की कथा ✍️धर्मेंद्र कुमार


जब-जब लोकतंत्र संकट में आता है, तब-तब श्री सत्ता नारायण भगवान अवतरित होते हैं. उनका आगमन न तो पुष्पक विमान से और न ही किसी तपस्वी की तपस्या से बल्कि वे आते हैं चुनाव आयोग की घोषणा के साथ, और जाते हैं परिणाम की घोषणा के बाद. इस दौरान वे जनता के बीच चमत्कार करते हैं, वादों की वर्षा करते हैं, और हर गली-नुक्कड़ में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं.
 अवतार की लीला
श्री सत्ता नारायण भगवान के अवतार अनेक रूपों में होते हैं, कभी वे किसान के हमदर्द बनते हैं तो कभी बेरोजगारों के मसीहा. चुनावी मौसम में उनके चमत्कारों की गति इतनी तीव्र होती है कि पांच सालों की निष्क्रियता एकदम से सक्रियता में बदल जाती है. सड़कें बनती हैं, घोषणाएं होती हैं, और जनता को याद दिलाया जाता है कि "आप ही हमारे मालिक हैं" बशर्ते वोट सही बटन पर पड़े.
 प्रसाद वितरण
श्री सत्ता नारायण भगवान की कथा में प्रसाद का विशेष महत्व होता है. भक्तों को मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, और मुफ्त वादों का प्रसाद मिलता है. कुछ विशेष भक्तों को तो टिकट नामक अमृत भी मिलता है, जिससे वे स्वयं सत्ता के हिस्सेदार बन जाते हैं. इस प्रसाद की गुणवत्ता चुनाव के बाद स्वतः समाप्त हो जाती है, जैसे ही भगवान बैक टू रियलिटी मोड में लौटते हैं.
 कथा की पुनरावृत्ति
हर चुनावी मौसम में वही कथा दोहराई जाती है कि "हमने किया", "हम करेंगे", "वे निकम्मे थे", "हम महान हैं". जनता, जो इस कथा की श्रोता है, हर बार नए कथा वाचकों के माध्यम से वही पुरानी सत्ता नारायण की कथा सुनती है. फर्क बस इतना है कि इस बार कथा वाचकों की वाणी में और भी अधिक डिजिटल प्रभाव है, रिल्स, ट्वीट्स और वायरल वीडियो के रूप में.
 भक्तों की श्रद्धा
श्री सत्ता नारायण भगवान के भक्तों की श्रद्धा अडिग होती है. वे हर बार विश्वास करते हैं कि इस बार भगवान सचमुच कल्याण करेंगे. वे भूल जाते हैं कि पिछली बार भी यही कथा थी, बस कथा वाचक बदले थे. भक्तों की स्मृति इतनी क्षीण होती है कि वे पांच साल की पीड़ा को पांच मिनट के प्रवचन में भूल जाते हैं.
कथा का फलादेश
कथा का अंत हमेशा एक ही होता है, कुछ भक्त निराश होते हैं, कुछ सत्ता में शामिल हो जाते हैं, और कुछ अगले चुनाव तक फिर से तपस्या में लीन हो जाते हैं. श्री सत्ता नारायण भगवान अगली बार जब फिर अवतरित होंगे तो फिर वही कथा सुनाई जाएगी, और फिर वही प्रसाद वितरित होगा.  चुनावी मौसम में श्री सत्ता नारायण भगवान की कथा अत्यंत गुणकारी है. यह जनता को आशा देती है, नेताओं को मंच देती है, और लोकतंत्र को तमाशा बना देती है. यह कथा हर पांच साल में दोहराई जाती है, और हर बार हम इसे "नया युग" मानकर सुनते हैं. सच्चाई यही है कि श्री सत्ता नारायण भगवान की कथा का श्रवण और प्रसाद ग्रहण के बिना लोकतंत्र व जनता का कल्याण संभव ही नहीं है. इति श्री सत्ता नारायण कथा समाप्तः.

