राजनीति का मंच अब अखाड़ा बन चुका है. जहां विचारधाराओं की कुश्ती नहीं बल्कि वफादारी की डब्ल्यू डब्ल्यू इ (WWE) चल रही है. एक ओर अंधभक्त हैं, जो अपने नेताओं की हर बात को वेदवाक्य मानते हैं और उनके झूठे बयानों को भी सच बताने के लिए तमाम तरह के गलत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. थेथरई उनका अमोध अस्त्र है, यदि उससे भी बात नहीं बनी तो गाली गलौज व मारपीट पर उतर जाते हैं. दरअसल अंधभक्तों की शिक्षा मूलतः व्हाट्स्अप यूनिवर्सिटी से हुई है. व्हाट्स्अप यूनिवर्सिटी से तो आप वाकिफ होंगे ही. आजकल उसी का ट्रेंड है. वहीं दूसरी ओर चमचों की बिरादरी है, जो अपने नेताओं के जूते चमकाने में इतनी महारत रखते हैं कि कभी-कभी इनके नेता खुद भ्रमित हो जाता है कि वो नेता है या सेलिब्रिटी.
तथ्यों की तिजोरी में ताले
इन दोनों वर्गों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनको तथ्यों से परहेज़ है. इतिहास की जानकारी तो इन्हें व्हाट्स्अप यूनिवर्सिटी से मिलती है, और भूगोल इनके लिए एक ट्रोल पोस्ट मात्र हैं. जब भी कोई सवाल उठता है, तो जवाब में आते हैं गूगल से प्राप्त अधकचरे आंकड़े, पुरानी क्लिपिंग्स, और भावनात्मक ब्लैकमेल पोस्ट. इन्हें अपने नेताओं के समक्ष अपनी वफादारी साबित करनी पड़ती है ताकि इनकी राजनीति की दुकान चलती रहे.
राजनीति में 'चाटुकारिता' ही सफलता की एक मात्र कुंजी है
किसी जमाने में भारतीय राजनीति में विचारधारा, नीति और जनसेवा की बात होती थी. लेकिन अब वहां ट्रेंडिंग हैशटैग, फोटोशूट, और टीवी डिबेट की नौटंकी है. नेता अब भाषण नहीं देते, डायलॉग मारते हैं. और उनके अनुयायी भक्त और चमचे उन डायलॉग्स को आत्मसात करते हैं. यदि आप शिक्षित, ईमानदार व प्रतिभावान है लेकिन आपके पास चाटुकारिता व चमचागिरी की कोई सर्टिफिकेट नहीं है तो लाख चाहने के बावजूद आप वर्तमान राजनीति में सफल नहीं हो सकते हैं. क्योंकि वर्तमान राजनीति में चाटुकारिता व चमचागिरी ही सफलता की कुंजी है.
नंबर वन कौन ?
नंबर वन बनने के इस महामुकाबले में जीत किसी की नहीं होती. बल्कि हार होती है विवेक की, तर्क की, और लोकतंत्र की गरिमा की. लेकिन दोनों ही पक्ष अपने-अपने आकाओं की जय-जयकार में इतने व्यस्त और मस्त हैं कि उन्हें समझाना अब तर्क व तथ्यों का अपमान लगता है. जब हर बात को सही साबित करने के लिए गलत उदाहरण दिए जाते हैं, तो कुछ देर के लिए ही सही जनता भी भ्रमित हो जाती है. लेकिन उस भ्रम में सच की हत्या हो जाती है. और जब सच मरता है, तो समाज में अंधविश्वास, घृणा, और टुकड़ों में बंटी सोच जन्म लेती है.
जब राजनीति में भक्तों और चमचों की संख्या बढ़ती है, तो जनता सिर्फ तमाशबीन बन जाती है. लेकिन हकीकत यही है कि तमाशा देखने से बदलाव नहीं आता. बदलाव आता है सवाल पूछने से, तथ्य को जानने से, और नेताओं को जवाबदेह बनाने से. अब निर्णय आपको करना है कि सबकुछ भुलाकर कुंभकर्णी निंद्रा में पड़े रहना है या फिर समाज और देश की बेहतरी के लिए मजबूती के साथ कदम बढ़ाना है. जय हिंद
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