Monday, November 3, 2025

अंधभक्त बनाम चमचे: कौन है नंबर वन ? ✍️ धर्मेंद्र कुमार


 
राजनीति का मंच अब अखाड़ा बन चुका है.  जहां विचारधाराओं की कुश्ती नहीं बल्कि  वफादारी की डब्ल्यू डब्ल्यू इ (WWE) चल रही है. एक ओर अंधभक्त हैं, जो अपने नेताओं की हर बात को वेदवाक्य मानते हैं और उनके झूठे बयानों को भी सच बताने के लिए तमाम तरह के गलत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. थेथरई उनका अमोध अस्त्र है, यदि उससे भी बात नहीं बनी तो गाली गलौज व मारपीट पर उतर जाते हैं. दरअसल अंधभक्तों की शिक्षा मूलतः व्हाट्स्अप यूनिवर्सिटी से हुई है. व्हाट्स्अप यूनिवर्सिटी से तो आप वाकिफ होंगे ही. आजकल उसी का ट्रेंड है. वहीं दूसरी ओर चमचों की बिरादरी है, जो अपने नेताओं के जूते चमकाने में इतनी महारत रखते हैं कि कभी-कभी इनके नेता खुद भ्रमित हो जाता है कि वो नेता है या सेलिब्रिटी.
 तथ्यों की तिजोरी में ताले
इन दोनों वर्गों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनको तथ्यों से परहेज़ है. इतिहास की जानकारी तो इन्हें व्हाट्स्अप यूनिवर्सिटी से मिलती है, और भूगोल इनके लिए एक ट्रोल पोस्ट मात्र हैं. जब भी कोई सवाल उठता है, तो जवाब में आते हैं गूगल से प्राप्त अधकचरे आंकड़े, पुरानी क्लिपिंग्स, और भावनात्मक ब्लैकमेल पोस्ट. इन्हें अपने नेताओं के समक्ष अपनी वफादारी साबित करनी पड़ती है ताकि इनकी राजनीति की दुकान चलती रहे.
 राजनीति में 'चाटुकारिता' ही सफलता की एक मात्र कुंजी है
किसी जमाने में भारतीय राजनीति में विचारधारा, नीति और जनसेवा की बात होती थी. लेकिन अब वहां ट्रेंडिंग हैशटैग, फोटोशूट, और टीवी डिबेट की नौटंकी है. नेता अब भाषण नहीं देते, डायलॉग मारते हैं. और उनके अनुयायी भक्त और चमचे उन डायलॉग्स को आत्मसात करते हैं. यदि आप शिक्षित, ईमानदार व प्रतिभावान है लेकिन आपके पास चाटुकारिता व चमचागिरी की कोई सर्टिफिकेट नहीं है तो लाख चाहने के बावजूद आप वर्तमान राजनीति में सफल नहीं हो सकते हैं. क्योंकि वर्तमान राजनीति में चाटुकारिता व चमचागिरी ही सफलता की कुंजी है.
नंबर वन कौन ?
नंबर वन बनने के इस महामुकाबले में जीत किसी की नहीं होती. बल्कि हार होती है विवेक की, तर्क की, और लोकतंत्र की गरिमा की. लेकिन दोनों ही पक्ष अपने-अपने आकाओं की जय-जयकार में इतने व्यस्त और मस्त हैं कि उन्हें समझाना अब तर्क व तथ्यों का अपमान लगता है. जब हर बात को सही साबित करने के लिए  गलत उदाहरण दिए जाते हैं, तो कुछ देर के लिए ही सही जनता भी भ्रमित हो जाती है. लेकिन उस भ्रम में सच की हत्या हो जाती है. और जब सच मरता है, तो समाज में अंधविश्वास, घृणा, और टुकड़ों में बंटी सोच जन्म लेती है.
 जब राजनीति में भक्तों और चमचों की संख्या बढ़ती है, तो जनता सिर्फ तमाशबीन बन जाती है. लेकिन हकीकत यही है कि तमाशा देखने से बदलाव नहीं आता. बदलाव आता है सवाल पूछने से, तथ्य को जानने से, और नेताओं को जवाबदेह बनाने से. अब निर्णय आपको करना है कि सबकुछ भुलाकर कुंभकर्णी निंद्रा में पड़े रहना है या फिर समाज और देश की बेहतरी के लिए मजबूती के साथ कदम बढ़ाना है. जय हिंद

Sunday, November 2, 2025

नेता जी कहिन: नाच ना आवे, आंगन टेढ़ा ✍️ धर्मेंद्र कुमार



वर्तमान परिपेक्ष्य में भारतीय राजनीति का मंच अब सिर्फ भाषणों का नहीं बल्कि यह एक रंगमंच बन गया है, जहां नेता जी कभी भावुकता का भरतनाट्यम करते हैं, कभी वादों की कथकली, और कभी-कभी तो विरोधियों पर आरोपों की ब्रेक डांस भी कर डालते हैं. चुनावी मौसम आते ही देश के हर कोने में "नेता नृत्य महोत्सव" शुरू हो जाता है जहां टिकट फ्री और ड्रामा गारंटीड. डांस दिखाओ वोटर रिझाओ के इस महाकुंभ में फ्री में जनता का भरपूर मनोरंजन होता है.

लोकतंत्र में नाच के प्रकार 

वैसे तो भारतीय शास्त्रीय संगीत में नृत्य का महत्वपूर्ण स्थान है. नृत्य के कई प्रकार भी हैं. लेकिन भारतीय राजनीति में नाच व नृत्य की बात ही कुछ और है. राजनीति में नाच कई प्रकार के होते हैं, जिनका कोई शास्त्रीय वर्गीकरण तो नहीं हैं. लेकिन वह जनभावनाओं में गहराई से पैठ बना चुके हैं. बात अगर राजनीति नृत्य की करें तो पहले नंबर पर वोट-लुभावन तांडव नृत्य आता है.  इसमें नेता जी विकास की ऐसी झड़ी लगाते हैं कि जनता को लगता है, बस अब रामराज्य आने ही वाला है. सड़क, बिजली, पानी सब वादों की ताल पर थिरकते हैं. वहीं दूसरा नंबर आरोप-प्रत्यारोप गरबा का है. इसमें एक पार्टी आरोप लगाती है, दूसरी उसका जवाब देती है, फिर दोनों मिलकर मीडिया के कैमरे के सामने ऐसा गरबा करते हैं कि टीआरपी की घंटी बज उठती है. तीसरा नंबर दल-बदल भांगड़ा का है. चुनाव से पहले नेता जी जिस पार्टी में होते हैं, चुनावी हवा बदलते ही दूसरे दल में कूद पड़ते हैं. यह नाच बिना संगीत के होता है, लेकिन ताल हमेशा सत्ता की होती है. वहीं जब कोई नेता अपने पुराने बयानों से पलटी मारता है, तो वह संविधान की व्याख्या करते हुए संविधानिक कथक करता है तो कुछ देर के लिए ही सही जनता भी भ्रमित हो जाती है.

 टेढ़ा आंगन या नाच नकली?
नेता जी कहते हैं कि "हम तो सच्चे हैं, नाचना नहीं आता, आंगन ही टेढ़ा है." लेकिन जनता जानती है कि यह आंगन टेढ़ा नहीं, तेजाबी है, जहां हर कदम फिसलन भरा है. हकिकत यह है कि नाचने वाले को पता है कि कैमरा कहां है, तालियां कब बजेंगी, और कब मंच से उतरकर फिर से जनता के बीच "सेवा" का अभिनय करना है, कब आंसू बहाना है और कब गीत गुनगुनाना है.
 नाच का नया रंगमंच
सोशल मीडिया के इस दौर में अब तो नेता जी का हर स्टेप वायरल होता है. कोई मंच पर गाना गा रहा है, कोई डांस कर रहा है, कोई बच्चों को गोद में उठाकर वोट मांग रहा है. जनता भी कम नहीं मीम्स, रील्स और व्यंग्यात्मक ट्वीट्स व कमेंट्स की बौछार से नेता जी का "नाच" ट्रेंडिंग में बना रहता है. राजनीति का यह नाच कभी-कभी मनोरंजन देता है, तो  कभी चिंता भी. लेकिन जब जनता सजग होती है, तब यह नाच एक जन-जागरण बन जाता है. नेता जी चाहे जितना भी कहें  "नाच ना आवे, आंगन टेढ़ा." जनता सब जानती है कि  नेताओं को नाच भी आता है, और आंगन भी सीधा है, बस उनकी नीयत ही टेढ़ी है.

Friday, October 31, 2025

"कुशासन की नई परिभाषा या जंगलराज का रिवाइवल पार्ट 2?" ✍️ धर्मेंद्र कुमार




बिहार में 2025 के चुनावी मौसम ने लोकतंत्र की गरिमा को फिर से लहूलुहान कर दिया है. मोकामा में जन सुराज पार्टी के नेता दुलारचंद यादव की हत्या और सिवान में एक एएसआई की गला रेतकर हत्या ने यह साबित कर दिया कि ‘सुशासन बाबू’ के राज में कानून-व्यवस्था सिर्फ भाषणों तक सीमित हो कर रह गया है. यदि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्यमंत्री के नजर यह सुशासन व्यवस्था है तो आप सहज ही अंदाजा लगा सकते है कि जंगलराज में क्या स्थिती होगी. आज के दौर में तो यही जंगलराज पार्ट 2 है. बड़ा सवाल यही है कि क्या इसी सुशासन व्यवस्था से प्रदेश की जनमानस का कल्याण होगा, यह गंभीर चिंता का विषय है.

कुशासन का नया अवतार

आपको बता दे कि 30अक्टूबर 2025 को मोकामा के घोसवरी थाना क्षेत्र में जन सुराज समर्थक दुलारचंद यादव की गोली मारकर हत्या कर दी गई. वे चुनाव प्रचार में निकले थे, और यह हत्या चुनावी रंजिश का नतीजा बताई जा रही है. सिवान में एक एएसआई की गला रेतकर हत्या कर दी गई, और आरोप है कि इसमें शराब माफियाओं का हाथ है. इन दोनों घटनाओं ने बिहार की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या यह वही बिहार है जहाँ प्रधानमंत्री और गृहमंत्री द्वारा ‘सुशासन’ का दावा किया जाता है?
क्या कहते है आंकड़े
2024 में बिहार में हत्या के 3,800 से अधिक मामले दर्ज हुए, जो देश के टॉप 5 राज्यों में शामिल है. 2025 के पहले 10 महीनों में ही 3,200 से अधिक हत्या के मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से कई चुनावी रंजिश और आपराधिक गिरोहों से जुड़े हैं. शराबबंदी के बावजूद 2024 में 1.5 लाख से अधिक शराब जब्ती के मामले दर्ज हुए, और शराब माफियाओं की ताकत लगातार बढ़ती दिख रही है. यह तो महज दो वर्षों का आकड़ा है एनसीआरबी के आकड़ों के अनुसार पिछले 10 वर्षों अपराधिक घटनाओं में अप्रत्याशित बढ़ोतरी दर्ज की गई है. 

सुशासन या कुशासन
प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री लगातार 90 के दशक के ‘जंगलराज’ की बात करते हैं, लेकिन मौजूदा हालात तो प्रदेश में जंगलराज पार्ट 2 चल रहा है. बाहुबली नेताओं की वापसी हो चुकी है. पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता ने जनता का भरोसा डगमगा रहा है. ऐसा लगता है कि “बिहार में अब कुशासन का नया ब्रांड लॉन्च हुआ है—‘सुशासन 2.0’, जिसमें अपराधी VIP हैं और जनता RIP!”
बिहार की जनता को यह समझना होगा कि चुनाव सिर्फ वोट डालने का नहीं, जवाब मांगने का भी पर्व है. जब जनप्रतिनिधि सुरक्षा देने में नाकाम हों, और प्रशासन सिर्फ चुनावी रैलियों की भीड़ गिनने में व्यस्त हो, तो लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है. अब वक्त है कि जनता सवाल पूछे—कुशासन की इस नई परिभाषा में हमारा भविष्य कहाँ है?

Thursday, October 30, 2025

लोकतंत्र में लोकलुभावन वादों से कैसे होगा जनता का कल्याण? धर्मेंद्र कुमार


बिहार में चुनाव आते ही नेताओं की जुबान पर "जनकल्याण" के जुमले चिपक जाते हैं. इस दौरान हर गली, नुक्कड़, और चाय की दुकान पर बिना बादल, बिना मौसम, और बिना गारंटी के लगातार वादों की बरसात होती रहती है. हर चुनाव में नेता थोक के भाव में वादे करते हैं जैसे "हर युवा को नौकरी", "हर खेत को पानी", "हर घर को बिजली", और "हर वोट को सम्मान",महिलाओं को आर्थिक रुप से सशक्त बनाने के ले लोखों रुपये के लोन. अब तो नेताओं ने लोगों के आस्था को भी चुनावी वादों में शामिल करने का प्रयास किया. लेकिन जैसे ही चुनाव समाप्त होता है, नेताओं के ये खोखले वादे भी जुमलों में तब्दिल हो जाते हैं. जनता खेतों में पानी ढ़ूढ़ती रहती है और नेता सत्ता की मलाई चाभने में व्यस्त और मस्त रहते है. यही भारतीय लोकतंत्र की विशेषता है. हर पांच वर्षों के बाद सारी बेशर्मी को ताख पर रख कर उन्हीं वादों के साथ पुनः नेता जी जनता के समक्ष वोट मांगने के लिए प्रकट हो जाते है. यह भारतीय जनमानस की हृदय विशालता का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि जनता हर बार नेताओं के वादों पर भरोसा कर उन्हें अना समर्थन देती है. लेकिन मोटी चमड़े वाले नेताओं की नियत भी कुत्ते की दुम की तरह ही होती है.
आपको बता दें कि  लोकतंत्र में वादे करना एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है. इसमें पहले जनता की भावनाओं को मापा जाता है, फिर उन्हें लुभाने के लिए शब्दों का ऐसा मिश्रण तैयार होता है जो सुनने में तो मधुर व मनभावन लगे, लेकिन पूरा करना असंभव हो. शायद इसे ही "चुनावी जुगलबंदी" कहते हैं. जहां तक चुनावी वादों के बिहार मॉडल की बात है, तो यहां चुनावी वादे ऐसे होते हैं जैसे "बिहार को सिंगापुर बना देंगे", कोई कहता है "हर छात्र को लैपटॉप देंगे", और कोई तो "बेरोजगारी भत्ता" को ऐसे पेश करता है जैसे शादी में मिठाई बांटी जा रही हो.
 जनकल्याण की धारणा वास्तव में एक रहस्य है. नेता इसे हर भाषण में दोहराते हैं, लेकिन इसको पूरा करने का कोई ठोस आधार नहीं बताते हैं. शायद यह वही चीज है जो चुनाव के बाद गायब हो जाती है, जैसे सरकारी योजनाओं का बजट.  जब तक वादों की पूर्ति की कोई जवाबदेही नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र लोकलुभावन वादों का अखाड़ा बना रहेगा. जनता हर बार उम्मीदों की गठरी लेकर वोट देगी और हर बार उसकी झोली खाली ही रहेगी. क्योंकि कड़वी हकिकत यही है कि सिर्फ भाषण से कभी राशन नहीं मिलता.

Tuesday, October 28, 2025

बिहार चुनाव 2025: कांग्रेस की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन? ✍️धर्मेंद्र कुमार



“हवाहवाई रणनीति और ओवरकॉन्फिडेंस ने कांग्रेस को डुबोया

         

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कांग्रेस पार्टी की स्थिति एक शिकस्त खाई टीम जैसी दिख रही है. जिसका न तो रणनीति स्पष्ट, न संगठन मजबूत, और न ही नेतृत्व में वह समझदारी जो एक बड़े गठबंधन में अपेक्षित होती है. वोटर अधिकार यात्रा के दौरान मिले अपार जनसमर्थन के भ्रम में उलझे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं व रणनीतिकारों के अति उत्साह व ओवरकॉन्फिडेंस के कारण बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस न सिर्फ सीटों के मामले में पिछड़ गई बल्कि गठबंधन में उसकी स्थिती भी कमजोर हुई है. शुरुआती दौर में कांग्रेस के पास बार्गेनिंग पावर था लेकिन नेताओं के ओवरकॉन्फिडेंस के कारण सब गड़बड़ा गया. 

 नेतृत्व का ओवरकॉन्फिडेंस होना

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व व रणनीतिकारों के ओवरकॉन्फिडेंस के कारण प्रथम दृष्टया में बिहार विधानसभा चुनाव में नुकसान होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की चुनावी रणनीति बनाने व निर्णय लेने में हुई देरी के कारण पार्टी को सीटों का नुकसान हुआ. वहीं तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने में हिचकिचाहट दिखाना और फिर अंततः समर्थन देना. यह द्वंद्व पार्टी की असमंजस भरी स्थिति को दर्शाता है. वोट अधिकार यात्रा के दौरान जो जनसमर्थन इंडिया गठबंधन को मिला, उसे कांग्रेस ने अपने पक्ष में समझने की भूल की, जिससे रणनीतिक भ्रम पैदा हुआ. जब पार्टी के पास अपनी शर्तों पर गठबंधन के दलों के साथ बार्गेंनिंग करने का मौका था. तब नेताओं के ओवरकॉन्फिडेंस के कारण वे चुक गए. जिसका खामियाजा उन्हें कम सीटों के तौर पर भुगतना पड़ा. समय पर बार्गेंनिंग नहीं हो पाने के कारण असमंजस की स्थिती पैदा हो गई. जिसके कारण लगभग एकदर्जन सीटों पर राजद और कांग्रेस दोनो ने अपने उम्मीदवार मैदान में उतार दिए. इससे जनता में गलत मैसेज गया, जिसका नुकसान निश्चित रुप से गठबंधन को होना तय है.

 संगठनहीनता और जातिगत समीकरण की अनदेखी
पार्टी के शीर्ष नेताओं को बिहार में अपने संगठन की स्थिती के आधार पर निर्णय लेना चाहिए था. ऐसा लगता है कि कांग्रेस के नेताओं ने बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर ठीक से होमवर्क नहीं किया यही कारण है कि सब कुछ हवाहवाई में रह गया. यदि पार्टी के रणनीतिकार चुनाव को लेकर होमवर्क किए होते तो आज स्थिती कुछ और होती. वहीं प्रदेश प्रभारी कृष्णा अल्लावरू की बिहार की जातिगत और सामाजिक संरचना की समझ सीमित रही, जिससे टिकट वितरण में भारी चूक हुई. लगभग डेढ़ दर्जन सीटें ऐसे उम्मीदवारों को दी गईं. जिनके तार एनडीए से जुड़े रहे हैं. यह न सिर्फ गठबंधन की नीति के खिलाफ था, बल्कि मतदाताओं के विश्वास को भी डगमगाने वाला कदम है वहीं पार्टी कार्यकर्ताओं में निराशा का भाव उत्पन्न होना भी स्वाभाविक है.
 टिकट वितरण में खेल और अंदरूनी असंतोष
कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व द्वारा पार्टी के वैसे नेताओं को बिहार विधानसभा से अलग रखना नुकसानदेह साबित हुआ. जो बिहार की राजनीति एवं जातिगत समीकरण को बेहतर ढ़ग से समझते हैं. टिकट वितरण में बड़े पैमाने पर गुटबाज़ी और व्यक्तिगत समीकरणों का बोलबाला रहा. कई जिलों में स्थानीय नेताओं की अनदेखी की गई, जिससे जमीनी कार्यकर्ता हतोत्साहित हुए. पार्टी ने सर्वे और फीडबैक के बावजूद दो मौजूदा सीटें गंवा दीं, जो रणनीतिक विफलता का स्पष्ट संकेत है. 
चुनाव से पहले राहुल गांधी की सक्रियता और वोटर अधिकार यात्रा ने कुछ उम्मीदें जगाईं थी, लेकिन नेतृत्व की चुप्पी, निर्णय में देरी और संगठन की निष्क्रियता ने इन उम्मीदों को धुंधला कर दिया है ऐसा प्रतीत होता है. कांग्रेस ने आरजेडी के साथ आंख में आंख मिलाकर बात करने की कोशिश की, लेकिन सीट बंटवारे और सीएम फेस पर स्पष्टता की कमी से गठबंधन कमजोर हुआ. हालांकि 29 अक्टूबर से राहुल गांधी बिहार में तेजस्वी के साथ चुनाव प्रचार की शुरुआत करेंगे. यह देखना दिलचस्प होगा कि जब राहुल और तेजस्वी की जोड़ी चुनावी मैदान में प्रचार करने उतरती है तो इसका कितना प्रभाव पड़ता है.
बिहार चुनाव 2025 कांग्रेस के लिए परीक्षा की घड़ी है. संगठन के बिना उम्मीदें पालना आत्मघाती है. यदि पार्टी को भविष्य में कोई भूमिका निभानी है, तो उसे नेतृत्व में स्पष्टता, संगठन में मजबूती और ज़मीनी हकीकत की समझ विकसित करनी होगी. वरना हर चुनाव में कांग्रेस सिर्फ गठबंधन का “अनिवार्य लेकिन अप्रभावी” घटक बनकर रह जाएगी.

चुनावी मौसम में नेता जी का राजनीतिक योगाभ्यास व प्राणायाम धर्मेंद्र कुमार


बिहार में चुनावी मौसम आते ही नेता जी का शरीर लचीला हो जाता है. नहीं, योगाभ्यास से नहीं बल्कि वोट पाने की साधना से. हर पांच साल में एक बार नेता जी पूरे जतन से ‘वोट-योग’ की तपस्या करते हैं, जिसमें वे जनता को लुभाने के लिए ऐसे-ऐसे आसन करते हैं कि बड़े बड़े योग गुरु भी अचंभित जाएं. इसमें तो कई नेताओं को महारत हासिल है. चुनाव के दौरान नेता जी द्वारा राजनीतिक योगासन के विभिन्न आसन के माध्यम से जनता को उनकी बेहतर राजनीतिक स्वास्थ्य का जानकारी प्रदान करते हैं. इन राजनीति आसन से किसे कितना फायदा पहुंचा है यह विमर्श का विषय हो सकता है लेकिन नेता जी हर पांच वर्षों पर यह करते जरुर हैं.
 वादाासन
सबसे पहले नेता जी के वादासन की बात करें तो इस आसन में जनता के सामने वादों की माला जपते हैं कि जीतने के साथ ही “हर खेत तक पानी पहुंचेगा,” “हर हाथ को काम मिलेगा,” “हर सड़क पर विकास दौड़ेगा.” इस आसन में नेता जी की गर्दन ऊपर, आंखें चमकदार, और ज़ुबान इतनी लचीली कि कल के वादे आज के बयान से मेल न खाएं तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता.
 पलटासन
पलटासन नेता जी का पसंदीदा आसन है. इसमें वे अपने कपड़ों की तरह पुराने बयानों को पलटते हैं, गठबंधन बदलते हैं, और विचारधारा को योगा मैट की तरह मोड़ते हैं. कल जो विरोधी था, आज वही सहयोगी है. कल जो “जनविरोधी” था, आज “जनसेवक” बन गया है. जनता पूछे तो जवाब मिलता है—“राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन नहीं होता, बस स्थायी कुर्सी होती है.” बिहार की जनता ने कई बार इस पलटासन को देखा समझा और जाना है.
  राजनीतिक प्राणायाम
इसमें नेता जी सांसों के साथ भावनाएं फूंकते हैं—कभी जाति, कभी धर्म, कभी क्षेत्रीय गौरव. “हम आपके हैं, आप हमारे हैं.”बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाएंगे लेकिन समय नहीं बताएंगे, “हमने किया है, हम ही करेंगे.” इस प्राणायाम में जनता की सांसे भले थम जाए, लेकिन नेता जी नजरे उनकी वोट पर टिकी होती है.
नेता जी के राजनीतिक योगाभ्यास व प्राणायाम के दौरान जनता को चाहिए कि वह अपना ‘बुद्धि-योग’ साधे. ना सिर्फ वादा सुनें, अपितु उसे याद भी रखें और नेता जी को गाहे बगाहे उनके वादों की याद भी दिलाती रहें ताकि नेता जी को भी सनद रहे कि जनता भी उनके राजनीतिक योग को बेहतर समझती है. "नेता जी का योग तभी सफल माना जाएगा, जब जनता का लोकतंत्र स्वस्थ और सजग हो. लोकतंत्र में सबसे बड़ा योग वही है, जो जनता को जागरूक बनाता है, और नेता को जवाबदेह.

Sunday, October 26, 2025

लोकआस्था के महापर्व छठ के आसरे लोकतंत्र का महापर्व को साधने की कवायद धर्मेंद्र कुमार



लोकआस्था का महापर्व छठ केवल एक पर्व नहीं अपितु त्याग,समर्पण,श्रद्धा, अनुशासन और सामाजिक समरसता का जीवंत दस्तावेज है. यह वह क्षण होता है जब करोड़ों श्रद्धालु प्रकृति, सूर्य और जल के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं. आस्था से जुड़ा दुनिया का एक मात्र ऐसा पर्व है जिसमें सबसे पहले डुबते हुए (अस्ताचलगामी) सूर्य को अर्घ्य देते हैं इस विश्वास के साथ कि कल नई उर्जा, उम्मीद व आकांक्षा के प्रतिकके तौर सबके कल्यार्थ भगवान भास्कर का उदय होगा और दूसरे दिन छठ व्रती उदीयमान अर्थात उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं. यही इस पर्व की विशेषता और महानता है. लेकिन जब केवल सत्ता के लिए इस आस्था का राजनीतिकरण किया जाता है, तो सवाल उठते हैं और उठने भी चाहिए.
 यमुना किनारे आस्था बनाम व्यवस्था
दिल्ली में छठ पूजा के लिए यमुना नदी के किनारे लाखों श्रद्धालु जुटते हैं. लेकिन इस बार दृश्य कुछ अलग होगा. आप जानते है कि बिहार में चुनाव का माहौल है और देश की राजधानी में बिहारियों की अच्छी खासी आबादी है तो भला प्रधानमंत्री कैसे पीछे रह जाते है. तो सोमवार की शाम को देश के प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी भी लोकआस्था के महापर्व के अवसर पर छठ व्रतियों के साथ यमुना नदी के घाट पर भगवान सूर्य को अर्घ्य देंगे देना भी चाहिए. लेकिन यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रधानमंत्री के लिए यमुना नदी के किनारे एक विशेष घाट बनाया गया है. नकली यमुना जिसमें फिल्टर पानी भरा गया है. वहीं आम जनता उसी असली यमुना में खड़ी हो कर भगवान सूर्य को अर्घ्य देगी, जिसकी हालत दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति की रिपोर्ट के अनुसार "गंदा ही नहीं, जहरीला" है.
सवाल यह नहीं कि प्रधानमंत्री अर्घ्य देंगे, सवाल यह है कि पिछले 11 वर्षों में उन्हें छठ की याद क्यों नहीं आई? और अब जब बिहार की राजनीति गरम है, तो अचानक सूर्योपासना की आस्था क्यों जाग गई?
 आस्था या राजनीतिक अवसरवाद
भाजपा ने इस बार छठ को एक राजनीतिक अवसर की तरह साधने के लिए वासुदेव घाट पर प्रधानमंत्री के लिए वजीराबाद जल शोधन संयंत्र से पाइपलाइन द्वारा फिल्टर पानी लाया गया. आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया कि यह पूर्वांचलियों को "मूर्ख बनाने" की कोशिश है. छठ के बहाने पूर्वांचलियों को लुभाने की कोशिश कोई नई बात नहीं. लेकिन जब आस्था को दिखावे और वोट के गणित से जोड़ दिया जाए, तो यह लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचाता है.

आम जनता के लिए जहरीली यमुना 

दिल्ली जल बोर्ड ने हथिनीकुंड बैराज से अतिरिक्त पानी छोड़ने और डी-फोमिंग स्प्रे के प्रयोग की बात कही. लेकिन क्या यह पर्याप्त है? रिपोर्टों के अनुसार यमुना में मल पदार्थ की मात्रा खतरनाक स्तर पर है. ऐसे में आम श्रद्धालु की सुरक्षा और स्वास्थ्य का क्या?
प्रधानमंत्री के लिए अलग घाट, अलग पानी, अलग व्यवस्था और आम जनता के लिए वही जहरीली यमुना. क्या यही लोकतंत्र है? क्या यही लोकआस्था का सम्मान है?
लोकआस्था के महापर्व छठ में दिखावा बिलकुल स्वीकार्य नहीं होता. व्रती बिना नमक का भोजन करते हैं, दिन-रात उपवास रखते हैं, और नदी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं. यह त्याग, अनुशासन और श्रद्धा का पर्व है. लेकिन जब इसी पर्व को राजनीतिक अवसर बना दिया जाए, तो यह आस्था का अपमान है.
लोकतंत्र का महापर्व चुनाव है. लेकिन अगर उसमें लोक की आस्था को केवल वोट के लिए इस्तेमाल किया जाए, तो यह लोकतंत्र नहीं, अवसरवाद है. छठ के बहाने राजनीति करना तो आसान है, लेकिन आस्था की गहराई को समझना बहुत कठिन.

Saturday, October 25, 2025

बिहार चुनाव 2025: सवर्ण समाज की राजनीति में वापसी की बेचैनी धर्मेंद्र कुमार



बिहार की राजनीति में सवर्ण जातियों ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ—का एक दौर था जब वे सत्ता के केंद्र में थे. 90 के दशक से पहले कांग्रेस की रीढ़ यही वर्ग था. फिर सामाजिक न्याय की लहर आई और लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में पिछड़ा वर्ग राजनीति का नया चेहरा बना. हालांकि सामाजिक न्याय के नाम पर लालू में पिछड़ी जातियों का कितना विकास किया यह चर्चा का विषय हो सकता है. लेकिन उन्होंने अगड़ों और पिछड़ों के बीच एक गहरी खाई जरुर बना दी. लालू ने अगड़ी जाति को पिछड़ी जाति के एक दुश्मन के तौर पर पेश करने की पूरजोर कोशिश कि जिसके परिणाम स्वरुप 90 के दशक में कई नरसंहार हुए. जिसमें अगड़ी और पिछड़ी दोनो जातियों के लोगों की जानें गई. लालू प्रसाद ने सामाजिक न्याय के आसरे सत्ता पर काबिज हुए और बिहार का बंटाधार कर दिया. पिछड़ी जातियों को रोजगार नहीं देकर उनके हाथों में लाठी डंडे जरुर थमा दिए. वहीं 2005 में नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली और भाजपा के साथ मिलकर एक नया समीकरण गढ़ा जिसमें सवर्णों ने फिर से निर्णायक भूमिका निभाई. लेकिन आज 2025 के चुनावी परिदृश्य में सवर्ण समाज खुद को राजनीतिक हाशिए पर महसूस कर रहा है. 
 जनसंख्या में गिरावट, हिस्सेदारी में कटौती
बिहार की जातिगत जनगणना के अनुसार सवर्ण जातियों की कुल आबादी लगभग 15% है. जिसमें राजपूत 5%, भूमिहार 5%, ब्राह्मण 4% और कायस्थ 1–1.2% की आबादी शामिल है. इस सीमित जनसंख्या के कारण राजनीतिक दलों ने टिकट वितरण में इन जातियों को प्राथमिकता देना बंद कर दिया है. 2025 के चुनाव में टिकटों की संख्या देखें तो राजपूतों को अपेक्षाकृत अधिक टिकट मिले वहीं भूमिहार को भी ठीक ठाक प्रतिनिधित्व मिला. लेकिन ब्राह्मण और कायस्थों की हिस्सेदारी नगण्य रही.
 राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं बदली
आज की राजनीति में पिछड़ा वर्ग (OBC), दलित और मुस्लिम वोट बैंक को साधना प्राथमिकता बन चुकी है. सवर्ण समाज, जो कभी सत्ता का निर्णायक स्तंभ था, अब "गणना में नहीं, गिनती में है". राजनीतिक दलों की रणनीति अब संख्यात्मक प्रभाव पर आधारित है, न कि ऐतिहासिक योगदान पर.
 सवर्ण समाज की बेचैनी और आत्ममंथन
बिहार के चुनाव में सवर्ण समाज के भीतर एक नई बेचैनी दिख रही है. पिछले दिनों बाहुबली नेता और पूर्व सांसद आनंद मोहन ने रघुवंश प्रसाद सिंह की पुण्यतिथि पर कहा कि “बिहार की सत्ता का फैसला ‘भूरा बाल’ करेगा.” यहाँ ‘भूरा बाल’ का अर्थ है भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला (कायस्थ). यह बयान न सिर्फ सवर्ण समाज को एकजुट होने का संकेत देता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सत्ता की चाबी अब भी इनके पास हो सकती है—यदि वे संगठित हों. वहीं भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूढ़ी ने कहा कि “मैं सवर्णों की आवाज बन चुका हूं. अब समय आ गया है कि सवर्ण समाज एकजुट हो.” उन्होंने यह भी दावा किया कि बिहार की 70 सीटों पर राजपूत समाज निर्णायक भूमिका निभा सकता है. उनका यह बयान सवर्ण समाज के भीतर नेतृत्व की तलाश और राजनीतिक पुनर्स्थापन की भावना को दर्शाता है. इन नेताओं के बयानों ने सवर्ण समाज को एक बार सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम सिर्फ "डालने वाले वोटर" रह गए हैं? क्या हमारी भूमिका अब सिर्फ "बैकबेंचर" की रह गई है?
इन सवालों ने सवर्ण समाज को आत्ममंथन की स्थिति में ला दिया है. कई युवा सवर्ण अब राजनीतिक दलों से दूरी बना रहे हैं, तो कुछ नए मंचों की तलाश में हैं. संख्या कम होने के बावजूद सवर्ण समाज का वोट निर्णायक हो सकता है. बशर्ते वो एकजूट हों. लगभग 70 सीटों पर सवर्ण समाज निर्णायक की भूमिका निभा सकते है, यदि वो एकजुट होकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करें. कई सीटों पर तो हार-जीत का अंतर 5–10% वोट से तय होता है. यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अपनी प्रतिष्ठा को बचाने के लिए सवर्ण समाज एकजुट होकर वोट करेगा या फिर वहीं ढ़ाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ होगी. 
बिहार की राजनीति में सवर्ण समाज भले ही संख्या में कम हो, लेकिन उसकी ऐतिहासिक भूमिका, वैचारिक ताकत और संगठित चेतना उसे आज भी निर्णायक बना सकती है. 2025 का चुनाव सवर्ण समाज के लिए सिर्फ वोट डालने का नहीं, अपना अस्तित्व बचाने का चुनाव है.

Tuesday, October 21, 2025

नीतीश ही होंगे मुख्यमंत्री इससे किसे है इंकार

बीजेपी को चाहिए बिहार में रिमोट कंट्रोंल सीएम
                        धर्मेंद्र कुमार

बिहार की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर है जहां तमाम उठापटक, गठबंधन, बयानबाज़ी और एक दूसरे को पछाड़ने की रणनीति के बावजूद एक नाम सबसे ऊपर है या यूं कहे कि उनके बिना बिहार की राजनीति की चर्चा अधूरी है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. जी हां आपने सही पहचाना मैं नीतीश कुमार की बात कर रहा हूं. 2025 के विधानसभा चुनावों की सरगर्मी के बीच यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? लेकिन जवाब हर बार नीतीश की ओर ही इशारा करता है. मैंने अपने पिछले आलेख में इस बात का जिक्र किया था कि नीतीश के बाद कौन लेकिन जबाव किसी के पास नहीं है.
नीतीश ने बिहार को विकास पथ पर बढ़ाया आगे
 नीतीश कुमार अब मात्र एक नेता नहीं रहे बल्कि वे बिहार के विकास मॉडल के एक ब्रांड के तौर पर स्थापित हो चुके हैं. संभव है आपको मेरी यह बात ठीक ना लगे, लेकिन जिन लोगों ने बिहार के लालू राज व 90 के दशक को देखा, समझा औऱ भोगा है उनके लिए तो हर हाल में नीतीश कुमार ही स्वीकार्य होंगे. यह ठीक है कि 20 वर्षों के शासनकाल में बिहार का जितना विकास होना चाहिए था उतना नहीं हो पाया, विशेषकर रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में औऱ आज भी बिहार सबसे पिछड़ा औऱ बीमारु प्रदेश के तौर पर जाना ताजा है. निश्चित रुप से इसके लिए नीतीश ही जिम्मेवार है लेकिन बिहार में आज जो आधारभूत संरचना के मामले में तरक्की हुई है उसका क्रेडिट तो कुमार की इच्छाशक्ति जाता है. उन्होंने कभी भी जातिगत राजनीति को साधने के लिए बिहार के विकास के साथ समझौता नहीं किया. तभी आज बिहार में सड़कों का जाल सा बिछ गया है. हाल के कुछ महीनों में बिहार में अपराधिक घटनाओं में वृद्धि हुई है जो चिंता का विषय तो है. वहीं सरकार के मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बावजूद नीतीश की खामोशी, उनको जानने वालों को लिए भी अनबुझ पहेली नब गई है. उनकी खामोशी का राज क्या है सीएम की कुर्सी या अप्रत्यक्ष दबाव ?

बीजेपी को चाहिए बिहार में रिमोट कंट्रोल मुख्यमंत्री
एनडीए ने भले ही अब तक नीतीश कुमार को औपचारिक रूप से मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित नहीं किया है, लेकिन चुनावी तैयारियों और प्रचार में उनका नाम और चेहरा लगातार सामने आ रहा है. भाजपा के शीर्ष नेता अमित शाह ने हाल ही में नीतीश से मुलाकात की और चुनावी रणनीति पर चर्चा की. लेकिन मुख्यमंत्री के चेहरा के नाम पर विधायक दल के नेता तय करने की बात कह कर नीतीश को मुख्यमंत्री का चेहरा खुले तोर पर घोषित करने से बचते दिखे. बीजेपी की मजबूरी कहे या जरुरत बिना नीतीश के अपने दम पर बिहार में बीजेपी के लिए सरकार बनाना संभव नहीं है. इसलिए नीतीश पर दबाव बनाने के लिए चिराग पासवान को 29 सीट देकर जदयू पर अप्रत्यक्ष रुस से दबाव बनाने का प्रयास किया गया. भाजपा का नेतृत्व यह जानता है कि यदि सीधे सीधे नीतीश को मुख्यमंत्री मानने से इंकार कर दिया तो संभव है कि नीतीश एक बार फिर इंडिया गठबंधन की ओर रुख कर दे जिसकी संभावना हर समय बनी हुई है. वहीं उनके वोट बैंक का लाभ भी नहीं मिल पाएगा. इसलिए बीजेपी नीतीश को उनके ही दल में अलग थलग करने की रणनीति पर काम कर रही है. जिसका एहसास भी उनको हो गया है. भाजपा को बिहार में एक ऐसा मुख्यमंत्री चाहिए जो रिमोट से कंट्रोल हो और उनके इशारे पर काम करें. ताकि वो बिहार में अपना एजेंडा सेट कर सकें. यही कारण है कि तमाम गंभीर आरोपों के बावजूद सम्राट चौधरी के खिलाफ पार्टी द्वारा कोई कार्रवाई नहीं किया जाना यह स्पष्ट संकेत है कि यदि गणित ठीक बैठ गया तो सम्राट चौधरी को सीएम बनाया जा सकता है. ताकि चौधरी के आसरे बिहार को साधा जा सके.

महागठबंधन की खुलती खिड़की
राजद और महागठबंधन के भीतर भी नेतृत्व को लेकर असमंजस है. तेजस्वी को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का चेहरा खेल तौर पर स्वीकार नहीं किया है क्योंकि इसकी अबतक महागठबंधन की और से आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है. क्योंकि अंदरखाने में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. यही कारण है कि गठबंधन स्तर पर कोई सर्वमान्य चेहरा अब तक सामने नहीं आया. ऐसे में अगर चुनाव परिणामों में जदयू को अपेक्षित सीटें नहीं मिलतीं और एनडीए नीतीश को दरकिनार करने की कोशिश करता है, तो यह संभावना बलवती हो जाती है कि नीतीश कुमार महागठबंधन की ओर रुख कर सकते हैं. नीतीश का राजनीतिक इतिहास भी इस संभावना को मजबूत करता है. वे पहले भी परिस्थितियों के अनुसार गठबंधन बदलते रहे हैं, और हर बार सत्ता की चाबी उन्हीं के हाथ में रही है. राजद सुप्रीमों लालू प्रसाद ने भी संकेत दिया है कि यदि नीतीश महागठबंधन के साथ आते है तो वे ही मुख्यमंत्री होंगे. वे जानते है कि नीतीश के आसरे बिहार की सत्ता पर आसानी से काबिज हुआ जा सकता है. उनके लिए ऐनकेन प्रकारेण सत्ता में बने रहना जरुरी है.
जनता की पसंद और राजनीतिक गणित
बिहार की जनता नीतीश को सुशासन बाबू के रूप में जानती है. उनके नेतृत्व में राज्य ने कई मोर्चों पर सुधार देखा है. यही कारण है कि भाजपा जैसे दल भी उनके नाम को पूरी तरह नकार नहीं सकते. उत्तराखंड और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री तक बिहार आकर नीतीश के नेतृत्व में विकास की बात कर रहे हैं. सबसे बड़ी बात की नीतीश पर कोई सीधे तौर पर दाग नहीं है और बिहार के विकास को लेकर विजन भी साफ है. इसकी बानगी तो बिहार में देखने को मिल रही है. हालांकि हाल के दिनों पर शासन व्यवस्था पर नीतीश की पकड़ बहुत कमजोर हुई है. इसके पीछे उनका स्वास्थ्य एक बड़ा कारण हो सकता है. लेकिन इन सबके बावजूद नीतीश के मुख्यमंत्री होने को लेकर कोई भी दल खुलकर विरोध करने की स्थिती में नहीं है इसका सबसे मजबूत कारण उनके साथ मजबूती के साथ खड़ा अति पिछड़ों का एक बड़ा वोट बैंक है जो नीतीश को अपना सर्वमान्य नेता मानता है. बिहार की राजनीति में चाहे जितनी भी चालें चली जाएं, एक बात साफ है—नीतीश कुमार को पूरी तरह नकारना किसी भी गठबंधन के लिए आसान नहीं होगा. वे न केवल राजनीतिक अनुभव का पर्याय हैं, बल्कि सत्ता संतुलन के ऐसे केंद्र हैं जिनके बिना कोई भी समीकरण अधूरा है.
वहीं, टिकट वितरण में असंतोष और बगावत की खबरें एनडीए और महागठबंधन दोनों में हैं. ऐसे में एक स्थिर और अनुभवी नेतृत्व की तलाश में नीतीश कुमार फिर से सबसे उपयुक्त विकल्प बन जाते हैं.